Monday, June 29, 2026
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कंपोजिट विद्यालय कंचनपुर में चोरी की वारदात, रसोई घर का ताला टूटा—सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। श्यामदेउरवा थाना क्षेत्र के कंपोजिट विद्यालय कंचनपुर में बीती रात अज्ञात चोरों ने रसोई घर का ताला तोड़कर चोरी की वारदात को अंजाम दिया। सुबह विद्यालय स्टाफ ने जब ताला टूटा देखा, तो अफरा-तफरी मच गई। चोर रसोई में रखा गैस सिलिंडर, भगौना, कड़ाही और अन्य आवश्यक बर्तन उठा ले गए।

प्रधानाध्यापक अजीत कुमार ने बताया कि यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले 11 मार्च 2025 को भी इसी विद्यालय में चोरी हो चुकी है, जिसकी लिखित शिकायत थाने में की गई थी। लगातार हो रही चोरी की घटनाओं ने विद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मध्याह्न भोजन योजना से जुड़े बर्तनों और उपकरणों की चोरी से विद्यालय संचालन पर भी असर पड़ रहा है।

सूचना मिलते ही श्यामदेउरवा थाना प्रभारी अभिषेक सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। उन्होंने बताया कि अज्ञात चोरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर दी गई है और जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस घटनास्थल का निरीक्षण कर आस-पास लगे सीसीटीवी फुटेज, संदिग्ध गतिविधियों और संभावित आरोपितों के सुराग जुटाने में लगी है।

घटना के बाद ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त है, जबकि विद्यालय प्रशासन ने सुरक्षा बढ़ाने की मांग की है। पुलिस का दावा है कि जल्द ही आरोपितों की पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा।

प्रधानमंत्री आवास योजना में बड़ा खुलासा: हरखोड़ा ग्राम प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। ग्राम पंचायत हरखोड़ा में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में गंभीर अनियमितताओं की शिकायत पर जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा ने कठोर कार्रवाई करते हुए ग्राम प्रधान को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। नोटिस में 15 दिनों के भीतर जिला पंचायतराज अधिकारी के माध्यम से विस्तृत स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया गया है।

गांव के निवासी मेराजुद्दीन सहित अन्य ग्रामीणों ने पीएम आवास योजना में अपात्र व्यक्तियों को लाभ दिए जाने की शिकायत प्रशासन को भेजी थी। जिलाधिकारी ने शिकायत को संज्ञान में लेते हुए जिला कृषि अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया। जांच रिपोर्ट में चौकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच आख्या के मुताबिक चार लाभार्थी—सुमन वर्मा, अमरावती, त्रिभुवन और रमनी—योजना के मानकों के अनुसार पात्र नहीं थे, फिर भी इन्हें तीनों किस्तों की धनराशि जारी की जा चुकी है।

यह बात सामने आई कि इन नामों का चयन ग्राम प्रधान अनीता की अध्यक्षता में हुई ग्राम पंचायत बैठक में किया गया था। इसके बाद पंचायत सचिव ने लाभार्थियों का भौतिक सत्यापन, रजिस्ट्रेशन एवं जियो टैगिंग कराते हुए प्रथम किश्त जारी करने की प्रक्रिया पूरी की।
जिलाधिकारी ने इस पूरी प्रक्रिया को गंभीर लापरवाही बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी महत्वपूर्ण और पारदर्शी योजना में अनियमितता किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं है।

ग्राम प्रधान से पूछा गया है कि आखिर किस आधार पर अपात्र व्यक्तियों को लाभ दे दिया गया और पात्र लोगों की उपेक्षा क्यों हुई। प्रशासनिक सख्ती के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। ग्रामीणों ने कहा कि यह जांच और नोटिस सही दिशा में उठाया गया कदम है, जिससे योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी और पात्र लोगों को उनका हक मिलेगा उन्होंने स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में संतोषजनक जवाब न मिलने पर आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

बारात के बहाने निकला युवक सुबह मिला सड़क के किनारे मृत

टूटी बाइक, संदिग्ध हालात ने बढ़ाई रहस्य की घनघोर परतें

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। पनियरा थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत तेंदुअहियां के बलूअहियां टोले के पास सोमवार सुबह एक युवक का शव मिलने से पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया। मृतक की पहचान अनंतपुर मोथही निवासी जिगर सिंह लगभग 35 वर्ष के रूप में हुई। सुबह-सुबह सड़क के किनारे शव पड़े होने की सूचना मिलते ही स्थानीय लोग दहशत में आ गए और तुरंत पुलिस को सूचना दी। घटनास्थल से मृतक की बाइक भी बरामद हुई, जिसका बायां शीशा टूटा हुआ मिला।

बाइक की यह स्थिति घटना को दुर्घटना मानने में बाधा बन रही है और संदेह गहरा रहा है कि मामला कुछ और भी हो सकता है। मौके का मुआयना करने पहुंचे लोगों के मुताबिक परिस्थितियां सामान्य सड़क हादसे जैसी नहीं लग रहीं। परिजनों के अनुसार,जिगर सिंह बीती रात बारात में जाने की बात कहकर घर से निकले थे, पर सुबह उनके निधन की सूचना घर पहुंचते ही कोहराम मच गया।

जिगर अपने माता-पिता के इकलौते बेटे थे। उनके परिवार में पत्नी स्नेहलता, मां बिंदु देवी, पांच वर्षीय बेटी जैक्लीन और चार वर्षीय बेटा दिग्विजय शामिल हैं। अचानक हुए इस हादसे ने पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया है। पत्नी और मां का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है।

सूचना मिलते ही पनियरा थानाध्यक्ष राघवेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पीएम के लिए भेज दिया। थानाध्यक्ष ने बताया कि पीएम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के वास्तविक कारणों का पता चल सकेगा।

फिलहाल पुलिस यह जांच कर रही है कि यह सड़क हादसा है या किसी अन्य संदिग्ध परिस्थिति में हुई मौत। घटना के बाद इलाके में दहशत और तरह-तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं। पुलिस हर एंगल से मामले की जांच में जुटी है।

निचलौल पुलिस की बड़ी कार्रवाई: वांछित अपराधी अबरार हुसैन गिरफ्तार, विशेष अभियान ‘वज्र’ में मिली सफलता

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अपराध पर कड़ा शिकंजा कसने के अभियान में निचलौल पुलिस ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में चल रहे विशेष अभियान ‘वज्र’ के तहत वांछित अपराधी अबरार हुसैन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। इस कार्रवाई से क्षेत्र में पुलिस की सक्रियता और सख्ती की चर्चा तेज है।

अबरार हुसैन के खिलाफ मु.अ.सं. 332/2025 में धारा 118(2) व 351(3) बीएनएस के अंतर्गत मुकदमा दर्ज था। आरोपी की तलाश में पुलिस कई दिनों से दबिश दे रही थी। सोमवार को पुलिस ने उसे टिकुलहिया नहर पुल, थाना निचलौल क्षेत्र से धर दबोचा। गिरफ्तारी के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए उसे न्यायालय पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया।

इस कार्रवाई में थानाध्यक्ष निचलौल के नेतृत्व में गठित टीम—
उपनिरीक्षक नागेन्द्र मणि, उपनिरीक्षक संजय यादव, कांस्टेबल धर्मवीर चौहान, कांस्टेबल सत्येन्द्र कुमार सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम की सतर्कता और निरंतर प्रयासों के चलते पुलिस को यह बड़ी सफलता मिली।

पुलिस प्रशासन का कहना है कि विशेष अभियान ‘वज्र’ के तहत अपराधियों के खिलाफ इसी तरह की सख्त कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी, ताकि क्षेत्र में कानून-व्यवस्था को और मजबूत किया जा सके। आरोपी की गिरफ्तारी से स्थानीय लोगों ने राहत की भावनाएँ व्यक्त की हैं।

स्वर्ण व्यवसायी से मारपीट मामले ने पकड़ा तूल, व्यापार मंडल उग्र—डीएम को सौंपा ज्ञापन, जेई और ठेकेदार पर कड़ी कार्रवाई की मांग

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। स्वर्ण व्यवसायी के साथ हुई मारपीट का मामला अब व्यापार जगत में उबाल ला रहा है। 27 नवंबर को गणपत ज्वेलर्स के मालिक मनोज वर्मा के बेटे सागर वर्मा के साथ मारपीट की गई थी, जिसमें उनकी उंगली भी टूट गई। घटना के विरोध में सोमवार को महराजगंज व्यापार मंडल इकाई के जिलाध्यक्ष पशुपतिनाथ गुप्त के नेतृत्व में व्यापारियों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए दोषियों पर कठोर विभागीय और कानूनी कार्रवाई की मांग की।

जिलाध्यक्ष पशुपतिनाथ गुप्त ने आरोप लगाया कि विद्युत विभाग के जूनियर इंजीनियर (जेई) आलोक कुमार और ठेकेदार बिना पूर्व सूचना व्यापारी के प्रतिष्ठान की बिजली काटने पहुंचे थे। इसी दौरान कथित रूप से अभद्रता और मारपीट की घटना हुई। आरोप है कि भीड़ के साथ मिलकर व्यापारी परिवार को डराने-धमकाने का प्रयास भी किया गया। व्यापार मंडल ने यह भी आपत्ति जताई कि घटना के बावजूद उल्टा व्यापारी परिवार पर ही मुकदमा दर्ज किया जाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि जेई आलोक कुमार लंबे समय से जिले में तैनात हैं और उन पर भ्रष्टाचार के माध्यम से संपत्ति अर्जित करने तथा व्यापारियों और स्थानीय नागरिकों को डराने-धमकाने जैसे गंभीर आरोप पहले भी लगते रहे हैं। व्यापारियों ने मांग की कि जेई और उनके साथ आए 10–15 लोगों के खिलाफ निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई की जाए, जिससे व्यापारी समुदाय का विश्वास बहाल हो सके।

इस दौरान राजेश स्वर्णकार, अवधेश, बिंदु वर्मा, दिलीप कुमार वर्मा, मनोज कुमार वर्मा, आशीष वर्मा, राजेश वर्मा, प्रदीप, श्याम वर्मा सहित बड़ी संख्या में व्यापारी मौजूद रहे।

व्यापार मंडल ने चेतावनी दी कि यदि समय रहते पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिला तो वे आंदोलन की रणनीति तैयार करेंगे।

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ऑनलाइन हाजिरी के विरोध में ग्राम पंचायत सचिवों का सांकेतिक प्रदर्शन, 5 दिनों में निर्णय वापस न हुआ तो बड़ा आंदोलन

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ग्राम पंचायत सचिवों की ऑनलाइन हाजिरी अनिवार्य किए जाने के निर्णय का विरोध अब तेज होने लगा है। सोमवार को विकासखंड घुघली परिसर में तैनात ग्राम पंचायत सचिवों ने काली पट्टी बांधकर शांतिपूर्ण सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। सचिवों ने स्पष्ट कहा कि वे किसी भी कार्य में बाधा नहीं डालेंगे, लेकिन अपनी समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना आवश्यक है।

सचिवों का कहना है कि ग्राम पंचायत स्तर पर पहले से ही भारी कार्यभार है। इसके अतिरिक्त कई अन्य विभागों के कार्य भी नियमित रूप से कराए जाते हैं, जिससे काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसे में ऑनलाइन हाजिरी अनिवार्य करना व्यावहारिक नहीं है और यह सचिवों पर अनावश्यक बोझ डालने जैसा है।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने 5 दिनों के भीतर अपने निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया, तो वे विरोध को आगे बढ़ाते हुए बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। सचिवों ने कहा कि आंदोलन से उत्पन्न होने वाली किसी भी स्थिति की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी, क्योंकि वे लंबे समय से समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं।

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सचिवों ने ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क कनेक्टिविटी की समस्या को भी बड़ी बाधा बताया। उनका कहना है कि तकनीकी कमियों का आकलन किए बिना ऐसे फैसले लागू करना जमीनी हकीकत से परे है और इससे कार्य प्रभावित हो सकता है।

प्रदर्शन शांतिपूर्वक संपन्न हुआ, जिसमें सचिवों ने एकजुट होकर अपनी मांगों को शासन तक पहुंचाने का संकल्प लिया।

इस दौरान मोहम्मद खालिद, रामकिशोर वर्मा, विपिन कुमार, ऋषिकेश यादव, अवनीश वर्मा, नागेंद्र पांडेय, अमरेंद्र प्रताप सिंह सहित कई सचिव मौजूद रहे।

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नागालैंड स्थापना दिवस — इतिहास, पहचान और विकास की गाथा”

विकास, नेताओं और नए भारत की दिशा

Nagaland भारत का 16वाँ राज्य है और हर साल 1 दिसंबर को उसका स्थापना दिवस यानी राज्य-दिवस मनाया जाता है। 1963 में इसी दिन असम के कुछ हिस्सों को अलग करके नागालैंड का गठन हुआ था, जिसे आदिवासी पहचान, सांस्कृतिक स्वायत्तता और लोकतांत्रिक संरचना देने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय माना गया।
स्थापना का इतिहास और महत्व
नागालैंड के गठन के समय राज्य को विशेष स्वायत्तता दी गई थी — Article 371(A) के तहत — ताकि राज्य की जनजातीय संस्कृति, रीति-रिवाज और स्वशासन की गरिमा बनी रहे।

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राज्य बनने के बाद नागालैंड ने एक नई शुरुआत की — विविध जनजातियों में एकता, सांस्कृतिक समरसता, सामाजिक-आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक शासन की नींव रखी गई। इस स्थापना दिवस पर न सिर्फ इतिहास याद किया जाता है, बल्कि विकास, शांति और मेल-जोल को भी पुनः संकल्पित किया जाता है।
🧑‍💼 मुख्यमंत्री — नाम, दल और प्रदेश के विकास में योगदान
नीचे कुछ प्रमुख मुख्यमंत्रियों और उनके योगदान पर प्रकाश डाल रहे हैं।
P. Shilu Ao 01 Dec 1963 – 14 Aug 1966 नागालैंड के पहले मुख्यमंत्री — नए राज्य के लिए लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की नींव रखी।
Thepfülo‑u Nakhro 1966–1969 प्रशासनिक संस्था को मजबूत किया, राजकीय ढांचे को संस्थागत बनाया, सड़कों व आधारभूत सुविधाओं की दिशा में शुरुआती विकास कार्य।
Vamüzo Phesao 1990–1992 शासन-प्रशासन में सुधार, अवसंरचना विकास — सड़कों, आवास, सार्वजनिक सुविधाओं पर ध्यान, गरीब व पिछड़ वर्गों की कल्याण योजनाएँ बढ़ाईं।
Neiphiu Rio कई कार्यकाल (2003–08, 2008–13, 2013–14, 2018– present) — दल: Nationalist Democratic Progressive Party (NDPP) + गठबंधन सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री, स्थिरता और सतत विकास की दिशा में काम — सामूहिक विकास, शांति प्रयास, नए जिलों का गठन, संसाधनों का पुनर्वितरण, समाज-कल्याण व विकास-कार्य में जोर।
अनेकों मुख्यमंत्री रहे, जिनमें से कई ने राज्य के राजनीतिक-सामाजिक आधार को मजबूत किया।
📊 राज्य के विकास पहलू और सांस्कृतिक पहचान
नागालैंड में अवसंरचनात्मक विकास: सड़कों, समृद्ध प्रशासनिक संरचनाओं, नागरिक सुविधाओं पर काम हुआ — जिससे पहले असम के हिस्से रहे क्षेत्र को एक अलग पहचान मिली।
सांस्कृतिक समृद्धि: आदिवासी संस्कृति, परंपराएँ, रीति-रिवाज सुरक्षित रहे। राज्य में अपने त्योहार, विधि-व्यवहार और जनजातीय परिचय ने नागा पहचान को संरक्षित रखा।
सामाजिक समरसता: विभिन्न जनजातियों के बीच शांति, मेल-जोल व सहअस्तित्व को बढ़ावा — जिससे सुशासन, सहिष्णुता और विकास संभव हुआ।
शांति एवं स्थिरता की दिशा: राजनीतिक स्थिरता, कल्याण योजनाओं, पंचायत-प्रशासन, स्थानीय विकास जैसी पहलों ने राज्य को विकास की ओर अग्रसर किया।
🎯 1-दिसंबर: आज के सन्दर्भ में
इस वर्ष 62वाँ स्थापना दिवस मनाया गया।
वर्तमान मुख्यमंत्री ने लोगों को “शांति के लिए विकास, विकास के लिए शांति” की दिशा में साथ मिलकर आगे बढ़ने का आह्वान किया है।
साथ ही, राज्य के संसाधनों, नई पहलों और विकास योजनाओं को लेकर आशा व्यक्त की गई है, ताकि नागालैंड आगे समृद्धि, सौहार्द और समावेशिता के साथ उभरे।
नागालैंड का स्थापना दिवस सिर्फ एक दिन की याद नहीं — यह उस संघर्ष, उस उम्मीद और उस गठन की याद है, जिसने कई जनजातियों, संस्कृतियों और पहचान को जोड़कर एक नया राज्य बनाया। आज जब हम देखा करें कि कितनी प्रगति हुई है — प्रशासन, विकास, समरसता, सांस्कृतिक संरक्षण — तो यह स्पष्ट है कि उन पहले नेताओं ने जिस नींव को रखा था, वो अब फल — फूल रही है।
इस स्थापना-दिवस पर — हमें राज्य के वर्तमान विकास, सामूहिक शांति और भविष्य की दिशा को नए जोश के साथ आगे बढ़ाना चाहिए।

विश्व एड्स दिवस पर संकल्प: डर नहीं, जानकारी ही असली सुरक्षा

जागरूकता, बचाव और जिम्मेदारी का वैश्विक संदेश

हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि एक वैश्विक अपील है—एड्स जैसी जानलेवा बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाने, इससे पीड़ित लोगों के लिए सहानुभूति और सहयोग का भाव जगाने और समाज में गलत धारणाओं को खत्म करने का दिन। विश्व एड्स दिवस की शुरुआत 1988 में हुई थी और तब से यह दिन एचआईवी/एड्स जागरूकता की सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय पहल बन चुका है।
आज जब मेडिकल साइंस ने बड़ी प्रगति की है, तब भी विश्व एड्स दिवस प्रासंगिक बना हुआ है, क्योंकि एड्स अब भी लाखों लोगों को प्रभावित कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, एचआईवी संक्रमण का खतरा आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन समय पर इलाज और सही जानकारी से इसके प्रसार को रोका जा सकता है।
क्या है एड्स और एचआईवी?
अक्सर लोग एचआईवी और एड्स को एक जैसा समझ लेते हैं, जबकि दोनों में फर्क है।
एचआईवी (HIV – Human Immunodeficiency Virus) एक वायरस है जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (इम्यून सिस्टम) को कमजोर करता है।
एड्स (AIDS – Acquired Immunodeficiency Syndrome) एचआईवी संक्रमण की सबसे गंभीर अवस्था है, जब शरीर की प्रतिरक्षा शक्ति अत्यधिक कमजोर हो जाती है और व्यक्ति कई बीमारियों की चपेट में आ जाता है।
विश्व एड्स दिवस का मुख्य उद्देश्य इसी भ्रम को दूर करना और लोगों को सही जानकारी देना है।

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एड्स कैसे फैलता है?
विश्व एड्स दिवस पर जानना जरूरी है कि एड्स किसी को छूने, साथ बैठने, हाथ मिलाने, एक प्लेट में भोजन करने या साथ काम करने से नहीं फैलता। यह केवल कुछ विशेष तरीकों से फैलता है:

  1. असुरक्षित यौन संबंध
  2. संक्रमित खून का चढ़ना
  3. एक ही सुई का बार-बार प्रयोग
  4. संक्रमित मां से बच्चे को (गर्भावस्था या स्तनपान के दौरान)
    यही वजह है कि विश्व एड्स दिवस पर सुरक्षित व्यवहार और नियमित जांच पर विशेष जोर दिया जाता है।
    बचाव के प्रभावी उपाय
    विश्व एड्स दिवस का सबसे महत्वपूर्ण
    संदेश है – “रोकथाम संभव है”। अगर लोग जागरूक हो जाएं, तो एड्स से बचाव पूरी तरह संभव है।
    हमेशा सुरक्षित यौन संबंध (Condom का प्रयोग)
    सुई या सिरिंज कभी साझा न करें
    खून चढ़वाने से पहले उसकी जांच सुनिश्चित करें
    एचआईवी टेस्ट नियमित रूप से करवाएं, खासकर यदि जोखिम की आशंका हो
    गर्भवती महिलाओं की समय पर एचआईवी जांच जरूरी
    विश्व एड्स दिवस पर सरकारें और सामाजिक संस्थाएं मुफ्त जांच शिविर, जागरूकता रैली और स्वास्थ्य कार्यक्रम आयोजित करती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जानकारी प्राप्त कर सकें।
    इलाज और आशा की किरण
    पहले एड्स को लाइलाज बीमारी माना जाता था। लेकिन अब मेडिकल साइंस ने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) के जरिए एचआईवी संक्रमित व्यक्ति एक सामान्य जीवन जी सकता है। समय पर इलाज शुरू कर दिया जाए तो मरीज की उम्र और जीवनस्तर सामान्य व्यक्ति जैसा हो सकता है।
    विश्व एड्स दिवस लोगों को यही विश्वास दिलाता है कि एचआईवी का मतलब जीवन का अंत नहीं है। सही इलाज, सपोर्ट और नियमित दवाओं से संक्रमित व्यक्ति स्वस्थ और सक्रिय रह सकता है।
    समाज की भूमिका
    विश्व एड्स दिवस सिर्फ डॉक्टर्स या सरकार का अभियान नहीं है, यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी भी है। आज भी एचआईवी पीड़ित लोगों के साथ भेदभाव होती है, उन्हें हीन भावना से देखा जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है प्रेम, सम्मान और सहयोग की।
    हमें यह समझना होगा कि एड्स कोई सामाजिक कलंक नहीं, बल्कि एक बीमारी है, जैसे अन्य बीमारियां होती हैं। विश्व एड्स दिवस इसी सोच को बदलने का प्रयास करता है।
    भारत में एड्स की स्थिति
    भारत सरकार ने एड्स के खिलाफ मजबूत राष्ट्रीय नीति बनाई है। “नाको” (NACO – National AIDS Control Organization) के माध्यम से देशभर में जागरूकता, मुफ्त जांच और उपचार केंद्र स्थापित किए गए हैं। विश्व एड्स दिवस के अवसर पर स्कूलों, कॉलेजों और गांव-शहरों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
    लक्ष्य सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि 2030 तक एड्स को खत्म करना है। इसके लिए जनभागीदारी सबसे जरूरी हथियार है।
    नई पीढ़ी के लिए संदेश
    आज की युवा पीढ़ी डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया से जुड़ी है। विश्व एड्स दिवस उन्हें जिम्मेदारी, संयम और जागरूकता का संदेश देता है। सही जानकारी और सुरक्षित व्यवहार ही स्वस्थ भविष्य की गारंटी है।

यदि युवा आज जागरूक बनेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को एड्स जैसे खतरे का सामना नहीं करना पड़ेगा।

सीमा सुरक्षा बल और भारत की अटूट रक्षा व्यवस्था

सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस 2025 — देश की सीमाओं का अडिग प्रहरी और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़

हर वर्ष 1 दिसंबर को सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस मनाया जाता है। यह दिन भारत के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल — सीमा सुरक्षा बल (BSF) — के शौर्य, समर्पण और राष्ट्रभक्ति को सम्मान देने के लिए समर्पित है। वर्ष 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद देश की पश्चिमी सीमा की सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाने के लिए सीमा सुरक्षा बल की स्थापना की गई थी। आज यह बल केवल सीमा रक्षक ही नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन, आंतरिक सुरक्षा और राष्ट्र की अखंडता का मजबूत स्तंभ बन चुका है।

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सीमा सुरक्षा बल की स्थापना का इतिहास

सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है, क्योंकि 1965 के युद्ध के समय देश ने महसूस किया कि सीमा पर एक विशेष बल की आवश्यकता है जो लगातार निगरानी, गश्त और सुरक्षा प्रदान कर सके। इसी सोच के तहत 1 दिसंबर 1965 को BSF की स्थापना की गई। इसे गृह मंत्रालय के अधीन रखा गया और इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा, घुसपैठ रोकना, तस्करी पर नियंत्रण और देश की संप्रभुता की रक्षा करना तय किया गया।

आज BSF भारत-पाकिस्तान और भारत-बांग्लादेश सीमा पर सतर्क निगरानी रखती है। रेगिस्तान की तपती रेत हो या दलदली और नदियों से घिरी सीमाएं, BSF के जवान हर परिस्थिति में तैनात रहते हैं। सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस के अवसर पर इन वीरों की कठिन ड्यूटी को याद किया जाता है।

साहस, बलिदान और प्रतिबद्धता की मिसाल

BSF के जवानों का जीवन चुनौतियों से भरा होता है। वे परिवारों से दूर कठिन मौसम, ऊबड़-खाबड़ इलाके और खतरे के बीच ड्यूटी निभाते हैं। सर्दी हो या तपती गर्मी, रात हो या दिन — BSF हर समय चौकस रहती है। देश की सुरक्षा में अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद जवानों की स्मृति को सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस पर नमन किया जाता है।

BSF न केवल सीमा की रक्षा करती है, बल्कि आतंकवाद विरोधी अभियानों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, चुनावी सुरक्षा और आपदा राहत कार्यों में भी अहम भूमिका निभाती है। बाढ़, भूकंप या किसी बड़ी आपदा के समय सबसे पहले राहत और बचाव कार्यों में BSF के जवान नजर आते हैं।

आधुनिक तकनीक और बढ़ती ताकत

वर्तमान समय में BSF अत्याधुनिक हथियारों, ड्रोन, निगरानी टेक्नोलॉजी और आधुनिक संचार प्रणाली से लैस है। बदलती सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए बल को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है। स्मार्ट फेंसिंग, थर्मल कैमरे, नाइट विजन उपकरण और डिजिटल निगरानी प्रणाली ने BSF को और अधिक सशक्त बना दिया है।

सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस पर नई चुनौतियों और भविष्य की सुरक्षा रणनीतियों पर भी चर्चा होती है। साइबर सुरक्षा, ड्रोन हमले और सीमा पार से हो रही नई तरह की घुसपैठ को रोकने के लिए BSF को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

BSF आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी है। देश के युवा सीमा सुरक्षा बल में शामिल होकर मातृभूमि की सेवा करने का सपना देखते हैं। यह बल साहस, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना का प्रतीक है। सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस युवाओं को देशभक्ति, त्याग और कर्तव्य का संदेश देता है।

राष्ट्रीय सम्मान और परेड का आयोजन

हर साल इस दिन BSF के विभिन्न मुख्यालयों पर विशेष परेड, शौर्य प्रदर्शन और शहीद स्मारकों पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उत्कृष्ट सेवा देने वाले जवानों को सम्मानित भी किया जाता है। इससे उनका मनोबल बढ़ता है और देशवासियों के बीच सम्मान और विश्वास की भावना और मजबूत होती है।
सीमा सुरक्षा बल स्थापना दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि यह उस वीरता की पहचान है, जिसने भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखा है। BSF हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का गर्व जगाती है। इन जवानों के कारण हम सुरक्षित रह पाते हैं और चैन की नींद सोते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि आज़ादी की रक्षा के लिए कोई न कोई हर पल सीमा पर खड़ा है।

पूजा, इबादत, प्रार्थना और आध्यात्मिकता को राजनीति से मुक्त रखना: आज की वैश्विक आवश्यकता

पूजा,इबादत प्रार्थना सेवा और आध्यात्मिकता: राजनीतिक़ घुसपैठ से ऊपर उठाने की वैश्विक अनिवार्यता

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जहां विज्ञान, तकनीक और भौतिक प्रगति मानव जीवन को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले गई है,वहीं मनुष्य का आंतरिकसंसार अस्थिरता, अनिश्चितता और विभाजन की गिरफ्त में है।ऐसे समय में पूजा,इबादत प्रार्थना सेवा और आध्यात्मिकता मनुष्य के मन में संतुलन,करुणा और शांति का आधार बनने चाहिए थे, पर विडंबना यह है कि आज इन्हीं आध्यात्मिक क्षेत्रों में राजनीति का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।आध्यात्मिकता का राजनीतिकरण वैश्विक स्तरपर एक गहरी चिंता का विषय बन चुका है क्योंकि इससे न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि सामाजिक एकता, धार्मिक सद्भाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ती है। इसलिए यह आवश्यक है कि पूजा-इबादत प्रार्थना सेवा को मनोरंजन, प्रचार-प्रसार, या राजनीतिक लाभ के साधन के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति को रोका जाए और अध्यात्म की पवित्रता को पुनर्स्थापित किया जाए।

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मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि विश्व की लगभग सभी धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराएँ,हिंदू, बौद्ध, ईसाई, इस्लाम, यहूदी, ताओ, शिंतो- पूजा को एक आंतरिक प्रक्रिया मानती हैं। हिंदू दर्शन में पूजा मन,बुद्धि,चित्त की शुद्धि का साधन है, केवल क्रियाकलाप का नहीं। बौद्ध परंपरा में पूजा नहीं, बल्कि स्मृति और ध्यान केंद्र में है, जिसका उद्देश्य मन की अशुद्धियों को शांत करना है।इस्लाम में नमाज़ मनोरंजन नहीं, बल्कि विनम्रता का प्रशिक्षण है। ईसाई प्रेयर को आत्मिक संवाद कहते हैं, जहाँ बाहरी आडंबर से अधिक भीतरी पवित्रता को महत्व दिया जाता है।यानें पूरी दुनियाँ इस बात को मानती है कि पूजा कोई कार्यक्रम याफेस्टिविटी नहीं,बल्कि एक अंतर्यात्रा है,स्वयं को जानने की, स्वयं को सुधारने की,और स्वयं को ईश्वर या ब्रह्मांडीय चेतना से जोड़ने की।

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मानव सभ्यता के विकास में पूजा,ध्यान,प्रार्थना और आध्यात्मिक साधनाएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रहीं,बल्कि मनुष्य के आंतरिक संतुलन,मानसिक अनुशासन और सामाजिक नैतिकता के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में विकसित हुई हैं। किंतु आज के डिजिटल युग,तीव्र बाज़ारीकरण,उपभोक्तावाद और मनोरंजन-प्रधान संस्कृति में पूजा के वास्तविक स्वरूप के समक्ष सबसे बड़ा संकट यही है कि इसे अनायास ही मनोरंजन, उत्सव, प्रदर्शनी या दिखावे के रूप में देखा जाने लगा है।पूजा इबादत प्रार्थना सेवा मनोरंजन नहीं है यह पंक्ति केवल धार्मिक चेतना को पुनर्स्थापित करने का आह्वान नहीं, बल्कि 21वीं सदी की मानव सभ्यता के लिए एक नैतिक मार्गदर्शन भी है कि आध्यात्मिकता और बाज़ार, श्रद्धा और मनोरंजन, साधना और प्रदर्शन के बीच सीमाओं को समझे बिना समाज का मानसिक स्वास्थ्य, सांस्कृतिक शुचिता और आध्यात्मिक अनुशासन लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता।

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साथियों बात अगर हम पूजा या इबादत प्रार्थना सेवा मनोरंजन नहीं है:पवित्रता की मूल आत्मा है इसको समझने की करें तो, पूजा और इबादत प्रार्थना सेवा किसी भी धर्म या संस्कृति में आनंद या मनोरंजन का माध्यम नहीं रहे हैं। प्राचीन सभ्यताओं से लेकर आधुनिक धार्मिक परंपराओं तक, पूजा का उद्देश्य मनुष्य को उसके अहंकार, उसकी इच्छाओं और उसकी भ्रमित अवस्थाओं से ऊपर उठाना रहा है।पूजा में एकांत, अनुशासन और मन की शुद्धता का भाव शामिल होता है, जबकि मनोरंजन का मूल स्वभाव हल्कापन क्षणिकता और बाहरी उत्तेजना पर आधारित होता है। आज जब कई स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठानों को संगीत-उत्सवों, भीड़-इकट्ठा करने वाले कार्यक्रमों या दिखावे की प्रतियोगिताओं में बदलते देखा जाता है, तब पूजा अपनी मूल सार्थकता खोने लगती है।पूजा का उद्देश्य आत्म-निरीक्षण औरआध्यात्मिक उन्नयन है, न कि भीड़ जुटाकर लोकप्रियता कमाना।पूजा या इबादत प्रार्थना सेवा को मनोरंजन के स्तर पर उतार देने से समाज में दो गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। प्रथम, धार्मिक भावना का बाजारीकरण बढ़ता है,जिसके कारण समारोह सजावट आयोजनों की भव्यता और तकनीकी प्रदर्शन पर केन्द्रित हो जाते हैं।दूसरा, इससे धर्म का उपयोग सामुदायिक पहचान दिखाने के साधन में बदल जाता है, जिससे बंटवारा और प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है। पूजा यदि मन की शांति का स्रोत रहे तो समाज शांत होता है, पर यदि इसे भीड़-संचालित मनोरंजन के रूप में रूपांतरित कर दिया जाए तो इससे तनाव और विभाजन बढ़ते हैं।

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साथियों बात अगर हम पूजा और मनोरंजन का मिश्रण 21वीं सदी की नई चुनौती इसको समझने की करें तो इंटरनेट,ग्लोबल मीडिया, स्मार्टफोन और सोशल नेटवर्क ने धर्म और पूजा को तेजी से मनोरंजन की वस्तु जैसा बना दिया है।मंदिरों, चर्चों मस्जिदों और गुरुद्वारों के लाइव स्ट्रीम, रील्स, व्लॉग्स, पब्लिक चैलेंज, वायरल भक्ति गाने, डांस वीडियोज और ‘डेवोशनल कंटेंट ट्रेडिंग’ ने पूजा की मूल भावना को बाज़ार का हिस्सा बना दिया है।आज भक्तों की संख्या नहीं, व्यूज़ और फॉलोअर्स की संख्या पर आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का मूल्यांकन होने लगा है। पूजा घर का एकांत साधना स्थल होने के बजाय स्टेज-लाइट्स, साउंड डीजे और डिजिटल शो का रूप लेती जा रही है। यह बदलाव केवल भारत में नहीं,बल्कि अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका तक देखा जा सकता है, जहाँ धार्मिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति में ग्लैमरस मनोरंजन का समावेश बढ़ता जा रहा है। 21वीं सदी में वैश्वीकरण, डिजिटल युग और राजनीतिक ध्रुवीकरण ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक लाभ का सबसे आसान साधन बना दिया है। दुनियाँ के अनेक देशों में चुनावों, सत्ता-समीकरणों, सार्वजनिक नीतियों और सामाजिक एजेंडों में आध्यात्मिकता के नाम पर जनमत को प्रभावित करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। यह प्रवृत्ति केवल किसी एक देश या धर्म की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चेतावनी है कि राजनीति यदि आध्यात्मिक क्षेत्रों में प्रवेश कर लेती है, तो वह लोगों की भावनाओं को हथियार बनाकर लोकतंत्र की आत्मा को क्षति पहुँचा सकती हैराजनीतिक शक्तियाँ जब धार्मिक प्रतीकों, पूजा-स्थलों या आध्यात्मिक संस्थाओं का उपयोग अपने प्रचार के लिए करती हैं, तब वे अध्यात्म की सार्वभौमिकता को सीमित कर देती हैं आध्यात्मिकता का मूल स्वभाव समावेशी है वह मनुष्य को मानवता के उच्चतर सिद्धांतों से जोड़ती है, न कि किसी दल, समूह या विचारधारा से। आधुनिक विश्व में जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और तकनीकी प्रगति मनुष्य को उसकी मूल आत्मा से दूर करती जा रही है,वहां आध्यात्मिकता की भूमिका और बढ़ जाती है।लेकिन जब यहीआध्यात्मिकता सत्ता का उपकरण बन जाती है, तो वह अपने मूल उद्देश्य मानव कल्याण और आंतरिक शांति से भटक जाती है।इसलिए आधुनिक युग में अध्यात्म को राजनीतिक रंगत से बचाना केवल धार्मिक स्वतंत्रता का ही प्रश्न नहीं,बल्कि यहमानवाधिकार लोकतंत्र और वैश्विक सामाजिक स्थिरता का प्रश्न भी है। राजनीतिकरण रोकने का अर्थ यह नहीं कि धार्मिक समुदाय सामाजिक मुद्दों पर बोलें नहीं; बल्कि इसका अर्थ यह है कि पूजा-इबादत को राजनीतिक उद्देश्य, चुनावी लाभ या नीतिगत लाभ उठाने का माध्यम न बनाया जाए।

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साथियों बात अगर हम आध्यात्मिकता में राजनीति की घुसपैठ: वैश्विक परिप्रेक्ष्य में खतरा इसको समझाने की करें तो, आध्यात्मिकता की राजनीति पर पकड़ जितनी गहरी होती जाती है, उतनी ही लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है,क्योंकि व्यक्ति की निजी आस्था राजनीतिक वादों और प्रचार मशीनों का विषय बन जाती है। पिछले कुछ दशकों में दुनियाँ के कई देशों में देखा गया है कि राजनीतिक दल आध्यात्मिक नेताओं, धार्मिक संस्थानों और सामुदायिक विश्वासों का उपयोग जनमत को प्रभावित करने में करते हैं। इससे आध्यात्मिक संस्थाएँ निष्पक्षता खो देती हैं और धर्म का उपयोग वैज्ञानिक, सामाजिक या आर्थिक वास्तविकताओं से ध्यान हटाने के लिए किया जाता है।राजनीति की घुसपैठ से आध्यात्मिकता का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह मनुष्य को विभाजित करने वाली रेखाओं को गहरा करती है। आध्यात्मिकता का असली उद्देश्य मनुष्य को उसके भीतर की एकता से जोड़ना है, लेकिन राजनीति उसकी पहचान को समूह, जाति, संप्रदाय या अन्य सामाजिक ध्रुवों में बदल देती है। जब आध्यात्मिक नेताओं को राजनीतिक मंचों पर खड़ा किया जाता है,जब पूजा-स्थलों को शक्ति -समीकरणों के केंद्र में रखा जाता है, या जब आस्था के नाम पर नीतियाँ बनती हैं, तो इससे सत्ता और आध्यात्मिकता के बीच ऐसा पैठयुक्त गठजोड़ बनता है जिससे समाज का नैतिक ढांचा कमजोर पड़ता है।यह वैश्विक प्रवृत्ति केवल धार्मिक स्वतंत्रता को ही नहीं, बल्कि वैश्विक शांति को भी चुनौती देती है। कई अंतरराष्ट्रीय संघर्ष, चाहे मध्य-पूर्व, अफ्रीका या एशिया में आस्था और राजनीति के मिश्रण का परिणाम रहे हैं। राजनीतिक उद्देश्यों के लिए आध्यात्मिक भावनाओं का दुरुपयोग सम्पूर्ण मानवता के लिए खतरा है।

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साथियों बात अगर हम पूजा- इबादत और आध्यात्मिकता को साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति से अलग रखने की आवश्यकता को समझने की करें तो,सत्ता की राजनीति साम, दाम, दंड, भेद की रणनीति पर चलती है।यह रणनीति युद्धकला, प्रशासन और राजनीतिक प्रबंधन के लिए हो सकती है,परंतु आध्यात्मिकता के लिए यहघातक है।पूजा-इबादत को राजनीति की ऐसी रणनीति मेंशामिल करने से धर्म का मूल स्वरूप ही बदल जाता है। आध्यात्मिकता का स्वभाव स्वैच्छिकता, प्रेम, आत्म- अनुशासन और आंतरिक विकास से जुड़ा होता है; जबकि सत्ता का स्वभाव लाभ-हानि, गणना, रणनीति और प्रतिस्पर्धा से जुड़ा होता है। इन दोनों की प्रकृति में मूलभूत विरोधाभास है।यदि पूजा इबादत प्रार्थना सेवा को राजनीतिक साधन बनाया जाएगा तो वह किसी समुदाय में श्रेष्ठता की भावना या दूसरे में हीनता का निर्माण कर सकती है।राजनीति जब धार्मिक आयोजनों को धन,शक्ति या सामाजिक प्रभाव के माध्यम के रूप में देखती है, तब यह स्वाभाविक है कि साम-दाम-दंड-भेद की नीति लागू हो।इससे आध्यात्मिकताका पवित्रक्षेत्र संघर्षों औरआरोपों का मैदान बन जाता है,जो किसी भी सभ्य समाज के लिएविनाशकारी है।पूजा इबादत प्रार्थना सेवा और राजनीति को अलग रखना केवल भारत जैसे बहुधर्मी समाज की ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की आवश्यकता है।अमेरिका, यूरोप, जापान, मध्य-पूर्व और अफ्रीका, सभी क्षेत्रों में यह एक स्थायी सिद्धांत स्वीकार किया गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता तभी सुरक्षित है जब राज्य और आध्यात्मिक संस्थान अपनी-अपनी सीमाओं का सम्मान करें।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि आध्यात्मिकता की वैश्विक रक्षा आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकता है,दुनियाँ जिस दौर से गुजर रही है आर्थिक अनिश्चितता मानसिक तनाव, डिजिटल प्रदूषण,सामाजिक ध्रुवीकरण, उसमें आध्यात्मिकता मनुष्य के लिए एकमात्र ऐसा माध्यम है जो उसे आंतरिक शक्ति और शांति दे सकता है। लेकिन यदि यही आध्यात्मिकता राजनीति का उपकरण बन जाए तो यह अपनी प्रभावशीलता खो देती है। इसलिए पूजा-इबादत को मनोरंजन से मुक्त रखना, आध्यात्मिकता के राजनीतिकरण को रोकना और राजनीति को पूजा-स्थलों से दूर रखना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।सभी देशों को यह सिद्धांत स्वीकार करना चाहिए कि आध्यात्मिकता मनुष्य की निजी स्वतंत्रता है और किसी भी स्वतंत्रता पर राजनीति की छाया नहीं पड़नी चाहिएआध्यात्मिकता को बचाने का अर्थ है मनुष्य की आंतरिक दुनिया को बचाना, और यदि आंतरिक दुनिया सुरक्षित है तो विश्व भी सुरक्षित रहेगा।

-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

भारत में एलपीजी सिलेंडर के दामों में कटौती, जानें दिल्ली से लखनऊ तक कितनी घटी कीमतें

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। 1 दिसंबर से देश में कई अहम बदलाव लागू हुए हैं, जिनमें एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बदलाव भी शामिल है। हालांकि घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, लेकिन कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर के दामों में 10 रुपये की कटौती की गई है। इससे रेस्तरां और छोटे व्यवसायों को राहत मिलने की उम्मीद है।

कमर्शियल सिलेंडर की नई कीमतें

कटौती के बाद प्रमुख शहरों में 19 किलोग्राम कमर्शियल सिलेंडर के दाम इस प्रकार हो गए:

दिल्ली: ₹1590.50 ➝ ₹1580.50, कोलकाता: ₹1694 ➝ ₹1684, मुंबई: ₹1542 ➝ ₹1531.50, चेन्नई: ₹1750 ➝ ₹1739.50, कीमतों में यह बदलाव 1 दिसंबर से लागू हो गया है।

घरेलू सिलेंडर के दाम अपरिवर्तित

घरेलू 14.2 किलोग्राम एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। प्रमुख शहरों में मौजूदा कीमतें:

दिल्ली: ₹853, मुंबई: ₹852.50, लखनऊ: ₹890.50, करगिल: ₹985.50, पुलवामा: ₹969, बागेश्वर: ₹890.50

ध्यान देने वाली बात है कि घरेलू एलपीजी के दाम पिछले महीने भी स्थिर रहे थे। अप्रैल में 50 रुपये प्रति सिलेंडर की वृद्धि के बाद से अब तक कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ।

हर महीने कीमतें क्यों बदलती हैं?

सरकारी तेल कंपनियाँ—IOC, BPCL और HPCL—हर महीने की पहली तारीख को एटीएफ और एलपीजी की कीमतों की समीक्षा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय ईंधन कीमतें और विदेशी विनिमय दर के आधार पर एलपीजी के दाम बढ़ते या घटते हैं।

क्या सोशल मीडिया बना रहा है परिवारों के बीच दीवार?

सोमनाथ मिश्र की रिपोर्ट

सोशल मीडिया और अत्याधुनिक तकनीक के इस दौर में दुनिया जितनी छोटी हुई है, उतनी ही जटिल भी। मोबाइल फोन, व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, वीडियो कॉल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने इंसान को हर समय जुड़ा रहने की सुविधा दी है। लेकिन इसी सुविधा के बीच एक अहम सवाल खड़ा हो रहा है — मीडिया और पारिवारिक रिश्ते क्या पहले से अधिक मजबूत हुए हैं या धीरे-धीरे कमजोर पड़ते जा रहे हैं?

आज मीडिया और पारिवारिक रिश्ते का रिश्ता एक डिजिटल पुल से जुड़ा हुआ है। दूर देश में रहने वाले माता-पिता अपने बच्चों को रोज़ स्क्रीन पर देख सकते हैं, परिवार के हर खास मौके की तस्वीरें और वीडियो पलभर में साझा हो जाती हैं। ग्रुप्स और चैट्स ने पारिवारिक संवाद को एक नया प्लेटफॉर्म दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया और पारिवारिक रिश्ते ने दूरी की दीवार को तोड़ा है।

लेकिन दूसरी ओर, यही तकनीक रिश्तों के बीच एक नई दूरी भी पैदा कर रही है। एक ही घर में रहने वाले सदस्य अब आमने-सामने बात करने के बजाय मैसेज के माध्यम से संवाद कर रहे हैं। भोजन की मेज पर बातचीत की जगह अब सोशल मीडिया स्क्रॉल करता हुआ मोबाइल ले चुका है। बच्चों और बुजुर्गों के बीच संवाद कम होता जा रहा है, क्योंकि हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन की दुनिया में व्यस्त है। इस तरह मीडिया और पारिवारिक रिश्ते दिखावटी जुड़ाव में बदलते जा रहे हैं।

समाजशास्त्रियों का मानना है कि मीडिया और पारिवारिक रिश्ते की मूल समस्या ‘उपस्थिति की कमी’ है। हम ऑनलाइन तो मौजूद हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से अनुपस्थित होते जा रहे हैं। रिश्तों की गर्माहट, जो आमने-सामने बैठकर बात करने, मुस्कुराने और एक-दूसरे की आवाज़ सुनने से आती थी, वह धीरे-धीरे कम हो रही है। वर्चुअल दुनिया ने वास्तविक दुनिया के रिश्तों को कमजोर करना शुरू कर दिया है।

हालांकि, इसका समाधान पूरी तरह से तकनीक से दूरी बनाना नहीं है। जरूरत है सही और संतुलित इस्तेमाल की। अगर मीडिया का उपयोग सिर्फ मनोरंजन तक सीमित न होकर संवाद और पारिवारिक जुड़ाव बढ़ाने के लिए किया जाए, तो मीडिया और पारिवारिक रिश्ते फिर से मजबूत हो सकते हैं। परिवार के साथ बैठकर समय बिताना, बिना मोबाइल के बातचीत करना और रिश्तों को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी हो गया है।

आज की सबसे बड़ी जरूरत यह समझने की है कि मीडिया एक साधन है, जीवन नहीं। अगर हम रिश्तों को समय, सम्मान और भावनाएं देंगे, तो मीडिया और पारिवारिक रिश्ते कभी कमजोर नहीं पड़ेंगे। वरना स्क्रीन की इस चमक में हम अपने ही अपनों से दूर होते चले जाएंगे।

अंततः यह सवाल तकनीक का नहीं, हमारे चुनाव का है — क्या हम मीडिया और पारिवारिक रिश्ते को संवारेंगे, या उसे सिर्फ डिजिटल दिखावे तक सीमित कर देंगे?

मतदाता सूची में नाम जोड़ने और संशोधन की अंतिम तिथि 11 दिसंबर तक बढ़ी, युवाओं और मतदाताओं में खुशी की लहर

कुशीनगर/हाटा (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। । उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से जुड़े सभी फॉर्म भरने की अंतिम तिथि बढ़ा दी गई है। राज्य निर्वाचन आयोग ने फॉर्म-6 (नया नाम जोड़ने), फॉर्म-7 (नाम हटाने) और फॉर्म-8 (संशोधन) भरने की समय सीमा बढ़ाकर 11 दिसंबर 2025 कर दी है। इस फैसले से पूरे प्रदेश में मतदाताओं, खासकर पहली बार वोट करने वाले युवाओं में खुशी की लहर दौड़ गई है।

आयोग को मिली थीं बढ़ाने की मांग

प्रदेश के विभिन्न जिलों से लगातार अनुरोध मिल रहे थे कि बड़ी संख्या में पात्र मतदाता अभी तक दस्तावेज पूरे नहीं कर पाए हैं। कई छात्र और नए मतदाता आवेदन नहीं दे पाए थे। स्थान परिवर्तन करने वाले परिवारों के लिए समय कम पड़ रहा था। ग्रामीण इलाकों में कृषि कार्य और स्थानीय आयोजनों के चलते लोग समय पर फॉर्म नहीं भर सके। इन परिस्थितियों को देखते हुए आयोग ने जनहित में अंतिम तिथि बढ़ाने का निर्णय लिया।

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अब बिना जल्दबाजी के भर सकेंगे फॉर्म

नई तिथि घोषित होने के बाद अब सभी पात्र नागरिक आसानी से अपने फॉर्म जमा कर सकेंगे। बीएलओ को भी निर्देश जारी किए गए हैं कि वे घर–घर जाकर मतदाताओं को जानकारी दें और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराएँ।

मतदाताओं ने कहा—निर्णय से मजबूत होगी लोकतांत्रिक प्रक्रिया

मतदाताओं का कहना है कि समय बढ़ने से मतदाता सूची और अधिक सटीक तैयार होगी तथा मतदान प्रतिशत में भी बढ़ोतरी होगी।
युवाओं ने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि अब उन्हें दस्तावेज पूरे करने और अपना नाम मतदाता सूची में जोड़ने का पर्याप्त समय मिल गया है।

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दवाइयों के भरोसे जीवन बिता रहे बुजुर्ग: क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था सच में तैयार है?

भारत तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार, आने वाले वर्षों में देश की बड़ी आबादी वरिष्ठ नागरिकों की होगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था इस ज़िम्मेदारी के लिए पूरी तरह तैयार है? आज देश के करोड़ों बुजुर्ग नियमित दवाइयों के सहारे अपने जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं, पर उनकी यह जंग केवल बीमारी से नहीं, बल्कि एक असंवेदनशील और अव्यवस्थित सिस्टम से भी है।

बुजुर्गों की सबसे बड़ी चुनौती है—निरंतर चिकित्सा सुविधा और सस्ती दवाइयों की उपलब्धता। मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थि-क्षय समेत कई बीमारियाँ उन्हें जीवनभर घेरती रहती हैं। ऐसे में हर महीने दवाइयों पर खर्च बढ़ता जा रहा है, जबकि पेंशन, सामाजिक सुरक्षा और पारिवारिक सहयोग कमजोर पड़ता जा रहा है। निजी अस्पताल आम आदमी की पहुँच से बाहर हो चुके हैं और सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की भारी किल्लत बनी रहती है।

गांवों और छोटे कस्बों की स्थिति और भी चिंताजनक है। वहाँ न तो विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हैं और न ही पर्याप्त दवाइयां। आयुष्मान भारत और अन्य वरिष्ठ नागरिक योजनाएं जरूर मौजूद हैं, लेकिन उनकी जानकारी का अभाव और जटिल प्रक्रिया उन्हें जरूरतमंदों से दूर कर देती है। कई बुजुर्ग ऑनलाइन आवेदन या दस्तावेज़ी प्रक्रिया पूरी करने में असमर्थ होते हैं, जिससे वे सरकारी लाभ से वंचित रह जाते हैं।

परिवार का ताना-बाना भी बदल रहा है। संयुक्त परिवार अब अपवाद बनते जा रहे हैं। युवा करियर की दौड़ में शहरों की ओर जा चुके हैं और गांवों में माता-पिता अकेले संघर्ष कर रहे हैं। सोशल और इमोशनल सपोर्ट के बिना बुजुर्गों का जीवन और ज्यादा कठिन हो गया है। उनकी शारीरिक स्थिति से ज्यादा, मानसिक स्थिति कमजोर हो रही है। अकेलापन और उपेक्षा उन्हें भीतर से तोड़ रही है।

यह समस्या सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए ज़रूरी है कि हर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर नियमित रूप से दवाइयां उपलब्ध हों। हर ब्लॉक में बुजुर्गों के लिए अलग हेल्पडेस्क हो, जहाँ उन्हें न केवल दवाई बल्कि सही मार्गदर्शन भी मिले। साथ ही मेडिकल इंश्योरेंस की प्रक्रिया को सरल करना और घर-घर जागरूकता अभियान चलाना भी जरूरी है।

इसके साथ-साथ परिवारों और समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि बुजुर्ग बोझ नहीं, बल्कि अनुभव और संस्कारों का जीवंत स्रोत हैं। उनकी देखभाल केवल दया नहीं, बल्कि हमारा नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है।

जब तक सरकार, समाज और परिवार मिलकर बुजुर्गों के लिए एक मजबूत स्वास्थ्य ढांचा तैयार नहीं करेंगे, तब तक “सबका साथ, सबका विकास” का नारा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगा।

नीलगाय तस्करी का भंडाफोड़: घुघली पुलिस ने आधी रात छापा मारकर तीन शिकारी गिरफ्तार, मांस, चाकू और बाइक बरामद

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। घुघली थाना पुलिस ने बीती रात एक बड़ी कार्रवाई करते हुए नीलगाय के अवैध शिकार और मांस तस्करी में शामिल तीन आरोपियों को रंगे हाथ गिरफ्तार किया। पुलिस ने मौके से नीलगाय का मांस भरी दो बोरियां, कटा हुआ सिर व खुर, तीन अवैध चाकू और दो मोटरसाइकिलें बरामद की हैं।

यह कार्रवाई उपनिरीक्षक अशोक कुमार गिरि के नेतृत्व में की गई, जिसमें हेड कांस्टेबल अभय कुमार, देवानंद और कांस्टेबल रजत प्रजापति, प्रवीण कुमार, विकास यादव व जीतेंद्र कुमार शामिल थे। टीम रात में सुभाष चौक पर गश्त कर रही थी, तभी मुखबिर से सूचना मिली कि कुशीनगर सीमा क्षेत्र से कुछ शिकारी नीलगाय का मांस लेकर महराजगंज में बेचने आ रहे हैं।

सूचना पर पुलिस घुघली बुजुर्ग घाट पहुंची और संदिग्ध दो मोटरसाइकिलों पर तीन लोगों को आते देखा। पुलिस को देखते ही वे भागने लगे, लेकिन पीछा कर उन्हें पकड़ लिया गया।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान —

सद्दाम पुत्र मोहम्मद अली, अब्दुल हसन पुत्र भोला अली, असरफी पुत्र हबीबुल्लाह तीनों निवासी: विरैचां टोला सेमरहनां, थाना घुघली।

तलाशी में एक बाइक से नीलगाय का कटा हुआ मांस, जबकि दूसरी बाइक से सिर, खुर और अन्य अवशेष मिले। डिक्की से तीन धारदार अवैध चाकू भी बरामद हुए। पूछताछ में आरोपियों ने स्वीकार किया कि वे नदी किनारे नीलगायों का शिकार कर मांस बेचकर अवैध कमाई करते थे।

बरामद अवशेषों का परीक्षण कर उन्हें मौके पर गड्ढा खोदकर दफनाया गया। चाकू सहित अन्य सामग्री को सील कर कब्जे में लिया गया।

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ—

• 325 BNS

• 9/51 वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972

• 4/25 आर्म्स एक्ट
में मुकदमा दर्ज कर हिरासत में ले लिया।
दोनों मोटरसाइकिलें 207 एमवी एक्ट के तहत सीज कर दी गईं। पूरी कार्रवाई की धारा 105 BNSS के तहत वीडियोग्राफी कराई गई।

यह कार्रवाई वन्यजीव संरक्षण और अवैध शिकार रोकने की दिशा में पुलिस द्वारा बड़ी सफलता मानी जा रही है।