पश्चिम बंगाल से उठता सवाल: क्या सत्ता कानून से ऊपर हो सकती है?

नवनीत मिश्र

पश्चिम बंगाल की घटना केवल एक क्षणिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं और संस्थागत संतुलन पर गहराते संकट की ओर संकेत करती है। जब कोई केंद्रीय एजेंसी विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत छापा मार रही हो और उसी समय राज्य का मुख्यमंत्री वहाँ पहुँचकर फाइलें उठाने लगे, तो यह दृश्य अपने-आप में कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यह सवाल केवल सत्ता के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि कानून के शासन की अवधारणा पर सीधी चोट का है।
लोकतंत्र में जांच एजेंसियाँ व्यक्ति या पद नहीं देखतीं, वे तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर काम करती हैं। यदि जांच प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप होने लगे, तो संदेश स्पष्ट होता है कि कानून सबके लिए समान नहीं रह गया। इसका असर केवल एक प्रकरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिक के मन में न्याय व्यवस्था को लेकर अविश्वास पैदा करता है।
मुख्यमंत्री का पद संवैधानिक संयम, मर्यादा और संस्थाओं के प्रति सम्मान का प्रतीक होता है। जब वही पद जांच एजेंसियों के कार्य में बाधा डालता हुआ दिखाई दे, तो यह प्रशासनिक अराजकता और सत्ता की असहजता को उजागर करता है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि सत्ता स्वयं को कानून से ऊपर समझने लगी है। जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
पश्चिम बंगाल पहले से ही राजनीतिक हिंसा, संस्थागत टकराव और प्रशासनिक अव्यवस्था के आरोपों से घिरा रहा है। ऐसे में इस तरह की घटनाएँ राज्य की छवि को और नुकसान पहुँचाती हैं। निवेश, विकास और सामाजिक सौहार्द के लिए सबसे आवश्यक तत्व है, कानून पर भरोसा। जब यही भरोसा कमजोर पड़ता है, तो विकास की गति भी ठहर जाती है।
यह मुद्दा केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश के लिए चेतावनी है कि यदि आज किसी राज्य में संवैधानिक संस्थाओं को खुली चुनौती दी जाती है और उसे राजनीतिक संरक्षण मिलता है, तो कल यही प्रवृत्ति अन्य राज्यों में भी फैल सकती है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि सत्ता में बैठे लोग स्वयं को कानून के अधीन मानें, न कि कानून को अपने अधीन।
अंततः प्रश्न किसी व्यक्ति या दल का नहीं, बल्कि व्यवस्था का है। जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से काम करने देना, न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करना और संवैधानिक सीमाओं का पालन करना। यही लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि इन मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज किया गया, तो उसका खामियाजा केवल किसी सरकार को नहीं, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ेगा।

rkpNavneet Mishra

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