1- ज़रूरत है कुछ और बदलने की

एक तो वैसे ही बेरोजगारी थी,
कोरोना वाइरस ने और बढ़ा दी है,
सरकारें बड़े भाव खा रही हैं,
बड़े उद्योगपति मालामाल हो रहे हैं,
युवक युवतियाँ बेकार घूम रहे है ;
माँ – बाप उम्मीद में जी रहे हैं ;
पर दोनो धोखा खा रहे हैं..,
जिनके पास काम धंधे थे,
वो भी मंदी में ठोकरें खा रहे हैं ।

पुलिस, प्रशासन रिश्वत में व्यस्त है,
नेता, अधिकारी लूट में व्यस्त हैं,
किसान आंदोलन कर रहे हैं,
सेना के जवान गोली खा रहे हैं,
माफिया आतंक फैला रहे हैं,
दलाल मुनाफ़ा कमा रहे हैं,
महंगाई सुरसा जैसा मुँह बाये खड़ी है,
आख़िर में सूखा, बारिस पीछे पड़ी है,
सूखा, तो कहीं बाढ़ का पानी भरा है,
कौन कहता, कोई भूखा मर रहा है?

जो फ़र्स्ट डिवीजन थे वे डाक्टर,

इंजीनियर व वैज्ञानिक हैं,
जो सेकंड डिवीजन थे वे अफ़सर हैं,
जो थर्ड डिवीजन थे वे नेता मंत्री हैं,
जो फेल हो गए वे माफिया डान हैं,

फ़र्स्ट डिवीजन वाले को सेकंड डिवीजन वाले,

फ़र्स्ट, सेकंड डिवीजन वालों को

थर्ड डिवीजन वाले और इन तीनों

को फेल होने वाले कंट्रोल कर रहे हैं।

एमपी, एमएलए, मंत्री, मुख्यमंत्री,
व प्रधानमंत्री के लिए,कोई भी

शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है,
आठ पास सरपंच व प्रधान,

दसवीं व इंटर पास/फेल देश के मंत्री,
सबका साथ, सबका विकास,
सबका विश्वास और सबका
प्रयास करवा रहे हैं,
ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमफ़िल,
पीएचडी, वॉट्सएप पर ग्रुप-ग्रुप खेल रहे हैं ।

2-वतन का मान करते हैं तो ये नफ़रत कैसे

अगर वो यहीं के हैं तो उन्हें ये डर कैसे,
चोरी से घुसे हैं तो ये उनका वतन कैसे,
वतन का मान करते हैं तो ये नफ़रत कैसे,
जिहादी दाँव खेलें तो सियासत सही कैसे।

मजहबी दाँव चलते हैं तो ये इंसान कैसे,
मंदिर तोड़ के मस्जिद बनायें ये धर्म कैसे,
क़ायदे क़ानून अलहदा,तो ये न्याय कैसे,
वतन के बाँटने वाले इस वतन के हैं कैसे।

सबका साथ, सबका विकास,
सबके विश्वास व सबके प्रयास
के सिद्धांत की बात ही कर रहा है,
कहने वाला सब सच कह रहा है।

भारत में रहने वाला हर वह शख़्स
भारत से प्रेम करने का अधिकारी है,
इस सिद्धांत को जो दिल से मानता है,
देश के विश्वगुरु होने की बात करता है।

देश के हित में हिलमिल कर रहना होगा,
राजनीतिक लोभ नहीं देश देखना होगा,
देश में रहने वाला हर शख़्स देश प्रेमी है,
देश द्रोही पर बाँटने की बात करता है।

धर्म नहीं, जाति नहीं, रंग नहीं, प्रांत नहीं,
भाषा विभेद नहीं, क्षेत्रीयता का प्रश्न नहीं,
एकसूत्र में हर पुष्प पिरोकर रखना होगा,
सांस्कृतिक विरासत संजोये रखना होगा।

ईर्ष्या, घृणा से व्याप्त नकारात्मकता
भूल, प्रेम एवं त्याग की सकारात्मकता,
अपनाकर ही आदित्य चलना होगा,
काम, क्रोध, मद, लोभ छोड़ना होगा।

•कर्नल आदि शंकर मिश्र’आदित्य’

rkpnews@desk

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