Friday, July 17, 2026
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“क्यों पिछड़ रही है पशु चिकित्सा सेवाएँ”

हर चौथा पद खाली: पशु चिकित्सकों की कमी से जूझता भारत, ग्रामीण पशुपालन पर संकट और किसानों की आय पर गहरा असर

भारत में पशु चिकित्सकों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। पूरे देश में 38,916 स्वीकृत पदों में से 10,839 पद खाली पड़े हैं। इसका अर्थ है कि लगभग हर चौथा पशु चिकित्सक पद रिक्त है। महाराष्ट्र में 4685 में से 3072, राजस्थान में 3691 में से 1367, कर्नाटक में 3317 में से 1156, बिहार में 2067 में से 860 और उत्तर प्रदेश में 1984 में से 506 पद खाली हैं। इतनी बड़ी कमी के कारण ग्रामीण पशुपालन और किसानों की आय पर गहरा असर पड़ रहा है।l
भारत में पशुपालन केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ ही नहीं है बल्कि यह करोड़ों परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार भी है। दूध, मांस, अंडे, ऊन और अन्य पशु उत्पादों की आपूर्ति के साथ-साथ यह क्षेत्र किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार सृजन का एक सशक्त साधन है। लेकिन विडंबना यह है कि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को संवारने वाले पशु चिकित्सकों की भारी कमी से आज देश जूझ रहा है। हाल ही में संसद में पूछे गए प्रश्न और सरकार द्वारा दिए गए उत्तर से यह तथ्य सामने आया कि देशभर में पशु चिकित्सकों के कुल 38,916 स्वीकृत पदों में से 10,839 पद रिक्त पड़े हुए हैं। यह लगभग 28 प्रतिशत रिक्तता है, जो सीधे-सीधे पशु स्वास्थ्य सेवाओं पर नकारात्मक असर डालती है।
पशु चिकित्सक केवल पशुओं का इलाज ही नहीं करते, बल्कि वे पशुधन से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम, टीकाकरण, कृत्रिम गर्भाधान, प्रजनन संबंधी परामर्श और वैज्ञानिक तकनीकों के प्रसार में भी अहम भूमिका निभाते हैं। उनके अभाव में न केवल पशुपालकों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है बल्कि देश की दुग्ध और मांस उत्पादन क्षमता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।
केंद्र सरकार द्वारा दिए गए आँकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों में पशु चिकित्सकों की कमी कितनी गंभीर है। महाराष्ट्र में 4685 स्वीकृत पदों में से 3072 पद खाली हैं। कर्नाटक में 3317 स्वीकृत पदों में से 1156 रिक्त हैं। बिहार में 2067 पदों में से 860 खाली पड़े हैं। राजस्थान में 3691 में से 1367 पद रिक्त हैं। उत्तर प्रदेश में 1984 में से 506 पद खाली हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ राज्यों जैसे मेघालय और लक्षद्वीप में कोई भी रिक्ति नहीं है। लेकिन देश के बड़े और कृषि प्रधान राज्यों में स्थिति बेहद चिंताजनक है। कुल मिलाकर 38,916 स्वीकृत पदों के मुकाबले 10,839 रिक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि लगभग हर तीसरा पद खाली है। यह आँकड़ा किसी भी देश के पशु स्वास्थ्य ढाँचे के लिए खतरे की घंटी है।
इतनी बड़ी संख्या में पदों के रिक्त रहने से ग्रामीण क्षेत्रों में पशु चिकित्सा सेवाएँ बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। खासकर छोटे और सीमांत किसानों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है, जिनकी आजीविका पूरी तरह से पशुपालन पर निर्भर है। आपात स्थिति में बीमार या घायल पशु के लिए समय पर डॉक्टर न मिल पाना पशुपालकों के लिए गंभीर संकट बन जाता है। मुंहपका-खुरपका, ब्रूसेलोसिस, बर्ड फ्लू जैसी संक्रामक बीमारियों से निपटना मुश्किल हो जाता है। पर्याप्त पशु चिकित्सक न होने से बड़े पैमाने पर टीकाकरण कार्यक्रमों की गति धीमी हो जाती है। पशुओं की समय पर देखभाल न होने से दूध और मांस उत्पादन घटता है, जिससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है। और ज़ूनोटिक बीमारियाँ जैसे रैबीज़ या एवियन फ्लू का खतरा भी बढ़ता है।
सरकार ने यह स्वीकार किया है कि पशु चिकित्सकों की नियुक्ति राज्यों का विषय है। केंद्र सरकार केवल दिशानिर्देश और वित्तीय सहयोग प्रदान करती है। इसी क्रम में लाइवस्टॉक हेल्थ एंड डिज़ीज कंट्रोल प्रोग्राम के तहत मोबाइल वेटरनरी यूनिट्स चलाए जाते हैं, जो गाँव-गाँव जाकर पशुपालकों को स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं। अभी तक 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 8191 मोबाइल इकाइयाँ कार्यरत हैं। किसानों के लिए 1962 नंबर की टोल-फ्री हेल्पलाइन भी शुरू की गई है। ये प्रयास निश्चित रूप से उपयोगी हैं, लेकिन इनसे स्थायी समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती क्योंकि मोबाइल इकाइयाँ नियमित पशु चिकित्सक का विकल्प नहीं बन सकतीं।
इस समस्या की जड़ गहराई से समझने पर पता चलता है कि सबसे बड़ा कारण भर्ती प्रक्रिया में देरी है। अधिकांश राज्यों में चयन आयोगों और भर्ती एजेंसियों की धीमी गति के कारण वर्षों तक पद खाली रह जाते हैं। इसके अलावा पशुपालन की बढ़ती जरूरतों के बावजूद नए पदों का सृजन नहीं हो रहा। ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा के प्रति पशु चिकित्सकों की अनिच्छा और शैक्षणिक संस्थानों की सीमित संख्या भी समस्या को और जटिल बनाती है। कई बार वेतन और सुविधाओं का स्तर भी इस पेशे को युवाओं के लिए आकर्षक नहीं बनाता।
यदि भारत को पशुपालन क्षेत्र को मजबूत बनाना है और किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य पाना है, तो पशु चिकित्सकों की कमी को दूर करना अनिवार्य है। राज्यों को तत्काल रिक्त पदों को भरने के लिए विशेष भर्ती अभियान चलाना होगा और केंद्र सरकार को इसमें सहयोग करना होगा। नए पदों का सृजन आवश्यक है ताकि बढ़ती मांग और पशुधन की संख्या के अनुपात में सेवाएँ उपलब्ध हो सकें। पशु चिकित्सा शिक्षा का भी विस्तार जरूरी है। नए कॉलेज खोले जाएँ, मौजूदा कॉलेजों की सीटें बढ़ाई जाएँ और आधुनिक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए। ग्रामीण सेवा के लिए पशु चिकित्सकों को प्रोत्साहन देना होगा। उन्हें अतिरिक्त भत्ता, आवास, परिवहन सुविधा और पदोन्नति में प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल भी इस क्षेत्र को मजबूत बना सकता है। टेलीमेडिसिन, मोबाइल ऐप्स और वर्चुअल परामर्श के माध्यम से किसानों तक त्वरित सेवा पहुँचाई जा सकती है। केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर संयुक्त कोष बनाएं ताकि वित्तीय संसाधनों की कमी दूर हो सके और भर्ती प्रक्रिया बिना रुकावट आगे बढ़े।
भारत जैसे विशाल देश में जहाँ 20 करोड़ से अधिक गौवंश और करोड़ों अन्य पशु हैं, वहाँ पशु चिकित्सकों की कमी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह केवल किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और निर्यात क्षमता से भी जुड़ा हुआ सवाल है। आज जब देश आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब पशुपालन क्षेत्र को मजबूत किए बिना यह लक्ष्य अधूरा है। पशु चिकित्सकों की भारी कमी इस विकास यात्रा में सबसे बड़ी रुकावट है। इसलिए यह आवश्यक है कि सरकारें तत्काल कदम उठाएँ और पशु चिकित्सकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन के माध्यम से इस संकट का समाधान करें।

डॉ. प्रियंका सौरभ

हिन्दू महासभा ने दिल्ली अधिवक्ता हड़ताल को दिया समर्थन – बी एन तिवारी

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा) अखिल भारत हिन्दू महासभा ने दिल्ली में गत सप्ताह से जारी अधिवक्ताओं की हड़ताल का समर्थन किया है। महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविन्द्र कुमार द्विवेदी ने कहा कि उपराज्यपाल ने अधिवक्ता विरोधी जो आदेश दिया है, हिन्दू महासभा उसे न्यायिक और संवैधानिक व्यवस्था के साथ अधिवक्ता समाज के हितों पर कुठाराघात मानती है। उपराज्यपाल को अपना अधिवक्ता विरोधी आदेश वापस लेकर अधिवक्ताओं की हड़ताल को समाप्त करवाने की दिशा में पहल करनी चाहिए।
हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता बी एन तिवारी ने जारी बयान में यह जानकारी देते हुए बताया कि उपराज्यपाल ने अपने एक आदेश में पुलिस को न्यायालय में जाकर अपना बयान दर्ज करवाने की अनिवार्यता से पूरी तरह से मुक्त कर दिया है। नए आदेश में पुलिस का बयान दर्ज करने के लिए अधिवक्ता को उसके थाना में जाकर बयान दर्ज करना होगा और कोर्ट की कस्टडी में सौंपना होगा।
बी एन तिवारी ने बताया कि हिन्दू महासभा उपराज्यपाल के इस आदेश को न्यायिक व्यवस्था को पुलिस प्रशासन के अधीन करने का षडयंत्र और अधिवक्ता समाज को पुलिस प्रशासन की कठपुतली बनाने की भावना से प्रेरित मानता है। बी एन तिवारी ने बताया कि इस आदेश को रद्द करवाने के लिए तीस हजारी, कड़कड़डूमा, रोहिणी, साकेत सहित दिल्ली की सभी न्यायालयों के अधिवक्ता गत सप्ताह से हड़ताल पर हैं। तीस हजारी न्यायालय में आज बार एसोसिएशन के आह्वान पर अपनी मांगों के समर्थन में बारिश में भीगते हुए अधिवक्ताओं ने न्यायालय परिसर में रैली निकाली और अधिवक्ता समाज की एकता का परिचय दिया।
हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर यशपाल सिंह ने कहा कि न्याय व्यवस्था और पुलिस प्रशासन संवैधानिक रूप से दो अलग अलग निकाय हैं। न्यायिक व्यवस्था को संवैधानिक रूप से पुलिस प्रशासन के अधीन करने का उपराज्यपाल के द्वारा प्रयास निंदनीय है। अगर इसे नहीं रोका गया तो भविष्य में इसके घातक परिणाम देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा कि पुलिस हो या मंत्री, उसे अपना बयान दर्ज करवाने के लिए न्यायधीश के समक्ष उपस्थित होना ही पड़ता है। इस संवैधानिक परिपाटी को बदलने के खिलाफ आम जनता को अधिवक्ता समाज के साथ जुड़ जाना चाहिए।
हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री ललित अग्रवाल ने भी अधिवक्ता समाज की हड़ताल और मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि हड़ताल का न्यायालयों में दैनिक सुनवाई पर गंभीर असर पड़ रहा है। कामकाज ठप है और केवल तारीखें मिल रही है। उपराज्यपाल का आदेश काला कानून है। उन्होंने कहा कि हिन्दू महासभा इस काले कानून का विरोध देश के सभी न्यायालयों के अधिवक्ताओं से करने का आह्वान करती है।

विनोबा भावे नगर पुलिस स्टेशन में “सिंघम” की एंट्री – पोपट आव्हाड का दबंग अंदाज

(अजय उपाध्याय की रिपोर्ट)

मुंबई, कुर्ला (राष्ट्र की परम्परा) विनोबा भावे नगर पुलिस स्टेशन में नए वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक पोपट आव्हाड ने पदभार संभालते ही अपने कड़े तेवर और साफ संदेश से इलाके में हलचल मचा दी है। स्थानीय लोग उन्हें पहले ही “सिंघम” की छवि में देखने लगे हैं।

पदभार ग्रहण करते ही आव्हाड ने घोषणा की –“मैं सुधारूंगा कुर्ला को, आप मेरा साथ दो। स्वच्छ करूंगा कुर्ला – यही मेरा संकल्प है।”

आव्हाड ने साफ कर दिया है कि अब कुर्ला के विनोबा भावे नगर क्षेत्र में अवैध धंधे, गंदगी और ट्रैफिक की अव्यवस्था को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

🔹 बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक के नेतृत्व में पुलिस टीम गुटखा, तंबाकू और शराब के अवैध कारोबार पर छापेमारी के लिए तैयार है। देर रात चल रहे जुआ अड्डों और आपराधिक गतिविधियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।

🔹 स्पष्ट लक्ष्य – स्वच्छ और अपराधमुक्त कुर्ला आव्हाड ने कहा कि पुलिस स्टेशन का मुख्य उद्देश्य कुर्ला को “स्वच्छ, सुरक्षित और अपराधमुक्त” बनाना है। उन्होंने चेतावनी दी कि अब गलत धंधों और अवैध कामों को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

🔹 नागरिकों से सहयोग की अपील विनोबा भावे नगर पुलिस ने आम जनता से अपील की है कि वे पुलिस प्रशासन को सहयोग दें और क्षेत्र को साफ एवं सुरक्षित बनाने में अपना योगदान करें।

🔹 नागरिकों में उत्साह स्थानीय लोगों में आव्हाड की कार्यशैली को लेकर उत्साह का माहौल है। लोग कह रहे हैं कि कुर्ला को सच में “सिंघम जैसे दबंग और ईमानदार अधिकारी” की जरूरत थी, जो अवैध कामों पर अंकुश लगा सके।

बिहार में वोटर अधिकार यात्रा का 10वां दिन: राहुल-प्रियंका और तेजस्वी संग रेवंत रेड्डी भी हुए शामिल

यात्रा की फोटो सौजन्य से पीके

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों को लेकर इंडिया गठबंधन की ओर से निकाली जा रही ‘वोटर अधिकार यात्रा’ मंगलवार को 10वें दिन पहुंच गई। इस यात्रा का नेतृत्व कांग्रेस नेता राहुल गांधी और तेजस्वी यादव कर रहे हैं। खास बात यह रही कि आज की यात्रा में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा भी पहली बार राहुल गांधी के साथ शामिल हुईं। वहीं तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी समेत कई दिग्गज नेता भी बिहार पहुंचे।

सुपौल से शुरू हुई पदयात्रा

आज सुबह यात्रा की शुरुआत सुपौल जिले के हुसैन चौक से हुई। राहुल गांधी हेलीकॉप्टर से आईटीआई कॉलेज हेलीपैड पर उतरे और वहां से सड़क मार्ग द्वारा कार्यक्रम स्थल पहुंचे। पदयात्रा हुसैन चौक से निकलकर थाना चौक, महावीर चौक, लोहियानगर चौक और गौरवगढ़ होते हुए डिग्री कॉलेज परिसर में समाप्त हुई। इस दौरान हजारों की भीड़ उमड़ी और सड़क किनारे समर्थक जमकर नारेबाजी करते दिखे।

मधुबनी जिले में 74 किमी लंबी यात्रा

सुपौल से आगे बढ़ते हुए यह काफिला मधुबनी जिले में प्रवेश कर गया, जहां 74 किलोमीटर लंबी पदयात्रा प्रस्तावित है।सुबह 9 बजे प्रवेश के बाद दोपहर 12:30 बजे यात्रा फुलपरास के लोहिया चौक पहुंची।यहां से थोड़ी दूरी पर स्थित झिलमिल ढाबा में दोपहर का भोजन कार्यक्रम रखा गया।इसके बाद दोपहर 3:30 बजे सिजौलिया दुर्गामंदिर परिसर में सामाजिक संवाद आयोजित हुआ।

यात्रा आगे मोहना झंझारपुर, राजे चौक, सरिसवपाही रोड से होती हुई शाम 7:30 बजे सकरी अंदर ब्रिज पहुंची, जहां थोड़ी देर रुककर दरभंगा जिले की ओर रवाना हुई।

सुरक्षा और माहौल पूरे मार्ग पर बड़े पैमाने पर पोस्टर-बैनर लगाए गए हैं। मधुबनी में सुरक्षा व्यवस्था की कमान खुद एसपी योगेंद्र कुमार ने संभाली। राहुल और प्रियंका गांधी की संयुक्त मौजूदगी से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों में गजब का उत्साह देखा गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह यात्रा न सिर्फ मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ विपक्षी मोर्चे की ताकत दिखा रही है, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर कांग्रेस और राजद कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का भी काम कर रही है।

बिहार NEET UG 2025: स्टेट मेरिट लिस्ट जारी, ऋणालिनी किशोर झा टॉपर, PMCH पटना छात्रों की पहली पसंद

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) बिहार संयुक्त प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा परिषद (BCECEB) ने NEET UG 2025 के तहत एमबीबीएस, बीडीएस और वेटरनरी कोर्स में प्रवेश के लिए स्टेट मेरिट लिस्ट जारी कर दी है। यह सूची राज्य के 85 प्रतिशत सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटों पर नामांकन के लिए जारी की गई है।

जारी सूची में ऋणालिनी किशोर झा ने रैंक 181 के साथ राज्य में पहला स्थान हासिल किया है। वहीं, मुस्कान को दूसरा, ऋषभ को तीसरा और आर्यन कुमार को चौथा स्थान मिला है।

छात्रों की पसंद सूत्रों के अनुसार, टॉप रैंकर्स की पहली पसंद राजधानी का पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (PMCH) रही। इसके बाद दूसरी पसंद के तौर पर दरभंगा स्थित नेहरू मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (NMCH) और तीसरी पसंद इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (IGIMS), पटना रही।

आगे की प्रक्रिया अब चयनित छात्र स्टेट काउंसलिंग में हिस्सा लेंगे और अपनी पसंद के अनुसार कॉलेज में सीट आवंटन की प्रक्रिया पूरी करेंगे। काउंसलिंग के दौरान छात्रों को दस्तावेज सत्यापन और विकल्प भरने की प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसके बाद ही अंतिम सीट अलॉटमेंट होगा।

राज्यभर में उत्साह स्टेट मेरिट लिस्ट जारी होने के बाद छात्रों और अभिभावकों में उत्साह देखा जा रहा है। मेडिकल शिक्षा में करियर बनाने की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए यह लिस्ट एक बड़ा पड़ाव साबित हुई है।

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर सबसे ज़्यादा मामले, राहुल गांधी की यात्रा में होंगे शामिल

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)कांग्रेस की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में मंगलवार को बड़ा राजनीतिक जमावड़ा दिखेगा। तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमाला रेवंत रेड्डी, उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क और उनके कई कैबिनेट सहयोगी बिहार पहुंच रहे हैं। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि ये नेता दिल्ली से सीधे दरभंगा के पास राहुल गांधी की यात्रा में शामिल होने के लिए रवाना हो गए हैं।

सबसे अधिक आपराधिक मामलों वाले मुख्यमंत्री तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी देश के उन चुनिंदा मुख्यमंत्रियों में गिने जाते हैं जिन पर सबसे अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, रेवंत रेड्डी पर कुल 89 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से 72 गंभीर आईपीसी धाराओं के अंतर्गत आते हैं।

क्या होते हैं गंभीर आपराधिक मामले? गंभीर आपराधिक मामले ऐसे अपराध माने जाते हैं जो गैर-जमानती और संज्ञेय होते हैं तथा जिनकी अधिकतम सजा पाँच साल या उससे अधिक हो सकती है। इनमें हत्या का प्रयास, हत्या, अपहरण, हमला, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध, चुनावी अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रकरण शामिल रहते हैं।

राहुल गांधी की यात्रा में राजनीतिक संदेश बिहार में राहुल गांधी की यह यात्रा विपक्षी एकजुटता और मतदाता अधिकारों के लिए कांग्रेस के अभियान को आगे बढ़ाने का हिस्सा है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों की मौजूदगी इस यात्रा को राजनीतिक रूप से और अधिक महत्व देती है।

हरतालिका तीज : आस्था, परंपरा और सोलह श्रृंगार का महत्व

पर्व विशेष

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। पवित्र सावन मास के बाद भादो मास में मनाए जाने वाले प्रमुख व्रत-त्यौहारों में हरतालिका तीज का विशेष स्थान है। यह पर्व मंगलवार को मनाया जा रहा है। हरतालिका तीज को विवाहित महिलाओं का पर्व कहा जाता है। इस दिन महिलाएँ व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करती हैं तथा अपने पति के दीर्घायु, दांपत्य सुख और परिवार की समृद्धि की कामना करती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने इसी दिन कठोर तपस्या कर भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। इसलिए यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाओं के लिए पवित्र और मंगलकारी माना जाता है। इस दिन प्रातः स्नान-ध्यान के उपरांत महिलाएँ व्रत का संकल्प लेकर श्रृंगार करती हैं और दिनभर निर्जला उपवास रखती हैं। संध्या समय भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है।
हरतालिका तीज पर सोलह श्रृंगार का विशेष महत्व है। यह श्रृंगार केवल सौंदर्य बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि मानसिक शांति, स्वास्थ्य लाभ और वैवाहिक जीवन की स्थिरता के प्रतीक माने जाते हैं। सोलह श्रृंगार में बिंदी, सिंदूर, काजल, मेहंदी, मंगलसूत्र, चूड़ी, नथ, पायल, बाजूबंद, गजरा, अलता, अंगूठी, कमरबंद, बालों का श्रृंगार, इत्र तथा परिधान-आभूषण सम्मिलित होते हैं। इन सभी का अपना-अपना महत्व है। बिंदी सौभाग्य और एकाग्रता का प्रतीक है, सिंदूर पति की लंबी आयु और दांपत्य स्थिरता का द्योतक है, काजल आँखों की शोभा और बुरी नजर से रक्षा करता है। मेहंदी शुभता और सौंदर्य के साथ शरीर में ठंडक प्रदान करती है। मंगलसूत्र अटूट वैवाहिक संबंध का प्रतीक है। चूड़ियाँ सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं। नथ और पायल स्त्री-सौंदर्य और स्वास्थ्य से जुड़े माने जाते हैं। बाजूबंद शक्ति का द्योतक है, गजरा और फूल शीतलता व सुगंध का प्रसार करते हैं। अलता पैरों की शोभा और शुभता बढ़ाता है। अंगूठी वैवाहिक बंधन का प्रतीक है, कमरबंद आभूषण के साथ शारीरिक संतुलन को दर्शाता है। बालों का श्रृंगार रूप को पूर्णता देता है, वहीं इत्र और सुगंध ताजगी और आकर्षण का प्रतीक माने जाते हैं। परिधान और आभूषण सम्पूर्ण श्रृंगार को पूर्णता प्रदान करते हैं और आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।
सोलह श्रृंगार का संबंध केवल परंपरा से नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है। मेहंदी शरीर को ठंडक पहुँचाती है, पायल और बिछुए रक्त संचार को संतुलित करते हैं, गजरा मानसिक शांति देता है, वहीं इत्र और फूल ताजगी प्रदान करते हैं। इस प्रकार श्रृंगार का उद्देश्य स्वास्थ्य, सौंदर्य और मानसिक संतुलन से भी जुड़ा है।
हरतालिका तीज केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर महिलाएँ एकत्र होकर गीत-संगीत और पूजा-अर्चना करती हैं। इससे आपसी मेल-जोल बढ़ता है और सामाजिक एकता मजबूत होती है। परिवार और दांपत्य जीवन में प्रेम तथा विश्वास की भावना सुदृढ़ होती है।
हरतालिका तीज भारतीय संस्कृति और परंपरा का जीवंत उदाहरण है। यह पर्व नारी-शक्ति, आस्था और दांपत्य सुख का प्रतीक है। सोलह श्रृंगार की परंपरा स्त्री के सौंदर्य को ही नहीं, बल्कि उसके आत्मविश्वास और मानसिक शांति को भी बढ़ाती है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी महिलाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय और श्रद्धा से मनाया जाता है।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर आज मनाया जाएगा चौरचन पर्व, शाम 6:25 से 7:55 बजे तक रहेगा चंद्र दर्शन का शुभ मुहूर्त

सांकेतिक फोटो

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के अवसर पर मंगलवार, 26 अगस्त 2025 को पूरे श्रद्धा और आस्था के साथ चौरचन पर्व मनाया जाएगा। विशेषकर मिथिलांचल क्षेत्र में इस दिन का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, गणेश चौठ के अवसर पर चंद्रमा की पूजा करने की परंपरा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रतीजन और महिलाएं नए बर्तन में जमाया हुआ दही, विभिन्न प्रकार के फल एवं पकवान लेकर चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करती हैं।

शुभ मुहूर्त पंडितों के अनुसार, आज शाम 6:25 बजे से 7:55 बजे तक चंद्र दर्शन का शुभ समय रहेगा। इसी दौरान महिलाएं और श्रद्धालुजन अपने घर की छतों और आंगनों से चंद्रमा को अर्घ्य देंगे।

धार्मिक महत्व मान्यता है कि इस दिन दही और फल चढ़ाकर चंद्रमा का दर्शन करने से व्यक्ति को जीवन में कभी भी मिथ्या कलंक का सामना नहीं करना पड़ता। साथ ही घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।

परंपरा और लोकआस्था मिथिलांचल के साथ ही बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में भी यह पर्व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन घर-घर में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। महिलाएं व्रत रखकर शाम को चंद्रमा के उदय के बाद पूजा-अर्चना करती हैं और फिर परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करती हैं।

रेलवे स्टेशनों पर अब वेंडरों को मिलेगा क्यूआर कोड युक्त पहचान पत्र

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

रेलवे प्रशासन ने यात्रियों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए अब रेलवे स्टेशनों पर खानपान दुकानदारों और वेंडरों को क्यूआर कोड आधारित पहचान पत्र जारी करने का निर्णय लिया है। बिना पहचान पत्र के कोई भी दुकानदार या वेंडर रेलवे स्टेशन अथवा ट्रेनों में सामान नहीं बेच पाएगा। रेल प्रशासन का कहना है कि यात्रियों को लंबे समय से खानपान सामग्री की गुणवत्ता और अवैध वेंडरों की मौजूदगी को लेकर शिकायतें मिल रही थीं। इसी को ध्यान में रखते हुए अब अधिकृत विक्रेताओं को ही क्यूआर कोड वाला आईडी कार्ड दिया जाएगा। इस कार्ड को स्कैन करते ही संबंधित विक्रेता का नाम, आधार संख्या, चिकित्सकीय फिटनेस, पुलिस सत्यापन तिथि, तैनाती इकाई और लाइसेंसधारक का पूरा विवरण मिल जाएगा। रेलवे अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि बिना क्यूआर कोड वाले पहचान पत्र के सामान बेचते पकड़े जाने वाले दुकानदारों और वेंडरों पर कार्रवाई की जाएगी। यही नहीं, यदि कोई कर्मचारी या सहायक नौकरी छोड़ता है तो उसका पहचान पत्र संबंधित लाइसेंसधारक को वापस करना अनिवार्य होगा। प्रत्येक स्टेशन पर तैनात सभी अधिकृत वेंडरों का रिकॉर्ड रजिस्टर में दर्ज रहेगा।
रेलवे का मानना है कि इस कदम से यात्रियों को बेहतर गुणवत्ता वाला खानपान उपलब्ध होगा और अवैध वेंडिंग पर अंकुश लगेगा। अधिकारियों का कहना है कि आने वाले दिनों में यह व्यवस्था सभी बड़े व छोटे स्टेशनों पर लागू कर दी जाएगी। रेलवे प्रशासन ने यात्रियों से भी अपील की है कि वे केवल उन्हीं दुकानदारों और वेंडरों से सामान खरीदें जिनके पास क्यूआर कोड युक्त पहचान पत्र मौजूद हो।

दुनियाँ में आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति का प्रचलन तेजी से बढ़ा- वैश्विक सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा व एकजुट की जगह गुटबाज़ी का माहौल बढ़ा

(राष्ट्र की परम्परा के लिए रिपोर्ट)

दुनियाँ में राजनीति व अर्थव्यवस्था का रिश्ता स्वार्थ प्रधान के चरम पर पहुंचा-हर देश अपनी सुरक्षा ऊर्जा व्यापार और तकनीक संप्रभुता को सर्वोपरि रखकर नीतियां बनाने लगा- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक परिदृश्य आज़ इस बात का सटीक साक्षी है कि राजनीति और कूटनीति अब सिर्फ़ विचारधाराओं या नैतिक मूल्यों पर नहीं टिकी, बल्कि उसका केंद्र आर्थिक स्वार्थ बन चुका है। प्रत्येक राष्ट्र अपनी रणनीति,नीतियों और कूटनीतिक चालों को इस आधार पर गढ़ रहा है कि उसकी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था मज़बूत हो, उसके संसाधनों पर उसका नियंत्रण बना रहे और वैश्विक शक्ति-संतुलन में उसकी पकड़ ढीली न हो। यह स्थिति वैश्वीकरण के उस सपने से बिल्कुल अलग है,जिसमें सबके हितों की साझेदारी की बात की जाती थी। इसके बजाय आज हम ऐसी दुनिया देख रहे हैं जहाँ हर शक्ति अपने आर्थिक हितों को सर्वोपरि मानते हुए, कभी सहयोग तो कभी टकराव के रास्ते पर आगे बढ़ रही है।2022 से चला आ रहा रूस-यूक्रेन संघर्ष 2026 तक वैश्विक स्वार्थ राजनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है। अमेरिका और नाटो इसे लोकतंत्र बनाम तानाशाही की लड़ाई कहते हैं, लेकिन असल में यह ऊर्जा संसाधनों, हथियारों के बाजार और भू-राजनीतिक प्रभुत्व का खेल है। रूस, चीन और भारत नए ब्लॉकों (ब्रिक्स+) के जरिए अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे रहे हैं।भारतीय पीएम ने दिनांक 25 अगस्त 2025 को अहमदाबाद में अपने संबोधन के दौरान कहा कि“आज दुनियाँ में आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति हो रही है”।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हुँ कि यह एक साधारण सा वाक्य प्रतीत होता है, लेकिन इसमें वैश्विक राजनीति,अर्थशास्त्र और कूटनीति की गहरी परतें छिपी हुई हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों और विश्व राजनीति की दिशा को समझने के लिए इस कथन का विश्लेषण अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसीलिए आज हम मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे,दुनियाँ में आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति का प्रचलन तेजी से बढ़ा-वैश्विक सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा व एकजुट की जगह गुटबाज़ी का माहौल बढ़ा।
साथियों बात अगर हम वैश्विक स्तर पर आज़ आर्थिक स्वार्थकी राजनीति का नयायुग शुरू होने की करें तो आज की दुनिया राजनीतिक विचारधाराओं की बजाय आर्थिक हितों से ज्यादा संचालित हो रही है। जहाँ कभी पूँजीवाद और समाजवाद जैसी विचारधाराएँ निर्णायक हुआ करती थीं,वहीं अब राष्ट्र अपनी नीतियों को इस आधार पर गढ़ते हैं कि उनका आर्थिक लाभ और हानि किस सीमा तक होगा। देशों की विदेश नीतियाँ, सैन्य रणनीतियाँ,यहाँ तक कि सांस्कृतिक कूटनीति भी अब उसी चश्मे से देखी जाती हैं जिसमें सबसे पहले सवाल पूछा जाता है-“इससे हमारे देश को क्या फायदा है?”।
साथियों बातें कम इस संबंध में अनेक देशोंकी अपडेट स्वार्थ -संचालित नीतियों को जाननेकी करें तो (1) अमेरिका की स्वार्थ-संचालितनीतियाँ:-अमेरिका की राजनीति आज सबसे स्पष्ट रूप से आर्थिक स्वार्थ पर आधारित दिखती है। डोनाल्ड ट्रंप के दौर से ही “अमेरिका फर्स्ट” नीति ने यह साफ़ कर दिया था कि वैश्विक सहयोग तभी तक टिकेगा, जब तक उससेअमेरिका को लाभ है। ट्रंप ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए, डब्लूटीओ के नियमों को चुनौती दी और नाटो सहयोगियों से रक्षा खर्च में बढ़ोतरी की मांग की।बाइडेन प्रशासन ने भले लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा अपनाई हो, लेकिन उनकी नीतियों का मूल भी अमेरिका की आर्थिक मज़बूती ही है। यूक्रेन युद्ध में खुले समर्थन का कारण भी रूस को कमजोर कर यूरोप के ऊर्जा बाजार और हथियारों के व्यापार पर अमेरिकी पकड़ बनाना है। अमेरिकी टेक कंपनियों पर चीन से दूरी बनाने का दबाव, भारत जैसे देशों में निवेश और सप्लाई- चेन शिफ्ट करना-ये सब दर्शाते हैं कि आर्थिक स्वार्थ ही विदेशनीति की दिशा तय करता है। (2) चीन का विस्तारवाद और आर्थिक हित:-चीन का मॉडल पूरी तरह आर्थिक हितों पर आधारित है। “बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव” के ज़रिये चीन ने एशिया, अफ्रीका और यूरोप में भारी निवेश किया, ताकि उसकी कंपनियों को नए बाजार मिलें और कर्ज़ देकर राजनीतिक प्रभाव भी कायम किया जा सके। लेकिन श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीकी देशों में “डेब्ट ट्रैप” की स्थिति बताती है कि चीन की नीतियाँ सहयोग से ज्यादा स्वार्थ पर आधारित हैं। दक्षिण चीन सागर में उसका आक्रामक रवैया भी समुद्री व्यापार और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के आर्थिक उद्देश्य से जुड़ा है। अमेरिका और यूरोप से तकनीकी प्रतिस्पर्धा, सेमीकंडक्टर पर पकड़ बनाने की कोशिश, और अफ्रीका में दुर्लभ धातुओं पर अधिकार हासिल करना-ये सब दर्शाते हैं कि चीन अपनी नीतियों को सिर्फ़ आर्थिक हित के तराज़ूपर तोल रहाहै।(3) यूरोप की दुविधा:-आदर्श बनाम आर्थिक ज़रूरतयूरोपीय संघ अक्सर जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार और वैश्विक न्याय की बातें करता है। लेकिन जब बात ऊर्जा, व्यापार और बाज़ार की आती है, तो वही यूरोप आर्थिक स्वार्थ के आगे झुक जाता है। जर्मनी और फ्रांस ने वर्षों तक रूस से सस्ती गैस पर अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी की, जबकि रूस की नीतियों को लेकर आलोचना भी करते रहे। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर प्रतिबंध लगाने का दबाव अमेरिका से आया, लेकिन अब यूरोप महंगे ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। इसके अलावा, यूरोप का अफ्रीकी देशों के साथ व्यापारिक संबंध, शरणार्थी संकट को रोकने के लिए समझौते, और चीन के साथ तकनीकी सहयोग भी आर्थिक हितों की राजनीति को उजागर करता है। (4) रूस का संसाधन-आधारित स्वार्थ:-रूस की राजनीति का मूल उसकी ऊर्जा और हथियारों पर आधारित अर्थव्यवस्था है। पुतिन ने बार-बार तेल और गैस को हथियार की तरह इस्तेमाल किया है। यूक्रेन पर आक्रमण के पीछे सिर्फ़ भू-राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक कारण भी हैं-काला सागर और डोनबास क्षेत्र पर नियंत्रण रूस के लिए औद्योगिक और ऊर्जा हितों से जुड़ा है। अफ्रीका में रूस की बढ़ती सैन्य मौजूदगी और खाद्य अनाज की आपूर्ति पर उसका नियंत्रण भी आर्थिक स्वार्थ को सामने लाता है। रूस आज अपने हथियार, ऊर्जा और खनिजों को इस्तेमाल कर वैश्विक राजनीति को प्रभावित करने की रणनीति अपना रहा है।(5)भारत का संतुलनकारी रवैया:-भारत भी इस वैश्विक परिदृश्य में अपने आर्थिक हितों को केंद्र में रख रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से सस्ते तेल की खरीद जारी रखी, भले ही पश्चिमी देशों ने दबाव बनाया। यही भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” की झलक है। अमेरिका और यूरोप से तकनीकी निवेश और व्यापारिक साझेदारी बढ़ाते हुए भी भारत रूस और ईरान से अपने संबंध बनाए रख रहा है।”मेक इन इंडिया” “आत्मनिर्भर भारत”और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे कार्यक्रम सीधे तौर पर आर्थिक स्वार्थ से प्रेरित हैं। साथ ही,भारत जलवायु परिवर्तन की वैश्विक राजनीति में भी यह स्पष्ट करता है कि वह केवल तभी बड़े कदम उठाएगा जब विकसित देश उसके आर्थिक हितों को सुरक्षित करेंगे। (6) मध्य-पूर्व: तेल, धर्म और शक्ति की राजनीति:-मध्य-पूर्व की राजनीति पूरी तरह तेल और गैस पर आधारित है। सऊदी अरब और यूएई ने अपनी आर्थिक नीतियों को “विजन 2030” जैसे कार्यक्रमों से विविधीकरण की ओर मोड़ा है, लेकिन उनकी प्राथमिकता अभी भी तेल निर्यात पर टिकीहै,इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष और ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता भी ऊर्जा मार्गों और क्षेत्रीय प्रभाव से जुड़ी है।अमेरिका और यूरोप का इस क्षेत्र में दखल केवल इसलिए है कि वे तेल की निर्बाध आपूर्ति चाहते हैं। हाल ही में ब्रिक्स में सऊदी अरब और ईरान की सदस्यता भी बताती है कि आर्थिक स्वार्थ कैसे नए भू-राजनीतिक समीकरण गढ़ रहा है।(7) अफ्रीका: संसाधनों पर वैश्विक खींचतान:- अफ्रीका दुनिया का सबसे समृद्ध महाद्वीप है प्राकृतिक संसाधनों के मामले में। लेकिन यहाँ की राजनीति में वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप साफ़ दिखता है। चीन, रूस, अमेरिका और यूरोप सब यहाँ की खनिज संपदा, ऊर्जा और बाज़ारों पर पकड़ बनाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। कोबाल्ट, लिथियम और दुर्लभ धातुओं की वैश्विक मांग ने अफ्रीका को तकनीकी युद्ध का नया केंद्र बना दिया है। लेकिन स्थानीय जनता गरीबी और असमानता से जूझ रही है, क्योंकि वैश्विक राजनीति केवल संसाधनों को हथियाने तक सीमित है।
साथियों बात अगर हम इस परिपेक्ष में वैश्विक संस्थाएँ और आर्थिक स्वार्थ की करें तो,डब्लूटीओ, आईएमफ, विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ सिद्धांत रूप से वैश्विक संतुलन के लिए बनी थीं। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन पर पश्चिमी देशों का दबदबा है और उनकी नीतियाँ अक्सर उन्हीं के आर्थिक हितों को साधती हैं। आईएमफ की शर्तों ने कई गरीब देशों को कर्ज़ जाल में फँसाया,डब्लूटीओ के नियम बड़े देशों के हितों के मुताबिक ढाले गए,और विश्व बैंक की परियोजनाएँ अक्सर पर्यावरण और स्थानीय समुदायों की कीमत पर पूरी हुईं। इसी के जवाब में ब्रिक्स,जी-20 और एससीओ जैसी संस्थाएँ उभर रही हैं, जो पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देकर अपने-अपने स्वार्थ पूरे करना चाहती हैं।
साथियों बात अगर हम तकनीकी युद्ध और डेटा की राजनीति की करें तो,आज की दुनिया में तकनीक नया हथियार है। अमेरिका और चीन 5जी, एआई,सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे हैं। यूरोप डेटा प्राइवेसी के नाम पर अपने हित साध रहा है।भारत,अफ्रीका और एशिया- प्रशांत देश इस तकनीकी प्रतिस्पर्धा में निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। “चिप वॉर” ने साफ कर दिया है कि तकनीकी विकास भी अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक शक्ति का प्रश्न बन चुका है।
साथियों बात अगर हमजलवायु परिवर्तन की राजनीति की करें तो,जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक सम्मेलन और समझौते अक्सर आदर्शवादी दिखते हैं, लेकिन असलियत आर्थिक स्वार्थ से जुड़ी है। विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश कार्बन उत्सर्जन कम करें, जबकि खुद उन्होंने दशकों तक प्रदूषण फैलाकर आर्थिक तरक्की हासिल की। हरित ऊर्जा, कार्बन क्रेडिट और क्लाइमेट फंड सब ऐसे उपकरण हैं, जिनका इस्तेमाल शक्तिशाली देश अपने आर्थिक हित साधने के लिए करते हैं। भारत और चीन जैसे देश यह साफ़ कह रहे हैं कि विकास की गति धीमी करना उनके हित में नहीं, जब तक विकसित देश उन्हें तकनीकी और आर्थिक मदद नहीं देंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आर्थिक स्वार्थ ही राजनीति का ध्रुवतारा:-दुनियाँ की राजनीति का असली चेहरा अब आर्थिक स्वार्थ है।चाहे अमेरिका की “अमेरिका फर्स्ट” नीति हो,चीन का बेल्ट एंड रोड, रूस की ऊर्जा कूटनीति, यूरोप की दुविधाएँ, भारत की संतुलनकारी रणनीति, या अफ्रीका-मध्यपूर्व पर वैश्विक खींचतान-सब जगह राष्ट्रीय नीतियों का ध्रुवतारा आर्थिक हित ही है। वैश्विक संस्थाएँ और समझौते भी इन्हीं हितों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। भविष्य में भी विश्व व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आगे बढ़ेगी-जहाँ सहयोग, संघर्ष और गठबंधन सब कुछ आर्थिक लाभ के आधार पर तय होंगे।

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

शराबखोरी का स्याह चेहरा आया सामने: छिन लिया परिवार की खुशियां, रौंद दी चार जिंदगियां

फोटो सौजन्य से पीके

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) के बाढ़ अनुमंडल में ऐसा दर्दनाक मंजर सामने आया जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। जामुनीचक गांव के पास एनएच-30ए पर तेज रफ्तार थार ने पैदल जा रहे एक ही परिवार को कुचल डाला। सड़क पर फैली चीख-पुकार और चार मासूम जिंदगियों का अचानक बुझ जाना सबके दिल को दहला गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, थार चालक नशे में धुत था और बेकाबू रफ्तार में गाड़ी चला रहा था। अचानक वाहन ने सड़क किनारे जा रहे परिवार पर चढ़ाई मार दी। इस दर्दनाक हादसे में दो महिलाओं और दो बच्चियों की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं एक अन्य किशोरी को गंभीर हालत में पटना पीएमसीएच भेजा गया है, जहां उसकी जिंदगी और मौत के बीच जंग जारी है।

हादसे के बाद गुस्साए लोगों का सब्र टूट गया। उन्होंने सड़क पर शव रखकर प्रदर्शन शुरू कर दिया। एनएच-30ए घंटों तक जाम रहा। भीड़ ने टायर जलाकर आगजनी की और हंगामा मच गया। मौके पर पहुंची पुलिस को हालात काबू में करने में खासी मशक्कत करनी पड़ी।

गांव में मातम पसरा है। जिस परिवार की खुशियां पलभर में उजड़ गईं, उसकी चीख-पुकार सुनकर हर किसी की आंखें नम हो गईं। ग्रामीणों का आरोप है कि शराब के नशे में धुत चालक ने यह वारदात की और घटना के बाद मौके से फरार हो गया।

यह हादसा सिर्फ एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि शराबखोरी और लापरवाही का वह स्याह चेहरा है जिसने मासूम जिंदगियों को निगल लिया। सवाल यह उठता है कि शराबबंदी वाले राज्य में आखिर शराब और नशे की हालत में वाहन चलाने की घटनाएं कब थमेंगी?

🔥 पुणे में भीषण अग्निकांड: टीवीएस मोटरसाइकिल शोरूम जलकर खाक, 60 बाइकें राख

सांकेतिक फोट

पुणे (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) महाराष्ट्र के पुणे शहर में सोमवार देर रात भीषण आग लगने की घटना सामने आई। शहर के एक टीव्हीएस मोटरसाइकिल शोरूम-सह-सर्विस सेंटर में आग लगने से पूरा इलाका धुएं के गुबार से भर गया। हादसे में अफरातफरी का माहौल बन गया, हालांकि राहत की बात यह रही कि दमकल कर्मियों ने समय रहते एक व्यक्ति की जान बचा ली।

दमकल विभाग के अधिकारियों ने बताया कि शोरूम में आग लगते ही धुआं तेजी से फैल गया, जिससे एक व्यक्ति अंदर फंस गया था। लेकिन बचावकर्मियों ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर उसे सुरक्षित बाहर निकाल लिया। करीब 30 मिनट की कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया।

आग में शोरूम में मौजूद करीब 60 दोपहिया वाहन पूरी तरह जलकर नष्ट हो गए। इनमें पेट्रोल और इलेक्ट्रिक दोनों तरह की मोटरसाइकिलें थीं। कई बाइकें बिल्कुल नई थीं, जबकि कुछ मरम्मत के लिए सेंटर में लाई गई थीं।

इसके अलावा आग की लपटों ने शोरूम में रखे बिजली के तार, मशीनरी, बैटरियां, स्पेयर पार्ट्स, कंप्यूटर, फर्नीचर और जरूरी दस्तावेज भी स्वाहा कर दिए।

अधिकारियों के मुताबिक, आग लगने के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। जांच टीम शॉर्ट-सर्किट समेत अन्य पहलुओं पर भी गौर कर रही है।
बड़ी राहत की बात यह रही कि समय पर दमकल विभाग की तत्परता से हादसे में किसी की जान नहीं गई, वरना नुकसान और भी बड़ा हो सकता था।

“सदर विधायक को मिली खौफनाक धमकी: मजार का मुद्दा उठाना पड़ा भारी, गोली से उड़ा देने की चेतावनी”

देवरिया। (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)गोरखपुर रोड पर रेलवे ओवरब्रिज के नीचे बनी मजार पर अवैध कब्जे का मामला उठाना सदर विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी को भारी पड़ता दिख रहा है। उन्हें जान से मारने की खौफनाक धमकी दी गई है, जिससे पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई है।

ईमेल पर भेजे गए संदेश, Mdseraj813@gmail.com में क्या लिखा गया –

“इतनी गोलियां मारेंगे कि लाश के चिथड़े उड़ जाएंगे… योगी आदित्यनाथ का भी जो हाल होगा पूरा इंडिया देखेगा। अब ओपन चैलेंज है, मजार को छूकर दिखा लो।”

यह संदेश सामने आते ही समर्थकों में जबरदस्त आक्रोश है। कई लोग इसे सिर्फ विधायक ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री को भी खुली चुनौती मान रहे हैं।

28 साल पुराना खौफनाक इतिहास विधायक ने खुलासा किया कि करीब 28 साल पहले संघ के वरिष्ठ प्रचारक राम नगीना यादव ने इसी मजार की वैधता पर सवाल उठाया था। उसके बाद उनकी हत्या कर दी गई थी। तब से लोग इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से कतराते रहे। साल 2017 में भी इसी भूमि पर अवैध कब्जे का मामला दर्ज हुआ, लेकिन रहस्यमयी तरीके से दबा दिया गया।

मुख्यमंत्री के आदेश के बाद बढ़ा विवाद हाल ही में विधायक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र सौंपकर इस मजार का दायरा लगातार बढ़ने और राष्ट्रीय राजमार्ग की जमीन पर कब्जे का मुद्दा उठाया। मुख्यमंत्री ने डीएम और एसपी को जांच के निर्देश दिए, जिसके बाद मामला तूल पकड़ गया।

धमकियों की बौछार और बढ़ी सुरक्षा डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी ने बताया कि धमकी सिर्फ ईमेल तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्हें व्हाट्सएप पर भी लगातार धमकी भरे संदेश मिल रहे हैं। इसकी सूचना उन्होंने पुलिस-प्रशासन को दे दी है।

कोतवाल डी.के. सिंह ने कहा कि धमकी की जांच की जा रही है और विधायक की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

जनमानस में भय और आक्रोश इस धमकी के बाद क्षेत्र में असुरक्षा की गहरी भावना फैल गई है। लोग आशंकित हैं कि कहीं इतिहास खुद को न दोहराए। वहीं समर्थक और आम नागरिक आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी और सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

मासूमों की मौत मामले की जांच पर नाराजगी, भीड़ ने गाड़ियां फूंकी, पुलिस पर हमला

फोटो सौजन्य पीके

पटना(राष्ट्र की परम्परा डेस्क) राजधानी पटना के अटल पथ पर सोमवार शाम हालात अचानक बेकाबू हो गए। 15 अगस्त को इंद्रपुरी इलाके में दो मासूम बच्चों की लाश कार से बरामद होने के मामले की जांच को लेकर नाराजगी जताने बड़ी संख्या में लोग जुटे और देखते ही देखते प्रदर्शन उग्र रूप ले लिया।

गुस्साई भीड़ ने सड़क जाम कर दिया और कई गाड़ियों में आग लगा दी। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर भी हमला कर दिया, जिससे कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। सिटी एसपी दीक्षा के नेतृत्व में मौके पर पहुंची पुलिस टीम पर भीड़ ने पथराव किया, जिसके बाद स्थिति नियंत्रित करने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी। इस दौरान एक स्कॉर्पियो व दो बाइक, जिनमें एक डायल-112 की गाड़ी शामिल है, को आग के हवाले कर दिया गया।

हंगामे में राहगीरों के साथ मारपीट, महिलाओं के साथ अभद्रता और वाहनों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं। पुलिसकर्मी जान बचाकर भागे लेकिन बाद में मोर्चा संभालते हुए उपद्रवियों को खदेड़ा।

पटना एसएसपी कार्तिकेय शर्मा भी मौके पर पहुंचे। उन्होंने कहा कि अब तक की जांच रिपोर्ट में बच्चों की हत्या का कोई सबूत नहीं मिला है, इस कारण आगे की कार्रवाई नहीं हो रही है। बावजूद इसके, कानून अपने हाथ में लेने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। घटना को साजिशपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि दोषियों की पहचान कर गिरफ्तारी की जाएगी।

पंचायत में भी आरक्षण 25 वर्षों के लिए होना चाहिए: डॉ. जनार्दन कुशवाहा

भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परंपरा)
राष्ट्रीय पंचायती राज ग्राम प्रधान संगठन उत्तर प्रदेश के प्रदेश संगठन मंत्री डॉ. जनार्दन कुशवाहा ने पंचायतों में आरक्षण की अवधि 25 वर्षों के लिए तय करने की मांग उठाई है।

उन्होंने संगठन के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर पांडे से बातचीत में कहा कि वर्तमान में पंचायतों में आरक्षण मात्र 5 वर्षों के लिए होता है, जबकि लोकसभा और विधानसभा सीटें 25 वर्षों तक आरक्षित रहती हैं। पंचायतों में बार-बार आरक्षण बदलने से विकास कार्य बाधित होते हैं और स्थिरता नहीं बन पाती।

प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर पांडे ने भी माना कि यदि यह मामला उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए, तो पंचायतों में भी आरक्षण की अवधि विधायिका की तरह 25 वर्ष की जा सकती है।

डॉ. कुशवाहा ने सभी ग्राम प्रधानों से आह्वान किया कि वे इस विषय पर एकजुट होकर प्रदेश अध्यक्ष से वार्ता करें और ठोस नीति बनाने की दिशा में कदम उठाएँ। उन्होंने कहा कि यह बदलाव पंचायतों में विकास और स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।