Monday, June 29, 2026
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जलन ने लिया खौफनाक रूप: पानीपत में मासूमों की हत्या का सनसनीखेज मामला

पानीपत सीरियल किलिंग केस: जलन बनी मासूमों की मौत की वजह, महिला गिरफ्तार

पानीपत (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)हरियाणा के पानीपत जिले से सामने आए एक बेहद चौंकाने वाले मामले ने पूरे इलाके को स्तब्ध कर दिया है। पुलिस ने एक 32 वर्षीय महिला पूनम को गिरफ्तार किया है, जिस पर बीते दो वर्षों में चार मासूम बच्चों को डुबोकर मारने का आरोप है। इनमें उसका खुद का तीन वर्षीय बेटा भी शामिल बताया जा रहा है।

पुलिस के अनुसार, आरोपी महिला बच्चों की मासूम खूबसूरती से असहनीय जलन महसूस करती थी। यही मानसिक स्थिति कथित तौर पर इन जघन्य अपराधों की वजह बन गई। पानीपत पुलिस अधीक्षक भूपेंद्र सिंह ने एक प्रेस वार्ता में बताया कि ये घटनाएं 2023 से 2025 के बीच अलग-अलग गांवों में हुईं, लेकिन हर बार मौत को दुर्घटना दिखाने की कोशिश की गई।

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पहली घटना 2023 में सोनीपत के भावर गांव में सामने आई, जबकि अगस्त 2025 में सिवाह गांव से एक और मामला जुड़ा। सबसे ताजा मामला 1 दिसंबर 2025 को नौलखा गांव की एक शादी समारोह में सामने आया, जहां छह साल की बच्ची का शव पानी से भरे टब में पाया गया। घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज में आरोपी की मौजूदगी की पुष्टि हुई, जिसके बाद पुलिस को मजबूत सुराग मिला।

पूछताछ के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर अपराध स्वीकार कर लिया है। बताया जा रहा है कि वह पढ़ी-लिखी है और उसने राजनीतिक विज्ञान में परास्नातक की पढ़ाई की है। पुलिस अब उसके मानसिक स्वास्थ्य और अपराध की गहराई से जांच कर रही है। उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

यह मामला समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक संबंधों पर समय रहते ध्यान देना कितना आवश्यक है।

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पुतिन के दो दिवसीय भारत दौरे से मजबूत होंगे रक्षा, ऊर्जा और व्यापारिक रिश्ते

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रस्तावित भारत दौरे को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर आयोजित 23वें इंडिया–रशिया एनुअल समिट से दोनों देशों के बीच रणनीतिक, रक्षा और ऊर्जा सहयोग को नई दिशा मिलने की उम्मीद है। यह यात्रा कई वर्षों के अंतराल के बाद हो रही है, जिससे वैश्विक मंच पर भारत-रूस रिश्तों को नई मजबूती मिलने की संभावना जताई जा रही है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में रक्षा उपकरणों के संयुक्त उत्पादन, आधुनिक तकनीक के आदान-प्रदान, और मल्टी-पोलर वर्ल्ड ऑर्डर के तहत द्विपक्षीय सहयोग को और बढ़ाने पर चर्चा होगी। इसके साथ ही, छोटे मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर (Small Modular Reactors – SMR) के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाएं भी प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। इससे भारत की स्वच्छ और स्थायी ऊर्जा योजना को गति मिल सकती है।

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बाहरी आर्थिक दबावों और वैश्विक अस्थिरता के बीच भारत और रूस के द्विपक्षीय व्यापार को सुरक्षित एवं स्थिर रखने के तरीकों पर भी विस्तार से वार्ता संभावित है। दोनों देश वैकल्पिक व्यापार मार्गों और भुगतान प्रणालियों पर विचार कर सकते हैं, ताकि भविष्य में किसी भी वैश्विक प्रतिबंध का प्रतिकूल असर न पड़े।

सुरक्षा के लिहाज से राजधानी में बहु-स्तरीय इंतजाम किए गए हैं। 5,000 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती, स्वैट टीमों की मौजूदगी, ड्रोन रोधी प्रणाली और आधुनिक सीसीटीवी नेटवर्क के जरिए पूरे क्षेत्र को निगरानी में रखा गया है। दिल्ली पुलिस, केंद्रीय एजेंसियों और रूसी सुरक्षा अधिकारियों के बीच मिनट-दर-मिनट समन्वय जारी है। खास मार्गों पर अतिरिक्त बैरिकेडिंग, स्नाइपर तैनाती और त्वरित प्रतिक्रिया दल की व्यवस्था की गई है।

यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दिल्ली पुलिस समय-समय पर ट्रैफिक एडवाइजरी भी जारी कर रही है। शहर के प्रमुख स्थानों, सरकारी भवनों और रणनीतिक क्षेत्रों पर विशेष नजर रखी जा रही है, ताकि किसी भी संभावित खतरे को पहले ही रोका जा सके।

कुल मिलाकर, यह दौरा केवल एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि भारत-रूस संबंधों के भविष्य की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल के बीच यह समिट दोनों देशों के लिए रणनीतिक स्थिरता और आर्थिक सहयोग का मजबूत आधार बन सकता है।

पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति भुगतान को लेकर आज राज्यपाल से मिलेगा आजसू छात्र संघ का प्रतिनिधिमण्डल

रांची (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) झारखंड में लंबित पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के भुगतान की मांग तेज़ होती जा रही है। इसी कड़ी में आजसू छात्र संघ का एक प्रतिनिधिमंडल आज गुरुवार को राज्यपाल से मुलाकात करेगा और उन्हें छात्रों की समस्याओं से जुड़ा एक अहम ज्ञापन सौंपेगा। इस प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात को राज्य के हजारों छात्रों की उम्मीदों से जोड़कर देखा जा रहा है, जो बीते लंबे समय से अपनी छात्रवृत्ति की बाट जोह रहे हैं।

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गौरतलब है कि पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के भुगतान में हो रही देरी के विरोध में आजसू छात्र संघ ने हाल ही में ‘शिक्षा के लिए भिक्षा : जनाक्रोश मार्च’ का आयोजन किया था। इस दौरान राजभवन के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया गया, लेकिन राज्यपाल के राज्य से बाहर होने के कारण उस समय ज्ञापन नहीं सौंपा जा सका था। अब राजभवन प्रशासन द्वारा आज मिलने का समय दिए जाने के बाद छात्र नेताओं को अपनी बात सीधे राज्यपाल के समक्ष रखने का अवसर मिल रहा है।

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आजसू छात्र संघ का आरोप है कि राज्य सरकार एसटी, एससी और ओबीसी वर्ग के छात्रों के साथ सौतेला व्यवहार कर रही है। छात्रवृत्ति का भुगतान समय पर नहीं होने से इन वर्गों के कई विद्यार्थी आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। कई छात्रों की पढ़ाई तक प्रभावित हो रही है और कॉलेज की फीस, हॉस्टल शुल्क जैसी आवश्यक जरूरतें अधूरी रह जा रही हैं।

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छात्र संघ ने स्पष्ट कहा है कि यदि जल्द ही सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन और अधिक उग्र रूप ले सकता है। आज की बैठक को छात्रहित में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक बयानबाज़ी के शोर में दबती आम जनता की ज़रूरतें — ज़मीन पर उतरे बिना अधूरा रह गया विकास

भारत में आज विकास सबसे ज़्यादा बोले जाने वाले शब्दों में से एक है, लेकिन ज़मीन पर इसके मायने लगातार धुंधले होते जा रहे हैं। मंचों, रैलियों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, पर आम आदमी की बुनियादी समस्याएँ—स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सड़क, बिजली, पानी और महंगाई — जस की तस बनी हुई हैं। यह स्थिति बताती है कि असली मुद्दे अब जनहित के केंद्र में नहीं हैं, बल्कि वे सस्ती राजनीतिक रणनीतियों की भेंट चढ़ते जा रहे हैं।

आज राजनीतिक बहसों का स्तर विकास की योजनाओं से हटकर आरोप-प्रत्यारोप, धर्म, जाति, और भावनात्मक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। जनता को असली समस्याओं से भटकाने के लिए नए-नए विवाद खड़े किए जाते हैं, जिससे असली सवालों पर बातचीत ही नहीं हो पाती। गांवों में आज भी साफ़ पानी और पक्की सड़क की कमी है, सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, स्कूलों की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही और युवा वर्ग नौकरी के लिए भटक रहा है।

शहरों में स्थिति कुछ अलग नहीं है। बढ़ती महंगाई ने मध्यम वर्ग और गरीब तबके की कमर तोड़ दी है। किराया, पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर, दवाइयाँ और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुएँ आम लोगों की पहुँच से दूर होती जा रही हैं। बावजूद इसके, राजनीतिक एजेंडे में इन मुद्दों पर गंभीर चर्चा दिखाई नहीं देती। चर्चा होती है तो सिर्फ भाषणों में, लेकिन उनके क्रियान्वयन की कोई ठोस योजना नज़र नहीं आती।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज़ होती है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से अब उस आवाज़ को ही भटका दिया जा रहा है। लोग सवाल पूछना चाहते हैं—पर उन्हें उन सवालों से दूर रखने के लिए नए मुद्दे परोस दिए जाते हैं। विकास की तस्वीरें केवल पोस्टर और मंचों तक सीमित रह गई हैं। हकीकत में विकास का मतलब होना चाहिए—बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था, स्थायी रोजगार और सुरक्षित जीवन।

ज़रूरत इस बात की है कि जनता भावनात्मक नारों के बजाय वास्तविक मुद्दों पर सवाल उठाए। राजनीतिक दलों को जवाबदेह बनाया जाए कि उन्होंने पिछले वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के क्षेत्र में क्या ठोस काम किया है। तभी विकास केवल भाषण का नहीं बल्कि ज़मीन का सच बन पाएगा।

अब समय आ गया है कि हम “कौन सा नेता क्या बोला” से आगे बढ़कर यह पूछें—“हमारे लिए क्या किया गया?” क्योंकि असली विकास वह है, जो आम इंसान के जीवन में बदलाव लाए, न कि सिर्फ चुनावी मंचों पर तालियाँ बटोरने का जरिया बने।

“तेज़ रफ्तार का कहर, धीमी होती ज़िंदगी – भारत में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं का खामोश सच”

देश की सड़कें पहले से कहीं अधिक तेज़ हो चुकी हैं, लेकिन इसी रफ्तार ने हजारों जिंदगियों को हर साल थाम लिया है। सड़क दुर्घटनाएँ अब केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकट बनती जा रही हैं। लापरवाही, जल्दबाज़ी और यातायात नियमों की अनदेखी रोज़ाना मौत को खुला निमंत्रण दे रही है।

आज हाईवे से लेकर शहर की गलियों तक, हर जगह रफ्तार ही प्राथमिकता बन गई है। हेलमेट न पहनना, सीट बेल्ट की अनदेखी, मोबाइल पर बात करते हुए वाहन चलाना, शराब पीकर ड्राइव करना और ट्रैफिक सिग्नल का उल्लंघन – ये सब आम हो चुका है। यही छोटी-छोटी लापरवाही गंभीर हादसों को जन्म देती है। कई बार एक पल की चूक, पूरे परिवार की खुशियाँ छीन लेती है।

सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े डराने वाले हैं। हर दिन सैकड़ों लोग सड़क पर अपनी जान गंवा रहे हैं, जिनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। इसका सबसे बड़ा कारण है तेज़ गति और गलत ओवरटेकिंग। सोशल मीडिया पर रील बनाने की होड़ भी अब दुर्घटनाओं की एक नई वजह बनती जा रही है। लोग चलती गाड़ी में वीडियो बनाते हैं, स्टंट करते हैं और खुद के साथ दूसरों की जान को भी खतरे में डालते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, सड़क सुरक्षा केवल सरकार या ट्रैफिक पुलिस की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। सड़क पर चलते समय यह याद रखना चाहिए कि आपकी एक छोटी सी गलती किसी और की जिंदगी तबाह कर सकती है। ज़रूरी है कि लोग ट्रैफिक नियमों का पालन करें, गति सीमा का ध्यान रखें और दूसरों की सुरक्षा का सम्मान करें।

अगर आज ही चेतना नहीं आई, तो आने वाला कल और भी खतरनाक हो सकता है। हमें यह समझना होगा कि मंज़िल तक पहुँचना जरूरी है, लेकिन सुरक्षित पहुँचना उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।

सड़क सुरक्षा एक नियम नहीं, बल्कि जीवन का नियम है।

विनोद दुआ की विरासत: सवाल पूछती कलम का इतिहास

विनोद दुआ: स्वतंत्र पत्रकारिता की बुलंद आवाज, जिसने सत्ता से सवाल पूछने का साहस सिखाया

हिंदी पत्रकारिता जगत में यदि किसी एक नाम को निर्भीकता, निष्पक्षता और बेबाक तेवरों का प्रतीक माना जाए, तो वह है – विनोद दुआ। 11 मार्च 1954 को नई दिल्ली में जन्मे विनोद दुआ ने मीडिया जगत में अपनी अलग पहचान बनाई, जो केवल एक पत्रकार की नहीं, बल्कि एक विचारधारा की थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. करने के बाद उन्होंने वर्ष 1974 में दूरदर्शन के साथ अपने पत्रकारिता सफर की शुरुआत की, जो आगे चलकर भारतीय समाचार मीडिया के एक मजबूत स्तंभ में बदल गई।

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विनोद दुआ ने सिर्फ खबरें नहीं पढ़ीं, बल्कि उन्होंने उन खबरों के पीछे की सच्चाई को उजागर करने का प्रयास किया। प्रमुख चैनलों पर उनकी प्रस्तुति शैली ने उन्हें एक विशिष्ट पहचान दिलाई। सामाजिक अन्याय, लोकतंत्र की मजबूती और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज हमेशा मुखर रही। उन्होंने सत्ता से सवाल पूछने का साहस किया और आम जन की आवाज को मंच दिया।

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उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1996 में रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि 2008 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा। इसके अलावा 2017 में मुंबई प्रेस क्लब द्वारा दिए गए रेड इंक अवार्ड ने उनकी पत्रकारिता की विश्वसनीयता और समर्पण को और मजबूती दी।

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कोविड-19 संक्रमण के बाद उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं के चलते 4 दिसंबर 2021 को उनका निधन हो गया। उनका जाना सिर्फ एक पत्रकार का निधन नहीं था, बल्कि निर्भीक पत्रकारिता के एक युग का अंत था। आज भी युवा पत्रकारों के लिए विनोद दुआ एक प्रेरणा हैं, जो यह सिखाते हैं कि कलम तभी शक्तिशाली होती है जब वह सच के साथ खड़ी हो।

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एक युग के अविस्मरणीय अभिनेता: शशि कपूर की याद में विशेष ले

हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो समय बीत जाने के बाद भी दर्शकों के दिलों में जीवित रहते हैं। इन्हीं में से एक हैं – शशि कपूर। 4 दिसंबर 2017 को उनका निधन हिंदी फिल्म उद्योग के लिए केवल एक समाचार नहीं, बल्कि एक पूरे युग का अंत था। उनकी अदाकारी, मासूम मुस्कान और स्वाभाविक अभिनय आज भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा है।

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शशि कपूर का जन्म 18 मार्च 1938 को कोलकाता में हुआ था। वे पृथ्वीराज कपूर के पुत्र और राज कपूर व शम्मी कपूर के छोटे भाई थे। बचपन से ही उनका रुझान अभिनय और रंगमंच की ओर था। पिता के प्रतिष्ठित ‘पृथ्वी थिएटर’ से उन्होंने अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की। यहीं से उनके भीतर वह गहराई और संजीदगी आई, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

फिल्मों में उन्होंने एक रोमांटिक हीरो के रूप में तो सफलता पाई ही, साथ ही गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को भी बखूबी निभाया। ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘नमक हराम’, ‘सुहाग’, ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ और ‘हीरालाल पन्नालाल’ जैसी फिल्मों में उनकी दमदार मौजूदगी आज भी सिनेप्रेमियों द्वारा सराही जाती है। उनका अभिनय कभी बनावटी नहीं लगा; वह किरदार में पूरी तरह डूब जाते थे।

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शशि कपूर केवल अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक संवेदनशील निर्माता और थिएटर प्रेमी भी थे। उन्होंने ‘फिल्मवालाज’ नाम से एक प्रोडक्शन कंपनी शुरू की और कई अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्मों का निर्माण किया, जिन्हें विश्व मंच पर सम्मान मिला। यह उनके सिनेमा के प्रति समर्पण और दूरदर्शिता का प्रमाण था।

उन्हें उनके योगदान के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें पद्म भूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्रमुख हैं। वे न केवल एक सफल अभिनेता थे, बल्कि एक संस्कारी, सरल और विनम्र व्यक्तित्व के धनी भी थे।

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आज भले ही शशि कपूर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके संवाद, भूमिकाएं और मुस्कान हमेशा जीवित रहेंगी। वह अभिनेता नहीं, बल्कि हिंदी सिनेमा के एक चमकते सितारे थे, जिनकी रोशनी कभी कम नहीं होगी।

फाइबर ऑप्टिक्स तकनीक के जन्मदाता जिनकी खोज ने बदली दुनिया

नरिंदर सिंह कपानी को आज विश्व “फाइबर ऑप्टिक्स के जनक” (Father of Fiber Optics) के रूप में जानता है। उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों ने इंटरनेट, ब्रॉडबैंड, मोबाइल कम्युनिकेशन और मेडिकल टेक्नोलॉजी की दिशा ही बदल दी। उनका जन्म 31 अक्टूबर 1926 को पंजाब के मोगा जिले में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा देहरादून में प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

वर्ष 1952 में कपानी उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड चले गए और Imperial College London में भौतिकी में पीएचडी पूरी की। इसी दौरान उन्होंने अपने मेंटर डॉ. हेरॉल्ड हॉपकिंस के साथ मिलकर यह क्रांतिकारी प्रयोग किया कि प्रकाश को कांच के बेहद पतले और लचीले रेशों (ग्लास फाइबर) के माध्यम से घुमाया और एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाया जा सकता है। यही खोज आगे चलकर “फाइबर ऑप्टिक्स तकनीक” की नींव बनी।

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1960 में प्रकाशित अपने शोध लेख में उन्होंने पहली बार “Fiber Optics” शब्द का उपयोग किया। आज यही तकनीक हाई-स्पीड इंटरनेट, डेटा ट्रांसमिशन, लेजर सर्जरी, एंडोस्कोपी और टेलीकम्युनिकेशन की रीढ़ बन चुकी है। उनकी खोज के बिना वर्तमान डिजिटल युग की कल्पना असंभव थी।

विज्ञान के साथ-साथ उन्होंने संस्कृति के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1967 में उन्होंने “Sikh Foundation” की स्थापना की, जिसमें सिख इतिहास और विरासत को संरक्षित करने का संकल्प लिया गया।

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उनका निधन 4 दिसंबर 2020 को कैलिफोर्निया (USA) में हुआ। उनकी विरासत को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने 2021 में उन्हें मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

नरिंदर सिंह कपानी केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विरासत के संवाहक भी थे, जिन्होंने संपूर्ण विश्व को प्रकाश की एक नई राह दिखाई।

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जीवन में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र – धैर्य और संयम

धैर्य की जीत: क्रोध, बदले और अहंकार के बोझ से डूबता इंसान

कहते हैं धैर्य कड़वा होता है, लेकिन उसका फल अत्यंत मीठा होता है। यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का ऐसा सत्य है जो हर दौर में हर इंसान की परीक्षा लेता है। आज के तेज़ी से बदलते, प्रतिस्पर्धा और तनाव से भरे समाज में अधिकतर लोग अपने भीतर कई तरह के बोझ लेकर चल रहे हैं – क्रोध का बोझ, बदले की भावना का भार और अभिमान की भारी थैली। यही भावनाएँ धीरे-धीरे मनुष्य की सोच, निर्णय और भविष्य को डुबोने लगती हैं।

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यह कहानी है अजय की, जो एक सामान्य परिवार से निकलकर एक बड़े शहर में नौकरी करने आया था। वह मेहनती, मेधावी और ईमानदार था, लेकिन उसके भीतर एक कमजोरी थी – उसे अपने अपमान और असफलता को सहन करना नहीं आता था। छोटी-सी बात पर वह क्रोधित हो जाता, और किसी ने उसका दिल दुखाया तो वह बदले की आग में जलने लगता।

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क्रोध का बोझ और पहली असफलता

ऑफिस में अजय का एक सहकर्मी था – रोहन। रोहन को अजय की प्रतिभा से ईर्ष्या होने लगी। वह अक्सर अजय की गलतियां बॉस के सामने बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता। एक दिन उसने अजय के प्रोजेक्ट को अपना बताकर प्रशंसा भी पा ली। यह बात जब अजय को पता चली, तो उसके भीतर का क्रोध भड़क उठा।

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उसने उसी समय बॉस के सामने रोहन से बहस कर दी। शब्दों की मर्यादा टूट गई। नतीजा यह हुआ कि गलती रोहन की होने के बावजूद, अजय को अनुशासनहीनता के आरोप में चेतावनी मिली और प्रमोशन भी रुक गया।

उस दिन पहली बार उसे एहसास हुआ कि क्रोध का बोझ इंसान की तरक्की रोक देता है।

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बदले की भावना: खुद के लिए खोदी गई खाई
इसके बाद अजय के मन में रोहन के प्रति बदले की आग जलने लगी। वह हर दिन कोई न कोई योजना बनाता कि कैसे रोहन को सबक सिखाया जाए। इसी चक्कर में उसका ध्यान काम से हटने लगा। रिपोर्ट में गलतियां होने लगीं, समय पर काम पूरे नहीं हो पाए। अंततः उसे यह चेतावनी और अत्यधिक तनाव के कारण अस्पताल जाना पड़ा।

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डॉक्टर ने कहा –
“आपकी समस्या शारीरिक नहीं, मानसिक है। आपके भीतर गुस्सा और नफरत ज़हर बन चुकी है।”
यह बात अजय के मन पर गहरी चोट कर गई।
धैर्य का पहला कदम
अस्पताल से लौटने के बाद अजय की मुलाकात उसके पुराने शिक्षक, शर्मा जी से हुई। शर्मा जी ने बस एक बात कही –

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“जो आदमी अपने भीतर धैर्य नहीं रख सकता, वह दुनिया का कोई बोझ नहीं उठा सकता। ज्यादा बोझ लेकर चलने वाले अक्सर डूब जाते हैं – चाहे वह बोझ सामान का हो या भावनाओं का।”

अजय ने पहली बार यह समझा कि असली लड़ाई रोहन से नहीं, बल्कि खुद से है। उसने वही किया, जो सबसे कठिन होता है – माफ करना और धैर्य रखना।

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उसने खुद को बदले की भावना से अलग कर लिया और अपने काम पर ध्यान देना शुरू किया। हर अपमान पर उसने चुप रहकर उत्तर देना सीखा – अपने मेहनत के माध्यम से।

अभिमान का पतन और विनम्रता की शुरुआत

कुछ महीनों के भीतर अजय की मेहनत दिखने लगी। उसे एक बड़े प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी सौंपी गई और वह सफल भी रहा। वही बॉस जो पहले उससे नाराज़ था, अब उसकी तारीफ करने लगा। और सबसे बड़ी बात – रोहन खुद आकर उससे माफी मांगने लगा।

अजय उस समय चाहे तो अहंकार दिखा सकता था, लेकिन उसने सिर्फ मुस्करा कर कहा –
“गलतियां हम सबसे होती हैं। चलो, अब आगे बढ़ते हैं।”

उस क्षण अजय ने जीत सिर्फ रोहन पर नहीं, बल्कि अपने अभिमान पर भी हासिल कर ली थी।

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समाज के लिए संदेश
आज का इंसान जितना आगे बढ़ रहा है, उससे कहीं ज्यादा बोझ अपने मन में भर रहा है। गुस्सा, ईर्ष्या, तुलना, बदला, और घमंड – ये सभी भावनाएं इंसान को भीतर से खोखला कर देती हैं। ऊपर से चाहे वह जितना सफल दिखाई दे, अंदर से वह टूट चुका होता है।

धैर्य केवल सहने का नाम नहीं है, यह खुद को मजबूत बनाने की प्रक्रिया है। जो व्यक्ति धैर्य रखता है, वही जीवन की असली जीत प्राप्त करता है।

धैर्य की जीत कोई एक दिन होने वाली घटना नहीं है, यह रोज़ का अभ्यास है, रोज़ का संघर्ष है और अंततः यही मनुष्य को असाधारण बनाता है।

“जो शांत रहना सीख जाता है, वही संसार के तूफानों से बच जाता है।”

निजी अस्पताल आदेश: 1400 डॉक्टरों और 300 अस्पतालों के लिए सख्त नियम लागू, नहीं माना तो होगी कार्रवाई; मरीज भी जानें नए नियम

मेरठ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। मेरठ निजी अस्पताल आदेश को लेकर बुधवार को सीएमओ कार्यालय ने बड़ा कदम उठाया है। जिले के करीब 1400 निजी डॉक्टरों और 300 से अधिक पंजीकृत अस्पतालों के लिए सख्त निर्देश जारी किए गए हैं। नए दिशानिर्देशों का पालन न करने पर अस्पताल का पंजीकरण निरस्त किया जा सकता है और संबंधित डॉक्टर पर कानूनी कार्रवाई भी होगी।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अशोक कटारिया ने कहा कि कोई भी अस्पताल मरीज को अपनी ही मेडिकल दुकान से दवा लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अस्पताल के भीतर और बाहर स्पष्ट रूप से यह बोर्ड लगाना अनिवार्य होगा कि—“मरीज अपनी मर्जी से किसी भी दुकान से दवा ले सकता है।” एक्सपायरी या निकट एक्सपायरी दवाओं का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।

अस्पतालों में बाहरी दलालों और एंबुलेंस चालकों की दलाली को भी सख्ती से रोका जाएगा। सभी निजी अस्पतालों को प्रवेश द्वार पर पीला बोर्ड लगाना होगा, जिसमें काले अक्षरों से अस्पताल का रजिस्ट्रेशन नंबर, संचालक का नाम, बेड संख्या, उपलब्ध सेवाएं और डॉक्टर-नर्सों की सूची लिखी हो।

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रेफर सिस्टम में लापरवाही पर सीधी कार्रवाई होगी। गंभीर मरीज को तुरंत हायर सेंटर रेफर करना होगा और अनावश्यक भर्ती कर पैसे वसूलने पर कड़ी सज़ा होगी। इसके अलावा हर मरीज का रिकॉर्ड अपडेट रखना अनिवार्य किया गया है, जिसमें इलाज करने वाले डॉक्टर की मुहर और हस्ताक्षर हों।

सीएमओ ने कहा कि सभी अस्पताल मुख्य द्वार पर सेवाओं और ऑपरेशन की अनुमानित रेट लिस्ट चस्पा करेंगे। बिना रेट लिस्ट के अस्पताल चलाने पर कार्रवाई निश्चित है।
साथ ही, आयुष्मान भारत योजना के मरीजों का इलाज पूरी तरह निशुल्क और बिना किसी परेशानी के किया जाना अनिवार्य है। साफ-सफाई, पार्किंग और संक्रमण नियंत्रण से जुड़े मानकों का पालन भी सुनिश्चित करना होगा।

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मेरठ निजी अस्पताल आदेश का उद्देश्य जिला स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और मरीज-अनुकूल व्यवस्था को मजबूत करना है।

आजम खां जेल मामला: परिवार मिलने पहुंचा, लेकिन आजम और अब्दुल्ला ने मुलाकात से किया इनकार; सुनवाई भी टली

रामपुर (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। आजम खां जेल मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। दो पैन कार्ड मामले में सात साल की सजा काट रहे सपा नेता आजम खां और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम से मिलने बुधवार को परिवार के सदस्य रामपुर जिला कारागार पहुंचे, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। बताया जा रहा है कि दोनों नेताओं ने स्वयं मुलाकात करने से इंकार कर दिया, जिससे परिवार को मायूस होकर वापस लौटना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम पर जेल प्रशासन ने चुप्पी साध रखी है, जिससे मामले को लेकर और सवाल खड़े हो रहे हैं।

बुधवार सुबह आजम खां की पत्नी डॉ. तजीन फात्मा, बड़े बेटे अदीब आजम और बहन निखहत मुलाकात की अर्जी लेकर जेल पहुंचे थे। जेल सूत्रों के अनुसार, परिवार की अर्जी स्वीकार हुई, लेकिन आजम और अब्दुल्ला ने मिलने से मना कर दिया। जबकि प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग मुलाकात के लिए पहुंच रहे हैं, परंतु कई दिनों से किसी की मुलाकात नहीं हो पा रही है।

इस बीच आजम खां जेल मामला से जुड़े अन्य मुकदमों की सुनवाई भी प्रभावित रही। फांसीघर की जमीन पर कब्जे के मामले में बुधवार को सुनवाई होनी थी, लेकिन अदालत में कार्यवाही नहीं हो सकी। अब इस मामले की नई तारीख 23 दिसंबर तय की गई है।

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इसी तरह, अब्दुल्ला आजम के खिलाफ वोटरों को धमकाने के मामले में भी सुनवाई नहीं हो सकी। एमपी/एमएलए कोर्ट में सुनवाई निर्धारित थी, लेकिन गवाह के कोर्ट न पहुंचने पर तारीख बढ़ा दी गई। इस मामले की भी अगली सुनवाई 23 दिसंबर को होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, आजम खां जेल मामला सपा की राजनीति और उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था चर्चा का बड़ा मुद्दा बना हुआ है। लगातार टलती सुनवाई और जेल में मुलाकात से इनकार ने इस केस को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

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बदलते मिज़ाज को लेकर अलर्ट जारी, जानें पूरी जानकारी

उत्तर प्रदेश में कल का मौसम बड़ा बदलाव दिखा सकता है। प्रदेश में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने और ठंडी हवाओं के बढ़ने के कारण मौसम विभाग ने कई जिलों के लिए हल्का अलर्ट जारी किया है। यूपी कल का मौसम कई क्षेत्रों में बादलों की मौजूदगी, कहीं-कहीं बूंदाबांदी और तापमान में गिरावट के संकेत दे रहा है।

मौसम विभाग के अनुसार, पश्चिमी यूपी—जैसे मेरठ, सहारनपुर, मुज़फ्फरनगर और बरेली में बादल छाए रह सकते हैं। वहीं, मध्य और पूर्वी यूपी—लखनऊ, कानपुर, अयोध्या, प्रयागराज और वाराणसी में सुबह हल्की धुंध और दिन में आंशिक बादल देखने को मिल सकते हैं। रात का तापमान सामान्य से 2–3 डिग्री कम रहने का अनुमान है।

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यूपी कल का मौसम किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि रबी फसलों पर तापमान में तेजी से गिरावट और अचानक बदलते बादलों का असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, तेज़ उत्तरी हवाएं चलने से ठंड और बढ़ेगी तथा कई जिलों में सुबह-शाम कंपकंपी महसूस हो सकती है।

मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश में अगले 24 घंटों के दौरान कहीं भी भारी बारिश की संभावना नहीं है, लेकिन हल्की फुहार या बूंदाबांदी का असर स्थानीय मौसम को ठंडा कर देगा। यात्रा करने वालों को सलाह है कि सुबह के समय धुंध के कारण दृश्यता कम होने पर सावधानी बरतें।

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संघर्षों से संवरता मानव जीवन का पड़ाव

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डॉ. सतीश पाण्डेय

महराजगंज(राष्ट्र की परम्परा)। मानव जीवन एक निरंतर गतिमान यात्रा है, जिसमें हर पड़ाव अपने साथ नई चुनौतियां, नए अनुभव और नई सीखें लेकर आता है। किसी भी व्यक्ति का जीवन सिर्फ सुखों से नहीं बनता, बल्कि असल रूप से वह संघर्षों से ही संवरता और मजबूत होता है। संघर्ष जीवन का वह अध्याय है जो मनुष्य को भीतर से तराशता है, उसे परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील बनाता है और उसकी क्षमता को उजागर करता है। यही संघर्ष आगे चलकर प्रयत्न, धैर्य और सफलता की नींव बनते हैं।
जीवन के शुरुआती चरणों से ही इंसान संघर्षों का सामना करता है—चाहे वह शिक्षा पाने का संघर्ष हो, समाज में अपनी जगह बनाने का प्रयास हो या परिवार और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन साधने की चुनौती। हर दिन की छोटी–छोटी कठिनाइयां व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक शक्ति को तपाती हैं। जो लोग इन विपरीत परिस्थितियों से नहीं घबराते, बल्कि उन्हें अवसर बनाकर देखते हैं, वही जीवन में बड़ा मुकाम हासिल करते हैं।
संघर्षों का अर्थ सिर्फ दुःख या पीड़ा से नहीं है। ये चुनौतियां व्यक्ति की समझ को गहरा बनाती हैं और उसके व्यक्तित्व को मजबूत करती हैं। आसान परिस्थितियों में कोई भी आगे बढ़ सकता है, लेकिन जब हालात कठिन हों, संसाधन कम हों और रास्ते अनिश्चित हों—तभी असली चरित्र की पहचान होती है। संघर्ष व्यक्ति को बेहतर बनने, सोचने और समाज को समझने की दृष्टि देता है। यही कारण है कि संघर्ष से गुजरने वाले लोग अधिक संवेदनशील, अधिक विनम्र और अधिक परिपक्व होते हैं।
समाज के बड़े–बड़े बदलाव भी संघर्षों की ही देन हैं। इतिहास गवाही देता है कि आम आदमी से लेकर महान नेताओं तक—किसी ने भी बिना चुनौतियों का सामना किए सफलता या पहचान नहीं पाई। खेत में मेहनत करता किसान, अपने परिवार के लिए रोज कमाने वाला मजदूर, नई राह बनाता युवा, या सीमाओं पर डटा सैनिक—हर कोई अपने-अपने मोर्चे पर संघर्ष के जरिए आगे बढ़ता है और इसी प्रक्रिया में समाज की प्रगति का रास्ता भी बनता है।
आज का आधुनिक जीवन भी संघर्षों से मुक्त नहीं है। डिजिटल दौर में जहां सुविधाएं बढ़ी हैं, वहीं प्रतिस्पर्धा भी कई गुना अधिक हो चुकी है। युवाओं के सामने करियर की चुनौतियां हैं, किसानों के सामने बाजार की अनिश्चितताएं, और आम परिवारों के सामने आर्थिक दबाव। ऐसे समय में संघर्ष और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है—क्योंकि वही व्यक्ति को दृढ़ता देता है और उसे हार मानने से रोकता है। वास्तव में, संघर्ष जीवन के उन पड़ावों में से है जिनसे गुजरकर इंसान अपना श्रेष्ठ रूप पाता है। जिस तरह सोना आग में तपकर चमकता है, उसी तरह मनुष्य संघर्षों से गुजरकर अपनी क्षमताओं को पहचानता है और नई ऊंचाइयों तक पहुंचता है। इसलिए संघर्षों को जीवन का बोझ नहीं, बल्कि स्वयं को निखारने का अवसर मानना चाहिए।
मानव जीवन का हर पड़ाव संघर्षों से ही संवरता है—ये संघर्ष ही जीवन की दिशा तय करते हैं, चरित्र गढ़ते हैं और मंजिलों को उजाला देते हैं। यही जीवन की सच्चाई है और यही इसकी खूबसूरती भी।

मानव जीवन: संघर्ष, सपनों और सफलताओं की अनोखी यात्रा

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कैलाश सिंह

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। मनुष्य का जीवन किसी सीधी रेखा की तरह नहीं होता, बल्कि उतार–चढ़ाव, चुनौतियों, उम्मीदों और अनुभवों से भरी एक विविध यात्रा है। यह यात्रा जन्म से लेकर अंतिम साँस तक निरंतर गतिशील रहती है। हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों, सपनों और संघर्षों के आधार पर इस यात्रा को एक अलग रंग देता है। यही कारण है कि मानव जीवन को अनोखी यात्रा कहा जाता है—क्योंकि हर कदम नया अध्याय, हर पड़ाव नई सीख और हर अनुभव एक नया दृष्टिकोण देता है।
जीवन की शुरुआत मासूमियत से होती है। बचपन में जहां सपनों के पंख होते हैं, वहीं चुनौतियों का कोई बोझ नहीं होता। धीरे– धीरे समय बढ़ता है, जिम्मेदारियां बढ़ती हैं और संघर्षों का सामना करना पड़ता है। शिक्षा, संसाधन और अवसर जीवन को नई दिशा देते हैं, लेकिन यह सफर हमेशा आसान नहीं होता। कभी असफलताओं की मार मन को तोड़ती है, तो कभी उम्मीदों के टूटने का दर्द हिम्मत की परीक्षा लेता है। फिर भी, इंसान की सबसे बड़ी ताकत उसकी हार के बाद फिर से उठ खड़े होने की क्षमता है।
जीवन का संघर्ष केवल आर्थिक या सामाजिक नहीं होता, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होता है। रिश्तों की कशमकश, समाज की अपेक्षाएं और अपनी कमियों से जूझते हुए मनुष्य खुद को मजबूत बनाना सीखता है। यही संघर्ष आगे चलकर उसकी सफलताओं की नींव बनते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति कठिनाइयों से लड़ता है, वही मंजिल का मूल्य समझता है और वही सफलता को विनम्रता के साथ जीता भी है।
सपने जीवन में ऊर्जा भरते हैं। यही सपने व्यक्ति को आगे बढ़ने, गिरने के बाद उठने और दुनिया को एक नई दिशा देने की प्रेरणा देते हैं। इतिहास साक्षी है कि जिसने सपने देखे और उन्हें पूरा करने का साहस रखा, उसने दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई। चाहे वह वैज्ञानिक हो, किसान, मजदूर, खिलाड़ी या आम नागरिक—हर सफलता के पीछे उसकी अनदेखी मेहनत और गहरे संघर्ष छिपे होते हैं।
मानव जीवन की इस अनोखी यात्रा में सफलता अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया है। एक लक्ष्य पूरा होते ही दूसरा लक्ष्य सामने खड़ा हो जाता है। इसलिए यह मान लेना गलत होगा कि सफलता वही है जो दुनिया देखती है। असली सफलता तो वह है जो व्यक्ति के भीतर संतोष, आत्मबल और अनुभवों के रूप में जमा होती रहती है।
आज के तेजी से बदलते दौर में जहां प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, वहीं जीवन की चुनौतियां भी जटिल होती जा रही हैं। ऐसे समय में जरूरत है कि मनुष्य अपने भीतर विश्वास बनाए रखे, सपनों को कभी बूढ़ा न होने दे और संघर्षों से डरने के बजाय उनसे सीखने का साहस रखे। क्योंकि अंततः जीवन केवल मंज़िल पाने का नाम नहीं है, बल्कि उस यात्रा का भी नाम है जो हमें इंसान होने का अर्थ समझाती है। मानव जीवन सचमुच संघर्ष, सपनों और सफलताओं का अद्भुत संगम है—एक ऐसी यात्रा जिसमें हर व्यक्ति अपनी कहानी स्वयं लिखता है।

मनरेगा कर्मियों का मानदेय 30 प्रतिशत बढ़ेगा – मंत्री दीपिका पांडेय सिंह

रांची ( राष्ट्र की परम्परा) ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्री दीपिका पांडेय सिंह की अध्यक्षता में झारखंड राज्य ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद की अहम बैठक मंगलवार को हुई। बैठक में मनरेगा कर्मियों के मानदेय, बीमा सुविधा और योजनाओं के क्रियान्वयन पर कई बड़े निर्णय लिए गए। मंत्री ने स्पष्ट कहा कि मनरेगा कर्मियों का मानदेय तुरंत 30 प्रतिशत बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि ग्रामीण विकास की रीढ़ माने जाने वाले इन कर्मियों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत करना जरूरी है। मानदेय बढ़ने से उनकी कार्य क्षमता और मनोबल दोनों में वृद्धि होगी।

बीमा कवर का प्रस्ताव तैयार होगा

बैठक में मनरेगा कर्मियों के लिए ग्रुप इंश्योरेंस, दुर्घटना बीमा और जीवन बीमा जैसी सुविधाएं देने पर भी सहमति बनी। मंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि इसके लिए एक अलग प्रस्ताव जल्द तैयार किया जाए। उन्होंने कार्मिकों के ग्रेड पे से जुड़े प्रस्ताव को भी शीघ्र लाने का आदेश दिया।

मनरेगा कार्यों की व्यापक समीक्षा

बैठक में राज्य के अलग-अलग जिलों में चल रहे मनरेगा कार्यों की समीक्षा की गई। आने वाले समय में इन्हें और प्रभावी ढंग से लागू करने की रणनीति भी तय हुई। मंत्री ने कहा कि ग्रामीण जनता को रोजगार का अधिकार देना सरकार की प्राथमिकता है और मनरेगा इस दिशा में एक मजबूत आधार है।

दीदी बाड़ी योजना से महिलाओं को मजबूती

मंत्री ने बताया कि दीदी बाड़ी योजना से ग्रामीण महिलाओं को नई पहचान और आर्थिक सहारा मिला है। मनरेगा के तहत रिकॉर्ड मैन-डेज सृजन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दी है।
तकनीकी समस्या पर चिंता
केंद्र सरकार द्वारा जल्दबाजी में लागू की गई तकनीकी प्रणाली के कारण मटेरियल भुगतान में हो रही देरी पर भी चर्चा हुई। मंत्री ने भरोसा जताया कि राज्य और केंद्र के बीच समन्वय बनाकर समस्या का समाधान जल्द निकाला जाएगा।

जल, जंगल, जमीन और मनरेगा की भूमिका

उन्होंने कहा कि झारखंड खनिज संपदा से भरपूर है, लेकिन कृषि की भी व्यापक संभावनाएं हैं। मनरेगा के माध्यम से इन्हें और मजबूत किया जा सकता है। जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा में भी मनरेगा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।