Friday, May 1, 2026
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निजी स्कूलों की महंगी फीस, बड़े दावे और हकीकत

चमकदार विज्ञापन बनाम वास्तविक परिणाम: निजी स्कूलों की पड़ताल

(विज्ञापनों में सफलता की गारंटी, लेकिन परिणामों में सच्चाई—क्या अभिभावकों को मिल रहा है उनके पैसे का सही मूल्य?)

– डॉ. सत्यवान सौरभ

आज के दौर में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन नहीं रह गई है, बल्कि यह एक तेजी से बढ़ता हुआ व्यवसाय भी बन चुकी है। शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक, निजी स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ रही है और उनके साथ-साथ बढ़ रही है उनके प्रचार-प्रसार की रणनीतियाँ। अखबारों, होर्डिंग्स, सोशल मीडिया और यहां तक कि स्थानीय कार्यक्रमों में भी स्कूलों के आकर्षक विज्ञापन देखने को मिलते हैं। हर स्कूल अपने आप को “सर्वश्रेष्ठ”, “भविष्य निर्माता” और “सफलता की गारंटी” देने वाला संस्थान बताता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ये दावे वास्तविकता से मेल खाते हैं, या फिर यह केवल अभिभावकों की उम्मीदों और भावनाओं का लाभ उठाने का एक तरीका है?

आज का अभिभावक पहले से कहीं अधिक जागरूक है, लेकिन साथ ही वह अपने बच्चों के भविष्य को लेकर उतना ही चिंतित भी है। वह चाहता है कि उसका बच्चा एक अच्छे स्कूल में पढ़े, बेहतर सुविधाएं प्राप्त करे और जीवन में आगे बढ़े। इसी सोच के चलते वह अक्सर अपनी आय से अधिक खर्च करने के लिए भी तैयार हो जाता है। कई परिवार ऐसे हैं जो अपनी जरूरतों में कटौती करके, कर्ज लेकर या अतिरिक्त काम करके बच्चों की फीस भरते हैं। उनके मन में यह विश्वास होता है कि महंगे स्कूल में पढ़ाई का मतलब है बेहतर शिक्षा और निश्चित सफलता।

निजी स्कूल इसी मनोविज्ञान को समझते हैं और अपने प्रचार में इसका भरपूर उपयोग करते हैं। वे अपने कैंपस, इंफ्रास्ट्रक्चर, स्मार्ट क्लासरूम, एयर-कंडीशंड सुविधाओं, खेल गतिविधियों और अन्य आधुनिक संसाधनों को प्रमुखता से दिखाते हैं। इसके साथ ही, वे प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून और रक्षा सेवाओं में सफलता के बड़े-बड़े दावे भी करते हैं। कई बार विज्ञापनों में कुछ चुनिंदा छात्रों की उपलब्धियों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है, जैसे वह पूरे स्कूल के स्तर को दर्शाती हों।

लेकिन जब हम इन दावों को गहराई से परखते हैं, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। वास्तविकता यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता का प्रतिशत बहुत कम होता है। चाहे वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा हो, इंजीनियरिंग की प्रतिष्ठित परीक्षाएं हों, या फिर कानून और रक्षा सेवाओं से जुड़ी परीक्षाएं—इनमें सफल होने वाले छात्रों की संख्या अक्सर सीमित होती है। कई बार तो पूरे साल में गिने-चुने छात्र ही इन परीक्षाओं को पास कर पाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या स्कूल द्वारा किए गए दावे वास्तविकता के अनुरूप हैं?

यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि इन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी केवल स्कूल की पढ़ाई के आधार पर संभव नहीं होती। अधिकतर छात्र अलग से कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं, जहां उन्हें विशेष रूप से इन परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाता है। वे अतिरिक्त समय, मेहनत और संसाधन लगाते हैं। ऐसे में यदि कोई स्कूल इन छात्रों की सफलता का पूरा श्रेय अपने ऊपर लेता है, तो यह अभिभावकों को गुमराह करने जैसा हो सकता है।

बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम भी किसी स्कूल की गुणवत्ता को मापने का एक प्रमुख आधार होते हैं। लेकिन यहां भी अक्सर देखा जाता है कि बहुत कम छात्र ही 90 प्रतिशत या उससे अधिक अंक प्राप्त कर पाते हैं। 95 प्रतिशत से ऊपर अंक लाने वाले छात्रों की संख्या तो और भी कम होती है। यदि कोई स्कूल खुद को क्षेत्र का अग्रणी संस्थान बताता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि उसके परिणाम भी उसी स्तर के हों। लेकिन कई बार यह अपेक्षा पूरी नहीं हो पाती।

फीस का मुद्दा इस पूरे विषय का सबसे संवेदनशील पहलू है। निजी स्कूलों की फीस लगातार बढ़ती जा रही है, और कई मामलों में यह मध्यम वर्गीय परिवारों की आर्थिक क्षमता से बाहर हो जाती है। फीस के अलावा भी कई तरह के अतिरिक्त खर्च होते हैं—जैसे परिवहन शुल्क, यूनिफॉर्म, किताबें, वार्षिक शुल्क, गतिविधि शुल्क आदि। कुल मिलाकर, एक बच्चे की शिक्षा पर होने वाला खर्च काफी अधिक हो जाता है।

यहां यह समझना जरूरी है कि स्कूलों को अपने संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है। अच्छे शिक्षक, आधुनिक सुविधाएं, सुरक्षा व्यवस्था, और सह-पाठयक्रम गतिविधियां—इन सभी का एक खर्च होता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब फीस और शिक्षा की गुणवत्ता के बीच संतुलन नहीं होता। यदि स्कूल अत्यधिक फीस ले रहा है, तो उससे यह अपेक्षा करना गलत नहीं है कि वह उसी स्तर की गुणवत्ता भी प्रदान करे।

सरकार ने इस समस्या को देखते हुए कई राज्यों में फीस नियंत्रण के लिए नियम और कानून बनाए हैं। फीस रेगुलेशन कमेटियां गठित की गई हैं, जिनका उद्देश्य स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वृद्धि को रोकना है। लेकिन व्यवहार में इन नियमों का प्रभाव सीमित दिखाई देता है। कई बार अभिभावकों को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती, और वे अकेले आवाज उठाने से हिचकिचाते हैं।

इस स्थिति में अभिभावकों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल विज्ञापनों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय स्कूल के वास्तविक प्रदर्शन, शिक्षकों की गुणवत्ता, और पिछले परिणामों का गंभीरता से विश्लेषण करना चाहिए। यदि संभव हो, तो अन्य अभिभावकों से बातचीत करनी चाहिए और उनके अनुभव जानने चाहिए। स्कूल के दावों और वास्तविकता के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।

इसके अलावा, यदि अभिभावकों को लगता है कि स्कूल पारदर्शिता नहीं बरत रहा है या गलत दावे कर रहा है, तो उन्हें सामूहिक रूप से आवाज उठानी चाहिए। एकजुट होकर स्कूल प्रबंधन से जवाब मांगना, और आवश्यक होने पर संबंधित शिक्षा अधिकारियों या बोर्ड के पास शिकायत दर्ज कराना, एक प्रभावी कदम हो सकता है। इससे न केवल समस्या का समाधान हो सकता है, बल्कि भविष्य में ऐसी स्थितियों को रोका भी जा सकता है।

यह भी जरूरी है कि हम सफलता की परिभाषा को केवल अंकों और प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित न रखें। हर बच्चा अलग होता है, उसकी रुचियां और क्षमताएं भी अलग होती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल एक परीक्षा में सफलता दिलाना नहीं, बल्कि बच्चे के समग्र विकास को सुनिश्चित करना होना चाहिए। एक अच्छा स्कूल वही है जो बच्चे को आत्मनिर्भर, आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करे।

आज के समय में यह समझना बेहद जरूरी है कि कोई भी स्कूल सफलता की गारंटी नहीं दे सकता। स्कूल केवल एक मंच प्रदान करता है, जहां से बच्चा अपनी यात्रा शुरू करता है। उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह कितना मेहनत करता है, उसे कैसा मार्गदर्शन मिलता है, और उसका वातावरण कैसा है।

अंततः, शिक्षा को एक सेवा के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल एक व्यापार के रूप में। स्कूलों की जिम्मेदारी है कि वे पारदर्शिता बनाए रखें, अपने दावों के प्रति जवाबदेह रहें, और अभिभावकों के विश्वास को बनाए रखें। वहीं, अभिभावकों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे जागरूक रहें, सही जानकारी के आधार पर निर्णय लें, और आवश्यकता पड़ने पर अपनी आवाज उठाएं।

यदि इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन और विश्वास बना रहता है, तभी हम एक ऐसी शिक्षा प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं जो वास्तव में बच्चों के भविष्य को उज्ज्वल बना सके, न कि केवल एक महंगा सौदा बनकर रह जाए।

(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

Auto Stand Auction: भिंसवा ऑटो स्टैंड की नीलामी में 8.10 लाख की रिकॉर्ड बोली, राम निवास गुप्ता बने विजेता

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। विकास खंड सदर अंतर्गत ग्राम पंचायत भिंसवा चौराहा शिकारपुर स्थित ऑटो स्टैंड/पार्किंग के संचालन के लिए बुधवार को आयोजित नीलामी प्रक्रिया में कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली। ग्राम पंचायत भवन भिसवा में प्रातः 11 बजे शुरू हुई इस नीलामी में क्षेत्र के कई इच्छुक प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिससे माहौल काफी प्रतिस्पर्धात्मक बना रहा।

ग्राम पंचायत द्वारा पूर्व में जारी सूचना के अनुसार गाटा संख्या 494 के अंतर्गत कुल 1.339 हेक्टेयर भूमि में से 0.128 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर निर्मित ऑटो स्टैंड/पार्किंग स्थल के संचालन हेतु यह नीलामी कराई गई। नीलामी प्रक्रिया ग्राम प्रधान जयगोविंद की अध्यक्षता में संपन्न हुई, जिसमें लेखपाल अशोक तिवारी, ग्राम सभा के सदस्य तथा बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति रही।

नीलामी की शुरुआत से ही बोलीदाताओं के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला। प्रारंभिक दौर में सभी प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक बोली लगाई, लेकिन प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ ही कुछ प्रतिभागी पीछे हटते चले गए। अंततः राम निवास गुप्ता ने 8 लाख 10 हजार रुपये की सर्वाधिक बोली लगाकर पहला स्थान प्राप्त किया और नीलामी अपने नाम कर ली।

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वहीं, विनोद प्रजापति 8 लाख रुपये की बोली लगाकर दूसरे स्थान पर रहे, लेकिन अंतिम चरण में वह आगे नहीं बढ़ सके। कुल छह प्रतिभागियों ने नीलामी में हिस्सा लिया, जिनमें से चार प्रतिभागी प्रतिस्पर्धा के दौरान ही बाहर हो गए।

ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों के अनुसार नीलामी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी एवं नियमों के अनुरूप संपन्न कराई गई। सभी आवश्यक अभिलेखों और औपचारिकताओं को पूरा करने के उपरांत सफल बोलीदाता को ऑटो स्टैंड संचालन का अधिकार सौंपा जाएगा।

ग्राम पंचायत ने इस नीलामी से प्राप्त होने वाली आय को लेकर संतोष जताया है। उम्मीद व्यक्त की जा रही है कि इससे ग्राम पंचायत की आमदनी में वृद्धि होगी, जिससे विकास कार्यों को नई गति मिलेगी और स्थानीय सुविधाओं का विस्तार किया जा सकेगा।

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30 मार्च को बस्ती मंडल में लगेगी पेंशन अदालत, 28 तक दें आवेदन

संत कबीर नगर (राष्ट्र की परम्परा)। बस्ती मंडल के सेवानिवृत्त पेंशनरों की समस्याओं के समाधान के लिए 30 मार्च 2026 को मण्डलायुक्त, बस्ती की अध्यक्षता में पेंशन अदालत का आयोजन किया जाएगा। यह आयोजन मण्डलायुक्त कार्यालय सभागार में अपराह्न 4 बजे से शुरू होगा।

वरिष्ठ कोषाधिकारी त्रिभुवनलाल ने बताया कि इस पेंशन अदालत में वित्तीय वर्ष 2025-26 के अंतर्गत पेंशन, पारिवारिक पेंशन, उपदान, राशिकरण एवं अन्य सेवानिवृत्ति संबंधी देयकों से जुड़ी समस्याओं का निस्तारण किया जाएगा।

उन्होंने जानकारी दी कि बस्ती मंडल के समस्त राजकीय कार्यालयों के सेवानिवृत्त समूह ‘ख’ तक के राजपत्रित अधिकारी, अन्य शासकीय सेवक तथा उनके परिवारीजन, जिन्हें अपने सेवानिवृत्तिक देयकों से संबंधित कोई समस्या हो, वे निर्धारित प्रारूप पर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन पत्र अपर निदेशक, कोषागार एवं पेंशन, बस्ती मंडल कार्यालय या मंडल के किसी भी कोषागार से प्राप्त किया जा सकता है।

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सभी इच्छुक पेंशनर अपने प्रत्यावेदन 28 मार्च 2026 तक संयोजक पेंशन अदालत/अपर निदेशक कोषागार एवं पेंशन, बस्ती मंडल, शास्त्री चौक स्थित कार्यालय में जमा करें। साथ ही आवेदन की एक प्रति संबंधित कार्यालयाध्यक्ष या विभागाध्यक्ष को भी भेजना अनिवार्य होगा, ताकि समय पर अनुपालन आख्या प्राप्त कर लंबित प्रकरणों का निस्तारण किया जा सके।

यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस पेंशन अदालत में केवल राजकीय सेवकों के मामलों पर ही विचार किया जाएगा। नगर निगम, जिला परिषद, जल निगम आदि संस्थाओं से सेवानिवृत्त कर्मचारियों के मामलों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। साथ ही 1 दिसंबर 2011 से पूर्व सेवानिवृत्त कर्मचारियों के प्रकरणों पर भी विचार नहीं होगा, क्योंकि वे अन्य मंडल के कार्यक्षेत्र में आते हैं।

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बलिया (राष्ट्र की परम्परा)। बेल्थरारोड-भागलपुर मार्ग पर तुर्तीपार स्थित घाघरा नदी पर निर्माणाधीन फोर-लेन पुल पर बुधवार को एक बड़ा हादसा हो गया। पुल के पिलर में लगा सरिया अचानक झुक जाने से वहां काम कर रहे मजदूर मलबे में दब गए। हादसे में दो मजदूरों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कई अन्य मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गए।घटना के बाद निर्माण स्थल पर अफरा-तफरी मच गई। मौके पर मौजूद अन्य मजदूरों ने तत्काल राहत कार्य शुरू किया और मलबे में दबे साथियों को निकालने का प्रयास किया।

सूचना मिलते ही स्थानीय प्रशासन और पुलिस टीम भी मौके पर पहुंच गई। उभांव थाना के इंस्पेक्टर संजय शुक्ला और क्राइम इंस्पेक्टर नरेश मलिक के नेतृत्व में पुलिस ने राहत और बचाव कार्य शुरू कराया।मलबे में दबे मजदूरों को बाहर निकालकर तत्काल नजदीकी अस्पताल पहुंचाया गया। चिकित्सकों ने दो मजदूरों को मृत घोषित कर दिया, जबकि गंभीर रूप से घायल अन्य मजदूरों को बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया है। घायलों की स्थिति को देखते हुए प्रशासन भी सतर्क है।

बताया जा रहा है कि लगभग 650 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस महत्वाकांक्षी पुल परियोजना का निर्माण कार्य पिछले कुछ समय से तेजी से चल रहा है। लेकिन मजदूरों की सुरक्षा को लेकर लापरवाही के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण स्थल पर पर्याप्त सुरक्षा उपकरण और मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है।

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गौरतलब है कि इससे पहले भी 28 जनवरी को इसी निर्माण स्थल पर एक हादसा हो चुका है, जिसमें कई मजदूर घायल हुए थे। उस घटना के बाद भी निर्माण एजेंसी की ओर से सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। अब फिर से हुए इस हादसे ने निर्माण कार्य की निगरानी और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

घटना के बाद स्थानीय लोगों और मजदूरों में काफी आक्रोश देखा जा रहा है। उनका कहना है कि बार-बार हो रहे हादसों के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी और कार्यदायी संस्था लापरवाह बनी हुई है। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों व निर्माण एजेंसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।

फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी हुई है और हादसे के कारणों का पता लगाया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

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बिहार दिवस 2026: उत्कृष्ट योगदान पर शिक्षक मृत्युंजय कुमार और विनोद कुमार सम्मानित, शिक्षा जगत में बढ़ाया मान

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बिहार दिवस 2026 के अवसर पर राजधानी पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में आयोजित भव्य समारोह के दौरान शिक्षा क्षेत्र से जुड़े समर्पित शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इस प्रतिष्ठित अवसर पर पूर्वी चंपारण जिले के दो शिक्षकों—मृत्युंजय कुमार और विनोद कुमार—को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रशस्ति-पत्र एवं मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया।
यह सम्मान उन्हें 22 से 24 मार्च 2026 तक आयोजित बिहार दिवस 2026 समारोह के सफल संचालन में निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका के लिए प्रदान किया गया। कार्यक्रम देर रात तक चला और इसमें हजारों लोगों की भागीदारी रही, जिससे आयोजन की भव्यता और प्रभाव स्पष्ट रूप से झलकता है।
मृत्युंजय कुमार, जो नवसृजित प्राथमिक विद्यालय खुटौना यादव टोला में कार्यरत हैं, और विनोद कुमार, जो नवसृजित प्राथमिक विद्यालय बेलाहीराम पूर्वी में पदस्थापित हैं, दोनों ने आयोजन के दौरान अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन अत्यंत निष्ठा और समर्पण के साथ किया। उनके कार्यों ने न केवल कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग किया, बल्कि शिक्षा विभाग के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाया।
शिक्षा के प्रति समर्पण का सम्मान
शिक्षा विभाग द्वारा जारी प्रशस्ति-पत्र में दोनों शिक्षकों के समर्पण, मेहनत और शैक्षणिक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी की विशेष रूप से सराहना की गई है। विभाग ने अपने संदेश में कहा कि ऐसे शिक्षक ही शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ होते हैं और उनके प्रयासों से ही समाज में सकारात्मक बदलाव संभव हो पाता है।
बिहार दिवस 2026 के इस मंच से मिला सम्मान न केवल इन शिक्षकों के लिए गर्व का विषय है, बल्कि यह पूरे शिक्षा समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले कर्मठ और प्रतिबद्ध शिक्षक समाज में परिवर्तन लाने की क्षमता रखते हैं।
बिहार दिवस 2026: सांस्कृतिक और शैक्षणिक संगम
बिहार दिवस 2026 का आयोजन इस वर्ष विशेष रूप से भव्य रहा। बिहार दिवस 2026 के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रमों, शैक्षणिक प्रदर्शनों और विभिन्न विभागों की सहभागिता ने इस आयोजन को और भी आकर्षक बना दिया।
गांधी मैदान में आयोजित इस समारोह में राज्य के विभिन्न जिलों से आए प्रतिभागियों ने अपनी-अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया। इस दौरान शिक्षा विभाग की भूमिका भी अहम रही, जिसमें शिक्षकों ने सक्रिय रूप से भाग लेकर कार्यक्रम की सफलता सुनिश्चित की।
शिक्षकों की भूमिका बनी प्रेरणा
मृत्युंजय कुमार और विनोद कुमार जैसे शिक्षकों का सम्मान यह दर्शाता है कि राज्य सरकार शिक्षा क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इन शिक्षकों की उपलब्धि से न केवल उनके विद्यालय परिवार में खुशी की लहर है, बल्कि पूरे पूर्वी चंपारण जिले के शिक्षकों में भी उत्साह का माहौल है।
स्थानीय स्तर पर इस उपलब्धि को गर्व के रूप में देखा जा रहा है। विद्यालय के छात्रों और अभिभावकों ने भी इस सम्मान पर खुशी जताते हुए कहा कि इससे बच्चों को शिक्षा के प्रति प्रेरणा मिलेगी और शिक्षक-छात्र संबंध और मजबूत होंगे।
शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा
इस प्रकार के सम्मान समारोह न केवल शिक्षकों के मनोबल को बढ़ाते हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जब शिक्षकों के प्रयासों को सार्वजनिक रूप से सराहा जाता है, तो इससे अन्य शिक्षकों को भी बेहतर कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
बिहार दिवस 2026 के इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि राज्य की प्रगति में शिक्षा और शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। ऐसे आयोजनों के माध्यम से सरकार और समाज मिलकर शिक्षा के क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

नवारम्भ उत्सव से गूंजा प्राथमिक विद्यालय रामपुर, नए सत्र का हुआ उत्साहपूर्ण आगाज़

शाहजहांपुर (राष्ट्र की परम्परा) जनपद के जैतीपुर विकास खंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय रामपुर में बुधवार को ‘नवारम्भ उत्सव’ के रूप में नए शैक्षणिक सत्र का भव्य और उत्साहपूर्ण शुभारंभ किया गया। विद्यालय परिसर पूरे दिन उत्सव के रंग में रंगा रहा, जहां बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली।

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बच्चों में शिक्षा के प्रति रुचि जागृत करना, विद्यालय से उनका भावनात्मक जुड़ाव मजबूत करना तथा अभिभावकों को शैक्षिक प्रक्रिया में सहभागी बनाना था। ‘नवारम्भ उत्सव’ ने विद्यालय को एक जीवंत और प्रेरणादायक वातावरण प्रदान किया।
मां सरस्वती के पूजन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का आरंभ मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन और पुष्प अर्पित कर किया गया। इस दौरान उपस्थित सभी लोगों ने ज्ञान की देवी से विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं ने इस अवसर को विशेष बनाते हुए बच्चों का स्वागत किया और उन्हें नए सत्र के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों, सहायिकाओं और रसोइयों की उपस्थिति ने आयोजन को सामुदायिक रूप प्रदान किया।
बाल वाटिका पर विशेष जोर, प्रारंभिक शिक्षा का महत्व बताया
कार्यक्रम के दौरान नोडल शिक्षक ने ‘बाल वाटिका’ की अवधारणा को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि प्रारंभिक शिक्षा बच्चों के मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास की नींव होती है।
उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को नियमित रूप से विद्यालय भेजें और उनकी पढ़ाई में रुचि लें। ‘नवारम्भ उत्सव’ के माध्यम से यह संदेश स्पष्ट रूप से दिया गया कि शिक्षा केवल विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अभिभावकों और समाज की भी साझा भूमिका है।
अभिभावकों और ग्रामवासियों की सक्रिय भागीदारी
इस कार्यक्रम में ग्राम प्रधान, अभिभावक एवं क्षेत्र के कई गणमान्य नागरिकों ने भाग लिया। सभी ने विद्यालय के प्रयासों की सराहना करते हुए शिक्षा के महत्व पर बल दिया।
ग्राम प्रधान अजय पाल कश्यप ने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे आयोजन बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं और उन्हें विद्यालय के प्रति आकर्षित करते हैं। उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि वे बच्चों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करें।
विद्यालय में उत्सव जैसा माहौल, बच्चों में दिखा उत्साह
पूरे कार्यक्रम के दौरान विद्यालय परिसर में उत्सव जैसा माहौल बना रहा। बच्चों के चेहरे पर खुशी और उत्साह साफ झलक रहा था। शिक्षकों ने बच्चों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें बेहतर शिक्षा और अनुशासन के महत्व के बारे में बताया।
इस आयोजन ने न केवल बच्चों को विद्यालय से जोड़ने का कार्य किया, बल्कि अभिभावकों के मन में भी शिक्षा के प्रति विश्वास और जागरूकता बढ़ाई।
सभी अतिथियों का किया गया आभार व्यक्त
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय परिवार द्वारा उपस्थित सभी अतिथियों, अभिभावकों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया गया। इस अवसर पर अनुभव शाक्य, पूरन लाल मौर्य, राजीव मौर्य, बलवीर श्रीवास्तव, जितिन श्रीवास्तव, राजबहादुर मौर्य, सतीश कश्यप, महावीर, जितेंद्र मौर्य, रतिराम कश्यप, ग्राम प्रधान अजय पाल कश्यप, एसएमसी अध्यक्ष रामेश्वर दयाल, होरी लाल कश्यप सहित कई लोग मौजूद रहे।
‘नवारम्भ उत्सव’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति जागरूकता और सहभागिता का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा। इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि जब विद्यालय, अभिभावक और समाज मिलकर प्रयास करते हैं, तो शिक्षा का स्तर स्वतः ही बेहतर हो जाता है।

दबंगई की हद: दंपति पर चाकू-चेन से हमला, घर में घुसकर मारपीट का वीडियो वायरल


📍 भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)देवरिया जनपद के मईल थाना क्षेत्र अंतर्गत मुरासो गांव में दबंगई का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। पुरानी रंजिश के चलते दबंगों द्वारा एक दंपति पर चाकू और लोहे की चेन से हमला करने के बाद अब उसी मामले से जुड़ा एक नया वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें एक युवक खुलेआम घर में घुसकर मारपीट और धमकी देता नजर आ रहा है।
घटना सोमवार रात की बताई जा रही है, जब गांव निवासी कमलेश यादव के घर कुछ लोग पुरानी दुश्मनी के चलते पहुंचे और अचानक हमला बोल दिया। आरोप है कि हमलावरों ने लोहे की चेन और चाकू से वार कर कमलेश यादव को गंभीर रूप से घायल कर दिया। जब उनकी पत्नी उन्हें बचाने के लिए बीच में आईं, तो हमलावरों ने उन पर भी बेरहमी से हमला कर दिया, जिससे वह लहूलुहान हो गईं।


इतना ही नहीं, परिवार के अन्य सदस्य भी इस हिंसा का शिकार बने। बीच-बचाव करने पहुंचे कमलेश यादव के भाई के साथ भी मारपीट की गई। घटना के बाद पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई और स्थानीय लोगों में भय का माहौल बन गया।
📹 वायरल वीडियो ने बढ़ाई चिंता
इस घटना के बाद अब एक और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में एक युवक रात करीब 9 बजे कमलेश यादव के घर पहुंचता है और दरवाजे पर गाली-गलौज करते हुए उसे तोड़कर अंदर घुस जाता है। इसके बाद वह परिवार के सदस्यों के साथ मारपीट करता दिखाई देता है।
वीडियो में युवक को यह कहते हुए भी सुना जा सकता है कि
“एसओ भी आ जाएंगे तो कुछ नहीं होगा, दौड़ा-दौड़ा कर मारूंगा, लोड करके रखा हूं।”
हालांकि इस वायरल वीडियो की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है, लेकिन इससे क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
🚨 पुलिस कार्रवाई और जांच
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और घायलों को तत्काल इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया। मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए गांव के ही बृजेश, योगेश, उमेश, विष्णु और अवनीश के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज किया है।
मईल थाना प्रभारी निरीक्षक संतोष कुमार ने बताया कि
“मामले में मुकदमा दर्ज कर लिया गया है और सभी आरोपियों की तलाश की जा रही है। वायरल वीडियो की भी जांच की जा रही है। दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
⚖️ पुरानी रंजिश बनी हिंसा की वजह
प्राथमिक जांच में सामने आया है कि यह पूरा विवाद पुरानी पारिवारिक रंजिश का परिणाम है। दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से तनाव चल रहा था, जो अब हिंसक रूप ले चुका है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते विवाद का समाधान कर लिया जाता, तो इतनी बड़ी घटना को टाला जा सकता था।
😨 गांव में दहशत का माहौल
घटना के बाद मुरासो गांव में दहशत का माहौल है। लोग खुलकर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दबंगों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे पुलिस के सामने भी धमकी देने से नहीं डरते।
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि गांव में पुलिस गश्त बढ़ाई जाए और आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर कड़ी सजा दी जाए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
📌 देवरिया का यह मामला न केवल आपराधिक प्रवृत्ति को उजागर करता है, बल्कि कानून-व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। वायरल वीडियो और खुलेआम दी जा रही धमकियां इस बात का संकेत हैं कि कुछ लोगों में कानून का डर खत्म होता जा रहा है। ऐसे में प्रशासन के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह सख्त कदम उठाए और पीड़ितों को न्याय दिलाए।

Gas Pipeline Rules 2026: LPG संकट के बीच बड़ा फैसला, अब पाइप गैस कनेक्शन लेना होगा आसान

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। LPG संकट के बीच केंद्र सरकार ने गैस पाइपलाइन और PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) कनेक्शन को लेकर बड़ा फैसला लिया है।
Ministry of Petroleum and Natural Gas ने प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम उत्पाद वितरण आदेश, 2026 को तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। यह आदेश Essential Commodities Act 1955 के तहत जारी किया गया है।

अब जल्दी मिलेगी मंजूरी

नए नियम के अनुसार:

• पाइपलाइन बिछाने की अनुमति में देरी खत्म
• तय समय में मंजूरी न मिलने पर ऑटो-अप्रूवल
• अलग-अलग विभागों से बार-बार अनुमति की जरूरत खत्म
इससे गैस पाइपलाइन परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकेंगी।

अवैध वसूली पर सख्ती

सरकार ने स्थानीय स्तर पर होने वाली अवैध वसूली पर भी रोक लगाई है।

• अतिरिक्त शुल्क लेने पर रोक
• पारदर्शी प्रक्रिया लागू
• कंपनियों और उपभोक्ताओं दोनों को राहत

सड़क खुदाई के लिए नए नियम

सड़क खुदाई और मरम्मत के लिए:

• ‘डिग एंड रिस्टोर’ नीति
• ‘डिग एंड पे’ नियम

लागू किए गए हैं, जिससे काम के बाद सड़कें समय पर ठीक की जा सकेंगी।

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कंपनियों के लिए सख्त गाइडलाइन

सरकार ने कंपनियों के लिए:

• बैंक गारंटी अनिवार्य
• गुणवत्ता और सुरक्षा मानक
• पारदर्शी कार्य प्रणाली
जैसे नियम लागू किए हैं।

आम लोगों को क्या फायदा?

इस फैसले से:

• शहरों में PNG कनेक्शन तेजी से मिलेगा
• LPG सिलेंडर पर निर्भरता घटेगी
• सस्ती और सुरक्षित ऊर्जा उपलब्ध होगी

सरकार का लक्ष्य भारत को गैस आधारित अर्थव्यवस्था बनाना है, जिससे प्रदूषण कम होगा और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

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पंडित गणेशशंकर विद्यार्थी: निर्भीक पत्रकारिता और मानवता के प्रहरी

नवनीत मिश्र

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में गणेशशंकर विद्यार्थी का नाम एक ऐसे जुझारू सेनानी के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी कलम से अंग्रेजी हुकूमत की नींव को चुनौती दी और समाज को जागरूक करने का कार्य किया। उनकी पुण्यतिथि हमें न केवल उनके संघर्ष और बलिदान की याद दिलाती है, बल्कि यह भी सोचने को प्रेरित करती है कि आज के दौर में उनके आदर्श कितने प्रासंगिक हैं।
पंडित गणेशशंकर विद्यार्थी जी ने पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम बनाया। ‘प्रताप’ समाचार पत्र के जरिए उन्होंने निर्भीक होकर अन्याय, शोषण और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई। वे सत्ता के दबाव से कभी नहीं डरे और हमेशा सच के साथ खड़े रहे। उनके लेखों में समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा साफ झलकती थी, जो उन्हें आम जनता का सच्चा प्रतिनिधि बनाती थी।
उनका व्यक्तित्व अत्यंत सरल, किंतु विचारों में दृढ़ता से भरा हुआ था। वे धर्मपरायण और ईश्वरभक्त थे, लेकिन उनका धर्म मानवता पर आधारित था। उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, भेदभाव और सांप्रदायिकता के खिलाफ लगातार संघर्ष किया और समाज में एकता व सौहार्द का संदेश दिया।
कानपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान उनका अद्वितीय साहस देखने को मिला। वे दंगों के बीच फंसे लोगों को बचाने के लिए आगे आए और इसी प्रयास में अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनका यह बलिदान आज भी मानवता और भाईचारे की सबसे बड़ी मिसाल के रूप में याद किया जाता है।
आज जब पत्रकारिता की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, तब पंडित गणेशशंकर विद्यार्थी जी का जीवन एक आदर्श की तरह सामने आता है। उनकी निर्भीकता, ईमानदारी और जनपक्षधरता आज भी पत्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
उनकी पुण्यतिथि पर जरूरत है कि हम केवल उन्हें याद ही न करें, बल्कि उनके विचारों और मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

Sonia Gandhi Health: अचानक बिगड़ी तबीयत, सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती—राहुल और प्रियंका पहुंचे

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा)। कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद Sonia Gandhi की मंगलवार (24 मार्च 2026) को अचानक तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें तुरंत Sir Ganga Ram Hospital में भर्ती कराया गया।

अस्पताल में चल रहा इलाज

अस्पताल में डॉक्टरों की टीम सोनिया गांधी की स्वास्थ्य जांच में जुटी है। फिलहाल उनकी स्थिति को लेकर अस्पताल की ओर से कोई आधिकारिक हेल्थ बुलेटिन जारी नहीं किया गया है।

परिवार भी पहुंचा अस्पताल

उनकी तबीयत बिगड़ने की खबर मिलते ही बेटे Rahul Gandhi और बेटी Priyanka Gandhi Vadra भी अस्पताल पहुंच गए हैं।

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पहले भी बिगड़ चुकी है तबीयत

इससे पहले जनवरी 2026 में भी सोनिया गांधी की तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें करीब 6 दिन तक इसी अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा था।

तब डॉक्टरों ने बताया था कि:

• ठंड और प्रदूषण के कारण सांस लेने में दिक्कत
• ब्रोंकियल अस्थमा की समस्या बढ़ना
जैसी वजहों से उनकी हालत प्रभावित हुई थी।

पहले भी हो चुकी हैं भर्ती

सोनिया गांधी को जून 2025 में भी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत के चलते अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस समय वह Shimla में थीं।

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Iran War Day 24: ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध के 24वें दिन वैश्विक हालात तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump जो पहले ईरान को कड़ी चेतावनी दे रहे थे, अब नरम रुख अपनाते दिख रहे हैं। उन्होंने 5 दिन तक ईरान के पावर प्लांट और ऊर्जा ठिकानों पर हमला न करने की बात कही, जिसे आंशिक युद्धविराम के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

ईरान का हमला, इजरायल में तबाही

दूसरी ओर ईरान लगातार आक्रामक बना हुआ है।
Tel Aviv पर हुए हमलों में क्लस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया, जिससे भारी तबाही मची और कई इलाकों में मलबा फैल गया।

क्यों बदला ट्रंप का रुख?

विशेषज्ञों के अनुसार ट्रंप के बदले रुख के पीछे कई कारण हैं:

• खाड़ी देशों (कतर, यूएई, बहरीन) की चेतावनी
• तेल की बढ़ती कीमतें
• वैश्विक दबाव और बाजार में अस्थिरता
• अमेरिका के भीतर बढ़ता विरोध

इन कारणों से अमेरिका अब सीधे टकराव के बजाय बातचीत का रास्ता तलाश रहा है।

मध्यस्थता की कोशिशें तेज

सूत्रों के मुताबिक Turkey, Pakistan और अन्य देश अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, ईरान ने सार्वजनिक रूप से किसी भी बातचीत से इनकार किया है और साफ किया है कि युद्ध उसकी शर्तों पर ही खत्म होगा।

क्या होगा ग्राउंड ऑपरेशन?

अमेरिका के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वह ईरान की जमीन पर सैनिक उतारेगा?

विशेषज्ञ मानते हैं कि:

• ईरान का भूगोल जटिल है
• जमीनी युद्ध बेहद कठिन होगा
• अमेरिकी सैनिकों के नुकसान का खतरा
• घरेलू और वैश्विक विरोध बढ़ सकता है
इसी कारण अमेरिका फिलहाल इस विकल्प से बचता नजर आ रहा है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा फैक्टर

Strait of Hormuz इस पूरे संकट का केंद्र बना हुआ है।
यह मार्ग बंद होने से:

• वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित
• अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल
• कई देशों की अर्थव्यवस्था पर असर
यही वजह है कि दुनिया के कई देश युद्ध खत्म कराने के लिए दबाव बना रहे हैं।

ट्रंप-नेतन्याहू रणनीति पर सवाल

इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu और ट्रंप की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक:

• ईरान में आंतरिक विद्रोह की उम्मीद गलत साबित हुई
• जनता सरकार के साथ खड़ी दिखी
• जंग लंबी और जटिल होती जा रही है

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धर्म परिवर्तन और एससी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: संवैधानिक संतुलन या सामाजिक विवाद?

सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना,ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिकार और आधुनिक सामाजिक संरचना के बीच संतुलन बनाने का प्रयास भी है

भारत में धर्म परिवर्तन, अनुसूचित जाति आरक्षण -24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला-संवैधानिक सिद्धांत, न्यायिक व्याख्या और सामाजिक- राजनीतिक प्रभाव का व्यापक विश्लेषण

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत जैसे बहु- धार्मिक,बहु- सांस्कृतिक और बहु-जातीय समाज में धर्म, जाति और सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र रहा है। 24 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया द्वारा सुनाया गया ताजा फैसला इसी जटिल विमर्श को एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ले आया है। इस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि हिंदू,सिख और बौद्ध धर्म को छोड़कर अन्य धर्म विशेषकर ईसाई और इस्लाम अपनाने वाले व्यक्तियों को अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा और उससे जुड़े आरक्षण लाभ प्राप्त नहीं होंगे। यह निर्णय केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान की मूल भावना,ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिकार और आधुनिक सामाजिक संरचना के बीच संतुलन बनाने का प्रयास भी है। मैं एडवोकेट किशनसनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि  इस निर्णय की जड़ें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और कंस्टीटूशन ( शेड्यूल्ड क़ास्ट्स ) आर्डर 1950 में निहित हैं। 1950 के इस आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन व्यक्तियों को मिलेगा जो हिंदू धर्म का पालन करते हैं। बाद में इसमें संशोधन कर सिख (1956) और बौद्ध (1990) धर्मों को भी शामिल किया गया, लेकिन ईसाई और मुस्लिम समुदायों को इस दायरे से बाहर रखा गया। अदालत ने अपने ताजा फैसले में इसी संवैधानिक ढांचे को पुनः पुष्ट करते हुए कहा कि धर्मांतरण के साथ ही व्यक्ति का एससी दर्जा तत्काल और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है।यह फैसला आंध्र प्रदेश से जुड़े एक मामले पर आधारित है, जिसमें चिंथाडा आनंद नामक व्यक्ति जो ईसाई पादरी थे,ने एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि उनके साथ जातिगत भेदभाव और अपमानजनक व्यवहार किया गया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए एफआईआर रद्द कर दी कि ईसाई धर्म अपनाने के बाद आनंद का अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो चुका है, इसलिए उन्हें इस कानून के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता। इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा, जिससे यह सिद्धांत और अधिक मजबूत हो गया कि धर्म परिवर्तन केवल आस्था का परिवर्तन नहीं, बल्कि कानूनी पहचान में भी बदलाव लाता है।यहां यह समझना आवश्यक है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है जिसमें किसी भी धर्म को मानना,उसका पालन करना और उसका प्रचार करना शामिल है।लेकिन यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष नहीं है; इसके साथ कुछ सामाजिक और कानूनी परिणाम भी जुड़े होते हैं।अदालत ने अपने फैसले में इसी संतुलन को रेखांकित करते हुए कहा कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक पिछड़ापन नहीं, बल्कि उस विशेष सामाजिक और धार्मिक ढांचे में झेली गई ऐतिहासिक प्रताड़ना है।चूंकि जाति व्यवस्था मुख्यतः हिंदू सामाजिक संरचना से जुड़ी मानी जाती है, इसलिए अन्य धर्मों में जाने पर उस विशेष प्रकार की सामाजिक पहचान स्वतः समाप्त हो जाती है। 

साथियों बात अगर हम ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक ढांचा इसको समझने की करें तो भारत में अनुसूचित जातियों की अवधारणा का मूल उद्देश्य उन समुदायों को विशेष संरक्षण देना था, जिन्होंने सदियों तक सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता का सामना किया। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश,1950 इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस आदेश के अनुसार, प्रारंभ में केवल हिंदू धर्म के भीतर आने वाले दलित समुदायों को ही अनुसूचित जाति का दर्जा दिया गया था। बाद में 1956 में सिख और 1990 में बौद्ध धर्म के अनुयायियों को भी इसमें शामिल किया गया।संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे किन समुदायों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करेंगे।वहीं अनुच्छेद 25प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता देता है। यही वह बिंदु है जहां अधिकारों का टकराव उत्पन्न होता है एक ओर धर्म बदलने की स्वतंत्रता,दूसरी ओर सामाजिक न्याय की जबरदस्त सटीक नीतियां। 

साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को अपने आप में लंबे समय से विवादों से घिरा हुआ है इसको समझने की करें तो, कई समाज शास्त्रियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि जातिगत भेदभाव केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना में गहराई तक व्याप्त है। उदाहरण के लिए,भारत में ईसाई और मुस्लिम समुदायों के भीतर भी दलित ईसाई और पसमांदा मुस्लिम जैसी पहचानें मौजूद हैं, जो यह दर्शाती हैं कि धर्म परिवर्तन के बावजूद सामाजिक भेदभाव पूरी तरह समाप्त नहीं होता। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या केवल धर्म के आधार पर आरक्षण से वंचित करना वास्तव में सामाजिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप है?इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू पुनः धर्मांतरण से जुड़ा है।अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म छोड़कर पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म अपनाता है, तो वह पुनः अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त कर सकता है—बशर्ते वह कुछ शर्तों को पूरा करता हो। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है सामुदायिक स्वीकृति। यानी, व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उसका मूल संबंध उसी जाति से है और उसका समुदाय उसे पुनः स्वीकार करता है। यह शर्त अपने आप में सामाजिक जटिलताओं को जन्म देती है, क्योंकि यह व्यक्तिगत पहचान को सामुदायिक मान्यता पर निर्भर बनाती है। 

साथियों बात अगर हम 24 मार्च 2026 का निर्णय: कानूनी स्पष्टता या सामाजिक विवाद? इसको समझने की करें तो सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया कि धर्म परिवर्तन के साथ ही एससी का दर्जा समाप्त हो जाएगा। अदालत ने कहा कि 1950 का आदेश पूरी तरह स्पष्ट है और इसमें जिन धर्मों का उल्लेख नहीं है, उनमें जाने पर व्यक्ति एससी की श्रेणी से बाहर हो जाता है।इसका अर्थ यह है कि यदि कोई दलित ईसाई या मुस्लिम बनता है, तो वह एससी आरक्षण और एससी /एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं उठा सकता।यह निर्णय कानूनी रूप से स्पष्टता प्रदान करता है,लेकिन सामाजिक दृष्टि से यह कई प्रश्न भी खड़े करता है। 

साथियों बात अगर हम  इस निर्णय के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को समझने की करें तो ये व्यापक हो सकते हैं। यदि भविष्य में नीति में बदलाव कर ईसाई और मुस्लिम दलितों को भी एससी आरक्षण में शामिल किया जाता है, तो इससे आरक्षण की वर्तमान संरचना पर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। सबसे पहले, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे मौजूदा लाभार्थियों के हिस्से में कमी आ सकती है।इसके अलावा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में भी बदलाव देखने को मिल सकता है, क्योंकि आरक्षित सीटों पर नए समुदायों की भागीदारी बढ़ेगी। यह परिवर्तन भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है।दूसरी ओर,आलोचकों का यह भी तर्क है कि यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण का लाभ जारी रखा जाता है, तो इससे धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहन मिल सकता है। हालांकि, इस तर्क का विरोध करने वाले कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति केवल आरक्षण के लिए धर्म नहीं बदलता; इसके पीछे सामाजिक सम्मान, भेदभाव से मुक्ति और बेहतर जीवन की तलाश जैसे गहरे कारण होते हैं। ऐसे में आरक्षण को धर्म से जोड़ना सामाजिक 

वास्तविकताओं की अनदेखी करना हो सकता है। 

साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फसलों को समझने की करें तो (1)सूसाई बनाम भारत संघ (1986):सुप्रीम कोर्ट ने दशकों पहले 1986 में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय का कोई व्यक्ति यदि ईसाई धर्म अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति के लिए बनी योजनाओं और लाभों के लिए पूरी तरह अयोग्य हो जाता है।सी. सेल्वाराणी मामला (2024): सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही अहम फैसले में कहा कि ईसाई धर्म अपनाने पर व्यक्ति अपनी मूल जाति खो देता है। अदालत ने कहा कि धर्मांतरण सच्ची आस्था से होना चाहिए। अगर धर्म परिवर्तन केवल आरक्षण का लाभ लेने के लिए किया गया है तो इसे अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह आरक्षण के सामाजिक उद्देश्य को खत्म करता है। अदालत ने दोहरी पहचान रखने को संविधान के साथ धोखा करार दिया था। (2) इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया फैसलाऐसा ही एक मामले में पिछले साल दिसंबर में फैसला आया था। जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया है, तो वह कानूनी रूप से एससी का दर्जा बरकरार नहीं रख सकता। अदालत ने 1950 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि जो हिंदू, सिख या बौद्ध नहीं है, वह एससी नहीं हो सकता। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को सख्त निर्देश दिए कि पूरे राज्य में ऐसे मामलों की जांच की जाए, जहां अल्पसंख्यक धर्मों में धर्मांतरित लोग अभी भी गैरकानूनी रूप से एससी वर्ग को मिलने वाले लाभों का दावा कर रहे हैं।(3)मद्रास उच्च न्यायालय में भी आए केससी. सेल्वाराणी मामला (2023): सुप्रीम कोर्ट में जाने से पहले सी. सेल्वाराणी केस मद्रास हाईकोर्ट पहुंचा था। यहां एक ऐसी महिला को एससी प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया गया था, जो जन्म से ईसाई थी और नियमित रूप से चर्च जाती थी, लेकिन केवल सरकारी नौकरी में आरक्षण पाने के लिए खुद को हिंदू और वल्लुवन जाति का बता रही थी।अकबर अली मामला: मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि इस्लाम या ईसाई धर्म में धर्मांतरण के बाद व्यक्ति अपनी जाति को आगे नहीं ले जा सकता। अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब कोई हिंदू इस्लाम अपना लेता है, तो वह केवल एक मुसलमान बन जाता है और मुस्लिम समाज में उसकी जगह इस बात से तय नहीं होती कि धर्मांतरण से पहले उसकी जाति क्या थी।(4) कर्नाटक हाईकोर्ट बोला था- ईसाई धर्म में जाति व्यवस्था नहीं कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी कहा था कि ईसाइयों को एससी एक्ट के तहत संरक्षण देना गलत है। अदालत का मानना था कि यह कानून विशेष रूप से जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए बना है, जबकि ईसाई धर्मशास्त्र में जाति-व्यवस्था जैसी कोई प्रथा ही नहीं है।

साथियों बात कर हम  अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से इस मुद्दे को समझने की करें तो भारत का यह मॉडल अद्वितीय है। अधिकांश देशों में सकारात्मक भेदभाव जाति के बजाय नस्ल, जातीयता या आर्थिक स्थिति के आधार पर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका में अश्वेत और अल्पसंख्यक समुदायों को शिक्षा और रोजगार में विशेष अवसर दिए जाते हैं, लेकिन यह धर्म से नहीं जुड़ा होता। भारत में आरक्षण का आधार ऐतिहासिक जातिगत उत्पीड़न है, जो इसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में एक अलग पहचान देता है। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि संतुलन की तलाश,धर्म परिवर्तन और आरक्षण का यह मुद्दा भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के सामने एक बड़ी चुनौती है। एक ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता है, तो दूसरी ओर सामाजिक न्याय की आवश्यकता। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी रूप से स्पष्टता प्रदान करता है, लेकिन यह बहस को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे और गहरा करता है।आगे का रास्ता यही है कि इस मुद्दे को संवेदनशीलता और संतुलन के साथ देखा जाए। कानून में बदलाव, सामाजिक जागरूकता और नीति सुधार के माध्यम से ही एक ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जो न केवल संवैधानिक रूप से सही हो, बल्कि सामाजिक रूप से भी न्यायसंगत हो।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

टीबी के खिलाफ डीडीयू की मुहिम: जागरूकता संग पोषण का संबल

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग द्वारा विश्व क्षय रोग दिवस के अवसर पर एक व्यापक जागरूकता एवं सेवा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह दिवस वर्ष 1882 में डॉ. रॉबर्ट कोच द्वारा क्षय रोग के जीवाणु की खोज की स्मृति में मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य टीबी के प्रति जागरूकता बढ़ाना और इसके उन्मूलन के लिए वैश्विक प्रयासों को गति देना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2026 की थीम “यस! वी कैन एंड टीबी: कमिट, इन्वेस्ट, डिलीवर” के तहत इस वर्ष यह संदेश दिया गया कि ठोस संकल्प, पर्याप्त निवेश और प्रभावी क्रियान्वयन से टीबी का उन्मूलन संभव है। यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 75वें जन्मवर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित श्रृंखला के अंतर्गत सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम के दौरान टीबी मरीजों को प्रोटीन युक्त पोषण पोटली वितरित की गई, जिसमें दालें, चना, सोया उत्पाद एवं अन्य पौष्टिक खाद्य सामग्री शामिल रही, ताकि रोगियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया जा सके और उनके उपचार को प्रभावी बनाया जा सके।
कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने कहा कि क्षय रोग उन्मूलन केवल स्वास्थ्य विभाग का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। उन्होंने कहा कि संतुलित आहार और जागरूकता टीबी नियंत्रण के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जो मरीजों के शीघ्र स्वस्थ होने में सहायक होते हैं।
मेयर डॉ. मंगलेश श्रीवास्तव ने स्वच्छता, पोषण और सामुदायिक भागीदारी को टीबी उन्मूलन का आधार बताया। उन्होंने कहा कि पौष्टिक आहार से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, जिससे दवाइयों का असर भी बेहतर होता है। साथ ही युवाओं से समाज में जागरूकता फैलाने की अपील की।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेश झा ने कहा कि “टीबी पूर्णतः इलाज योग्य रोग है, बशर्ते मरीज नियमित रूप से दवा लें और उपचार अधूरा न छोड़ें।” उन्होंने टीबी मुक्त भारत अभियान के लक्ष्य को प्राप्त करने में जनसहभागिता की अहम भूमिका पर बल दिया। इस अवसर पर उनकी टीम भी उपस्थित रही।
कार्यक्रम संयोजक प्रो. दिव्या रानी सिंह ने बताया कि इस पहल का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना ही नहीं, बल्कि रोगियों को पोषण सहयोग देकर उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ में सहायता करना भी है। उन्होंने विश्वविद्यालय की सामाजिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
प्रो. एस.एस. दास (सेवानिवृत्त) ने शिक्षा और स्वास्थ्य के समन्वय को आवश्यक बताते हुए विश्वविद्यालयों की भूमिका को सराहा। संतोष अग्रवाल (प्रबंध निदेशक, गैलेंट ग्रुप) ने निजी क्षेत्र की सामाजिक जिम्मेदारी पर बल दिया, जबकि अचिंत्य लाहिड़ी ने युवाओं से जागरूकता अभियान में अग्रणी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर डीएसडब्ल्यू प्रो. अनुभूति, फार्मेसी विभाग के निदेशक डॉ. अमित निगम, डॉ. प्रीति गुप्ता, डॉ. अनुपमा कौशिक, डॉ. नीता सिंह, डॉ. गार्गी एवं डॉ. गरिमा सहित अनेक शिक्षक, विशेषज्ञ, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों को टीबी के लक्षण, जांच, उपचार एवं बचाव के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई और यह संदेश दिया गया कि समय पर जांच, नियमित दवा और उचित पोषण से इस रोग को पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है। कार्यक्रम का सफल संचालन गृह विज्ञान विभाग द्वारा किया गया, जिसमें प्राध्यापिकाओं, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का सराहनीय योगदान रहा।

डॉ. तूलिका मिश्रा की एआई तकनीक को यूके से पेटेंट, पौधों से औषधीय तत्व पहचानने में मिलेगी नई दिशा

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तूलिका मिश्रा ने एक ऐसी अत्याधुनिक एआई तकनीक विकसित की है, जो पौधों को स्कैन कर उनमें मौजूद औषधीय तत्वों की पहचान कर सकती है। इस अभिनव रिसर्च और डिजाइन को यूनाइटेड किंगडम से पेटेंट प्राप्त हुआ है, जिससे दवा खोजने की प्रक्रिया अधिक तेज, सटीक और किफायती बनने की उम्मीद है।
इस शोध कार्य में डॉ. तूलिका मिश्रा के साथ देश के विभिन्न संस्थानों के वैज्ञानिकों ने लगभग दो वर्षों तक गहन अध्ययन किया। इस दौरान करीब 50 औषधीय पौधों की स्क्रीनिंग कर उनके जैव-सक्रिय यौगिकों का विश्लेषण किया गया। सकारात्मक और प्रभावी परिणाम मिलने के बाद इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन किया गया, जिसे अब स्वीकृति मिल गई है।
यह रिसर्च औषधीय पौधों में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड्स की एआई आधारित त्वरित पहचान पर केंद्रित है। विकसित तकनीक एक उन्नत प्रणाली के रूप में कार्य करती है, जो पौधों के विभिन्न यौगिकों की तेजी से स्क्रीनिंग कर उनकी संभावित औषधीय उपयोगिता का आकलन करती है। यह पारंपरिक वनस्पति ज्ञान और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो भविष्य में औषधीय अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं में नई दिशा प्रदान करेगा।
डॉ. तूलिका मिश्रा के अनुसार यह एक डिजाइन पेटेंट है, जिसमें एआई तकनीक के माध्यम से पौधों में मौजूद बायो-ऑब्जेक्टिव केमिकल्स जैसे अल्कालॉयड, स्टेरॉयड, फिनॉल और टैनिन्स की पहचान संभव है।
गौरतलब है कि यह डॉ. तूलिका मिश्रा का पांचवां पेटेंट है, जिसमें एक कॉपीराइट भी शामिल है। इस शोध में डॉ. सीमा मंडल, डॉ. परशावेनी बालाराजू, राज्यलक्ष्मी मिश्रा, डॉ. सीमा नारखेड़े, डॉ. थोडूर मनोहरन विजयलक्ष्मी और डॉ. रुचिका श्रीवास्तव ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
इस उपलब्धि पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. पूनम टंडन ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सफलता न केवल संस्थान बल्कि देश के वैज्ञानिक समुदाय के लिए भी गर्व का विषय है। एआई आधारित यह नवाचार भविष्य में अनुसंधान के नए आयाम स्थापित करेगा।

फर्जी आईएएस बनकर शादी रचाने वाला प्रीतम निषाद गिरफ्तार

गोरखपुर पुलिस ने जालौन से दबोचा, कई शादियों और ठगी के आरोप

गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)l गोरखपुर की एक युवती से खुद को फर्जी आईएएस अधिकारी बताकर शादी रचाने वाले आरोपी प्रीतम निषाद को कैंट पुलिस ने मंगलवार को गिरफ्तार कर लिया। युवती के पिता की तहरीर पर मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस टीम आरोपी की तलाश में इटावा गई थी। इसी दौरान उसकी लोकेशन बुंदेलखंड के जालौन में मिली, जहां कालपी रेलवे स्टेशन के पास से उसे दबोच लिया गया।
पुलिस लाइन स्थित व्हाइट हाउस में आयोजित प्रेस वार्ता में एसपी सिटी निमिष पाटील ने बताया कि आरोपी बेहद शातिर किस्म का व्यक्ति है, जो खुद को मणिपुर कैडर का आईएएस अधिकारी बताकर लोगों को गुमराह करता था। उसके पास से मोबाइल फोन, एक टैबलेट और आधार कार्ड बरामद किया गया है। शुरुआती जांच में दो शादियों की पुष्टि हुई है, जबकि अन्य मामलों की जांच जारी है।
पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह केवल हाईस्कूल पास है और कभी आईएएस की तैयारी नहीं की। फर्जी पहचान के सहारे वह लोगों पर रौब जमाता था और शादी करता था, लेकिन गोरखपुर में उसकी सच्चाई उजागर हो गई।
परिजनों ने खोली पोल, 25 शादियों का दावा
आरोपी के जीजा भानु निषाद ने बताया कि प्रीतम ने केवल हाईस्कूल तक पढ़ाई की है और उसने कभी किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं की। वह फर्जी तरीके से लोगों को प्रभावित कर शादी करता रहा। भानु के घर को अपना बताकर उसने गोरखपुर की युवती से 11 मार्च को शादी की थी। शादी के अगले दिन जब वह पत्नी को लेकर इटावा पहुंचा तो लड़की पक्ष के परिजन भी वहां पहुंच गए और सच्चाई सामने आने पर हंगामा हो गया। इसके बाद मारपीट के बीच लड़की को वापस ले जाया गया।
परिजनों के अनुसार, प्रीतम की पहली शादी औरैया जिले के दौलतपुर गांव में हुई थी, जिसका अभी तक तलाक नहीं हुआ है। इसके बावजूद उसने दूसरी शादी कर ली। चचेरी बहन रश्मि ने बताया कि शादी के दौरान किसी को शक नहीं हुआ, लेकिन बाद में विवाद खड़ा हो गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, प्रीतम लंबे समय से अपनी पहचान छिपाकर कभी खुद को अधिकारी तो कभी बड़ी नौकरी में होने का दावा करता था। वह फर्जी आईएएस बनकर अब तक 25 शादियां करने का आरोप झेल रहा है।
परिवार का दर्द, सख्त कार्रवाई की मांग
पीड़ित युवती के पिता, जो शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं, ने कहा कि आरोपी ने उनकी बेटी की जिंदगी बर्बाद कर दी। उन्होंने कहा कि “एक नहीं, 25 शादियां कर चुका है। फर्जी आईएएस बनकर पैसे ऐंठे और हमारी बेटी को धोखा दिया। हम उसे किसी भी हालत में सजा दिलाकर रहेंगे।”
कैंट थाने में आरोपी प्रीतम निषाद, उसकी बहन, जीजा और अन्य सहयोगियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस का कहना है कि मामले की गहन जांच जारी है और यदि अन्य पीड़ित सामने आते हैं तो उनके आधार पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।