‘बीर भोग्या वसुंधरा’ का अब
शायद विचार बदल चुका है,
मेहनत का फल तो मिलता है,
धरती से सब उसको मिलता है।

मेहनत का फल मिलता है,
यह सत्य वचन सनातन है,
बीर वही होता है इस जग में,
जो मेहनत कर उपजाता है।

रावण भी बीर पराक्रमी था,
पर अहंकार में मदमस्त सदा,
सोने की लंका जल ख़ाक हुई,
उसका पराक्रम धरा रह गया।

कुंभकरण सा भाई बलशाली,
पर अक्सर सोता ही रहता था,
मेघनाथ जैसा पुत्र पराक्रमी था,
इंद्रविजयी इंद्रजीत कहलाता था।

रणकौशल चाहे कितना भी हो,
मेहनत मशक़्क़त करना होता है,
आदित्य ये धरती उसकी होती है,
जो इसका लालन पालन करता है।

  • कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
rkpshomnath

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