— डॉ. कर्नल
आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
परस्पर आदर–सम्मान का व्यवहार,
प्रेम और सद्भाव का है आधार।
यह शाश्वत सत्य जग ने माना,
ताली न बजे, जब तक हों न दो प्राण।
जो ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, पूज्य जनों की
उपस्थिति में करता है उपेक्षा,
वह कृतघ्नता के दर्पण में
अपना ही चरित्र दिखाता है स्पष्टता से।
जो सादर सम्मान अर्पित करे,
उसकी अवहेलना जो करता जाए,
वह मानव नहीं, कृतघ्न कहलाए,
अपने आचरण से स्वयं को नचाए।
ऐसे व्यक्ति अहंकार के नशे में,
विवेक को तज, उन्माद में जीते,
विषय-वासनाओं में लिप्त रहकर
पशुवत् आचरण को ही अपनाते।
ज्ञानहीनता, विवेकहीनता संग
संस्कारहीनता जब मन में बस जाए,
तो जीवन के हर पथ पर
अंधकार स्थायी रूप से छा जाए।
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