Sunday, March 15, 2026
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सनातन और स्त्री के शाश्वत संबंधों पर मंथन, राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “सनातन एवं स्त्री : शाश्वत सिद्धांत और स्त्री शक्ति के अंतर संबंधों का अन्वेषण” के समापन सत्र में वक्ताओं ने सनातन संस्कृति और स्त्री शक्ति के पारस्परिक संबंधों पर व्यापक चर्चा की।
जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजीत गुप्ता ने कहा कि सनातन और स्त्री पर विचार करते समय मध्यकालीन परिस्थितियों का विश्लेषण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्राचीन व्यवस्था ही सनातन नहीं है, बल्कि सनातन वह है जो निरंतर प्रवाहमान और जीवंत रहता है। यूरोप को विकास का मॉडल मानने से सनातन मूल्यों की समझ कमजोर हुई है। उन्होंने कहा कि यूरोपीय धार्मिक मान्यताओं में स्त्री को कई बार वस्तु के रूप में चित्रित किया गया, जबकि भारतीय परंपरा में स्त्री सृजनशीलता और विकास का स्रोत है। स्त्री समाज और परिवार की धुरी है। यदि परिवार उजड़ेगा तो समाज भी बिखर जाएगा। सनातन संस्कृति में स्त्री केवल पूजनीय नहीं बल्कि सहगामिनी भी है।
दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि महाभारत की द्रौपदी का प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि स्त्री व्यक्ति है या वस्तु। यदि वह व्यक्ति है तो उसे दांव पर क्यों लगाया गया और यदि वस्तु है तो एक बार हार जाने के बाद पुनः उस पर अधिकार कैसे स्थापित किया गया। उन्होंने कहा कि समाज का प्रत्येक दौर आत्मावलोकन की मांग करता है और “प्रधान-पति” जैसा संबोधन वर्तमान समय में स्त्री की स्थिति का सूचक है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अभिनव मिश्रा ने कहा कि स्त्री सशक्तिकरण की चर्चा को ग्राम चौपाल तक ले जाने की आवश्यकता है। उन्होंने ऋग्वेद का उल्लेख करते हुए कहा कि अस्तित्व ही सृष्टि का मूल है और सनातन संस्कृति के स्त्री मूल्यों को पुनः रेखांकित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि पत्नी वह पवित्र भूमि है जिससे पति का जन्म होता है।
विश्वविद्यालय के वित्त अधिकारी जय मंगल राव ने कहा कि सनातन और स्त्री का संबंध अविछिन्न है और सनातन की प्राण शक्ति ही मातृशक्ति है। अपाला, घोषा, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों के उदाहरण स्त्री शक्ति की परंपरा को दर्शाते हैं।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कला संकाय की अधिष्ठाता एवं दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. कीर्ति पांडेय ने कहा कि सनातन में स्त्री के प्राचीन संदर्भ अत्यंत गौरवपूर्ण रहे हैं, हालांकि मध्यकालीन परिस्थितियां निराशाजनक रहीं। वर्तमान समय सशक्त स्त्री को पुनःसृजित करने का कालखंड है।
संगोष्ठी के पूर्व सत्रों को प्रो. द्वारकानाथ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की डॉ. शिखा श्रीवास्तव, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. अभिषेक कुमार, प्रो. प्रज्ञा चतुर्वेदी, प्रो. संतोष प्रकाश गुप्ता और डॉ. आमोद राय ने संबोधित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में संगोष्ठी के संयोजक डॉ. दीपक कुमार गुप्ता ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि दर्शनशास्त्र विभाग के समन्वयक डॉ. संजय राम ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रमेश चंद और डॉ. संजय तिवारी के साथ स्नातक के विद्यार्थियों ने किया।
संगोष्ठी में प्रो. गौर हरी बेहरा, प्रो. सुनीता मुर्मू, डॉ. देवेंद्र पाल, डॉ. धर्मेंद्र सिंह, डॉ. रंजन लता सहित अनेक आचार्य, पत्रकार, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

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