प्राइवेट हॉस्पिटलों में मौतों की जिम्मेदारी किसकी? सरकारी मशीनरी की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद बलिया में निजी अस्पतालों में हो रही संदिग्ध मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। बीते एक वर्ष के भीतर दर्जनों ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें मरीजों की मौत के बाद परिजनों ने निजी अस्पतालों पर लापरवाही और गलत इलाज के गंभीर आरोप लगाए हैं। इन घटनाओं के बाद धरना-प्रदर्शन, हंगामा और कार्रवाई की मांग तो होती है, लेकिन कुछ दिनों बाद मामले ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर इन मौतों की जिम्मेदारी किसकी है?

सरकारी संसाधनों से निजी अस्पतालों में रेफर क्यों?

जानकारी के अनुसार, अधिकांश मामलों में मरीजों को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों से एंबुलेंस या अन्य सरकारी संसाधनों के माध्यम से सीधे निजी अस्पतालों में भेजा जाता है। यह प्रक्रिया किसके आदेश पर होती है, इसकी न तो परिजनों को स्पष्ट जानकारी दी जाती है और न ही कोई पारदर्शी जांच सामने आती है। जब सरकारी अस्पताल और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं, तो निजी अस्पतालों में रेफर करने की मजबूरी क्यों पैदा होती है, यह आज भी अनुत्तरित है।

जांच के नाम पर खानापूर्ति

निजी अस्पतालों में मौत के बाद अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि मरीज की हालत पहले से ही गंभीर थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग द्वारा जांच की घोषणा तो होती है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं। न तो संबंधित निजी अस्पतालों पर ठोस कार्रवाई होती है और न ही उन सरकारी अधिकारियों या कर्मचारियों की जवाबदेही तय होती है, जिनकी भूमिका मरीज को निजी अस्पताल तक पहुंचाने में रही।

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एफआईआर के बाद भी नहीं बढ़ती जांच

बलिया में बीते एक साल में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें एफआईआर दर्ज होने के बावजूद जांच आगे नहीं बढ़ सकी। इससे आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि निजी अस्पताल और उनसे जुड़े तंत्र कानून से ऊपर हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इलाज के नाम पर अपनी जमा-पूंजी गंवा देते हैं और अंततः उन्हें अपनों की लाश ही मिलती है।

जवाबदेही तय करना जरूरी

अब सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कभी ठोस कदम उठाएगा? क्या सरकारी मशीनरी की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी? जब तक निजी अस्पतालों और उन्हें संरक्षण देने वाली व्यवस्था पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसी मौतों का सिलसिला रुकना मुश्किल है। जनहित में आवश्यक है कि प्रशासन जवाबदेही तय करे और दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई करे, ताकि आम जनता का स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा बना रहे।

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Karan Pandey

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