Tuesday, July 7, 2026
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चंडीगढ़ में बड़ी घटना: हरियाणा पुलिस के आईजी रैंक अधिकारी ने खुद को गोली मारकर दी जान, मौके पर पहुंची एसएसपी व फोरेंसिक टीम

चंडीगढ़ (राष्ट्र की परम्परा)। पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ के सेक्टर-11 में मंगलवार को एक दर्दनाक घटना सामने आई। हरियाणा पुलिस के आईजी रैंक के अधिकारी ने कथित रूप से खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इस घटना से पुलिस विभाग और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

जानकारी के अनुसार, मंगलवार दोपहर अधिकारी ने अपने आवास पर सरकारी रिवॉल्वर से खुद को गोली मारी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई। गोली चलने की आवाज सुनते ही मौके पर मौजूद कर्मियों और स्थानीय लोगों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।

सूचना मिलते ही चंडीगढ़ पुलिस की एसएसपी, सीएफएसएल और फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई और जांच शुरू कर दी। फिलहाल पुलिस ने पूरे इलाके को घेरकर साक्ष्य जुटाने का काम शुरू कर दिया है।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, आत्महत्या के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है। फिलहाल फोरेंसिक टीम और सीएफएसएल की जांच के बाद ही मामले की स्पष्ट जानकारी सामने आएगी।

इस घटना से पुलिस महकमे में शोक की लहर है। वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है।

मंदसौर में बड़ी कार्रवाई: कंटेनर ट्रक से 39 क्विंटल अवैध मछली जब्त, तीन आरोपी गिरफ्तार – गुजरात ले जाई जा रही थी मछलियां

मंदसौर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए आयशर कंटेनर ट्रक से 39 क्विंटल (3920 किलो) से अधिक अवैध मछलियां जब्त की हैं, जिनकी अनुमानित कीमत करीब तीन लाख रुपये बताई जा रही है। इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। बताया जा रहा है कि ये मछलियां चंबल नदी से अवैध रूप से निकालकर गुजरात भेजी जा रही थीं।

भानपुरा थाना प्रभारी आर.सी. दांगी के अनुसार, भैसोदामंडी चौकी के सहायक उप निरीक्षक ओकार सिंह ठाकुर को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक ट्रक (क्रमांक GJ-32 T 8175) में अवैध मछलियां भरकर निमथुर टोल चौराहा से भानपुरा-गरोठ मार्ग होते हुए गुजरात की ओर भेजी जा रही हैं।

सूचना पर तत्काल कार्रवाई करते हुए पुलिस ने निमथुर टोल पर नाकाबंदी की और संदिग्ध ट्रक को रोका। तलाशी लेने पर ट्रक के पीछे लगे कंटेनर में 112 केरेट में भरी लगभग 39 क्विंटल मछलियां बरामद हुईं।

पुलिस ने ट्रक में सवार तीन आरोपियों –

  1. अल्ताफ पिता उमर शेख (57 वर्ष), निवासी वेरावल, जिला गिर सोमनाथ, गुजरात
  2. जुबेर पिता जावेद शेख (40 वर्ष), निवासी वेरावल, जिला गिर सोमनाथ, गुजरात
  3. राकेश पिता किशनलाल भोई (50 वर्ष), निवासी इमली बाजार, मराठी मोहल्ला, इंदौर –
    को मौके से गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने ट्रक (GJ-32 T 8175) को भी जब्त कर लिया है। आरोपियों के खिलाफ धारा 303(2) बीएनएस व पांच मत्स्य अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई है।

थाना प्रभारी दांगी ने बताया कि आरोपियों से अवैध मछली के स्रोत और खरीददारों के बारे में पूछताछ की जा रही है। फिलहाल पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस रैकेट के पीछे और कौन लोग शामिल हैं।

“मुख्यमंत्री धामी का शिक्षा सुधार: मदरसा बोर्ड समाप्त, गुणवत्ता शिक्षा की पहल”

“उत्तराखंड में मदरसों का नया अध्याय: अल्पसंख्यक शिक्षा बोर्ड समाप्त, सभी स्कूल अब शिक्षा बोर्ड से जुड़े”

देहरादून (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने सोमवार को उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक, 2025 को मंजूरी दे दी। इस नए कानून के लागू होने के बाद राज्य का मदरसा बोर्ड समाप्त हो जाएगा और सभी मदरसे अब उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त करेंगे तथा उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड से संबद्ध होंगे।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्यपाल की स्वीकृति की सराहना करते हुए कहा कि यह कदम राज्य की शिक्षा प्रणाली को पारदर्शी, जवाबदेह और गुणात्मक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक नया प्राधिकरण स्थापित किया जाएगा, जो उनकी मान्यता और गुणवत्ता की निगरानी करेगा।

धामी ने आगे बताया कि जुलाई 2026 से सभी अल्पसंख्यक स्कूल राष्ट्रीय पाठ्यचर्या (NCF) और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) को अपनाएँगे। मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राज्य के हर बच्चे को समान शिक्षा और अवसर मिले, चाहे वह किसी भी वर्ग या समुदाय का हो।

राज्य विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद, उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन जाएगा, जहां मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त किया गया। मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा कि यह पहल अल्पसंख्यक संस्थानों को मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली में लाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने की सरकार की कोशिशों का हिस्सा है।

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“लोकतंत्र पर हमला या अंतरराष्ट्रीय मंच? राहुल गांधी की आलोचना में भाजपा नेता की चुनौती”

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने मंगलवार को सवाल उठाया कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को विदेशी विश्वविद्यालयों में क्यों आमंत्रित किया जाता है, जबकि उन्हें किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय में बोलने का अवसर नहीं मिलता। त्रिवेदी की यह टिप्पणी कोलंबिया विश्वविद्यालय में गांधी की हालिया टिप्पणियों के बाद आई, जहाँ उन्होंने केंद्र सरकार की आलोचना की थी।

त्रिवेदी ने कहा कि राहुल गांधी विदेशी मंचों पर जाकर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं और देश की उपलब्धियों को नजरअंदाज करते हैं। उन्होंने सवाल उठाया, “उन्हें कौन आमंत्रित करता है, यह रहस्य है।”

सुधांशु त्रिवेदी ने कहा, “कांग्रेस में कई विद्वान नेता हैं। लेकिन कोई उन्हें विदेशी विश्वविद्यालयों में क्यों नहीं बुलाता, सिर्फ राहुल गांधी को ही क्यों बुलाता है? अगर वह वास्तव में विद्वान हैं, तो देश का कोई भी विश्वविद्यालय उन्हें क्यों आमंत्रित नहीं करता।”

राहुल गांधी ने 2 अक्टूबर को नरेंद्र मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती लोकतंत्र पर हो रहे हमले हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में इंजीनियरिंग और स्वास्थ्य सेवाओं में मजबूत क्षमताएं हैं, जिससे देश की प्रगति के लिए आशावादी रहना संभव है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमले देश के लिए गंभीर खतरा हैं।

गांधी ने कहा कि भारत में अनेक धर्म, परंपराएँ और भाषाएँ हैं, और यह विविधता ही लोकतंत्र की ताकत है। उन्होंने जोर दिया कि विभिन्न विचारों और संस्कृतियों के बीच संवाद बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल उद्देश्य है।

इसी बीच, सुधांशु त्रिवेदी ने मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई पर हमले के प्रयास की भी निंदा की और कहा कि ऐसी परिस्थिति में भी मुख्य न्यायाधीश ने संयम दिखाया, जिसकी सराहना की जानी चाहिए।

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पुरानी रंजिश ने भड़काया खूनी संघर्ष, बलिया में मारपीट और फायरिंग – तीन घायल

बलिया (राष्ट्र की परम्परा) यह दृश्य किसी हॉरर फिल्म का हिस्सा नहीं बल्कि बलिया का सच है। सोमवार दोपहर गड़वार थाना क्षेत्र के सिंहाचवर पेट्रोल पंप पर पुरानी रंजिश ने खौफनाक रूप धारण कर लिया। तीन युवा – सूरज राजभर (18), अशोक राजभर (18) और लखन कुमार (19) – इस खूनी झड़प के शिकार बने। सूरज के बाएं हाथ में गोली लगी, जबकि अशोक और लखन को लाठियों और ईंट-पत्थरों से चोटें आईं।

घायल युवकों के परिवार सदमे में हैं। सूरज की माँ रोते हुए कहती हैं, “हमारा बेटा घर का इकलौता सहारा है। उसे गोली लगी है, सोचकर ही दिल कांप जाता है।” अशोक के पिता अश्वस्त हैं कि उनका बेटा बेहतर इलाज के लिए वाराणसी भेजा गया है। लखन के भाई ने भावुक होकर कहा, “हमने कभी सोचा भी नहीं था कि मामूली झगड़े इतने खतरनाक रूप ले लेंगे।”

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि दिन में पहले चिलकहर चट्टी पर मामूली विवाद हुआ था, जिसे स्थानीय लोगों ने थोड़ी देर के लिए शांत करा दिया। लेकिन जैसे ही दोनों गुट सिंहाचवर पेट्रोल पंप पर आमने-सामने आए, माहौल एकदम तनावपूर्ण हो गया और फिर भयंकर मारपीट और फायरिंग शुरू हो गई।

पुलिस की प्रतिक्रिया:
घटना के तुरंत बाद इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई। अतिरिक्त बल तैनात कर दिया गया है और गांव में लगातार गश्त की जा रही है। थाना प्रभारी ने बताया कि आरोपियों की पहचान कर ली गई है और जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

ग्रामीणों में डर और चिंता साफ दिख रही है। एक ग्रामीण ने कहा, “ऐसी रंजिशें अक्सर छोटे झगड़े को जानलेवा बना देती हैं। अगर इसे जल्द नहीं रोका गया, तो परिणाम और भयावह हो सकते हैं।”

इस घटना ने बलिया के छोटे कस्बों में शांति और सुरक्षा की चिंता को फिर से उजागर कर दिया है। लोग अब सिर्फ न्याय की नहीं, बल्कि सुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं की मांग भी कर रहे हैं।

तीनों घायल अब जिला अस्पताल में भर्ती हैं, सूरज की हालत स्थिर, अशोक का वाराणसी में इलाज जारी।

पुलिस जांच जारी, आरोपियों की गिरफ्तारी की कवायद तेज। इलाके में तनाव को देखते हुए स्कूल और सार्वजनिक स्थल पर सतर्कता बढ़ा दी गई है।

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थोक व्यापारी को वाणिज्य कर विभाग से मिला न्याय, 1.65 लाख रुपये की हुई बचत

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा) – इस्माइलपुर, साहबगंज निवासी प्रतिष्ठित थोक किराना व्यापारी अवनीश ट्रेडर्स को वाणिज्य कर विभाग सचल दल, वाराणसी द्वारा बेबुनियाद रूप से रोककर ₹1.65 लाख जमा करने का दबाव बनाए जाने के मामले में न्याय दिलाने में चेंबर ऑफ कॉमर्स, गोरखपुर के अध्यक्ष संजय सिंघानिया ने अहम भूमिका निभाई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अवनीश ट्रेडर्स ने महावीर कोकोनेट एंड एग्रो प्रोडक्ट प्रा. लि., टुमकुर (कर्नाटक) से 200 बोरी गरी बुरादा वाहन संख्या KA52C1774 में मंगवाया था। सभी कागजात — ई-इनवॉइस, ई-वे बिल, बिल्टी और जीएसटी दस्तावेज़ — सही होने के बावजूद, वाणिज्य कर विभाग सचल दल ने 5 अक्टूबर 2025 की मध्यरात्रि को वाहन रोक लिया और असिस्टेंट कमिश्नर शरद मिश्रा ने फोन पर व्यापारी और चालक को ₹1.65 लाख जमा करने का दबाव बनाया।

व्यापारी ने नियमों के तहत सभी दस्तावेज़ प्रस्तुत किए, लेकिन उन्हें अनसुना करते हुए मालवाहन को वाराणसी कार्यालय में खड़ा कर नोटिस जारी कर दिया गया। सभी प्रयास विफल होने पर व्यापारी ने चेंबर ऑफ कॉमर्स अध्यक्ष संजय सिंघानिया से संपर्क किया।

सिंघानिया ने व्यापारी की शिकायत को गंभीरता से लेते हुए सभी दस्तावेजों का गहन अध्ययन किया और वाराणसी व लखनऊ के वाणिज्य कर विभाग के उच्च अधिकारियों से संपर्क किया। प्रमुख सचिव, वाणिज्य कर विभाग, उत्तर प्रदेश को भी पूरी जानकारी दी गई। प्रमुख सचिव और मुख्यालय के हस्तक्षेप के बाद 6 अक्टूबर 2025 की सायंकाल विभाग ने मालवाहन को बिना किसी दंड के छोड़ने का आदेश जारी किया।

व्यापारी अवनीश ट्रेडर्स ने सिंघानिया का हृदय से आभार व्यक्त करते हुए कहा,
“आपका निःस्वार्थ सहयोग और न्याय दिलाने की प्रतिबद्धता प्रशंसनीय है। अब तक मैंने किसी व्यापारी संगठन में ऐसी तत्परता नहीं देखी थी।”

इस अवसर पर अध्यक्ष संजय सिंघानिया ने कहा,
“यह आप सभी का स्नेह और विश्वास है। चेंबर ऑफ कॉमर्स सदैव व्यापारियों के साथ खड़ा है और उनकी न्यायसंगत समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर रहेगा।”

सिंघानिया ने प्रमुख सचिव वाणिज्य कर विभाग तथा मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों को उनके त्वरित निर्णय एवं निष्पक्ष कार्रवाई के लिए धन्यवाद और बधाई भी दी।

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इसे पढ़ें – धर्म के नाम पर न्यायपालिका पर हमला: भारतीय संविधान की आत्मा पर कालिख

धर्म के नाम पर न्यायपालिका पर हमला: भारतीय संविधान की आत्मा पर कालिख

भारत की सर्वोच्च न्यायपालिका पर धर्म के नाम पर हमला ने देश को झकझोर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर जूता फेंकने का प्रयास किया। गिरफ्तारी के समय उन्होंने चिल्लाते हुए कहा, “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे, हिंदुस्तान!”।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने शांतिपूर्ण प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “These things don’t affect me.” लेकिन सवाल यही है कि समाज में यह जहरीली मानसिकता कहाँ से आई, और कब यह तय होने लगा कि असहमति व्यक्त करने वाले पर हमला करना “धर्म रक्षा” कहलाने लगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि धर्म के नाम पर फैली यह हिंसक विचारधारा अब अदालतों तक पहुँच चुकी है। ऐसे लोग केवल मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों और बौद्धों के खिलाफ ही नहीं, बल्कि अपने ही समाज के कमजोर वर्गों के लिए भी खतरा हैं।

कांवड़ यात्राओं में तोड़फोड़, दूसरे धर्मों के पूजास्थलों में उपद्रव, दलितों और कमजोर तबकों पर अत्याचार—यह सब उस धर्म का चेहरा है जो संविधान और कानून की मर्यादाओं को नकार रहा है। गरीब मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार भी इसी हिंसक मानसिकता का परिणाम है, जब अपराध और पाखंड को धर्म की ओट में वैधता मिलती है।

विश्लेषकों के अनुसार यह मानसिकता देश में विभाजन और हिंसा के बीज बो रही है। सुप्रीम कोर्ट में जूता फेंकने की घटना न केवल न्यायपालिका पर हमला है, बल्कि भारतीय गणराज्य की आत्मा पर हमला भी है।

समस्या किसी धर्म की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो धर्म को सत्ता और प्रभुत्व के औजार के रूप में प्रयोग करती है। ऐसे विचार किसी भी राष्ट्र के लिए आत्मघाती हैं। यह घटना स्पष्ट चेतावनी है कि अगर हमने इस उन्माद का प्रतिरोध नहीं किया, तो भविष्य में संविधान, न्याय और स्वतंत्रता को भी खतरा हो सकता है।

मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकना किसी व्यक्तिगत कृत्य का परिणाम नहीं, बल्कि उस मानसिक अंधकार का प्रतीक है जिसमें सच्चाई, न्याय और विवेक को अपमान कहा जाने लगा है।

देश को बचाने के लिए सबसे पहले धर्म के नाम पर फैली हिंसा और पागलपन के खिलाफ आवाज उठानी होगी, क्योंकि अगर आज अदालत पर जूता फेंका गया, तो कल यह लोकतंत्र के चेहरे पर भी पड़ेगा।

इसे पढ़ें –“सद्भाव और संस्कृति का प्रतीक बना कोपागंज — हजारों ने देखा रामराज्य का साकार रूप”

“सद्भाव और संस्कृति का प्रतीक बना कोपागंज — हजारों ने देखा रामराज्य का साकार रूप”

कोपागंज के ओड़ियाना मैदान में गूंजा ‘जय श्रीराम’ — 68 वर्षों की परंपरा में उमड़ा श्रद्धा व उत्साह का सागर”

रिपोर्ट – धीरेन्द्र त्रिपाठी

मऊ (राष्ट्र की परम्परा)। 6 अक्टूबर की ऐतिहासिक रात को कोपागंज कस्बे के ओड़ियाना मैदान ने एक बार फिर इतिहास रचा। “वेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे, नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे” की पावन ध्वनि के साथ सोमवार की रात प्रभु श्रीराम का भव्य रामराज्याभिषेक संपन्न हुआ। पूरा नगर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा और “जय श्रीराम” के जयघोष से पूरा आकाश गूंज उठा।

68 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में इस बार श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। ओड़ियाना बाजार, गलियां, छतें — सब श्रद्धा से भरे लोगों से पट गए। सुरक्षा के लिए पूरे नगर को छावनी में तब्दील किया गया था। कोपागंज थाना प्रभारी रवींद्र नाथ राय, एसआई अनिकेत सिंह और पीएसी के जवान पूरी रात मुस्तैद रहे।

पूरे विधि-विधान से कुल पुरोहित पंडित परशुराम तिवारी ने प्रभु श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का पूजन-अर्चन किया। इसके बाद मुनि वशिष्ठ की भूमिका निभा रहे ब्राह्मण ने प्रभु श्रीराम का राजतिलक किया। पुष्पवृष्टि और मंत्रोच्चार के बीच जब प्रभु गद्दी पर विराजे, तो श्रद्धा की लहर हर दिशा में दौड़ गई।

रामलीला कमेटी के अध्यक्ष डॉ. अजय यादव सहित पदाधिकारियों — हरिशंकर जायसवाल, दुर्गेश गुप्ता, मोतीचंद्र जायसवाल, राकेश यादव आदि ने पूरी रात आयोजन को सफल बनाने में भूमिका निभाई। नगर पंचायत प्रशासन ने स्वच्छता व सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया।

इस अवसर पर लगे मीना बाजार में महिलाओं का हुजूम देर रात तक खरीदारी में व्यस्त रहा, जहां केवल महिलाओं के प्रवेश की अनुमति थी। वहीं देर रात तक चले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भोजपुरी गायकों के भजन और नृत्य प्रस्तुतियों ने श्रद्धालुओं को झूमने पर विवश कर दिया।

कोपागंज का यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक, बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक भी है। हर धर्म, हर समुदाय के लोग इस आयोजन में साथ आते हैं और मिलकर “रामराज्य” की अवधारणा को साकार करते हैं। यह आयोजन स्वतंत्रता पूर्व काल से निरंतर होता आ रहा है — और आज भी इसकी आस्था, अनुशासन व समरसता जनमानस को जोड़ती है।

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मूसलाधार बारिश से तबाही, 30 की मौत; हरसंभव मदद का आश्वासन

कोलकात्ता (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में वह दिन दर्ज हुआ जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार के नेतृत्व में पार्टी प्रतिनिधिमंडल उत्तर बंगाल के भूस्खलन और बाढ़ प्रभावित इलाकों का मुआयना करने पहुँचा।
मूसलाधार बारिश से दार्जिलिंग और मिरिक क्षेत्र में भारी तबाही मची है, जिसमें अब तक 30 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और कई लापता हैं।

शुभंकर सरकार, वरिष्ठ नेता पार्थ भौमिक और आशुतोष चटर्जी के साथ मिरिक मार्ग पर कई स्थानों पर रुके और आपदा की वास्तविक स्थिति का जायजा लिया। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया।

पार्टी सूत्रों ने बताया कि बंगाल कांग्रेस ने राहत कार्यों के समन्वय के लिए एक विशेष आपदा राहत समिति गठित की है, जो उत्तर बंगाल में फंसे और प्रभावित परिवारों तक सहायता पहुंचाएगी।
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस दौरे के बाद कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व को विस्तृत रिपोर्ट सौंपेंगे ताकि राहत प्रयासों को और तेज़ किया जा सके।
स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान शुभंकर सरकार ने कहा,
“यह सिर्फ़ प्राकृतिक आपदा नहीं, मानवीय त्रासदी है — कांग्रेस हर पीड़ित परिवार के साथ खड़ी है।”

उनके इस बयान ने न केवल राहत कार्यों को गति दी बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी संवेदनशील चर्चा छेड़ दी है।

प्रधानमंत्री ने सीजेआई गवई पर हुए हमले की तीव्र निंदा की — देश भर में आक्रोश

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुप्रीम कोर्ट परिसर में मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई पर हुए हमले को “निंदनीय कृत्य” कहा और इसे हर भारतीय के लिए अपमान बताया। उन्होंने न्यायमूर्ति गवई से बात की और कहा कि ऐसा आचरण हमारे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।

घटना सुबह हुई जब 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने सीजेआई की कक्ष में जूता फेंकने का प्रयास किया। सौभाग्य से, चीफ जस्टिस गवई शांत और संयमित रहे — उन्होंने उपस्थित सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों से इस घटना को नजरअंदाज करने की अपील की। उन्होंने कहा, “हम विचलित न हों — इन बातों का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता।”

इस घटना के पश्चात्, भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) ने दोषी अधिवक्ता का वकालत लाइसेंस तुंरत निलंबित कर दिया। पुलिस को आरोपी के कब्जे से एक पर्चा मिला जिस पर लिखा था, “सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान”. अदालत कक्ष में हुई इस अभूतपूर्व घटना के बावजूद, प्रधान न्यायाधीश ने शांतिपूर्वक निर्देश दिया कि दोषी को चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए।

प्रधानमंत्री मोदी ने इस घटना पर कहा: “हमारे समाज में ऐसे अभद्र और असंवैधानिक कृत्यों की कोई जगह नहीं है। मैं न्यायमूर्ति गवई द्वारा प्रदर्शित धैर्य और संविधान व न्याय के मूल्यों की प्रति उनकी प्रतिबद्धता की सराहना करता हूँ।”

बिहार की लड़ाई: क्या विपक्ष फिर लिख पाएगा इतिहास?

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)लोकसभा चुनाव 2024 की राजनीतिक महासमर ने भाजपा को सत्ता की चाबी सौंप दी थी, लेकिन विपक्ष को भी राष्ट्रीय अखाड़े में दोबारा वापसी करने की उम्मीदें जगा दी थीं। महज डेढ़ साल बाद, हालात बदलने लगे हैं। हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा की अप्रत्याशित जीत ने विपक्ष की उमंगों को झटका दिया, वहीं झारखंड और जम्मू-कश्मीर की लड़ाइयाँ वो असर नहीं छोड़ सकीं जिसकी प्रबल आशा थी।

अब जब बिहार का रण सामने है, तो यह महज राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा-निर्धारक जंग बन चुका है। बिहार वो प्रदेश है जहाँ कभी लालू-प्रसाद यादव की समाजवादी राजनीति ने केंद्र सरकार की नीतियों को आकार दिया था। आज यह प्रश्न गूंजता है कि तेजस्वी यादव, क्या दो दशक बाद सत्ता की धुरी बन सकेंगे? या क्या भाजपा पहली बार राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी?

विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक के लिए यह चुनाव सिर्फ़ पर्चियों की लड़ाई नहीं, अस्तित्व की परीक्षा है। 2024 के विपरीत परिस्थितियों में भी यदि विपक्ष ने लड़ाई की कड़ी कर दी थी, तो अब देखना है कि क्या वही जोश, वही अनुशासन, वही मिलाप कायम रह पाएगा। क्योंकि सत्ता पक्ष ने मतदाताओं को लुभाने के लिए तमाम सामाजिक-आर्थिक योजनाओं, जातिगत संतुलन, संगठनात्मक मजबूती और मोदी की लोकप्रिय छवि का भरपूर उपयोग किया है।

भाजपा-जेडीयू गठबंधन के पास एक सुदृढ़ सामाजिक गठजोड़ है — सवर्णों से लेकर अति-पिछड़ों तक एक बुनाव तैयार है जो विपक्ष के लिए दरारों की चुनौती बनाता प्रतीत होता है। विपक्षी इंद्रधनुष गठबंधन के पास एकता है, भाषणों में जोश है, लेकिन सामाजिक स्तर पर उसका असर कितना गहरा है — यह अभी अनिश्चित है।

विपक्ष ने कम तैयारी नहीं की है। राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’, तेजस्वी यादव की जनसभाएँ, नीतीश कुमार पर कटाक्ष— ये सारी कवायदें मनोबल बढ़ा रही हैं। वोटर सूची विवाद पर सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत ने उन्हें नैतिक बल दिया है। लेकिन ये सब तब तक अधूरा है जब तक कि यह जोश मतों में परिवर्तन नहीं करता।

दूसरी ओर, भाजपा-जेडीयू गठबंधन ने विकास का नैरेटिव स्थापित किया है: मुफ्त राशन, आवास, उज्जवला, जनधन जैसी योजनाएँ यह संदेश देती हैं कि “गरीबों को सम्मान और अवसर” मिल रहा है। विपक्ष इस दावे को चुनौती देता है कि ये योजनाएँ गरीबों को आत्मनिर्भर नहीं बल्कि राज्य-निर्भर बनाएँगी। तेजस्वी यादव बेरोज़गारी, महँगाई और विकास के असमय दायरे को सामने ला रहे हैं, और यह तर्क कर रहे हैं कि विकास सिर्फ घोषणाएँ नहीं, सही नीतियाँ चाहिए।

यह चुनाव केवल बिहार की राजनीति के लिए नहीं, बल्कि विपक्ष की राष्ट्रीय प्रासंगिकता के लिए मापदंड सिद्ध होगा। अगर INDIA गठबंधन ने यहाँ शानदार प्रदर्शन किया, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष अभी भी मुकाबले में है। लेकिन यदि भाजपा-जेडीयू गठबंधन एक बार फिर सहज जीत दर्ज कर लेता है, तो यह विपक्ष के मनोबल के लिए बड़ा धक्का होगा।

हालाँकि वर्तमान माहौल यह बताता है कि यह चुनाव एकतरफ़ा नहीं होगा। तेजस्वी यादव और राहुल गांधी नेतृत्व कर रहे विपक्ष की तैयारियाँ पूरी हैं; वह भाजपा को चुनौती देने को तैयार है। अब देखना है कि मतदाता किसके पक्ष में झुकता है, और किस पार्टी को कितना विश्वास मिल पाता है।

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सोशल मीडिया: समाज के लिए वरदान के साथ अभिशाप भी है सावधानीपूर्वक इसका प्रयोग करे

     लेखिका - सुनीता कुमारी

​सोशल मीडिया (Social Media) एक ऐसा ऑनलाइन माध्यम (Online Platform) है, जहाँ लोग आपस में जुड़ते हैं, जानकारी साझा करते हैं, विचार व्यक्त करते हैं, मनोरंजन करते हैं और समाचार या घटनाओं से जुड़ी सामग्री देख या बना सकते हैं।सोशल मीडिया वह डिजिटल मंच है जहाँ कोई भी व्यक्ति अपने विचार, फोटो, वीडियो या जानकारी साझा कर सकता है और दूसरों से बातचीत कर सकता है।
​सोशल मीडिया आज के दौर में हमारे जीवन का एक अविभाज्य अंग बन चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर (अब X) और यूट्यूब जैसे मंचों ने संचार की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ दिया है। यह एक ऐसा शक्तिशाली उपकरण है जिसने समाज को एक नए तरीके से जोड़ा है, लेकिन इसके साथ ही इसने नई चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। प्रश्न यह है कि सोशल मीडिया वास्तव में हमारे समाज के लिए वरदान है या अभिशाप?एक ओर जहां इसके अनेको फायदे है वही ढेरो नुकसान भी है।सोशल मीडिया के कारण समाज तेजी से बदल रहा है।
​सोशल मीडिया एक वरदान के रूप में

सूचना और ज्ञान का प्रसार:
सोशल मीडिया ने जानकारी को लोकतंत्रात्मक बना दिया है। पल-पल की खबरें, शिक्षाप्रद सामग्री और विभिन्न विषयों पर ज्ञान कुछ ही क्लिक दूर है। यह दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी पहुँच गया है, जहाँ पारंपरिक मीडिया की पहुँच सीमित है।

सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता:
इसने लोगों को सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के लिए एकजुट होने का एक मंच दिया है। ‘मी टू’ और अन्य जागरूकता अभियानों ने इसी मंच के माध्यम से अपनी आवाज़ बुलंद की है। इसने सरकारों को अधिक जवाबदेह बनाया है।

कनेक्टिविटी और भावनात्मक समर्थन:
यह दूर रहने वाले दोस्तों और परिवार से जुड़े रहने का एक बेहतरीन माध्यम है। यह लोगों को समान रुचियों वाले समुदायों से जोड़कर भावनात्मक समर्थन और अपनत्व की भावना प्रदान करता है।
​सोशल मीडिया एक अभिशाप के रूप में

फेक न्यूज़ और गलत सूचना:
यह सोशल मीडिया का सबसे खतरनाक पहलू है। गलत और भ्रामक जानकारी (Fake News) आग की तरह फैलती है, जिससे सामाजिक वैमनस्य, दंगे और अफवाहों को बढ़ावा मिलता है। यह लोकतंत्र और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है।

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:
सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की “परिपूर्ण” जीवनशैली देखकर लोग हीन भावना, तनाव और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ पर निर्भरता एक प्रकार की लत पैदा करती है, जिससे वास्तविक जीवन के रिश्ते प्रभावित होते हैं।

एकांतता और साइबर बुलिंग:
सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग से लोग वास्तविक दुनिया से कटकर एकांत महसूस करने लगते हैं। साथ ही, साइबर बुलिंग (ऑनलाइन धमकाना या अपमानित करना) एक गंभीर समस्या है, जो विशेषकर किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाती है।
​निष्कर्ष
​सोशल मीडिया दो-धारी तलवार की तरह है। इसकी शक्ति निष्पक्ष है; यह न तो पूरी तरह से अच्छा है और न ही बुरा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं।
​यह आवश्यक है कि हम एक समाज के रूप में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा दें। हमें इसके सकारात्मक पहलुओं को अपनाना चाहिए (जैसे ज्ञान प्राप्त करना, सामाजिक मुद्दों पर आवाज़ उठाना) और इसके नकारात्मक प्रभावों से स्वयं को बचाना चाहिए (जैसे फेक न्यूज़ शेयर करना, अनावश्यक तुलना करना)। स्व-नियमन (Self-Regulation) ही वह कुंजी है जो सोशल मीडिया को समाज के लिए एक वरदान बनाए रख सकती है।

सुनीता कुमारी -बिहार

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बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ: कानून हैं, लेकिन संवेदना कहाँ है?

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भारत में बढ़ती छात्र आत्महत्याएँ एक गहरी सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य संकट का संकेत हैं। मानसिक स्वास्थ्य कानून (2017) और आत्महत्या रोकथाम नीति (2021) ने क़ानूनी ढाँचा तो दिया, पर उसका असर सीमित रहा। जागरूकता की कमी, काउंसलिंग ढाँचे का अभाव और अभिभावकों की अपेक्षाएँ छात्रों को अवसाद की ओर धकेल रही हैं। अब ज़रूरत है भावनात्मक शिक्षा, प्रशिक्षित काउंसलर, डिजिटल सहायता और पारिवारिक संवेदना की। जब तक समाज यह नहीं समझेगा कि हर बच्चे की सफलता अलग है, तब तक कानून भी किसी की जान नहीं बचा पाएँगे।
भारत जैसे युवा देश के लिए यह एक शर्मनाक सच्चाई है कि यहाँ हर साल हज़ारों विद्यार्थी पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा और सामाजिक दबाव के बोझ तले अपनी जान दे देते हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2023 में 13,000 से अधिक छात्र आत्महत्याएँ दर्ज की गईं — यानी हर 40 मिनट में एक विद्यार्थी अपनी ज़िंदगी खत्म कर रहा है। यह सिर्फ़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की नाकामी का सबूत है जो बच्चों को बचाने के बजाय उन्हें अंधे मोड़ पर छोड़ देती है।

सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई कानून और नीतियाँ बनाईं हैं — जैसे मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति 2021। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कागज़ों पर लिखे कानून ज़मीन पर किसी बच्चे को सच में बचा पा रहे हैं?

मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 का मकसद था कि आत्महत्या का प्रयास अब अपराध नहीं माना जाएगा, बल्कि इसे मानसिक संकट के रूप में देखा जाएगा। यानी अगर कोई बच्चा आत्महत्या की कोशिश करता है, तो उसे सज़ा नहीं, बल्कि सहारा दिया जाएगा। यह बहुत बड़ी पहल थी, क्योंकि इससे पहले ऐसे मामलों में पुलिस कार्रवाई होती थी, जिससे पीड़ित और परिवार दोनों और टूट जाते थे। कानून ने यह भी कहा कि हर नागरिक को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अधिकार होगा। यानी स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों पर काउंसलिंग और सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

पर आज भी सच्चाई यह है कि देश के अधिकांश स्कूलों और कॉलेजों में कोई प्रशिक्षित काउंसलर तक नहीं हैं। 2023 में एम्स द्वारा किए गए सर्वे में पाया गया कि 70 प्रतिशत कॉलेजों में कोई मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मौजूद नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी खराब है। यानी कानून बना, लेकिन उसके लिए जो आधारभूत ढांचा चाहिए था, वो कभी तैयार नहीं हुआ।

2021 में सरकार ने राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति जारी की। इस नीति में कहा गया कि आत्महत्या एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है और इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण विभागों को मिलकर काम करना चाहिए। इसमें “हाई-रिस्क ग्रुप” जैसे छात्रों, किसानों और प्रवासी मजदूरों की पहचान कर, उनके लिए रोकथाम तंत्र बनाने की बात कही गई थी।

कुछ राज्यों ने इसे गंभीरता से लिया भी। जैसे केरल और महाराष्ट्र में स्कूल शिक्षकों को यह सिखाया गया कि वे छात्रों में अवसाद या निराशा के संकेत पहचान सकें। कुछ जगहों पर “स्कूल काउंसलिंग सेल” भी बने। लेकिन पूरे देश की तस्वीर देखें तो 40 प्रतिशत ज़िलों में अब भी कोई “सुसाइड प्रिवेंशन सेल” नहीं बना है। इस नीति के लिए अलग से कोई बजट तय नहीं किया गया। परिणाम यह हुआ कि यह नीति भी सरकारी फाइलों में एक और दस्तावेज बनकर रह गई।

कानूनों और नीतियों की सीमाओं से आगे जाकर हमें यह समझना होगा कि आत्महत्या का कारण सिर्फ मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि समाज का बढ़ता असंवेदनशील माहौल भी है। कोचिंग सेंटर्स की दीवारों पर “IIT or Nothing” जैसे नारे लिखे होते हैं। हर बच्चा रैंक और रिज़ल्ट की दौड़ में फँस गया है। उसे बचपन की जगह एक ‘प्रोजेक्ट’ बना दिया गया है।

बहुत से माता-पिता अपने सपने बच्चों पर थोप देते हैं। असफलता को अपमान समझा जाता है। घर में बातचीत के बजाय सवाल-जवाब होता है — “कितने नंबर आए?” “अगले साल क्या करोगे?” यह भावनात्मक दूरी बच्चों को भीतर से तोड़ देती है।

अब असफलता छिपाना भी मुश्किल हो गया है। इंस्टाग्राम और रीलों की दुनिया में हर कोई “सफल” दिखना चाहता है। जो नहीं दिखा पाता, वह खुद को असफल मान लेता है। किसी स्कूल में खेल का मैदान नहीं तो लोग शिकायत करते हैं, लेकिन काउंसलर नहीं है तो कोई नहीं पूछता। बच्चे को “तनावग्रस्त” कहने पर आज भी परिवार उसे “कमज़ोर” समझता है। मानसिक स्वास्थ्य आज भी कलंक बना हुआ है।

कानूनों और नीतियों से आगे बढ़कर अब हमें कुछ व्यावहारिक, संवेदनशील और स्थायी उपाय अपनाने की ज़रूरत है। हर स्कूल और कॉलेज में प्रशिक्षित काउंसलर अनिवार्य होने चाहिए। सरकार चाहे तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत मनोवैज्ञानिकों की नियुक्ति कर सकती है। टेली-काउंसलिंग की सुविधा भी दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँचाई जा सकती है। मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि असफलता अंत नहीं है। दिल्ली सरकार के “हैप्पीनेस करिकुलम” की तरह सभी राज्यों में “लाइफ स्किल्स” और “इमोशनल एजुकेशन” को अनिवार्य किया जा सकता है।

हर माता-पिता और शिक्षक को यह समझना होगा कि उनकी बातों का बच्चों पर कितना असर पड़ता है। यदि कोई बच्चा अलग-थलग रह रहा है, बात नहीं कर रहा, या अचानक व्यवहार बदल रहा है — तो यह संकेत है कि उसे मदद की ज़रूरत है। आज हर छात्र के पास मोबाइल है। अगर उसी से वह मनोवैज्ञानिक सहायता पा सके तो कई जानें बच सकती हैं। “किरण हेल्पलाइन” जैसी पहल को और मज़बूत करने की ज़रूरत है।

मीडिया को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। आत्महत्या की खबरों को सनसनी बनाकर दिखाने के बजाय, मीडिया को यह दिखाना चाहिए कि कैसे मदद ली जा सकती है। फिल्मों और सोशल मीडिया को भी “सफलता या मृत्यु” वाली सोच से बाहर लाना होगा। सरकार के हर जिले में यह रिपोर्ट होनी चाहिए कि कितने स्कूलों में काउंसलर हैं, कितनी आत्महत्या की घटनाएँ हुईं और कौन-से कदम उठाए गए। जवाबदेही के बिना कोई नीति सफल नहीं होती।

कानून और नीतियाँ दिशा दिखा सकती हैं, लेकिन वे संवेदना नहीं जगा सकतीं। वह समाज को खुद करनी होगी। हमें यह स्वीकार करना होगा कि बच्चा “रैंक” नहीं, “इंसान” है। उसकी आँखों में सिर्फ़ डिग्री नहीं, सपने भी हैं — और उन सपनों को असफलता से नहीं, प्यार और सहारे से संभाला जा सकता है।

कोटा, दिल्ली, पटना या हैदराबाद — हर शहर से आती आत्महत्याओं की खबरें हमें झकझोरती हैं, लेकिन कुछ दिन बाद हम भूल जाते हैं। जबकि हर बच्चा जो चला गया, वह हमारे समाज का आईना था — वह यह कह गया कि “तुमने मुझे सुना नहीं।”

भारत में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति 2021 जैसी पहलें सही दिशा में कदम हैं, लेकिन ये तब तक अधूरी रहेंगी जब तक समाज, परिवार और शिक्षा संस्थान मिलकर मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देंगे। हर आत्महत्या एक असफल नीति नहीं, बल्कि असफल संवेदना की कहानी है। समाधान किसी नए कानून में नहीं, बल्कि इस सोच में है कि असफलता कोई अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।

डॉ सत्यवान सौरभ
स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भस्कार -हिसार

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बीईओ की कड़ी कार्रवाई: अनुपस्थित शिक्षकों का वेतन रोका, चेतावनी—‘अब नहीं चलेगी लापरवाही’

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महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)।सरकारी विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था सुधारने की दिशा में खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) मिठौरा आनंद कुमार मिश्रा ने सोमवार को ग्राम पंचायत भागाटार और सिंदुरिया टोला मंगलापुर के प्राथमिक विद्यालयों का औचक निरीक्षण कर बड़ा कदम उठाया।
निरीक्षण के दौरान कई शिक्षक अनुपस्थित पाए गए, जिस पर बीईओ ने वेतन रोकने और अनुशासनात्मक कार्रवाई के सख्त निर्देश जारी किए।

🔹 शैक्षिक अनुशासन पर सख्त निगरानी
प्राथमिक विद्यालय भागाटार में कुल 59 पंजीकृत छात्र-छात्राओं में से 35 बच्चे उपस्थित पाए गए।
विद्यालय में कार्यरत पांच शिक्षकों में से तीन—चंदा भारती, वंदना पांडेय और सुशीला यादव— अनुपस्थित थीं।
बीईओ ने इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए इन शिक्षकों का वेतन तत्काल प्रभाव से रोकने के निर्देश दिए।

🔹 दूसरे विद्यालय में भी खुली पोल
निरीक्षण के क्रम में बीईओ ने प्राथमिक विद्यालय सिंदुरिया टोला मंगलापुर का भी निरीक्षण किया।
उन्होंने उपस्थिति रजिस्टर, परीक्षा कॉपियां, दैनिक लेखा रजिस्टर आदि का गहन परीक्षण किया।
विद्यालय में 52 पंजीकृत बच्चों में से 30 उपस्थित पाए गए— जिनमें 12 बालक व 18 बालिकाएं थीं।
हालाँकि, प्रधानाध्यापिका ललिता यादव अनुपस्थित मिलीं, जिससे बीईओ ने कड़ा असंतोष जताया।

🔹 बीईओ बोले—“अब नहीं चलेगी मनमानी”
बीईओ आनंद कुमार मिश्रा ने स्पष्ट कहा कि,
“सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की अनुपस्थिति या लापरवाही किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अनुपस्थित कर्मियों का वेतन रोका जाएगा और विभागीय कार्रवाई तय है।”
उन्होंने बताया कि विद्यालयों में शिक्षण गुणवत्ता, अनुशासन और उपस्थिति व्यवस्था में सुधार लाने के लिए औचक निरीक्षण नियमित रूप से किए जाते रहेंगे

शिक्षा में शिथिलता नहीं, जिम्मेदारी जरूरी — प्रशासन ने दिखाई कठोरता, शिक्षकों को चेताया।

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हीरापुर बिजली कार्यालय में रातों-रात आग, ट्रांसफॉर्मर रिपेयर यूनिट खाक

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🔥 धनबाद में ट्रांसफॉर्मर रिपेयरिंग वर्कशॉप में भीषण आग, लाखों का नुकसान

धनबाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। धनबाद थाना के पीछे हीरापुर स्थित बिजली सब-डिवीजन कार्यालय परिसर में सोमवार की रात भीषण आग लग गई। यह आग परिसर के भीतर मौजूद एरिया बोर्ड के ट्रांसफॉर्मर रिपेयरिंग वर्कशॉप (टीआरडब्ल्यू) में करीब रात 9 बजे भड़की। आग की लपटें देखते ही इलाके में अफरातफरी मच गई।

धुएं ने ढका इलाका, फायर ब्रिगेड की 6 गाड़ियां लगीं

स्थानीय लोगों ने बताया कि अचानक वर्कशॉप से धुआं उठता दिखाई दिया, जिसके बाद तुरंत बिजली विभाग के अधिकारियों और थाना को सूचना दी गई।
मिनटों में फायर ब्रिगेड की तीन गाड़ियां मौके पर पहुंचीं, लेकिन आग इतनी तेज थी कि उस पर काबू पाना मुश्किल हो गया।
करीब एक घंटे की मशक्कत के बाद भी आग नहीं बुझी, तब तक ट्रांसफॉर्मर, तार और तेल जलकर खाक हो चुके थे।
बाद में कुल छह दमकल वाहन, जिनमें एक सिंदरी हर्ल से मंगाई गई थी, को आग बुझाने के काम में लगाया गया।
रात 11:30 बजे के आसपास स्थिति नियंत्रण में लाई जा सकी।

बारिश के बीच राहत कार्य

इस दौरान तेज बारिश ने राहतकर्मियों के काम में बाधा डाली, फिर भी अग्निशमन कर्मी भीगते हुए लगातार आग बुझाने में लगे रहे।
आसपास के लोग छाता लेकर पहुंचे और सहायता करने लगे। ढाई घंटे की मशक्कत के बाद आग पर आखिरकार काबू पाया गया।

गार्ड की चौकसी के बावजूद हादसा

जानकारी के मुताबिक, सोमवार शाम पांच बजे वर्कशॉप के कर्मचारी काम खत्म कर घर चले गए थे।
रात को कुछ गार्ड सुरक्षा में तैनात थे, तभी अचानक अंदर से लपटें उठने लगीं।
गार्ड और स्थानीय लोग जब तक समझ पाते, तब तक आग विकराल रूप ले चुकी थी।

स्क्रैप सेक्शन से शुरू हुई आग

बिजली विभाग के अधिकारियों ने बताया कि आग वर्कशॉप के उस हिस्से में लगी जहां पुराना स्क्रैप और तेल रखा हुआ था।
प्राथमिक जांच में अनुमान है कि आग थंडरिंग या शॉर्ट सर्किट से लगी होगी।
हालांकि विभाग का कहना है कि मुख्य उपकरण सुरक्षित हैं, इसलिए बड़ा वित्तीय नुकसान नहीं हुआ है।
नुकसान का सही आकलन किया जाएगा।

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