✍️ पुनीत मिश्र
जब भी भारत में देशभक्ति की धुनें गूंजती हैं, जब भी किसी समारोह में राष्ट्रप्रेम की भाव-लहर उठती है और जब भी लोगों की आंखें वीरों के स्मरण में नम होती हैंl वहाँ एक नाम अनायास ही स्मरण हो जाता है; कवि प्रदीप का। उनकी कलम ने ऐसे अमर गीत रचे, जिन्होंने पूरे राष्ट्र को एक भाव, एक स्वर और एक संकल्प में पिरो दिया।
‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ की पहली ही पंक्तियाँ सुनते ही आज भी हर भारतीय का मन शहीदों के प्रति कृतज्ञता से भर उठता है। यह गीत केवल संगीत नहींl बल्कि राष्ट्र के वीरों को सामूहिक नमन है। यह वह भाव-लहर है, जिसने पीढ़ियों से भारतीयों के मन में देशप्रेम की ज्योति को जीवित रखा है।
इसी तरह ‘साबरमती के संत…’ के माध्यम से कवि प्रदीप ने गांधीजी के आदर्शों को अत्यंत सरल, सहज और भावपूर्ण शैली में देश के हर व्यक्ति तक पहुँचाया। उनकी भाषा लोकभाषा की तरह सरल, लेकिन भावों में अत्यंत गहरी थीl यही कारण है कि उनका लिखा हर गीत सीधे दिल में उतर जाता है।
कवि प्रदीप की लेखनी में न दिखावा था, न जटिलता। वे जीवन, समाज और राष्ट्र की धड़कनों को सुनते थे और फिर उन्हें शब्दों के उस संगीत में ढालते थे, जिसमें संवेदना भी होती थी और चेतना भी। वे वास्तव में जनकवि थेl जो जनता की भाषा में जनता की भावना को व्यक्त करते थे।
उनके गीतों ने समय-समय पर देश को न केवल प्रेरणा दी, बल्कि कठिन परिस्थितियों में मनोबल भी बढ़ाया। युद्धकाल में उनका काव्य सैनिकों के साहस को सम्बल देता था, तो आज भी राष्ट्रीय पर्वों, विद्यालयों और बड़े सांस्कृतिक आयोजनों तक उनकी रचनाएँ पूरे गर्व और भावुकता के साथ गाई जाती हैं।
कवि प्रदीप केवल एक गीतकार नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रभाव के सबसे प्रखर और जीवंत स्वर थे। उनकी रचनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर पीढ़ी में नई ऊर्जा के साथ फिर से जीवित हो उठती हैं। यही कारण है कि आज भी जब राष्ट्रभक्ति की बात आती है, तो कवि प्रदीप की आवाज़ मन के किसी कोने में अनायास गूंज उठती है-
“देशभक्ति कोई क्षणिक भावना नहीं,
वह हमारे जीवन का सदैव जलता दीपक है।”
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