डर के साए में नहीं, विश्वास के माहौल में हो शिक्षा-प्रदीप कुमार

भागलपुर /देवरिया
क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था सचमुच बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में आगे बढ़ रही है? यह सवाल आज केवल विद्यालयों से नहीं, बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और पूरे समाज से पूछा जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा कराना, परीक्षा में अंक दिलाना या बच्चे को अगली कक्षा में पहुंचाना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य बच्चे को एक जिम्मेदार, संवेदनशील, आत्मनिर्भर और सभ्य नागरिक बनाना है।
आज कई विद्यालयों में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संबंधों को लेकर परिस्थितियां बदल रही हैं। शिक्षक किसी बच्चे को उसकी गलती पर डांट दे तो मामला अभिभावक तक पहुंच जाता है और कई बार शिक्षक से ही जवाब-तलब होने लगता है। दूसरी ओर, कुछ शिक्षक भी अनुशासन के नाम पर बच्चों के साथ कठोर व्यवहार कर बैठते हैं। इन दोनों स्थितियों के बीच सबसे अधिक नुकसान शिक्षा की मूल भावना का होता है।
अनुशासन जरूरी है, लेकिन अनुशासन और भय में अंतर है। बच्चे को गलती समझाकर सुधारना शिक्षा है, जबकि हर समय डर के माहौल में रखना उसके व्यक्तित्व के विकास में बाधा बन सकता है। शिक्षक को सम्मान मिलना चाहिए और बच्चे को भी सम्मानजनक वातावरण मिलना चाहिए। अभिभावक और शिक्षक एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि बच्चे के भविष्य के दो महत्वपूर्ण सहयोगी हैं।
दूसरा बड़ा सवाल विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली किताबों और उनकी कीमत को लेकर है। अभिभावक विद्यालय की फीस और शिक्षक के पारिश्रमिक को शिक्षा की आवश्यक लागत मानकर स्वीकार करता है, लेकिन जब किताबों की संख्या, कीमत और उपयोगिता पर सवाल उठते हैं तो उस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए। क्या हर महंगी किताब वास्तव में बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी है? क्या किताबों का चयन बच्चे की उम्र, मानसिक क्षमता और वास्तविक जीवन की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है? यह जांचने और समझने की जरूरत है।
पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो बच्चे को केवल परीक्षा पास करना न सिखाए, बल्कि उसे जीवन जीना भी सिखाए। व्यवहार, नैतिकता, संवाद, पर्यावरण, वित्तीय समझ, तकनीक का जिम्मेदार उपयोग, स्वास्थ्य, सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता जैसे विषय भी शिक्षा का हिस्सा बनने चाहिए। किताबें ऐसी हों जिनका संबंध बच्चे की वास्तविक जिंदगी से हो।
आज ऑनलाइन कक्षाओं और मोबाइल आधारित पढ़ाई का दौर भी है। तकनीक शिक्षा का बेहतरीन माध्यम बन सकती है, लेकिन सवाल यह है कि बच्चा मोबाइल पर वास्तव में क्या सीख रहा है? हर डिजिटल सामग्री ज्ञानवर्धक नहीं होती। इसलिए बच्चों को मोबाइल देने से ज्यादा जरूरी है उन्हें मोबाइल के सही उपयोग की समझ देना।
निजी विद्यालयों में शिक्षकों की स्थिति पर भी समाज को विचार करना चाहिए। यदि किसी शिक्षक को बेहद कम वेतन में लंबे समय तक काम करना पड़ता है, तो उससे गुणवत्तापूर्ण और समर्पित शिक्षा की अपेक्षा करना कितना उचित है? शिक्षक केवल नौकरी करने वाला कर्मचारी नहीं है। वह आने वाली पीढ़ी के निर्माण में भूमिका निभाता है। जिस समाज में शिक्षक को सम्मान, उचित पारिश्रमिक और सुरक्षित कार्य वातावरण नहीं मिलेगा, वहां शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ना स्वाभाविक है।
बेशक, सभी शिक्षक आदर्श नहीं होते और सभी अभिभावक भी गलत नहीं होते। हर व्यवस्था में अच्छे और कमजोर दोनों पक्ष होते हैं। लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार के कारण पूरे शिक्षक समुदाय को संदेह की नजर से देखना भी उचित नहीं है। अधिकांश शिक्षक चाहते हैं कि उनके विद्यार्थी उनके विषय में बेहतर प्रदर्शन करें, आगे बढ़ें और समाज में अपना स्थान बनाएं। शिक्षक की सफलता कहीं न कहीं उसके विद्यार्थी की सफलता से जुड़ी होती है।
इसी तरह अभिभावकों की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे अपने बच्चों पर पैसा खर्च करते हैं तो उनकी अपेक्षाएं भी होती हैं। लेकिन अपेक्षा और दबाव के बीच की रेखा समझना जरूरी है। बच्चे को हर सुविधा देना पर्याप्त नहीं है; उसके साथ समय बिताना, उसकी बात सुनना और यह समझना भी जरूरी है कि वह उन सुविधाओं का उपयोग किस दिशा में कर रहा है।
आज जरूरत शिक्षक को डराने की नहीं, शिक्षक पर विश्वास करने की है। जरूरत बच्चे को दबाने की नहीं, उसे सही दिशा देने की है। जरूरत अभिभावक और विद्यालय के बीच विवाद की नहीं, संवाद की है।
शिक्षा तभी सार्थक होगी जब विद्यालय ज्ञान का केंद्र होने के साथ-साथ संस्कार, अनुशासन, स्वतंत्र सोच और मानवीय संवेदनाओं का भी केंद्र बने।
हमें यह तय करना होगा कि हमारा लक्ष्य केवल अच्छे अंक लाने वाला बच्चा तैयार करना है या ऐसा इंसान तैयार करना है जो जीवन की चुनौतियों का सामना कर सके, अपने माता-पिता और शिक्षकों का सम्मान करे, समाज के प्रति जिम्मेदार हो और अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता रखता हो।
शिक्षक को सम्मान, अभिभावक को विश्वास और बच्चे को सुरक्षित एवं स्वतंत्र सीखने का वातावरण—इन तीनों के संतुलन से ही बेहतर शिक्षा व्यवस्था का निर्माण संभव है।
क्योंकि डर से बच्चा कुछ समय के लिए चुप हो सकता है, लेकिन विश्वास और प्रेम से ही वह जीवनभर सीखने वाला इंसान बन सकता है।

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