Tuesday, July 7, 2026
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महिला सुरक्षा को लेकर एंटी रोमियो टीम सक्रिय

बालिकाओं को दी गई आत्मरक्षा व हेल्पलाइन की जानकारी

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार मीना के निर्देश पर मिशन शक्ति फेज 5.0 के अंतर्गत महिलाओं और बालिकाओं की सुरक्षा एवं सम्मान को लेकर एंटी रोमियो टीम लगातार सक्रिय है। महिला थाना प्रभारी पूनम मौर्या के नेतृत्व में उप निरीक्षक श्रीराम यादव, महिला आरक्षी नेहा सिंह, महिला पीआरडी कर्मी पूनम देवी, सुमन विश्वकर्मा, निर्मला देवी, सरिता व लक्ष्मी यादव ने सिटी क्षेत्र में भ्रमण कर बालिका एवं महिला सुरक्षा अभियान चलाया।
अभियान के दौरान गोला बाजार, सरौली और मेहदावल बाईपास पर स्कूली छात्राओं एवं महिलाओं को मिशन शक्ति के उद्देश्यों से अवगत कराया गया। उन्हें आत्मरक्षा के उपाय बताए गए तथा हेल्पलाइन नंबर 1090, 181, 112, 1076, 1098, 108, 102 और 1930 (साइबर हेल्पलाइन) की जानकारी दी गई।
एंटी रोमियो टीम ने मिशन शक्ति फेज 5.0 के अंतर्गत 100 पंपलेट भी वितरित किए। अभियान के दौरान मेहदावल बाईपास और मधुकुंज तिराहा पर 20 व्यक्तियों से पूछताछ की गई, जबकि एक युवक से माफीनामा भरवाकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

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महिला सशक्तिकरण को नई उड़ान: आरसेटी में जनरल ई.डी.पी. बैच से आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को नई गति देने के उद्देश्य से सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (सेंट-आरसेटी) देवरिया में शनिवार को जनरल ई.डी.पी. बैच का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि विशाल विशाल गुप्ता ने दीप प्रज्वलित कर किया।

संस्थान के निदेशक विशाल गुप्ता ने बताया कि इस छह दिवसीय प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार के लिए सक्षम बनाना, उनकी आय के स्रोत बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है। इस बैच में देवरिया जिले के 16 ब्लॉकों से कुल 35 महिला प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है।

मुख्य अतिथि विशाल गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि प्रशिक्षण के उपरांत महिलाएं उच्च गुणवत्ता वाले घरेलू उत्पाद जैसे साबुन, सर्फ़, हैंडवॉश, फिनायल आदि तैयार कर स्थानीय बाजार के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी बेचने की दिशा में आगे बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाते हैं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूत आधार प्रदान करते हैं।

कार्यक्रम में संस्थान के वरिष्ठ संकाय सोमनाथ मिश्रा, संकाय विनय शंकर मणि त्रिपाठी, कार्यालय सहायक अभिषेक तिवारी सहित अन्य स्टाफ सदस्य उपस्थित रहे। माहौल में उत्साह और आत्मविश्वास साफ झलक रहा था, जो इस बात का संकेत है कि प्रशिक्षण के बाद महिलाएं न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी होंगी, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बनेंगी।

दीपोत्सव 2025: 56 घाटों पर जगमगाएंगे 28 लाख दीप, अयोध्या में रचेगा नया विश्व रिकॉर्ड

-लक्ष्मण किला घाट पहली बार बना दीपोत्सव का आकर्षण केंद्र

योगी सरकार के नेतृत्व में अयोध्या का दीपोत्सव बनेगा सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक

22 समितियाँ जुटीं युद्धस्तर पर तैयारियों में, सरयू तट होगा दिव्य आलोकित

दीपोत्सव से अयोध्या की आस्था और संस्कृति पहुंचेगी विश्व पटल पर

अयोध्याधाम (राष्ट्र की परम्परा)। रामनगरी अयोध्या इस वर्ष एक बार फिर विश्व मंच पर अपनी आस्था, संस्कृति और गौरव का प्रकाश फैलाने जा रही है। योगी सरकार के नेतृत्व में इस बार नौवां दीपोत्सव 2025 अब तक का सबसे भव्य और ऐतिहासिक आयोजन बनने जा रहा है। सरयू तट के 56 घाटों पर लगभग 26 लाख दीपों के प्रज्वलन के लिए 28 लाख दिए बिछाए जाएंगे, जो एक नया विश्व रिकॉर्ड स्थापित करेगा। इस वर्ष आयोजन की विशेषता यह है कि पहली बार लक्ष्मण किला घाट को दीपोत्सव में शामिल किया गया है। अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान को देगा वैश्विक स्वरूप यह दीपोत्सव केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सनातन संस्कृति, आध्यात्मिकता और विश्वबंधुत्व का सशक्त प्रतीक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मार्गदर्शन में यह आयोजन न केवल अयोध्या के विकास और राम मंदिर निर्माण के विज़न को आगे बढ़ा रहा है, बल्कि उत्तर प्रदेश को धार्मिक पर्यटन के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम भी है। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालु और देश-विदेश से आए पर्यटक रामनगरी की इस दिव्य आभा के साक्षी बनेंगे।
इन घाटों पर होगा दीपों का सागर
लक्ष्मण किला घाट पर पहली बार सवा चार लाख दीप प्रज्वलित होंगे। राम की पैड़ी और चौधरी चरण सिंह घाट पर करीब साढ़े चार लाख दीप जलाए जाएंगे। भजन संध्या घाट पर साढ़े पांच लाख दीपों की रौशनी से सरयू तट अलौकिक चमक में नहाएगा। मुख्य आकर्षण राम की पैड़ी रहेगी, जहां 15 से 16 लाख दीपों की अविरल ज्योति से पूरा घाट जगमगा उठेगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं दीप प्रज्ज्वलित कर इस भव्य कार्यक्रम का नेतृत्व करेंगे और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से पूरा वातावरण भक्तिमय बन जाएगा।
पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ने की तैयारी
बीते वर्षों में अयोध्या का दीपोत्सव गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हो चुका है। इस बार लक्ष्य है उस रिकॉर्ड को और आगे बढ़ाना 28 लाख दीपों का नया विश्व कीर्तिमान स्थापित करने का। इसके लिए सरकार, प्रशासन और स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाओं की टीमें युद्धस्तर पर तैयारियों में जुटी हैं। दीपों की सजावट, सुरक्षा व्यवस्था, सांस्कृतिक मंचन, और पर्यटकों के स्वागत की रूपरेखा बारीकी से तैयार की जा रही है।
फैक्ट फाइल दीपोत्सव 2025
नौवां दीपोत्सव अयोध्या में आयोजित होगा। 33 लाख दीपों की कुल व्यवस्था। 75 हजार लीटर तेल की जरूरत होगी। 55 लाख रुई बत्तियाँ तैयार की जा रही हैं। 30 हजार स्वयंसेवकों को टोपी व टीशर्ट वितरित होंगी। 28 लाख दीप बिछाकर नया विश्व रिकॉर्ड रचा जाएगा।
22 समितियाँ बना रहीं आयोजन को साकार
डाॅ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के दीपोत्सव नोडल अधिकारी प्रो. संत शरण मिश्र के निर्देशन में 22 समितियाँ गठित की हैं, जो दीपोत्सव के प्रत्येक पहलू की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। इनमें प्रमुख समितियाँ हैं। समन्वय समिति, अनुशासन समिति,सुरक्षा समिति, दीप गणना समिति, यातायात समिति, स्वच्छता समिति, मीडिया एवं फोटोग्राफी समिति, प्राथमिक चिकित्सा समिति, साज-सज्जा एवं रंगोली समिति,वालंटियर व आईकार्ड समिति, पर्यवेक्षण एवं नियंत्रण समिति, सभी समितियों के संयोजक, सह-संयोजक एवं सदस्य दिन-रात अयोध्या को दिव्य स्वरूप देने के अभियान में लगे हुए हैं।
अयोध्या दीपोत्सव का आध्यात्मिक और राष्ट्रीय महत्व
अयोध्या दीपोत्सव केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं
यह ‘रामराज्य’ के आदर्शों का स्मरण, भारतीय संस्कृति की एकता का प्रतीक और विश्व को शांति का संदेश देने वाला अवसर है। यह आयोजन अयोध्या को केवल एक शहर नहीं, बल्कि “विश्व सांस्कृतिक राजधानी” के रूप में स्थापित करता है। दीपों की यह ज्योति केवल सरयू किनारे नहीं, बल्कि पूरे भारतवर्ष और विश्व के हृदय में आस्था, एकता और आशा की लौ जलाएगी।

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📰 कम ऊंचाई पुल निर्माण प्रकरण : जनता की शिकायत पर पहुंचे उप जिलाधिकारी भाटपार रानी

भाटपार रानी/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)।
मुख्य संपर्क मार्ग पर बन रहे कम ऊंचाई पुल के निर्माण को लेकर क्षेत्रीय जनता में असंतोष बढ़ने पर प्रशासन हरकत में आ गया। पत्रकार बृजेश मिश्र एवं ग्राम प्रधान विद्या सागर गौड़ द्वारा इस प्रकरण की जानकारी स्थानीय सांसद रामाशंकर विद्यार्थी, देवरिया सांसद शशांक मणि त्रिपाठी तथा उप जिलाधिकारी भाटपार रानी को मांग पत्र के माध्यम से दी गई। शिकायत पर त्वरित संज्ञान लेते हुए उप जिलाधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति का जायजा लिया।

सोहनपुर–बनकटा मार्ग से जुड़े पुलिया निर्माण विवाद के समाधान हेतु उप जिलाधिकारी की उपस्थिति में निर्माण कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर ने जनता के समक्ष 5.5 मीटर चौड़ी पास-वे सड़क का नक्शा प्रस्तुत किया। यह सड़क भारी वाहनों के आवागमन हेतु प्रस्तावित की गई है, जिससे बनकटा मार्ग तक यातायात सुगम रहेगा। वहीं अंडरपास को हल्के वाहनों के उपयोग के लिए रखा जाएगा।

जनता की मांग पर प्रोजेक्ट मैनेजर ने अपने हस्ताक्षर सहित नक्शे की प्रति धरना कर्ताओं एवं स्थानीय प्रतिनिधियों को सौंपी। इससे क्षेत्रीय जनता की आशंकाओं का समाधान हुआ और विवाद का शांतिपूर्ण अंत निकला।

धरना स्थल पर पत्रकार बृजेश मिश्र, ग्राम प्रधान विद्या सागर गौड़, क्षेत्र पंचायत सदस्य नागेंद्र यादव, भाजपा युवा मोर्चा ब्लॉक अध्यक्ष राहुल प्रताप सिंह, ग्राम प्रधान धर्मेंद्र कुशवाहा, एम. सिंह, समाजसेवी बादल सिंह रघुवंशी, पूर्व जिला पंचायत सदस्य एडवोकेट रवि प्रकाश कुशवाहा, लखन लाल मिश्र, सुदामा यादव सहित कई जनप्रतिनिधि एवं ग्रामीण मौजूद रहे।

धरना के दौरान कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा अफवाह फैलाने का प्रयास किया गया, किंतु जनता ने संयम और एकजुटता का परिचय देते हुए शांति बनाए रखी।

धरना से जनता को मिले प्रमुख लाभ

  1. जनता की आशंकाओं का समाधान करते हुए निर्माण कंपनी ने पारदर्शी रूप से नक्शा प्रस्तुत किया।
  2. क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर स्थानीय लोगों में जागरूकता और आत्मबल बढ़ा।
  3. प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट संदेश गया कि जनहित में उठाई गई आवाज़ पर किसी निर्दोष के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी।
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“ट्रंप का ‘ट्रेड वॉर’ अपग्रेड: चीन पर 100% टैरिफ, वैश्विक बाजारों में मची हलचल”

वॉशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विश्व व्यापार व्यवस्था को झटका देते हुए चीन से होने वाले सभी आयातों पर 100 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप ने यह कदम 1 नवंबर से लागू करने की बात कही है। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिकी सॉफ्टवेयर निर्यात पर कड़े नियंत्रण की भी घोषणा की, जिससे टेक उद्योग और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल मच गई है।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए चीन पर “आक्रामक व्यापार नीति” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “बीजिंग ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की अवधारणा को ही पलट दिया है। अब समय आ गया है कि अमेरिका भी उसी अंदाज़ में जवाब दे।”

अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि चीन कई वर्षों से वैश्विक व्यापार नियमों को अपने हित में मोड़ता रहा है, और यह कदम उस पर जवाबी कार्रवाई का हिस्सा है। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि यह निर्णय “दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर गहरा प्रभाव डालने वाला साबित होगा।”

हालाँकि ट्रंप ने यह स्पष्ट किया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ उनकी प्रस्तावित बैठक फिलहाल रद्द नहीं की गई है, लेकिन यह भी जोड़ा कि “स्थिति पर निर्भर करेगा कि वार्ता संभव हो पाएगी या नहीं।”

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध को नए सिरे से भड़का सकता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ेगा और बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है।

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख की जयंती के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कृषि क्षेत्र को सशक्त करने वाली दो महत्वाकांक्षी योजनाओं का शुभारंभ किया —प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना और दलहन आत्मनिर्भरता मिशन।

कुल ₹35,440 करोड़ के परिव्यय से शुरू की गई ये योजनाएँ भारत के ग्रामीण परिदृश्य में कृषि क्रांति का नया अध्याय लिखने जा रही हैं।
प्रधानमंत्री कार्यालय की जानकारी के अनुसार,
₹24,000 करोड़ की लागत वाली धन-धान्य योजना का उद्देश्य है —
फसल उत्पादकता में वृद्धि, फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन, टिकाऊ खेती की तकनीक अपनाना, पंचायत व ब्लॉक स्तर पर भंडारण क्षमता बढ़ाना,
सिंचाई सुधारना और चयनित 100 आकांक्षी जिलों में किसानों को अल्पकालिक व दीर्घकालिक ऋण उपलब्ध कराना।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा —

“आज का दिन ऐतिहासिक है। यह वह दिन है जब भारत रत्न जयप्रकाश नारायण और नानाजी देशमुख जैसे महान सपूतों ने जनसेवा का दीप जलाया था। इन्हीं की प्रेरणा से हम आज किसानों की समृद्धि के लिए दो क्रांतिकारी योजनाओं की शुरुआत कर रहे हैं।”

प्रधानमंत्री ने बताया कि ये दोनों योजनाएँ करोड़ों किसानों के जीवन में बदलाव लाएँगी। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद से कृषि सुधारों की दिशा में सरकार ने एक नया अध्याय शुरू किया, क्योंकि पहले की सरकारों ने खेती को उसके हाल पर छोड़ दिया था।

उन्होंने आकांक्षी जिलों की प्रगति का उल्लेख करते हुए कहा —

“पहले जिन 100 से अधिक जिलों को पिछड़ा कहा जाता था, उन्हें हमने आकांक्षी घोषित किया। आज इन जिलों में सड़क, बिजली, टीकाकरण और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ पहुँच चुकी हैं। अभिसरण, सहयोग और प्रतिस्पर्धा की भावना ने इन जिलों की तकदीर बदली है।”

इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री ने देश के किसानों से आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को साकार करने का आह्वान किया और कहा कि

“खेती केवल अन्न उत्पादन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है।”

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)भारत की राजधानी नई दिल्ली आगामी 14 से 16 अक्टूबर तक विश्व शांति के नए अध्याय की साक्षी बनेगी। मानेकशॉ सेंटर में आयोजित होने जा रहे संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिक योगदानकर्ता देशों (United Nations Troop Contributing Countries – UNTCC) के सेनाध्यक्ष सम्मेलन में 33 देशों के शीर्ष सैन्य अधिकारी भाग लेंगे। इनमें ग्लोबल साउथ और यूरोप के प्रमुख देश शामिल होंगे, जबकि पाकिस्तान और चीन को आमंत्रण सूची से बाहर रखा गया है।

भारत के पड़ोसी देश— बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और भूटान— इस बहुप्रतीक्षित सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। सैन्य सूत्रों के अनुसार, सभी 33 देशों ने भागीदारी की पुष्टि कर दी है।

भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, “संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत की भूमिका अब केवल सहयोगी नहीं, बल्कि स्थिरता के सूत्रधार की हो चुकी है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में शांति स्थापना की दिशा में यह सम्मेलन नई ऊर्जा देगा।”

वर्तमान में 5,500 से अधिक भारतीय सैनिक और महिला अधिकारी नौ देशों में संयुक्त राष्ट्र मिशनों में सक्रिय हैं। अब तक भारत के 179 वीर जवानों ने शांति की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया है— जो भारत की नैतिक नेतृत्व क्षमता और मानवीय प्रतिबद्धता का प्रमाण है।

यह सम्मेलन भारत की सांस्कृतिक अवधारणा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ — “विश्व एक परिवार है” — की भावना पर आधारित रहेगा। साथ ही यह भारत की संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा को भी चिह्नित करेगा, जिसकी शुरुआत 1948 में कोरिया युद्ध के दौरान चिकित्सा सहयोग से हुई थी।

आज जब दुनिया युद्ध, आतंकवाद और अविश्वास के संकट से जूझ रही है, भारत इस सम्मेलन के माध्यम से “वैश्विक शांति के केंद्र” के रूप में अपनी भूमिका को सशक्त कर रहा है। यह केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि सभ्यता के दर्शन का विस्तार है, जहाँ शक्ति से नहीं, सहयोग और संवाद से स्थायी शांति की नींव रखी जाती है।

भारत का यह आयोजन उसकी सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो दर्शाता है कि भारत शांति को केवल रणनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में देखता है। नीली टोपी पहने भारतीय सैनिक जब किसी संघर्षग्रस्त भूमि पर उतरते हैं, तो वे केवल संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि नहीं— बल्कि भारतीय संस्कृति, संयम और मानवता के जीवंत प्रतीक होते हैं।

वास्तव में, यह सम्मेलन न केवल सैन्य सहयोग का मंच है, बल्कि “शांति निर्माण के नए युग” की शुरुआत भी है। जैसा कि एक अधिकारी ने कहा— “शांति थोपी नहीं जाती, उसे बनाया जाता है— सैनिक दर सैनिक, कर्म दर कर्म।” यही भारत का वैश्विक संदेश है— “Peace is not enforced, it is created.”

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बिहार की जनता को अबकी बार चुनाव में जागरूक होना होगा तभी, बिहार के साथ न्याय होगा

लेखक- चंद्रकांत सी पूजारी


गुजरात से राष्ट्र की परम्परा के साथ बिहार तक बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा हो गई है। बिहार में 2 चरणों में विधानसभा चुनाव होंगे। पहले चरण के लिए 6 नवंबर और दूसरे चरण के लिए 11 नवंबर को वोटिंग होगी।
पहले चरण की अधिसूचना 10 अक्टूबर को जारी होगी। नामांकन की प्रक्रिया 17 अक्टूबर से शुरू होगी। नामांकन की जांच 18 अक्टूबर को होगी। दूसरे चरण का नोटिफिकेशन 13अक्टूबर को होगा। नामांकन 20 अक्टूबर तक किए सकेंगे। नाम वापस लेने की तिथि 23 अक्तूबर है। वोटों की गिनती 14 नवंबर को होगी।
बिहार, जो अपनी ऐतिहासिक विरासत, समृद्ध संस्कृति और बुद्धि के लिए जाना जाता है, आज भी विकास की राह में कई चुनौतियों से जूझ रहा है। इन चुनौतियों का मूल कारण केवल व्यवस्था की कमियाँ नहीं हैं, बल्कि जनता की राजनैतिक असावधानी भी है। इसलिए आने वाले विधानसभा चुनावों में बिहार की जनता को पहले से कहीं अधिक जागरूक और जिम्मेदार मतदाता बनकर सामने आना होगा।
राजनीति केवल नेताओं की कुर्सी की लड़ाई नहीं होती, बल्कि यह जनता के भविष्य की दिशा तय करती है। लेकिन अक्सर देखा गया है कि जाति, धर्म, या छोटी-छोटी सुविधाओं के नाम पर लोग अपने अमूल्य वोट का दुरुपयोग कर बैठते हैं। नतीजा यह होता है कि चुनाव जीतने वाले नेता जनता की असली समस्याओं — शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और अपराध — से दूर होते चले जाते हैं।
अबकी बार बिहार की जनता को यह समझना होगा कि वोट केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है। किसी उम्मीदवार को केवल चेहरे या पार्टी के नाम पर नहीं, बल्कि उसकी नीतियों, कामकाज और ईमानदारी पर परखना जरूरी है। जनता को यह सोचना चाहिए कि कौन सा प्रतिनिधि बिहार के युवाओं के लिए रोजगार ला सकता है, कौन सड़कों और अस्पतालों की हालत सुधार सकता है, और कौन वास्तव में गांवों तक विकास पहुँचा सकता है।
सोशल मीडिया के इस युग में जानकारी की कोई कमी नहीं है। इसलिए हर नागरिक को चाहिए कि वह नेताओं के वादों की जांच करे, पिछले कामों का मूल्यांकन करे और वोट डालने से पहले सोच-समझकर निर्णय ले। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।
यदि बिहार की जनता इस बार सच में जागरूक होकर मतदान करेगी, तो न केवल सही सरकार बनेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ भी एक बेहतर बिहार का सपना साकार होते देखेंगी।
अबकी बार बिहार की जनता को जाति, धर्म या प्रलोभन से ऊपर उठकर विकास और सुशासन को वोट देना होगा। क्योंकि जब जनता जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र मजबूत होता है — और जब लोकतंत्र मजबूत होता है, तभी बिहार सच में “बुद्ध की धरती” से “विकास की धरती” बनता है।

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वादों का आकर्षण और सच्चाई का आईना

तेजस्वी यादव का यह ऐलान कि “बिहार के हर परिवार को एक सरकारी नौकरी दी जाएगी” राजनीतिक दृष्टि से भले ही उत्साह जगाने वाला लगे, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर यह विचार कल्पना से अधिक कुछ नहीं दिखता। चुनावी दौर में इस तरह के आश्वासन जनता के दिलों में आशा तो जगाते हैं, पर जब उनका आर्थिक और प्रशासनिक आधार कमजोर होता है, तो यह उम्मीदें जल्द ही निराशा में बदल जाती हैं।
बिहार जैसे राज्य में, जहाँ करीब 13 करोड़ की आबादी और लगभग तीन करोड़ परिवार हैं, हर परिवार को सरकारी नौकरी देना किसी भी तरह व्यावहारिक नहीं है। इतनी विशाल संख्या में पद सृजित करना तो दूर, मौजूदा सरकारी ढाँचा भी इतने भार को वहन नहीं कर सकता। राज्य की आय का बड़ा हिस्सा पहले ही वेतन और पेंशन में खर्च हो जाता है, जिससे विकास कार्यों पर सीमित संसाधन बचते हैं।
राजनीतिक विश्लेषको ने इस घोषणा को “अवास्तविक और भ्रामक” कहा है। उनका तर्क यह है कि ऐसे वादे जनता को भ्रमित करते हैं और गंभीर मुद्दों की चर्चा को हल्का बना देते हैं। युवाओं में रोजगार की बेचैनी और आकांक्षा का फायदा उठाकर यदि केवल चुनावी लाभ के लिए नारे दिए जाएँ, तो राजनीति का भरोसा कमजोर होता है।
तेजस्वी यादव निश्चित रूप से युवाओं को केंद्र में रखकर अपनी राजनीति को नए सिरे से परिभाषित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि भरोसा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस योजनाओं से बनता है। यदि इस तरह के वादे असत्य सिद्ध हुए, तो आरजेडी को अपनी विश्वसनीयता की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
बिहार को ज़रूरत है व्यावहारिक रोजगार नीति की, शिक्षा, कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में अवसरों के विस्तार की। नौकरी के सपने को सरकारी कागज़ों तक सीमित रखने के बजाय उसे निजी क्षेत्र और स्वरोजगार तक फैलाना होगा। तभी युवाओं की ऊर्जा राज्य के विकास में रूपांतरित हो सकेगी।
नेताओं का काम केवल उम्मीदें जगाना नहीं, बल्कि उन पर खरा उतरना भी है। और जनता का कर्तव्य है कि वह नारे नहीं, नीतियाँ देखे। क्योंकि विकास वादों से नहीं, योजनाओं से आता है।

एक गोली, पंद्रह नाम और सन्नाटा

जाति, जलन और जान: नौकरशाही का काला चेहरा
“फाइलों से फायर तक: अफसरशाही के भीतर सड़ता भेदभाव”
(जातिगत अपमान, साइड पोस्टिंग और मानसिक उत्पीड़न — एक अफसर की चुप्पी जो अब चीख बन गई।)
हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार की आत्महत्या ने प्रशासनिक जगत को झकझोर दिया है। उनके सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं, जिन पर जातिगत अपमान और मानसिक उत्पीड़न के आरोप हैं। चंडीगढ़ पुलिस ने डीजीपी शत्रुजीत कपूर और रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया समेत 14 अधिकारियों पर एफआईआर नंबर 156 दर्ज की है। यह हरियाणा के इतिहास में पहला मौका है जब इतने सीनियर अफसरों पर एक साथ एससी/एसटी एक्ट और भारत न्याय संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा चला है। यह मामला नौकरशाही के भीतर छिपे जातिगत भेदभाव पर गहरी चोट है।

  • डॉ. सत्यवान सौरभ
    हरियाणा की प्रशासनिक मशीनरी में 7 अक्टूबर की सुबह एक ऐसी गूंज उठी, जिसने नौकरशाही के चेहरे से शालीनता का मुखौटा उतार फेंका। सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सेक्टर-11 स्थित अपने सरकारी आवास पर खुद को गोली मार ली। पर यह आत्महत्या नहीं, व्यवस्था के भीतर पल रहे जातिगत भेदभाव, सत्ता संघर्ष और संस्थागत उत्पीड़न का परिणाम थी। अब चंडीगढ़ पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है, उसने इस सन्नाटे को कानून के दस्तक में बदल दिया है।

एफआईआर नंबर 156, जिसमें डीजीपी शत्रुजीत कपूर, रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया सहित 14 अफसर आरोपी बनाए गए हैं, भारतीय प्रशासनिक इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना है। भारत न्याय संहिता की धारा 108, 3(5) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत दर्ज यह मामला इस सच्चाई की गवाही देता है कि नौकरशाही की ऊँची दीवारों के भीतर भी जाति आज भी उतनी ही जीवित है जितनी गांवों की गलियों में।

पूरन कुमार के सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं। हर नाम एक आरोप है, और हर आरोप यह सवाल है कि क्या एक सविधानिक पद पर बैठा अधिकारी भी इस देश में अपनी जाति की जंजीरों से मुक्त नहीं हो सकता? उन्होंने लिखा कि उन्हें लगातार “साइड पोस्टिंग” दी जाती रही, उनकी योग्यता को दबाया गया, और उन्हें जातिगत तंज और धमकियों से मानसिक रूप से तोड़ा गया।

पूरन कुमार का कैरियर रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करता है। मेहनत और ईमानदारी से उन्होंने पुलिस सेवा में पहचान बनाई, पर उन्हें बार-बार “कम प्रभावी” पदों पर भेजा गया — कभी आईजी होमगार्ड, कभी आईजी टेलीकम्युनिकेशन। जब अप्रैल 2025 में उन्हें रोहतक रेंज का आईजी बनाया गया, तब उन्होंने यह सोचा होगा कि अब मेहनत का फल मिला है। लेकिन मात्र पांच महीने बाद ही उन्हें सुनारिया पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज भेज दिया गया — और वहीं से उनकी मानसिक गिरावट की शुरुआत हुई।

यह कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की वह बीमार रग है जो ‘योग्यता’ के सामने ‘पहचान’ को रखती है। हमारे समाज में आरक्षण भले अवसर देता हो, लेकिन व्यवस्था अक्सर उसे स्वीकार नहीं करती। वह दलित अफसर को ‘काबिल अधिकारी’ की जगह ‘आरक्षण वाला अफसर’ कहकर छोटा करती है। पूरन कुमार की मौत ने यह दिखा दिया कि जाति का भूत सिर्फ समाज में नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी घूमता है।

पूरन कुमार की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने दो अलग-अलग प्रतिवेदन दिए — एक में केवल डीजीपी और एसपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, और दूसरे में सभी 15 अफसरों की गिरफ्तारी की। यह एक अधिकारी की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पत्नी और सहकर्मी की लड़ाई है जो व्यवस्था से इंसाफ मांग रही है। उन्होंने कहा कि “यह सिर्फ एक सुसाइड नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक मर्डर है।”

एफआईआर दर्ज होने के बाद राज्य के एससी समुदाय से जुड़े कई आईएएस, आईपीएस और एचसीएस अफसर पूरन परिवार के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। यह अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि आमतौर पर नौकरशाही के भीतर एक ‘मौन संस्कृति’ चलती है — जहां अधिकारी अपने साथी पर टिप्पणी करने से भी कतराते हैं। लेकिन इस बार सन्नाटा टूटा है। अफसर कह रहे हैं कि पूरन कुमार का मामला एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की हत्या है जो समानता और सम्मान की उम्मीद करती थी।

मुख्यमंत्री नायब सैनी ने परिवार से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है। पर सवाल यह है कि क्या यह भरोसा न्याय में बदलेगा? क्या राज्य सरकार इतनी हिम्मत दिखा पाएगी कि डीजीपी जैसे शीर्ष अधिकारी को छुट्टी पर भेजे और एसपी को हटाए? या यह भी किसी और “आंतरिक जांच” की तरह फाइलों में गुम हो जाएगा?

हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी में वर्षों से यह चर्चा होती रही है कि जातिगत गुटबाजी अफसरों की नियुक्तियों, ट्रांसफरों और प्रमोशनों को प्रभावित करती है। “कौन किसका है” — यह बात यहां पद से बड़ी हो जाती है। और जब इस गुटबाजी में जाति का तड़का लग जाता है, तो योग्यता, सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता सब हाशिये पर चली जाती हैं।

पूरन कुमार की मौत इस झूठी प्रतिष्ठा वाली मशीनरी पर एक नैतिक प्रश्नचिह्न है। यह घटना सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक सिस्टम की आत्मा की हत्या है — जो अपने अफसरों को मानसिक और जातिगत रूप से इतना तोड़ देती है कि वे जीवन से हार मान लेते हैं।

इस घटना के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि अब नौकरशाही के भीतर जातिगत भेदभाव पर खुली चर्चा शुरू होगी। लेकिन डर यह भी है कि यह मामला किसी प्रशासनिक औपचारिकता में तब्दील कर दिया जाएगा — जैसे हर बार होता है। जांच कमेटी बनेगी, बयान होंगे, और अंत में रिपोर्ट यह कहेगी कि “व्यक्तिगत कारणों से आत्महत्या थी।”

पूरन कुमार का लिखा हर शब्द आज भी सवाल बनकर हवा में तैर रहा है —
“जब न्याय देने वाले ही अन्याय करने लगें, तो शिकायत किससे करें?”
एक संवेदनशील अफसर ने अपनी जान देकर यह दिखा दिया कि जाति का दर्द कुर्सी की ऊंचाई से नहीं मिटता। आज यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है कि वह यह स्वीकार करे — जातिवाद अब सिर्फ राजनीति नहीं, प्रशासन की आत्मा में भी जहर की तरह घुल चुका है।
पूरन कुमार चले गए, पर उनके सुसाइड नोट ने यह साफ कर दिया है कि अब नौकरशाही की चुप्पी भी एक अपराध है। उनकी मौत व्यवस्था से यह मांग करती है कि वह सिर्फ दोषियों को नहीं, बल्कि अपनी सोच को भी कटघरे में खड़ा करे। क्योंकि जब तक सिस्टम खुद को नहीं बदलेगा, तब तक हर पूरन कुमार के भीतर कोई न कोई गोली तनी रहेगी।
डॉ. सत्यवान सौरभ
(स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)

त्योहारों का सेल्फ़ी ड्रामा

(त्योहार अब दिल से नहीं, डिस्प्ले से मनाए जाते हैं —
हम अब त्योहारों से ज़्यादा अपनी तस्वीरें मना रहे हैं।)

अब त्योहार पूजा, मिलन और आत्मिक उल्लास का नहीं, बल्कि ‘कंटेंट’ का मौसम बन गए हैं। दीपक की लौ से ज़्यादा रोशनी अब मोबाइल की फ्लैश में दिखती है। भक्ति, व्रत और परंपराएँ अब फ़िल्टर और फ्रेम में सिमट गई हैं। लोग ‘सेल्फ़ी विद गणेश’, ‘करवा चौथ वाइब्स’ और ‘भाई दूज मोमेंट्स’ जैसे टैग से उत्सव मनाते हैं। सच्ची आस्था और दिखावे के बीच की यह डिजिटल खाई हमारी आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। यह सवाल अब ज़रूरी है — क्या हम त्योहार मना रहे हैं या दिखा रहे हैं?

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

त्योहार हमारे समाज की आत्मा होते हैं — वह समय जब इंसान ईश्वर, प्रकृति और अपने संबंधों के प्रति आभार व्यक्त करता है। लेकिन अब हर त्योहार के साथ एक नया किरदार जुड़ गया है — मोबाइल कैमरा। जैसे ही दीपक जलता है, आरती की थाली घूमती है या राखी बंधती है, पहला सवाल यही होता है — “फोटो ली क्या?”। पहले पूजा पूरी होती थी, फिर प्रसाद बाँटा जाता था; अब पहले स्टोरी लगती है, फिर पूजा होती है। यह वही भारत है जहाँ कभी ‘मन का उत्सव’ मनाया जाता था, आज वही ‘मीडिया का उत्सव’ बन गया है।

दीपावली अब दीपों की नहीं, सजावट की पोस्टों की रात है। घरों की सफ़ाई से ज़्यादा लोग कैमरे का कोण सुधारने में व्यस्त रहते हैं। माता लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा से पहले “बूमरैंग” बनता है, और पटाखों से पहले “कैप्शन” तय होता है — #दीवालीकीवाइब्स #परिवारकाप्यार। ऐसा लगता है मानो हर व्यक्ति का त्योहार सोशल मीडिया पर दिखना चाहिए, वरना वह अधूरा है। यह डिजिटल प्रतिस्पर्धा अब भक्ति से ज़्यादा ‘लाइक’ का खेल बन चुकी है।

करवा चौथ जैसे व्रतों का जो भाव था — प्रेम, समर्पण और आशीर्वाद — वह अब फोटो खिंचवाने और छूट वाले ऑफ़र में बँट गया है। “सेल्फ़ी विद सासू माँ”, “उपवास वाला चेहरा” और “चाँद के साथ तस्वीर” जैसी प्रवृत्तियाँ अब त्योहार की नई पहचान हैं। पहले चाँद देखने का रोमांच था, अब ‘क्लिक करने’ का जुनून है। एक जमाना था जब महिलाएँ साड़ी पहनती थीं पूजा के भाव से; आज वही साड़ी ब्रांड को टैग करने का साधन बन गई है। त्योहार अब प्रेम का नहीं, प्रदर्शन का पर्व बन गया है।

होली भी अब रंगों का नहीं, रंगीन दिखावे का खेल है। पहले जो चेहरे रंगों में डूबे होते थे, अब वे फ़िल्टर में धुल चुके हैं। लोग अब एक-दूसरे को रंग लगाने से ज़्यादा डरते हैं कि “कपड़े खराब हो जाएँगे, फोटो में अच्छा नहीं लगूँगा।”
“सेल्फ़ी विद गुलाल” में रंग तो हैं, पर अपनापन नहीं। यह होली अब मन की नहीं, मेकअप की होली बन गई है।

ईद, क्रिसमस, नवरात्र — हर धर्म का उत्सव अब एक ही रंग में रंग गया है — डिजिटल दिखावे का रंग। मस्जिद या गिरजाघर के सामने मुस्कुराती तस्वीरें, थाली में सजे पकवानों के फोटो, और शीर्षक — “प्यार और शांति बाँट रहे हैं।” पर क्या सचमुच प्यार और शांति फैल रही है, या बस दिखावा? त्योहार अब इंसान को जोड़ने की बजाय, तुलना और प्रतिस्पर्धा का कारण बनते जा रहे हैं। “उसकी लाइटिंग ज़्यादा सुंदर”, “उसका मंडप बड़ा”, “उसके पास महँगी सजावट”— यह सब उस आत्मीयता को निगल गया है जो कभी परिवारों की पहचान थी।

यह सेल्फ़ी नाटक इतना गहरा हो चुका है कि अब भक्ति का भी अभिनय होता है। मंदिर में जाते ही लोग पहले फोन निकालते हैं, फिर हाथ जोड़ते हैं। आरती लाइव होती है, पर मन ऑफ़लाइन। दान सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है, ताकि दूसरों को पता चले कि ‘हम भी नेक हैं’। भक्ति निजी नहीं रही, सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। आस्था अब आत्मा से नहीं, प्रसारण से चलती है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह “डिजिटल आस्था” एक गहरी बेचैनी का परिणाम है। इंसान अब अपने हर अनुभव का प्रमाण सोशल मीडिया से चाहता है। उसे लगता है कि अगर कोई चीज़ कैमरे में नहीं आई तो वह हुई ही नहीं। यही कारण है कि अब त्योहारों में मुस्कान असली नहीं, अभ्यास की हुई होती है। बच्चे तक कैमरे के सामने “हैप्पी दिवाली” बोलना सीख चुके हैं। रिश्तों की गर्माहट अब कैमरे की ठंड में जम गई है।

त्योहारों का असली अर्थ था — रुकना, साँस लेना, जुड़ना।
अब अर्थ बदल गया है — सजना, पोस्ट करना, भूल जाना।
लोगों को यह भी याद नहीं रहता कि त्योहार का मूल कारण क्या था — बस इतना याद रहता है कि किस दिन क्या पोस्ट करना है। यह ‘सेल्फ़ी संस्कृति’ धीरे-धीरे उस आध्यात्मिक गहराई को खा रही है जो भारतीय समाज की पहचान थी।अब त्यौहार आत्मा का नहीं, ‘छवि’ का दर्पण बन गए हैं।

बाज़ार ने भी इस प्रवृत्ति को भुनाने में देर नहीं लगाई।
हर त्यौहार से पहले ‘सेल्फ़ी पृष्ठभूमि’, ‘फोटो मंच’, ‘डिजिटल सजावट’ और ‘त्योहार संग्रह’ की बाढ़ आ जाती है।
पूजा की थाली से ज़्यादा महत्त्व अब पैकेजिंग का हो गया है। त्योहार अब आध्यात्मिक नहीं, ब्रांडेड अवसर बन चुके हैं। दीपावली अब “ऑनलाइन खरीदारी पर्व” है, नवरात्र “गरबा नाइट्स प्रायोजित कार्यक्रम” है, और होली “कलर ब्लास्ट आयोजन” बन चुकी है। जहाँ पहले त्योहार आत्मा को शुद्ध करते थे, अब वह जेब को खाली कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर दिखावे की इस होड़ ने समाज में एक अजीब-सी भावनात्मक दूरी पैदा कर दी है। लोगों को लगता है कि उन्होंने दूसरों की फोटो देखकर उनसे जुड़ाव बना लिया — जबकि असल में वह जुड़ाव एक भ्रम है। त्योहार जो कभी सबको साथ लाते थे, अब लोगों को अकेला कर रहे हैं। हर कोई अपने फोन में बंद है, दूसरे की मौजूदगी सिर्फ स्क्रीन पर है। “परिवार की फोटो” तो पूरी है, लेकिन परिवार बिखरा हुआ है।

यह सब लिखते हुए एक प्रश्न चुभता है — क्या हम ईश्वर से जुड़ रहे हैं या नेटवर्क सिग्नल से? क्या हमें खुशी मिल रही है या बस ‘प्रतिक्रिया’? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे त्योहार अब आत्मा से नहीं, कैमरे की चमक से रोशन हो रहे हैं?

त्योहारों का असली अर्थ तब लौटेगा जब हम कैमरा नीचे रखकर, किसी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान देखेंगे।
जब दीया सिर्फ़ फोटो के लिए नहीं, अंधेरे के लिए जलाया जाएगा। जब करवा चौथ पर फोटो नहीं, साथ बैठकर एक-दूसरे की आँखों में सुकून ढूँढा जाएगा। जब होली पर रंग लगाते वक्त डर नहीं, अपनापन होगा। त्योहार तब लौटेंगे, जब हम दिखाना बंद करेंगे — और महसूस करना शुरू करेंगे।

त्योहारों का यह सेल्फ़ी ड्रामा तभी खत्म होगा जब इंसान अपने अंदर झाँककर यह कह सके — “मुझे किसी की लाइक नहीं चाहिए, मुझे बस अपने अपनों की सच्ची मुस्कान चाहिए।”

प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

जनसामान्य को मिला सुरक्षा का भरोसा: देवरिया पुलिस का ‘मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान’, 339 व्यक्तियों व 207 वाहनों की हुई जांच

सुरक्षा, संवाद और सामुदायिक पुलिसिंग का उदाहरण बनी देवरिया पुलिस की पहल

देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)
जनपद में शांति, सुरक्षा एवं कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से पुलिस अधीक्षक सजीव सुमन के निर्देशन में शनिवार की सुबह एक विशेष “मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान” चलाया गया। यह अभियान सुबह 5 बजे से 8 बजे तक जनपद के सभी थाना क्षेत्रों में एक साथ संचालित हुआ।

इस दौरान सभी थाना प्रभारी व थानाध्यक्ष स्वयं मैदान में उतरे और मार्निंग वॉक पर निकले आम नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित किया। पुलिस अधिकारियों ने लोगों की समस्याएं सुनीं और छोटे-मोटे विवादों को मौके पर ही सामुदायिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास किया।

पुलिस अधीक्षक सजीव सुमन ने बताया कि इस अभियान का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक पुलिसिंग को सशक्त करना, आमजन में विश्वास और सुरक्षा की भावना को बढ़ाना तथा ‘मित्र पुलिसिंग’ की भावना को प्रोत्साहित करना है।

अभियान के दौरान संदिग्ध व्यक्तियों, वाहनों और विधिविरुद्ध गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी गई। पुलिस टीमों ने चोरी की गाड़ियों की जांच की, तीन सवारी व मोडिफाइड साइलेंसर वाले वाहनों पर कार्रवाई की, नाबालिग चालकों और अवैध मादक पदार्थ या असलहा रखने वालों की तलाशी ली।

जनपदीय पुलिस के अनुसार, अभियान के दौरान 19 स्थानों पर चेकिंग की गई, जिसमें 339 व्यक्तियों और 207 वाहनों की जांच की गई। पुलिस ने बताया कि आगे भी ऐसे अभियानों को निरंतर जारी रखा जाएगा ताकि जनसुरक्षा, शांति और विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा सके।

जनसामान्य ने देवरिया पुलिस की इस सकारात्मक पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह की गतिविधियाँ नागरिकों में भरोसा और सहयोग की भावना बढ़ाने में सहायक हैं।

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राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख: ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अद्भुत साधक

नवनीत मिश्र

राष्ट्र की चेतना को जगाने वाले महामानवों में एक नाम हैl भारत रत्न नानाजी देशमुख। वे ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने अपने जीवन को न पद के लिए जिया, न प्रचार के लिए, बल्कि समाज के पुनर्निर्माण और आत्मनिर्भर भारत की नींव रखने के लिए समर्पित किया। 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिंगोली में जन्मे नानाजी बाल्यकाल से ही अनुशासित, कर्मठ और जिज्ञासु थे। जीवन में अभावों के बावजूद उन्होंने कभी संघर्ष से मुंह नहीं मोड़ा। आरएसएस से जुड़कर उन्होंने राष्ट्रसेवा का व्रत लिया और आजीवन उसी मार्ग पर अडिग रहे।
नानाजी देशमुख भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में अग्रणी रहे। उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में संगठन और वैचारिक नेतृत्व का नया अध्याय जोड़ा। 1967 में विपक्षी एकता के सूत्रधार बनकर उन्होंने लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी। लेकिन सत्ता उनके लक्ष्य में नहीं थी। उन्होंने राजनीति से सन्यास लेकर ग्रामोदय की दिशा में कदम बढ़ाया। उनका स्पष्ट विश्वास था कि समाज यदि सशक्त है, तो सत्ता अपने आप संवेदनशील हो जाती है।
राजनीति से दूर होकर नानाजी देशमुख ने चित्रकूट को अपने कर्मक्षेत्र के रूप में चुना। यहां उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान (Deendayal Research Institute) की स्थापना की। उनका लक्ष्य था, गांवों को आत्मनिर्भर, स्वावलंबी और संस्कारित बनाना। उन्होंने कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और पर्यावरण संरक्षण को ग्राम विकास के पाँच आधार स्तंभ बनाए। चित्रकूट का यह मॉडल आज भी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि बिना सरकारी अनुदान के भी समाज स्वयं अपने बल पर विकास कर सकता है।
नानाजी का मानना था कि भारत का वास्तविक चेहरा गांवों में बसता है। जब गांवों का उत्थान होगा, तभी राष्ट्र सशक्त बनेगा। उनकी “ग्रामोदय” अवधारणा आज के “आत्मनिर्भर भारत” अभियान की वैचारिक नींव है। उन्होंने गांवों में शिक्षा को जीवन कौशल से जोड़ा, कृषि को नवाचार से, और समाज को संस्कार से। उनकी कार्यशैली ने यह दिखाया कि सेवा, साधना और स्वावलंबन से ही विकास टिकाऊ हो सकता है।
नानाजी देशमुख का पूरा जीवन एक सुसंगठित अनुशासन का प्रतीक था। उन्होंने कभी निजी लाभ की कामना नहीं की। उनका हर कार्य समाज के उत्थान के लिए था। उनकी वाणी में सरलता और विचारों में गहराई थी। वे कहा करते थेl “सेवा का अर्थ दान नहीं, बल्कि आत्मबल से समाज को सशक्त बनाना है।” उनकी सोच और कर्म की एकता ने उन्हें “राष्ट्रऋषि” की उपाधि दिलाई।
2019 में भारत सरकार ने नानाजी देशमुख को भारत रत्न से सम्मानित किया। यह सम्मान केवल उनके योगदान का नहीं, बल्कि उस विचारधारा का सम्मान था जो “अंत्योदय” समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की भावना पर आधारित है।
आज जब देश ग्राम विकास, स्वावलंबन और समावेशी प्रगति की दिशा में आगे बढ़ रहा है, नानाजी का मॉडल पहले से अधिक प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले, राजनीति का उद्देश्य सेवा होना चाहिए, सत्ता नहीं, और राष्ट्रनिर्माण का मूल केन्द्र व्यक्ति नहीं, समाज है।
नानाजी देशमुख ने दिखाया कि बिना किसी पद या प्रतिष्ठा के भी व्यक्ति समाज को दिशा दे सकता है। उनकी जयन्ती पर उन्हें स्मरण करना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारने का संकल्प है।

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संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। पति की लंबी उम्र और उनके सुखी व समृद्ध जीवन की कामना में शुक्रवार को प्रदेश भर में करवाचौथ का पर्व गहरी श्रद्धा और भावनाओं के साथ मनाया गया। सूर्योदय से पहले ही सुहागिनों ने व्रत की शुरुआत की और पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हुए अपने मन में पति के लिए अटूट स्नेह संजोए रखा।
शहर से गांवों तक महिलाएं पारंपरिक परिधानों और सोलह श्रृंगार में सज-धज कर पूजा की तैयारियों में व्यस्त रहीं। शाम को उन्होंने गौरी-गणेश की विधिवत पूजा-अर्चना कर अपनी आस्था का संकल्प दोहराया।
जैसे ही चंद्रमा की चांदनी झिलमिला उठी, महिलाएं चलनी से चांद को निहारती रही, अपने पति की लंबी उम्र और सुखमय जीवन के लिए मन-ही-मन प्रार्थना करती हुईं। उसके बाद आरती उतारकर व्रत खोलते समय उनके चेहरे पर संतोष और खुशी की चमक साफ झलक रही थी। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे को व्रत की बधाई देती और करवाचौथ की लोककथाओं में लीन रहीं।

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“अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस: लड़कियों के अधिकारों और सशक्तिकरण की वैश्विक पुकार”

Rkpnews हर वर्ष 11 अक्टूबर को विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। यह दिवस केवल तारीख़ नहीं, बल्कि लड़कियों के अधिकारों की रक्षा, उनके सशक्तिकरण और उनके समक्ष आने वाली सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने का प्रतीक है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2011 में इसे आधिकारिक रूप से घोषित किया था, लेकिन इसकी नींव 1997 में रखे गए घोषणापत्र में देखने को मिलती है। उस समय पहली बार विश्व स्तर पर लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, और सुरक्षा के मुद्दों पर जोर दिया गया और उनके सशक्तिकरण की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।

इस दिवस का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं है, बल्कि समाज में लड़कियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना भी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल और नेतृत्व के क्षेत्र में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों ने अपने-अपने कार्यक्रम और अभियान शुरू किए हैं।

आज भी कई देशों में लड़कियों के अधिकारों की स्थिति चुनौतीपूर्ण है। बाल विवाह, बाल श्रम, शिक्षा में असमानता और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएं लड़कियों के जीवन में बाधाएं बनकर खड़ी हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें यह याद दिलाता है कि लड़कियों को सशक्त बनाना केवल उनका अधिकार नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की प्रगति का भी आधार है।

समाज, सरकार और व्यक्तिगत स्तर पर सभी को मिलकर लड़कियों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना होगा। केवल तभी हम एक समृद्ध और सशक्त भविष्य की कल्पना कर सकते हैं, जहां हर लड़की अपने सपनों को बिना किसी रोक-टोक के पूरा कर सके।

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