रद्दा देखत रइहौंव तोर, गियां रे मंझनिया के पहाती।
आबे मोर खेत म मयारू, टोरे ल तिवरा, चना भाजी।।
केंवची-केंवची पाना ल, खोंट के रखबे ओली भर के।
साध बुतावत ले खाबो, नून अउ मिरचा लाबे धर के।।
हंसी-ठिठोली करत रहिबो, पिरीत के बनके हम साथी।
आबे मोर खेत म मयारू, टोरे ल तिवरा, चना भाजी।।
पक्का गुरतुर बोइर फरे हे, लबेदा मार-मार के गिराबो।
पार के राहेर पोठागे, टोरत-टोरत ददरिया गीत गाबो।।
तिवरा, चना अउ राहेर के बटकर खाए म मजा आही।
आबे मोर खेत म मयारू, टोरे ल तिवरा, चना भाजी।।
सुकसा भाजी, बोइर खोइला के साग ह बिकट मिठाही।
गरमी के दिन म रांधबे अम्मटहा, गोरी तोर मन ल भाही।।
मया तोला करथौंव बही, मोर ले मिले बर हो ज राजी।
आबे मोर खेत म मयारू, टोरे ल तिवरा, चना भाजी।।
कवि- अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़
रिश्तों में रूठापन हो,बातों में तल्ख़ी आती है,दिल के किसी कोने मेंमिलने की आस जगाती…
नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ और सैलाब के बाद तबाही का मंजर…
रसोई में महंगाई का तड़का: प्याज 70 रुपये पार, चीनी की तेजी ने बढ़ाई चिंता;…
बिछुआ (राष्ट्र की परम्परा)। कक्षा में पढ़ाई के साथ विद्यार्थियों को उद्योग जगत की वास्तविक…
नवनीत मिश्र रक्षा बंधन केवल कलाई पर राखी बांधने का पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन के…