✍️ नवनीत मिश्र
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस वह व्यक्तित्व हैं जिन्होंने संघ के कार्य को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाया और संगठन को राष्ट्रजीवन की धड़कनों से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य को प्रमाणित करता है कि संगठन विचारों से जन्म लेता है, परंतु वह व्यवहार, अनुशासन, संवेदनशीलता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति आत्मीयता से मजबूत बनता है। 11 मार्च 1915 को नागपुर में जन्मे देवरस जी बचपन से ही अध्ययन, अनुशासन और समाजसेवा के भाव से सम्पन्न थे।
डॉ. हेडगेवार और गुरुजी गोलवलकर के निकट सान्निध्य ने उनके भीतर राष्ट्रधर्म की ऐसी ज्वाला प्रज्वलित की, जिसने उनके जीवन को दिशा और उद्देश्य दोनों प्रदान किए। सरसंघचालक का दायित्व संभालते ही उन्होंने संघ के कार्य को समाज की वास्तविक नब्ज से जोड़ा। वे भलीभाँति जानते थे कि राष्ट्र की मजबूती केवल नीतियों से नहीं, बल्कि समाज की एकजुटता और समरसता से निर्मित होती है। इसी सोच के साथ उन्होंने संघ को वंचित बस्तियों, ग्रामीण अंचलों और समाज के उपेक्षित वर्गों तक पहुँचाया।
भेदभाव को वे राष्ट्र की कमजोरी और समरसता को उसकी सर्वश्रेष्ठ शक्ति मानते थे। उनके मार्गदर्शन में सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्राम-विकास के क्षेत्र में व्यापक कार्य हुए, जिन्होंने संघ की छवि को अधिक जनोन्मुख बनाया। उनके लिए समरसता कोई नारा नहीं, बल्कि आचरण का विषय थीl जीवन के हर क्षण में दिखाई देने वाला व्यवहार।
आपातकाल के दौर में उनका नेतृत्व विशेष रूप से उभरकर सामने आया। वह समय राजनीतिक अस्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा का था, परंतु देवरस जी ने पूरे संगठन को संयम, दृढ़ता और सत्यनिष्ठा के साथ मार्ग दिखाया। उनकी भाषा में कठोरता नहीं, बल्कि राष्ट्रहित की स्पष्टता और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प था। इस चुनौतीपूर्ण कालखंड में उनका धैर्यपूर्ण नेतृत्व देश के लोकतांत्रिक आंदोलन का आधार साबित हुआ।
देवरस जी की दृष्टि में भारतीय परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं थे। वे संस्कृति की जड़ों से जुड़े रहते हुए विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और आधुनिक साधनों को युग की आवश्यकता मानते थे। उनके भीतर यह गहरा विश्वास था कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान और आधुनिक क्षमता के संगम से विश्व को नई दिशा दे सकता है।
व्यक्तित्व की दृष्टि से वे अत्यंत सरल, सहज और आत्मीय थे। उनसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति उनकी विनम्रता और मनुष्यता का अनुभव करता था। संगठन के छोटे से छोटे कार्यकर्ता को भी वे सम्मान और आत्मीयता से सुनते थे। यही सरलता, यही मानवीयता उनके नेतृत्व की वास्तविक शक्ति थी, जिसने असंख्य स्वयंसेवकों को प्रेरित किया।
उनका चिंतन राष्ट्र के भविष्य से गहराई से जुड़ा था। वे मानते थे कि सत्ता परिवर्तन राष्ट्रनिर्माण का आधार नहीं होता; राष्ट्र निर्माण विश्वास, मूल्य, नैतिक आचरण और अनुशासन से होता है। इसलिए उन्होंने जीवनभर चरित्र निर्माण को समाज निर्माण का मूल मंत्र बताया।
बालासाहेब देवरस का जीवन एक सतत प्रवाहित धारा की भाँति हैlजिसमें सेवा, समरसता, संगठन और राष्ट्रभाव का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। उनका योगदान केवल संघ के इतिहास तक सीमित नहीं, वह पूरे भारतीय समाज की चेतना को स्पर्श करने वाला है। उनकी सोच, उनका व्यवहार और उनका मार्गदर्शन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
सैकड़ों अधिवक्ताओं ने कोतवाली परिसर में दिया धरना, कोतवाल और दीवान के खिलाफ कार्रवाई की…
75 जिलों में से 50 का सर्वे पूरा, 25 जिलों में काम बाकी; पंचायत चुनाव…
फोटो AI निर्मित महिला ने पकड़ा DM आनंद शर्मा का कॉलर, फिर भी नहीं खोया…
रांची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। झारखंड की राजधानी रांची के बेड़ो थाना क्षेत्र में सोमवार…
तीन नाबालिग लड़कियों से दुष्कर्म का आरोप, दो संदिग्ध हिरासत में; पॉक्सो एक्ट के तहत…
रेलवे ट्रैक पर जोरदार धमाका! ट्रेन को उड़ाने की साजिश की आशंका, बाल-बाल टला बड़ा…