मेरी रचना, मेरी कविता
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मैं नही वियोगी कभी रहा,
पर कविताएँ लिखता था,
कभी विरह में नही जला,
पर गीत, ग़ज़ल रचता था।
कल्पना मेरी, लेखनी मेरी,
इस मन-मानस के साथी हैं,
सोच- समझ की स्वरमाला,
अच्छरमाला बन जाती है ।
शब्दों का चयन, वाग़दा का वर,
नव स्वर सरगम बन जाते हैं ।
कुछ नव स्वर हों, नव गीत रचूँ,
नव ताल लिये लय लाते है ।
आदि कवि से स्वर लेकर,
सारे कवि कविता लिख पाये।
कवि सूर सूर्य, तुलसी शशि,
कवि केशव उड़ुगन कहलाये।
काव्यों-महाकाव्यों की रचना,
प्रतिभूति-न्यास वांग़मय के ।
वेद, उपनिषद, पुराण, संहिता,
बृहद कोष समृद्ध संस्कृति के।
रामायण, महाभारत, गीता
ज्ञान गंगा की गहरी धार।
गोते गहरे लगा लगा कर,
मानव करते जीवन पार ।
काव्य-कौमुदी है बैतरणी,
पुण्य प्रतापी है सलिला ।
सारे तीर्थों का यश लेकर,
उतरें पार पुरुष व महिला ।
काम, क्रोध, मद, लोभ छोड़,
सुख- शान्ती ऐश्वर्य मिले ।
कवि की कविता कहती है,
विद्या पाकर विनय मिले ।
गीतों में रोमांस भरा हो,
ग़ज़लों में दिखती तकरार ।
चल-चित्रों में नायक गाकर,
अभिनेत्री से करता प्यार ।
विरह, वियोग, योग कविता
के होते हैं अनुपम आधार ।
आदित्य कल्पना ही कवि की,
कविता में देती रसधार ।
कर्नल आदि शंकर मिश्र, ‘आदित्य’
लखनऊ
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