ज़िन्दगी असमंजस से भरी,
जो चाहते वो मिलता नहीं,
जो मिले उससे संतोष नहीं,
उम्मीद कभी पूरी होती नहीं।
उम्मीदों का है फ़साना,
शब्दों का ही अफ़साना,
उम्मीदें तो बदल पाएँगे
पर कहे शब्द कैसे बदलेंगे।
बंदूक़ से निकली हुई गोली
और मुँह से निकले हुए शब्द,
न गोली अंदर वापस जाती
न कही हुई बात वापस आती।
न चाहो जो वह मिलता रहे,
जो चाहो वह कभी ना मिले,
चाहत नफ़रत बनी ज़िंदगी,
एक अफ़साना है ज़िन्दगी।
प्रार्थना कर मन ही मन ख़ुश होना,
इस ख़ुशी से दूसरों की सेवा करना
सेवा है माध्यम औरों तक पहुँचना,
पहुँचकर उनको भी अपना बनाना।
अपना बनाना है रिश्ता निभाना,
स्नेह से प्रस्फुटित रिश्ता जताना
संवाद और सम्वेदना से महसूस
कर रिश्ता दिल से आगे बढ़ाना ।
जीवन असमंजस का है आकर,
गलफ़हमियों से रिश्ते मुरझाते,
आदित्य मत होने दो अहंकार,
इससे आने से रिश्ते बिखर जाते।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’
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