डॉ. संदीप मिश्र
छत्तीसगढ़ की धरती केवल खनिज, वन और नदियों के लिए ही नहीं जानी जाती, बल्कि यह ऐसी विभूतियों की जन्मस्थली भी रही है जिन्होंने अपने साहित्य से भारतवर्ष की चेतना को गहराई तक स्पर्श किया। इन्हीं अनमोल रत्नों में एक नाम है, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘मास्टरजी’ कहा गया। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करना केवल अतीत को याद करना नहीं, बल्कि उस विचार-धारा को पुनः जीवित करना है, जिसने साहित्य को जीवन से जोड़ दिया।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का व्यक्तित्व सरलता और गंभीरता का अनूठा संगम था। शिक्षक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों को केवल अक्षर-ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि जीवन-मूल्यों की शिक्षा भी दी। इसी कारण ‘मास्टरजी’ नाम उनके व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन गया। साहित्य उनके लिए मनोरंजन या प्रतिष्ठा का साधन नहीं, बल्कि समाज से संवाद करने का माध्यम था।
उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ की माटी की महक स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। ग्रामीण जीवन, लोकसंस्कृति, सामाजिक विषमताएँ और मानवीय संवेदनाएँ ये सब उनके साहित्य के केंद्र में रहीं। उन्होंने सरल भाषा में गहरी बातें कहने की कला विकसित की। यही कारण है कि उनका लेखन सामान्य पाठक से लेकर गंभीर अध्येता तक सभी को समान रूप से आकर्षित करता है।
मास्टरजी का साहित्य आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच संतुलन स्थापित करता है। वे समाज की कमजोरियों को पहचानते भी हैं और उन्हें सुधारने का मार्ग भी सुझाते हैं। उनकी रचनाओं में नैतिकता उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के स्वाभाविक अनुभव के रूप में सामने आती है। यही गुण उन्हें अपने समय के अन्य साहित्यकारों से अलग पहचान देता है।
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का योगदान केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने हिंदी साहित्य को छत्तीसगढ़ की लोक-चेतना से जोड़ा और क्षेत्रीय अनुभवों को राष्ट्रीय साहित्यिक मंच तक पहुँचाया। इस दृष्टि से वे सेतु की तरह हैं। लोक और शास्त्र, ग्राम और राष्ट्र, अनुभव और विचार के बीच।
आज उनकी पुण्यतिथि पर जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक संकल्प भी है कि साहित्य को जीवन से, समाज से और संवेदना से जोड़े रखा जाए। मास्टरजी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके शब्द, उनके विचार और उनकी साहित्यिक सुगंध आज भी भारतवर्ष को महकाए हुए हैं। यही उनकी सच्ची अमरता है।
