महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जनपद की सड़कों पर रफ्तार का खेल जानलेवा बनता जा रहा है। किसी भी प्रकार की गति में जरा-सा भी भटकाव, एक सेकेंड की लापरवाही… और पूरा परिवार उजड़ जाता है। हालिया हादसों ने साबित कर दिया है कि सड़कें अब सिर्फ रास्ते नहीं रहीं, मौत का जाल बन चुकी हैं। हर रोज किसी न किसी को
तेज गति,बिना नियंत्रण वाहन,गलत ओवरटेक,मोबाइल पर बात,या ध्यान भटकने का खामियाजा अपनी जान देकर चुकाना पड़ रहा है।
चेतावनी पट्टिकाएं लगी हैं—पर लोग पढ़ते नहीं। नियम बने हैं—पर मानते नहीं। नतीजा: अस्पताल भरे पड़े हैं, परिवार रो रहे हैं, और सड़कें खून से लाल हो रही हैं।पिछले कुछ दिनों में ही कई दर्दनाक हादसों ने जनपद को झकझोर दिया—पर रफ्तार के दीवानों पर कोई असर नहीं। सड़क सुरक्षा नियम उनके लिए मजाक बनकर रह गए हैं। हेलमेट न पहनना, सीटबेल्ट न लगाना, रात में हाई बीम का गलत इस्तेमाल—यह सब मिलकर हादसों को और भी भयावह बना रहे हैं। यातायात विभाग मान चुका है कि सड़क पर होने वाली ज्यादातर मौतें टाली जा सकने वाली मौतें हैं। अगर वाहन चालक,गति सीमित रखें,मोबाइल से दूरी बनाएं,और सड़क अनुशासन का पालन करें,तो आधे से ज्यादा हादसे कभी न हों।
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लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उल्टा है।लोग गाड़ी नहीं चलाते—गोलियों की तरह सड़क पर दौड़ते हैं।और जब हादसा होता है, तो पीछे छूट जाते हैं सिर्फ चीखें, पछतावा और बिखरी हुई ज़िंदगियां। विशेषज्ञों की चेतावनी है—रफ्तार मज़ा नहीं देती, मौत देती है। संभल जाएं, वरना एक सेकेंड की गलती पूरी ज़िंदगी ले सकती है।
अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन सड़कों पर चल रहे इस मौत के खेल को रोकने के लिए कड़े कदम उठाएगा?और सबसे बड़ा सवाल—क्या लोग अपनी जान की कीमत समझेंगे?
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