(प्रस्तुति सुधीर मिश्र उर्फ अंतिम बाबा)
मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल इस नश्वर शरीर से संसार के भोगों का आनंद लेना कभी नहीं रहा। यह तन अंततः मिट्टी में मिल जाएगा, लेकिन उससे पहले हमें ईश्वर को जानना और भक्ति मार्ग को अपनाना है। यही वह संदेश है, जो भगवान शंकर ने माता पार्वती को दिया और जिसे महापुरुषों ने श्रीराम कथा के रूप में प्रसारित किया।
भगवान शंकर कहते हैं—
“तेसिर कटु तुंबरि समतूला।
जे नमत हरि गुर पद मूला।।”
अर्थात जिन लोगों का सिर भगवान श्रीहरि और गुरु के चरणों में नहीं झुकता, उनका सिर उस तुमड़ी फल के समान है, जो बाहर से सुंदर और आकर्षक दिखता है, लेकिन अंदर से अत्यंत कड़वा होता है। अगर कोई गलती से भी उसे चख ले, तो उसके मुंह की कड़वाहट शहद खाने पर भी नहीं जाती।
इतिहास में औरंगजेब इसका उदाहरण है—भले ही उसका साम्राज्य विशाल था और सिर पर जगमगाता ताज, किंतु भक्ति-विहीन होने के कारण उसका मस्तक भी तुमड़ी के समान ही था।
संतजन सदा से कहते आए हैं कि जीवन क्षणभंगुर है। इसे ऐसे महान कार्यों में लगाना चाहिए कि शरीर मिट्टी हो जाने के बाद भी, लोग हमारे स्थान पर मस्तक झुकाएं। यह तभी संभव है, जब हम भक्ति के मार्ग का अनुसरण करें।
भक्ति-विहीन जीवन, जीवित शव के समान
शंकर जी आगे कहते हैं—
“जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी।
जीवत सव समान तेइ प्रानी।।”
जिस हृदय में भगवान की भक्ति का वास नहीं है, वह जीवित होकर भी मृतक समान है। ऐसे व्यक्ति के भीतर पाँच विकार—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—की दुर्गंध फैली रहती है, जो अंततः उसे विनाश की ओर ले जाती है। यही दुर्गंध रावण में थी, जिसने उसके स्वर्ण-निर्मित लंका महल को भी उसे बचाने में असमर्थ बना दिया।
निंदा और चुगली – मेंढक की प्रवृत्ति
भोलेनाथ ऐसे लोगों पर भी टिप्पणी करते हैं, जो अपनी जीभ से दिन-भर निंदा, चुगली और व्यर्थ की बातें करते हैं। भगवान शंकर कहते हैं—
“हे पार्वती! ऐसे लोग मेरे लिए मेंढक के समान हैं।”
मेंढक दिन-भर टर्र-टर्र करता है, जिसका कोई लाभ समाज को नहीं होता। इसी तरह चुगलखोर और निंदक केवल वाणी का दुरुपयोग कर ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं। शंकर जी कहते हैं कि हमें व्यर्थ की बातों में समय गंवाने के बजाय, प्रभु की महिमा का गान करना चाहिए, क्योंकि उसी में हमारा कल्याण निहित है।
मानव जीवन का सार यही है कि हम इसे प्रभु की भक्ति और गुरु सेवा में लगाएं। जीवन में श्रद्धा, विनम्रता और भक्ति का संचार करके ही हम इस नश्वर शरीर को सार्थक बना सकते हैं। अन्यथा, यह शरीर चाहे कितना भी सुंदर और सामर्थ्यवान क्यों न हो, तुमड़ी के समान ही निष्फल है।
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