विश्व हिंदी दिवस: माँ भारती के माथे पर सजी भाषा की अमिट आभा

हिंदी केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की धुरी है। विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर यह अनुभूति और गहरी हो जाती है कि हिंदी माँ भारती के माथे पर उस श्रृंगार की तरह सुशोभित है, जो उसकी पहचान, गरिमा और आत्मसम्मान को उजागर करता है। यह भाषा जन-जीवन से निकली, जन-मन में रची-बसी और समय-समय पर राष्ट्र की दिशा तय करने वाली आवाज़ बनी।
स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सामाजिक सुधारों तक, हिंदी ने संघर्षों को शब्द दिए और सपनों को आकार। संत-कवियों की वाणी में अध्यात्म, साहित्यकारों की लेखनी में यथार्थ और जनआंदोलनों में साहस, हर स्तर पर हिंदी ने समाज का दर्पण बनकर भूमिका निभाई। यही कारण है कि हिंदी विचारों की वाहक ही नहीं, मूल्यों की संवाहक भी है।
वैश्वीकरण के युग में विश्व हिंदी दिवस यह संदेश देता है कि हिंदी सीमाओं से परे अपनी जगह बना रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसकी उपस्थिति, विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन-अध्यापन और प्रवासी भारतीयों के माध्यम से निरंतर विस्तार इस बात का प्रमाण है कि हिंदी में वैश्विक संवाद की क्षमता है। सरलता, आत्मीयता और स्वीकार्यता ने हिंदी को विश्व-समुदाय से जोड़ा है।
फिर भी आधुनिकता की दौड़ में अपनी ही भाषा से दूरी चिंता का विषय है। अंग्रेज़ी की अनिवार्यता के बीच हिंदी को कमतर आंकना आत्मघाती सोच है। विश्व हिंदी दिवस आत्ममंथन का अवसर देता है कि हिंदी को घर, विद्यालय, कार्यालय और तकनीक, हर क्षेत्र में सम्मान और अवसर कैसे मिले। भाषा तभी फलती-फूलती है, जब वह रोज़मर्रा के व्यवहार में जीवित रहती है।
डिजिटल युग में हिंदी की बढ़ती मौजूदगी आशा जगाती है। तकनीक, विज्ञान, स्टार्टअप और नवाचार के क्षेत्र में हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ रही है। आवश्यकता है कि शब्दावली के विकास, गुणवत्तापूर्ण सामग्री और सृजनशील प्रयोगों से हिंदी को भविष्य की भाषा बनाया जाए।
विश्व हिंदी दिवस पर संकल्प यही होना चाहिए कि हिंदी केवल बोली न जाए, बल्कि सोची जाए, रची जाए और जी जाए। क्योंकि जब हिंदी समृद्ध होगी, तभी माँ भारती के माथे पर सजी यह भाषा-सौंदर्य विश्व को भारतीय संस्कृति की उज्ज्वल पहचान कराता रहेगा।

rkpNavneet Mishra

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