निंदा छोड़ें, आत्मचिंतन अपनाएं: यही है श्रेष्ठता का मार्ग

गोंदिया, महाराष्ट्र।
“न विना परवादेन रमते दुर्जनोजन:। काक: सर्वरसान भुक्ते विनामध्यम न तृप्यति।।“
अर्थात् दुष्ट व्यक्ति बिना निंदा किए आनंद नहीं पाते, जैसे कौआ सभी रसों का सेवन करता है, परंतु गंदगी के बिना संतुष्ट नहीं होता।

आज के समाज में यह श्लोक अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है। जब हम दूसरों की आलोचना करते हैं, तब हमें यह भी याद रखना चाहिए कि हम स्वयं भी त्रुटियों से परिपूर्ण हैं। एक उंगली जब हम किसी और पर उठाते हैं, तो तीन उंगलियां हमारी ओर संकेत करती हैं—यह केवल कहावत नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है।
सृष्टि के रचयिता ने मनुष्य को श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान की है, ताकि वह गुण और अवगुण के बीच सही चयन कर सके। किंतु अक्सर हम अवगुणों को चुन लेते हैं और अंततः परिस्थितियों या ईश्वर को दोष देने लगते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल हमारे व्यक्तित्व को कमजोर करती है, बल्कि समाज में नकारात्मकता भी फैलाती है।
निंदा करना एक ऐसा अवगुण है, जो प्रारंभ में सुखद प्रतीत होता है, परंतु अंततः मन में अशांति और तनाव उत्पन्न करता है। किसी की आलोचना करके हम अपने अहंकार को क्षणिक संतुष्टि तो दे सकते हैं, लेकिन उसकी वास्तविक योग्यता, अच्छाई और सत्य को कभी कम नहीं कर सकते। सूर्य पर बादल छा जाने से उसकी रोशनी कम नहीं होती, उसी प्रकार सच्चे गुणों को निंदा से दबाया नहीं जा सकता।
हम अक्सर दूसरों के दोष आसानी से देख लेते हैं, लेकिन अपने दोषों को नजरअंदाज कर देते हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे हम चंद्रमा के दाग देख लेते हैं, पर अपनी आंखों का काजल नहीं देख पाते। वास्तव में, दूसरों में जो दोष हमें दिखाई देते हैं, वे कहीं न कहीं हमारे भीतर की दूषित प्रवृत्तियों का ही प्रतिबिंब होते हैं।
महापुरुषों ने भी निंदा से बचने की सीख दी है। उनका मानना था कि दूसरों के दोष देखने के बजाय उनके गुणों को अपनाना चाहिए। निंदा न केवल संबंधों में कटुता लाती है, बल्कि व्यक्ति की विश्वसनीयता भी कम कर देती है।
यह भी सत्य है कि संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसकी आलोचना न होती हो। कोई कम बोलने पर, कोई अधिक बोलने पर, तो कोई अपनी भाषा या व्यवहार के कारण आलोचना का शिकार होता है। इसलिए दूसरों की बातों से विचलित होने के बजाय आत्मचिंतन और आत्मविकास पर ध्यान देना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
दूसरों की निंदा में समय व्यर्थ करने से बेहतर है कि हम अपने व्यक्तित्व को मजबूत बनाएं। जब हम अपने गुणों को विकसित करते हैं और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो निंदक स्वतः ही पीछे छूट जाते हैं।
अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि निंदा त्यागकर आत्मचिंतन अपनाना ही सच्ची प्रगति का मार्ग है। स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के बजाय विनम्रता अपनाने वाला व्यक्ति ही वास्तव में गुणवान और महान होता है।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया (महाराष्ट्र)

Editor CP pandey

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