✍️ दिव्या भोसले
लोकतंत्र में पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछने, नागरिक अधिकारों की रक्षा करने और सरकार व जनता के बीच जवाबदेही कायम रखने वाली महत्वपूर्ण संस्था है। यही कारण है कि पत्रकारिता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ लोकतंत्र का “चौथा स्तंभ” कहा जाता है। स्वतंत्र प्रेस किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है, क्योंकि सत्ता का स्वभाव केंद्रीकरण की ओर होता है और पत्रकारिता उस पर सार्वजनिक नियंत्रण बनाए रखने का कार्य करती है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Thomas Jefferson का प्रसिद्ध कथन है—
“यदि मुझे सरकार के बिना समाचार पत्र और समाचार पत्रों के बिना सरकार में से किसी एक को चुनना पड़े, तो मैं समाचार पत्रों को चुनूँगा।” यह कथन लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता की अनिवार्यता को स्पष्ट करता है।
21वीं सदी की डिजिटल क्रांति ने सूचना के स्वरूप, प्रसार और नियंत्रण को पूरी तरह बदल दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा निगरानी और एल्गोरिदमिक नियंत्रण ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता के सामने नए और जटिल खतरे खड़े कर दिए हैं। सूचना अब केवल खबर नहीं रही, बल्कि राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक हित और सामाजिक ध्रुवीकरण का शक्तिशाली माध्यम बन चुकी है।
हाल ही में नॉर्वे की पत्रकार Hele Lang ने दावा किया कि भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi से सवाल पूछने के बाद उनका इंस्टाग्राम अकाउंट निलंबित कर दिया गया। घटना तकनीकी कारणों से हुई या इसके पीछे व्यापक डिजिटल नियंत्रण के संकेत हैं, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन इससे एक गंभीर प्रश्न फिर सामने आया—क्या डिजिटल युग में पत्रकारिता की स्वतंत्रता सुरक्षित है?
आज पत्रकारिता पर दबाव केवल सरकारों से नहीं, बल्कि निजी तकनीकी कंपनियों, डेटा निगरानी तंत्र, ट्रोल नेटवर्क और कॉर्पोरेट हितों से भी बढ़ रहा है। “प्रेस की स्वतंत्रता” अब केवल अखबारों और न्यूज चैनलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह डिजिटल नागरिकता और सूचना के अधिकार से सीधे जुड़ गई है।
पहले सेंसरशिप खुलकर दिखाई देती थी, लेकिन अब वह एल्गोरिदम के पीछे छिपी हुई है। अकाउंट निलंबन, पोस्ट हटाना, शैडो बैनिंग, इंटरनेट बंदी और एल्गोरिदमिक रीच कम करना आधुनिक डिजिटल नियंत्रण के प्रमुख साधन बन चुके हैं।
Meta, Google, X और YouTube जैसी कंपनियाँ आज वैश्विक सूचना प्रवाह को प्रभावित करने वाली शक्तियाँ बन चुकी हैं। प्रसिद्ध विदुषी Shoshana Zuboff ने इस व्यवस्था को “Surveillance Capitalism” कहा है, अर्थात ऐसी पूँजीवादी व्यवस्था जो डिजिटल निगरानी और डेटा नियंत्रण पर आधारित हो।
पत्रकारिता की स्वतंत्रता का इतिहास सत्ता के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष का इतिहास रहा है। John Milton की प्रसिद्ध कृति Areopagitica (1644) ने सेंसरशिप के विरोध में मजबूत तर्क प्रस्तुत किए। वहीं John Stuart Mill ने On Liberty में विचारों की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा बताया।
संयुक्त राष्ट्र के United Nations द्वारा जारी Universal Declaration of Human Rights के अनुच्छेद 19 में प्रत्येक व्यक्ति को विचार व्यक्त करने और सूचना प्राप्त व प्रसारित करने का अधिकार दिया गया है। भारत में संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
दुनिया भर में पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। Julian Assange के खिलाफ कार्रवाई, Jamal Khashoggi की हत्या, Maria Ressa पर मुकदमे, तथा Dmitry Muratov और Anna Politkovskaya पर दमन जैसे मामले प्रेस स्वतंत्रता पर बढ़ते संकट के उदाहरण हैं।
इसी तरह Daphne Caruana Galizia की हत्या, Can Dündar का निर्वासन और Apple Daily पर कार्रवाई ने खोजी पत्रकारिता के सामने खड़े गंभीर खतरों को उजागर किया है।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन प्रेस स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ लगातार बढ़ रही हैं। Reporters Without Borders के 2024 प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 157वें स्थान पर रहा। पत्रकारों पर हमले, ऑनलाइन ट्रोलिंग, कॉर्पोरेट दबाव, यूएपीए और देशद्रोह कानूनों का उपयोग, इंटरनेट बंदी तथा डिजिटल निगरानी इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं।
Pegasus spyware विवाद ने पत्रकारों की डिजिटल निगरानी के खतरे को और गंभीर बना दिया। ऐसी परिस्थितियों में कई पत्रकार आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से बचने लगते हैं, जिसे “सेल्फ-सेंसरशिप” कहा जाता है।
महिला पत्रकारों के लिए स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है। UNESCO की रिपोर्ट के अनुसार 73 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का अनुभव किया है। ट्रोलिंग, यौन धमकियाँ, मॉर्फिंग और डॉक्सिंग के जरिए उन्हें डराने और चुप कराने की कोशिश की जाती है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक सुरक्षा का विषय भी बन गई है।
“फेक न्यूज” रोकने के नाम पर कई सरकारें डिजिटल नियंत्रण बढ़ा रही हैं। लेकिन यदि “झूठी जानकारी” और “सरकार विरोधी जानकारी” के बीच की सीमा धुंधली हो जाए, तो लोकतंत्र के लिए खतरा पैदा हो सकता है।
Edward Snowden द्वारा अमेरिकी निगरानी कार्यक्रमों का खुलासा किए जाने के बाद डिजिटल निगरानी और नागरिक स्वतंत्रता का मुद्दा वैश्विक बहस का केंद्र बन गया।
आज आवश्यकता है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए डिजिटल अधिकारों के स्पष्ट कानून, सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही, पत्रकार सुरक्षा कानून, डेटा संरक्षण नीतियाँ और मीडिया साक्षरता को मजबूत किया जाए।
डिजिटल युग में सूचना ही सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी है। जिस समाज में सूचना नियंत्रित होती है, वहां नागरिकों की सोच भी नियंत्रित होने लगती है। इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल मीडिया का अधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक के सूचना के अधिकार की रक्षा है। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी में है कि पत्रकार कितनी निर्भीकता से सवाल पूछ सकते हैं। क्योंकि जिस समाज में पत्रकार डरने लगते हैं, वहां सत्य धीरे-धीरे मौन में खो जाता है।
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