Sunday, June 28, 2026
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दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण से मामूली राहत, लेकिन हवा अब भी ‘खराब’; कई इलाकों में AQI बहुत खराब श्रेणी में

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। दिल्ली-एनसीआर की हवा अभी भी लोगों को राहत देने के मूड में नहीं है। मंगलवार सुबह राजधानी दिल्ली की वायु गुणवत्ता ‘खराब’ श्रेणी में दर्ज की गई। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार सुबह 8 बजे दिल्ली का औसत AQI 292 रहा, जबकि कई इलाकों में स्मॉग की हल्की परत के कारण दृश्यता प्रभावित हुई।

दिल्ली के क्षेत्रों में AQI स्थिति

मंगलवार सुबह इंडिया गेट और कर्तव्य पथ पर हल्की धुंध छाई रही, जहां AQI 265 रिकॉर्ड किया गया। राजधानी के अन्य प्रमुख क्षेत्रों में AQI इस प्रकार रहा:

ITO – 294, अलीपुर – 282, आया नगर – 253, बुराड़ी – 291

अक्षरधाम, गाजीपुर और आनंद विहार में प्रदूषण का स्तर सबसे अधिक रहा, जहाँ AQI 319 दर्ज हुआ, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में आता है। इसके अलावा:

अशोक विहार – 305, बवाना – 342, चांदनी चौक – 333, द्वारका – 314

इन सभी इलाकों में हवा की गुणवत्ता ‘बहुत खराब’ कैटेगरी में रही।

सोमवार को भी दिल्ली की हवा रही बेहद खराब

सोमवार सुबह भी शहर हल्के कोहरे और स्मॉग की चादर में लिपटा रहा। इस दौरान सोमवार का औसत AQI 314 दर्ज किया गया, जो ‘बेहद खराब’ श्रेणी में आता है। इसके कारण सांस के मरीजों और बुजुर्गों को दिक्कत का सामना करना पड़ा।

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एनसीआर की स्थिति: नोएडा सबसे प्रदूषित

दिल्ली से सटे शहरों में नोएडा की हवा सबसे खराब पाई गई, जहाँ AQI 330 दर्ज किया गया।
अन्य क्षेत्रों में स्थिति इस प्रकार रही:

गाजियाबाद – 309, ग्रेटर नोएडा – 302, गुरुग्राम – 278, फरीदाबाद – 203 (तुलनात्मक रूप से सबसे साफ)

किस स्रोत से कितना प्रदूषण?

CPCB के अनुसार सोमवार को दिल्ली में कुल प्रदूषण योगदान इस प्रकार रहा:

वाहन प्रदूषण – 17.58%, आवासीय गतिविधियाँ – 4.29%, निर्माण कार्य – 2.49%, पेरिफेरल इंडस्ट्री – 8.42%

उत्तर-पश्चिम दिशा से लगभग 20 किमी/घंटा की रफ्तार से हवा चली, लेकिन इससे भी प्रदूषण स्तर में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई।

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आने वाले दिनों में राहत की संभावना कम

CPCB के पूर्वानुमान के अनुसार, गुरुवार तक हवा बेहद खराब श्रेणी में बनी रह सकती है। इस दौरान लोगों को आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और स्मॉग के कारण दृश्यता में कमी जैसी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है।

नहर में मिला अज्ञात बुजुर्ग का शव, क्षेत्र में फैली सनसनी; हर एंगल से जांच में जुटी पुलिस

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। घुघली थाना क्षेत्र के भुवना गांव में सोमवार सुबह उस समय हड़कंप मच गया, जब गांव के पास बह रही नहर में एक लगभग 70 वर्षीय अज्ञात बुजुर्ग का शव तैरता हुआ दिखाई दिया। ग्रामीणों की सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को बाहर निकलवाया।

पुलिस के अनुसार शव काफी समय पुराना प्रतीत हो रहा है और पहचान योग्य स्थिति में नहीं था। फिलहाल मृतक की पहचान नहीं हो सकी है। थानाध्यक्ष ने बताया कि मामले को संदिग्ध मानकर हर एंगल से जांच की जा रही है। यह दुर्घटना है, हत्या है या किसी अन्य कारण से मौत हुई है—इसका स्पष्ट कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सामने आएगा।

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शव को पहचान के उद्देश्य से 72 घंटे के लिए मर्चरी, महराजगंज में सुरक्षित रखा गया है। पुलिस आसपास के थानों से गुमशुदगी से जुड़ी जानकारी भी जुटा रही है। घटना के बाद गांव और आसपास के क्षेत्रों में दहशत और चर्चा का माहौल है।

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सरकारी अस्पतालों में दलाली तंत्र—गरीबों के इलाज का सबसे बड़ा दुश्मन

भारत में सरकारी अस्पताल गरीबों और आम जनता के लिए जीवनरेखा माने जाते हैं, क्योंकि यहां इलाज लगभग मुफ्त या कम लागत पर उपलब्ध होता है। लेकिन इसी व्यवस्था के भीतर वर्षों से एक ऐसा तंत्र पनप चुका है, जो गरीबों के इलाज का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुका है—सरकारी अस्पतालों में दलाली तंत्र। यह नेटवर्क न सिर्फ मरीजों का आर्थिक शोषण करता है, बल्कि अस्पतालों की छवि, चिकित्सा सेवाओं की विश्वसनीयता और प्रशासनिक पारदर्शिता—सब पर गहरा असर डालता है।

कैसे काम करता है सरकारी अस्पतालों में दलाली तंत्र?

दलालों का नेटवर्क आमतौर पर अस्पताल के महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सक्रिय रहता है—ओपीडी काउंटर, आपातकालीन वार्ड, टेस्ट सेंटर, दवा वितरण कक्ष और भर्ती काउंटर। ये लोग मरीजों से संपर्क कर उन्हें “जल्दी नंबर लगवाने”, “बेड दिलवाने”, “डॉक्टर से सीधे मिलवाने” या “टेस्ट जल्दी करवाने” का लालच देते हैं। बदले में उनसे भारी रकम वसूल की जाती है।

कुछ मामलों में दलाल निजी अस्पतालों और निजी पैथोलॉजी से भी जुड़े रहते हैं, जो सरकारी अस्पताल के मरीजों को गलत जानकारी देकर बाहर भेज देते हैं, ताकि उन्हें कमीशन मिल सके।

गरीब मरीजों पर सबसे बड़ा असर

जो लोग सरकारी अस्पताल इसलिए आते हैं क्योंकि उनके पास आर्थिक संसाधन कम हैं, वही दलाली तंत्र का सबसे आसान शिकार बनते हैं।

कोई दलाल कहता है—“लाइन में घंटों खड़े रहोगे, मगर 500 रुपये दोगे तो तुरंत काम हो जाएगा।”
कोई कहता है—“सरकारी दवा नहीं मिलेगी, बाहर से खरीदनी पड़ेगी।”
कई मामले ऐसे भी सामने आते हैं जहाँ दलाल बेड उपलब्ध न होने की झूठी बात कहकर मरीज को निजी अस्पताल भेज देते हैं।

इस तरह गरीब मरीजों के अधिकार, सुविधाएँ और सरकारी योजनाओं का लाभ, सब दलालों की जेब में चला जाता है।

कहाँ है निगरानी? क्यों नहीं रुक रहा यह तंत्र?

अस्पताल प्रशासन, सुरक्षा कर्मी और स्वास्थ्य विभाग के कुछ अधिकारी इन दलालों की गतिविधियों से पूरी तरह अनजान नहीं होते। कई बार कार्रवाई होती भी है, लेकिन तंत्र इतना मजबूत है कि कुछ दिनों बाद वही दलाल वापस सक्रिय हो जाते हैं।

पर्याप्त निगरानी का अभाव
सीसीटीवी की सीमित निगरानी
भीड़ का फायदा उठाकर दलालों का घुल-मिल जाना
कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत
ये सभी कारण इस अवैध सिस्टम को खत्म करने में बड़ी बाधाएँ हैं।
समाधान—क्या किया जाना जरूरी है?
देशभर में इस तंत्र को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है:
अस्पतालों में पूर्ण डिजिटल व्यवस्था—ऑनलाइन पंजीकरण, ऑनलाइन रिपोर्ट, SMS अलर्ट
हर संवेदनशील जगह पर उच्च गुणवत्ता वाले सीसीटीवी कैमरे
दलाली में शामिल कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई
अस्पताल परिसरों में अनधिकृत व्यक्तियों के प्रवेश पर रोक
आम जनता में जागरूकता—सरकारी सुविधा मुफ्त है, दलालों को पैसे न दें
सरकार अगर इन कदमों को गंभीरता से लागू करे, तो दलाली तंत्र का बड़ा हिस्सा खत्म हो सकता है।
सरकारी अस्पतालों में दलाली तंत्र भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक गंभीर खतरा है। यह न सिर्फ गरीब जनता के अधिकारों को छीनता है, बल्कि सरकारी संसाधनों को भी खराब करता है। जरूरत है कि प्रशासन और सरकार इस समस्या को प्राथमिकता पर लेकर देशभर में मजबूत व्यवस्था बनाएं। जब तक दलाली खत्म नहीं होगी, तब तक सरकारी अस्पतालों का असली उद्देश्य—सभी को समान और सुलभ स्वास्थ्य सेवा—पूरा नहीं हो पाएगा।

हाईकोर्ट की दो टूक: धर्मोपदेश देना और बाइबिल बांटना अपराध नहीं, राज्य सरकार से मांगा जवाब

लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अवैध धर्मांतरण के एक मामले में पुलिस कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने साफ कहा है कि धर्मोपदेश देना और बाइबिल बांटना स्वयं में अपराध नहीं है। अदालत ने इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

धर्मांतरण मामले में दर्ज एफआईआर को चुनौती

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें राम केवल प्रसाद समेत अन्य आरोपियों ने सुल्तानपुर के धम्मौर थाने में उनके खिलाफ दर्ज अवैध धर्मांतरण निवारण कानून 2021 और भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत एफआईआर को रद्द करने की मांग की है।

याचिका के अनुसार, वादी मनोज कुमार सिंह ने 17 अगस्त 2025 को एफआईआर दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि आरोपियों ने प्रार्थना सभा आयोजित की, दलितों और गरीबों को बाइबिल बांटी और उनका धर्मांतरण कराने का प्रयास किया।

“बाइबिल बांटना अपराध नहीं साबित कर पाए” — हाईकोर्ट

याचियों की ओर से कहा गया कि एफआईआर तथ्यहीन और झूठे आरोपों पर आधारित है। सरकारी वकील ने याचिका का विरोध तो किया, लेकिन कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाए कि बाइबिल बांटना या धर्मोपदेश देना कानूनन अवैध है।

खंडपीठ—न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति बबिता रानी—ने कहा कि प्राथमिक स्तर पर आरोप गंभीर रूप से संदेहास्पद प्रतीत होते हैं, इसलिए राज्य सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

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राज्य सरकार को चार बिंदुओं पर हलफनामा दाखिल करने का आदेश

कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार:

• चार निर्धारित बिंदुओं पर अपना जवाबी हलफनामा छह सप्ताह के भीतर दाखिल करे

• इसके बाद याची दो सप्ताह में अपना प्रतिउत्तर दाखिल कर सकते हैं

मामले की अगली सुनवाई न्यायालय ने छह सप्ताह बाद तय की है।

कानूनी और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण फैसला

विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट का यह रुख धार्मिक स्वतंत्रता, प्रचार और धार्मिक साहित्य वितरण से जुड़े संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। यह फैसला भविष्य के धर्मांतरण मामलों में भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।

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पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में 50% से ज्यादा की कमी, दो साल में 68 करोड़ का जुर्माना

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में इस वर्ष बड़ी कमी देखने को मिली है। केंद्रीय वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) से प्राप्त आरटीआई जानकारी के अनुसार, 2024 की तुलना में 2025 में खेतों में आग लगाने की घटनाएं 53% से अधिक कम हुई हैं। दोनों राज्यों में पराली जलाने के कुल मामले 12,750 से घटकर 6,080 रह गए।

पंजाब-हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में तेज गिरावट

आरटीआई डेटा के अनुसार:

• पंजाब में 2024: 5,802 मामले → 2025: 1,963

• हरियाणा में 2024: 667 मामले → 2025: 230

कुल मिलाकर दोनों राज्यों में घटनाओं की संख्या आधे से भी कम हो गई है।

एफआईआर में भी 66% की गिरावट

किसानों के खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर भी तेज़ी से घटी हैं:

• 2024: 6,469 एफआईआर

• 2025: 2,193 एफआईआर

यह दिखाता है कि पराली प्रबंधन कार्यक्रमों और निगरानी सिस्टम में सुधार हुआ है।

दो साल में लगाया गया 68 करोड़ रुपये का जुर्माना

आरटीआई विवरण बताता है कि पंजाब और हरियाणा में दो वर्षों में कुल 68 करोड़ रुपये का जुर्माना पराली जलाने पर लगाया गया।

2024 में: लगभग 44 करोड़ रुपये

2025 में: लगभग 25 करोड़ रुपये

जुर्माने में हुई कमी पराली जलाने की घटनाओं में आई गिरावट से जुड़ी मानी जा रही है।

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दिल्ली की हवा पर पराली का असर बेहद कम

दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर मिले डेटा के अनुसार:

• नवंबर 2025 के अधिकांश दिनों में पराली का योगदान 5% से कम रहा

• केवल 12–13 नवंबर को यह बढ़कर 22% तक पहुंचा

यह आंकड़े संकेत देते हैं कि दिल्ली की खराब हवा के पीछे पराली अब मुख्य कारण नहीं है।

पर्यावरण सुधार की दिशा में सकारात्मक संकेत

सरकार द्वारा उपकरण सब्सिडी, जागरूकता अभियान और वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराने जैसे कदमों के कारण पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी आई है। विशेषज्ञ इसे उत्तरी भारत में वायु प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में बड़ा सुधार मान रहे हैं।

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भारतीय चावल और कनाडाई खाद पर नए टैरिफ लगाने के संकेत, अमेरिकी किसानों की शिकायत पर भड़के ट्रंप

वॉशिंगटन (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि उनकी सरकार जल्द ही भारत से आने वाले चावल और कनाडा से आयातित खाद (फर्टिलाइजर) पर नए टैरिफ लगा सकती है। यह कदम अमेरिकी किसानों की बढ़ती शिकायतों के बाद उठाया जा सकता है, जो पिछले कई महीनों से विदेशी आयात के कारण नुकसान का आरोप लगा रहे हैं।

व्हाइट हाउस में आयोजित एक गोलमेज बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि भारत, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों से कम कीमत वाले चावल की “डंपिंग” अमेरिकी किसानों को प्रभावित कर रही है। इसी बैठक में उन्होंने अमेरिकी किसानों के लिए 12 अरब डॉलर के नए सहायता पैकेज की भी घोषणा की।

भारतीय चावल पर “डंपिंग” जांच के संकेत

ट्रंप ने कहा कि सरकार इस बात की जांच करेगी कि क्या विदेशों से आने वाला चावल जानबूझकर कम कीमत पर अमेरिकी बाजार में उतारा जा रहा है। उन्होंने कहा:

“उन्हें डंपिंग नहीं करनी चाहिए। मैंने यह सुना है और इसकी जांच की जाएगी। आप ऐसा नहीं कर सकते।”

अमेरिकी किसान लगातार दावा कर रहे हैं कि भारतीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई चावल की वजह से स्थानीय चावल की कीमतों में गिरावट आई है।

कनाडाई खाद पर ‘बहुत कड़े’ टैरिफ की चेतावनी

कनाडा से बड़े पैमाने पर आयात होने वाली खाद पर भी ट्रंप ने कठोर रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि यदि घरेलू उद्योग को बचाने की जरूरत पड़ी तो कनाडाई उर्वरक पर “बहुत कड़े टैरिफ” लगाए जा सकते हैं।

“हम अपने घरेलू उत्पादन को मजबूत करना चाहते हैं, और जरुरत पड़ी तो कनाडाई फर्टिलाइजर पर भारी टैरिफ लगाए जाएंगे।”

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भारत और कनाडा के साथ व्यापार तनाव बढ़ने के संकेत

ट्रंप प्रशासन इस साल पहले ही भारत पर 50% तक के टैरिफ लगा चुका है। इस सप्ताह एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत की यात्रा पर आ रहा है, लेकिन किसी बड़े समाधान की संभावना कम मानी जा रही है।
कनाडा के साथ भी ट्रंप कई बार व्यापार समझौते की समीक्षा की चेतावनी दे चुके हैं। ताज़ा बयान दोनों देशों के साथ व्यापारिक तनाव बढ़ने का संकेत देते हैं।

किसान बने चुनावी रणनीति का केंद्र

अमेरिकी किसान हे ट्रंप के प्रमुख समर्थक माने जाते हैं। बढ़ती लागत और विदेशी आयात की प्रतिस्पर्धा से परेशान किसान लगातार सरकार पर दबाव बना रहे हैं। नए टैरिफ और सहायता पैकेज को चुनावी वर्ष में किसानों को साधने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है।

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चाइल्ड लेबर—कानून मौजूद, फिर भी बच्चे मजदूर क्यों? भारत की सच्चाई उजागर करती विशेष रिपोर्ट

(राष्ट्र की परम्परा)

भारत में चाइल्ड लेबर पर सख्त कानून मौजूद हैं, फिर भी सड़कों, ढाबों, फैक्ट्रियों और घरों में आज भी हजारों मासूम बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं। सरकार की योजनाओं, सामाजिक जागरूकता अभियानों और कानूनों के बावजूद बच्चों के हाथों से किताबें छूटकर औज़ार पकड़ने की मजबूरी सवाल उठाती है कि आखिर कमी कहाँ है? यह रिपोर्ट बताती है कि कानूनी ढांचा मजबूत होने के बावजूद चाइल्ड लेबर क्यों खत्म नहीं हो पा रहा।

कानून क्या कहते हैं?

भारत में बाल श्रम को रोकने के लिए चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेग्युलेशन) एक्ट 1986, बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) 2009, और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जैसे कानून मौजूद हैं। 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों से किसी भी तरह के श्रम, और 14 से 18 वर्ष तक के किशोरों से खतरनाक उद्योगों में काम लेना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद चाइल्ड लेबर के आंकड़े हर साल बढ़ते दिखाई देते हैं।

गरीबी और मजबूरी: सबसे बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में चाइल्ड लेबर का सबसे बड़ा कारण गरीबी है। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिवार बच्चों को पढ़ाने के बजाय कमाने भेजना ज्यादा सुरक्षित विकल्प समझते हैं। कई क्षेत्रों में आज भी बच्चों की मजदूरी को आम माना जाता है, क्योंकि परिवार की आय में होने वाली छोटी-छोटी मदद उन्हें जीवनयापन का सहारा देती है।

शिक्षा व्यवस्था की कमजोर पकड़

ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आज भी शिक्षा तक पहुंच आसान नहीं है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी, खराब ढांचा और अभिभावकों में जागरूकता की कमी के कारण बच्चे पढ़ाई छोड़कर छोटे-मोटे कामों में लग जाते हैं। पढ़ाई का बोझ और परिवार की आर्थिक जरूरतें उन्हें मजदूरी की ओर खींच लेती हैं, जिससे चाइल्ड लेबर का दुष्चक्र जारी रहता है।

बढ़ती मांग: सस्ते श्रमिकों की तलाश

कई उद्योगों, ढाबों, ईंट-भट्टों, चमड़ा कारखानों और घरों में बच्चों को इसलिए काम पर रखा जाता है क्योंकि वे कम पैसे लेते हैं और आसानी से नियंत्रित किए जा सकते हैं। सस्ता श्रम मिलने की वजह से कई व्यवसायी कानूनों को नजरअंदाज कर देते हैं। इस मांग को रोकने के लिए सख्त कार्रवाई की जरूरत है।

निगरानी तंत्र कमजोर, कार्रवाई सीमित

कई राज्यों में श्रम विभाग और चाइल्ड वेलफेयर कमेटियों के पास जनशक्ति की कमी है। नियमित छापेमारी न होने से चाइल्ड लेबर के मामले सामने नहीं आते। जहां कार्रवाई होती भी है, वहां अक्सर छोटे दुकानदार या नियोक्ता पकड़े जाते हैं, लेकिन बड़े नेटवर्क तक पहुँचना मुश्किल साबित होता है।

समाधान क्या?

विशेषज्ञों के अनुसार चाइल्ड लेबर को खत्म करने के लिए केवल कानून काफी नहीं है।
इसके लिए—
गरीब परिवारों की आय बढ़ाने वाली योजनाओं की मजबूती
बच्चों की शिक्षा में सुधार
पंचायत स्तर पर निगरानी
उद्योगों में कड़ी जांच
और सामाजिक जागरूकता
जरूरी है। जब तक समाज खुद आगे बढ़कर “बच्चे मजदूर नहीं, विद्यार्थी हैं” की सोच नहीं अपनाएगा, तब तक चाइल्ड लेबर खत्म नहीं होगी।

इनामिया अपराधी संजय उर्फ झल्लू क्राइम ब्रांच की पकड़ में, कई राज्यों में मचाई थी दहशत

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)दिल्ली पुलिस ने बावरिया गिरोह के एक कुख्यात और लंबे समय से फरार चल रहे वांछित अपराधी को पंजाब के मंडी गोबिंदगढ़ से गिरफ्तार कर बड़ी सफलता हासिल की है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार पकड़ा गया आरोपी संजय उर्फ झल्लू उत्तर प्रदेश के शामली जिले का रहने वाला है और उस पर दिल्ली, यूपी और पंजाब सहित कई राज्यों में संगठित अपराध संचालित करने के आरोप थे।

डीसीपी (क्राइम) हर्ष इंदौरा ने बताया कि संजय उर्फ झल्लू बावरिया गिरोह का सक्रिय सदस्य है और उसके खिलाफ हत्या के प्रयास, डकैती, झपटमारी, सेंधमारी, चोरी और Arms Act के तहत कुल 34 आपराधिक मामले दर्ज हैं। दिल्ली के आदर्श नगर थाने में दर्ज एक मामले में उसे पहले भी दोषी ठहराया जा चुका है।

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पुलिस के मुताबिक आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए लगातार उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के बीच ठिकाने बदलता रहा। उसकी गिरफ्तारी पर यूपी पुलिस ने नकद इनाम भी घोषित किया था। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने करीब दो सप्ताह तक उसकी गतिविधियों की निगरानी की और तत्पश्चात मंडी गोबिंदगढ़ स्थित उसके ठिकाने पर छापेमारी कर उसे दबोच लिया।

पूछताछ में संजय ने खुलासा किया कि उसने करीब दस वर्ष पहले अपने गांव के साथियों के साथ मिलकर दिल्ली, यूपी, पंजाब, चंडीगढ़ और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में लूट और झपटमारी की वारदातें शुरू की थीं। पुलिस ने बताया कि जमानत मिलने के बाद भी वह लगातार आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा और अदालत में पेश होना बंद कर दिया, जिसके चलते उसके खिलाफ कई गैर-जमानती वारंट जारी हुए और उसे भगोड़ा अपराधी घोषित कर दिया गया।

फिलहाल दिल्ली, गाजियाबाद, मुरादाबाद और अमरोहा में दर्ज मामलों की जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

सिख परंपरा की अनोखी सेवा: क्यों खास है गुरुद्वारे में जूता संभालना

गुरुद्वारे की जूता सेवा का आध्यात्मिक महत्व: विनम्रता, करुणा और आत्मिक शुद्धि का अद्भुत संगम

दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा धर्म डेस्क)गुरुद्वारे में की जाने वाली जूता सेवा सिख परंपरा की सबसे पवित्र और प्रेरणादायक सेवाओं में से एक मानी जाती है। यह केवल जूतों को रखना या व्यवस्थित करना भर नहीं, बल्कि विनम्रता, सेवा-भाव और आत्मिक जागृति का अत्यंत महत्वपूर्ण माध्यम है। इस सेवा के माध्यम से हर व्यक्ति अपने भीतर छिपे अहंकार, घमंड और नकारात्मक विचारों से मुक्त होकर शुद्ध मन के साथ गुरु के मार्ग पर चलता है।

गुरुद्वारे में आने वाले श्रद्धालुओं के जूतों को संभालना सिख धर्म में सीधी ईश्वर-सेवा माना गया है। यह विश्वास किया जाता है कि बिना किसी स्वार्थ के किए गए इस छोटे से कार्य से व्यक्ति के मन में करुणा, दया और सेवा-भावना विकसित होती है। जूता सेवा करते समय इंसान हर वर्ग, जाति, उम्र और परिस्थिति से जुड़े लोगों के संपर्क में आता है, जिससे उसके भीतर सबके प्रति समानता और प्रेम की भावना उत्पन्न होती है।

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इस सेवा का आध्यात्मिक पक्ष भी उतना ही गहरा है। जूतों को उठाना, साफ करना या व्यवस्थित करना व्यक्ति को यह एहसास कराता है कि हर कार्य, चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, गुरु की राह में एक अमूल्य योगदान है। इससे मन में विनम्रता बढ़ती है और अहंकार स्वत: कम हो जाता है। यही वजह है कि सिख मत में कहा गया है—
“सेवा करनी सर्वश्रेष्ठ भक्ति है।”

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जूता सेवा का एक बड़ा लाभ यह भी है कि यह मानसिक तनाव को कम करती है। शांत मन से की गई यह सेवा व्यक्ति को अंदरूनी सुकून, संतोष और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है। दैनिक जीवन की अनेक बाधाएँ, परेशानियाँ और चिंताएँ इस निस्वार्थ सेवा के दौरान दूर होती चली जाती हैं। माना जाता है कि नियमित रूप से सेवा करने से पिछले कर्मों का भार भी हल्का होता है और जीवन में गुरु कृपा का अनुभव होता है।

आज के समय में जब समाज तेजी से बदल रहा है, गुरुद्वारों में जूता सेवा लोगों को मानवता और विनम्रता का जीवंत पाठ सिखाती है। यह परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों पर आधारित है। यही वजह है कि गुरुद्वारों में जूता सेवा को चरित्र निर्माण और आध्यात्मिक उन्नति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

पुलिस अलर्ट मोड पर: गोवा नाइट क्लब हादसे के बाद होटलों-बार की सख्त जांच तेज

धनबाद (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)गोवा के एक नाइट क्लब में हुए दर्दनाक हादसे के बाद धनबाद पुलिस सुरक्षा जांच को लेकर पूरी तरह अलर्ट मोड में आ गई है। एसएसपी प्रभात कुमार के निर्देश पर सोमवार देर रात जिले के विभिन्न थाना क्षेत्रों में होटलों, रेस्टोरेंट, कैफे, बार और मनोरंजन स्थलों पर व्यापक औचक निरीक्षण किया गया। यह जांच अभियान दूसरे दिन भी देर रात तक जारी रहा।

पुलिस टीम ने प्रतिष्ठानों की संरचनात्मक सुरक्षा, फायर सेफ्टी उपकरण, अग्निशामक यंत्रों की वैधता, आपातकालीन निकास, सीसीटीवी कवरेज, विद्युत वायरिंग, धूम्रपान नियमों का अनुपालन और कर्मचारियों की सुरक्षा जागरूकता जैसे सभी अहम मानकों का गहन मूल्यांकन किया।

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बैंक मोड़, हीरापुर, सरायढेला, राजगंज, कतरास, झरिया और तेतुलमारी में चलाए गए इस निरीक्षण में कई प्रतिष्ठानों में व्यवस्था संतोषजनक पाई गई, लेकिन कुछ जगहों पर गंभीर खामियां भी उजागर हुईं। कई होटलों और बार में फायर एक्सटिंग्विशर एक्सपायर्ड मिले और कर्मचारियों को उनके इस्तेमाल की जानकारी तक नहीं थी।

एसएसपी ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जिन प्रतिष्ठानों में कमियां पाई गई हैं, उन्हें 48 घंटे के भीतर सुधार रिपोर्ट जमा करनी होगी। समय सीमा में सुधार नहीं करने वालों के खिलाफ लाइसेंस निलंबन से लेकर प्रतिष्ठान सील करने तक की सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि भीड़-भाड़ वाले स्थलों पर सुरक्षा मानकों की अनदेखी किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है और नागरिकों की सुरक्षा ही प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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उन्होंने यह भी बताया कि यह जांच सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि निरंतर निरीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसे आगे और अधिक कठोर बनाया जाएगा। आवश्यकतानुसार नगर निगम, अग्निशमन विभाग और जिला प्रशासन को भी संयुक्त अभियान में शामिल किया जाएगा।

बिहार को मिलेगा पहला हाई-टेक ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट

पटना जंक्शन के बाहर बनेगा ट्रैफिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, बिहार को मिलेगा पहला हाई-टेक ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट

पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)जंक्शन पर लगने वाला जाम राजधानी की सबसे पुरानी समस्याओं में से एक है, लेकिन अब यह स्थिति बदलने जा रही है। बिहार सरकार ने सोमवार को पुलिस मुख्यालय में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में पटना ट्रैफिक सिस्टम में ऐतिहासिक बदलाव की दिशा में कई बड़े फैसले लिए। उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में पटना जंक्शन के बाहर ट्रैफिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर बनाने की मंजूरी दी गई, जिसके बाद पटना का यातायात प्रबंधन पूरी तरह हाई-टेक मॉडल पर चलेगा।

बिहार का पहला आधुनिक ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट

बैठक में सबसे महत्वपूर्ण फैसला रहा—बिहार में पहला आधुनिक ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट स्थापित करना। यह संस्थान मुंबई और दिल्ली की तर्ज पर तैयार किया जाएगा। एडीजी ट्रैफिक सुधांशु कुमार के अनुसार, इसके लिए विस्तृत प्रस्ताव तैयार हो चुका है और पटना या उसके आसपास भूमि चयन की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

इस इंस्टीट्यूट में जवानों से लेकर अफसरों तक को एक सप्ताह से छह महीने की ट्रेनिंग दी जाएगी, जिसमें बेसिक, रिफ्रेशर और स्पेशल कोर्स शामिल होंगे। ट्रेनिंग के लिए देश-विदेश के अनुभवी ट्रैफिक विशेषज्ञ भी बुलाए जाएंगे।

प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर खास जोर

यह ट्रेनिंग सेंटर केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं होगा। जवानों को इंडोर-आउटडोर प्रैक्टिकल के माध्यम से ट्रैफिक प्रबंधन की वास्तविक स्थितियों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाएगा।
VIP मूवमेंट, भीड़भाड़ वाले आयोजन, त्योहार, मेले, रैलियां—सभी परिस्थितियों में ट्रैफिक नियंत्रण की तकनीकें सिखाई जाएंगी।

सबसे खास बात यह कि पूरे बिहार के प्रमुख मार्गों की विस्तृत ट्रैफिक मैपिंग ट्रेनिंग का हिस्सा होगी। जैसे—पटना जंक्शन से दानापुर तक कहां मोड़ है, कौन-सा फ्लाईओवर, किस गोलंबर पर वाहनों की रुकावट रहती है—हर जानकारी ट्रेनिंग मॉड्यूल में शामिल की जाएगी।

सीसीटीवी, कड़क कार्रवाई और जागरूकता अभियान

गृह मंत्री ने सभी पंचायतों और शहरी निकायों के एंट्री-एग्जिट पॉइंट पर सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्देश दिया। ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई और अवैध पार्किंग हटाने के लिए प्राइवेट क्रेन लगाने के आदेश भी दिए गए।
साथ ही स्कूल-कॉलेजों और पंचायतों में बड़े पैमाने पर ट्रैफिक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया गया।

पटना जंक्शन के बाहर बनने वाला ट्रैफिक कमांड एंड कंट्रोल सेंटर न केवल भीड़भाड़ कम करेगा बल्कि ट्रैफिक पुलिस की कार्यकुशलता को कई गुना बढ़ाएगा। वहीं आधुनिक ट्रैफिक ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट पूरे बिहार की यातायात व्यवस्था को नई दिशा देगा।

भारत बन सकता है रूस–यूक्रेन युद्ध का मध्यस्थ! पुतिन–जेलेंस्की की कूटनीति में बढ़ी मोदी की भूमिका

नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)भारत की शांतिपूर्ण कूटनीति एक बार फिर वैश्विक मंच पर बड़ा असर छोड़ती दिख रही है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया भारत दौरे के बाद यूक्रेन युद्ध को लेकर नई उम्मीदें जागी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुतिन के साथ शिखर बैठक में स्पष्ट कहा कि “भारत यूक्रेन युद्ध पर तटस्थ नहीं, बल्कि शांति का समर्थक है।” इस बयान को रूस ने बेहद सकारात्मक रूप में लिया और अब पूरी दुनिया को लगने लगा है कि इस लंबे युद्ध को समाप्त कराने में भारत की भूमिका निर्णायक हो सकती है।

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इसी बीच यह बड़ा संकेत भी मिल गया है कि भारत केवल बयानबाज़ी नहीं, बल्कि सक्रिय कूटनीतिक प्रयास में जुटा है। पुतिन के दौरे के तुरंत बाद अब यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की भी जल्द ही भारत आ रहे हैं। जनवरी में होने वाला यह दौरा रूस–यूक्रेन संघर्ष को खत्म कराने की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।

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सूत्रों के अनुसार, पीएम मोदी ने पुतिन के साथ हुई बैठक में एक विस्तृत शांति रोडमैप साझा किया है, जिस पर रूस ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। माना जा रहा है कि इसी प्लान पर चर्चा के लिए जेलेंस्की दिल्ली में पीएम मोदी से मुलाकात करेंगे। भारत पहले से ही कीव और मॉस्को दोनों से लगातार संपर्क में है और शांति बहाली के लिए सक्रिय बातचीत कर रहा है।

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यह भी महत्वपूर्ण है कि पीएम मोदी अब तक जेलेंस्की से आठ बार फोन पर बात कर चुके हैं और 2024 में मॉस्को व कीव दोनों का दौरा भी किया था। इससे भारत की विश्वसनीयता और बढ़ी है। इसी कारण अमेरिका और यूरोप की दबाव आधारित नीति के विपरीत दुनिया अब भारत के संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान की उम्मीद कर रही है।

9 दिसंबर – इतिहास के वे सितारे, जो अमर होकर भी चुपचाप चले गए

भारत और संसार के इतिहास में 9 दिसंबर केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन विभूतियों की स्मृति है जिन्होंने अपने शब्दों, कर्मों, साहस और सेवा से मानवता को नई दिशा दी। यह लेख 9 दिसंबर को दिवंगत हुए उन महान व्यक्तित्वों के जीवन, उनके जन्म-स्थल, प्रदेश और समाज के लिए दिए गए योगदान को संवेदनशील और विस्तृत रूप से उजागर करता है।

  1. मंगलेश डबराल (निधन – 2020)

हिंदी साहित्य के आधुनिक दौर के सबसे सशक्त कवियों में मंगलेश डबराल का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। उनका जन्म उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जनपद में हुआ था। हिमालय की शांत वादियों में पले-बढ़े मंगलेश जी के भीतर प्रकृति, पीड़ा और सामाजिक यथार्थ की गहरी संवेदना बस गई थी। वे केवल कवि ही नहीं बल्कि एक सजग पत्रकार भी थे।

उनकी कविताएँ आम आदमी के संघर्ष, शोषण, राजनीति और मानवीय संवेदनाओं को बेहद सादगी और प्रभावशाली शब्दों में प्रस्तुत करती हैं। ‘घर का रास्ता, आवाज़ भी एक जगह है’ जैसी उनकी कृतियाँ साहित्य जगत में विशेष महत्व रखती हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनकी लेखनी की सशक्तता का प्रमाण है।

9 दिसंबर 2020 को उनका निधन कोरोना संक्रमण के कारण हुआ, जिसने साहित्य जगत को गहरा आघात पहुँचाया। उनकी कविताएँ आज भी युवाओं को सोचने और संघर्ष करने की प्रेरणा देती हैं।

  1. उस्ताद हनीफ मोहम्मद खाँ (निधन – 2009)

भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में तबले की थाप से आत्मा को झंकृत कर देने वाले उस्ताद हनीफ मोहम्मद खाँ का जन्म उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद में हुआ था। वे लखनऊ घराने के प्रमुख तबला वादकों में से एक माने जाते थे। संगीत उन्हें विरासत में मिला था और वर्षों के कठिन रियाज़ से उन्होंने तबले को अपनी साधना बना लिया।

उन्होंने भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भारतीय ताल और लय की गरिमा को ऊँचाइयों तक पहुँचाया। उनके उँगलियों की गति और ताल का संतुलन सुनने वालों को मंत्रमुग्ध कर देता था। कई प्रसिद्ध गायकों और वादकों के साथ उन्होंने मंच साझा किया।

9 दिसंबर 2009 को उनका देहांत हुआ, पर उनकी ताल आज भी संगीत प्रेमियों के हृदय में जीवित है। वे अपने पीछे एक समृद्ध संगीत विरासत छोड़ गए।

  1. त्रिलोचन शास्त्री (निधन – 2007)

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में जन्मे त्रिलोचन शास्त्री प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख स्तंभों में गिने जाते हैं। वे छायावाद के बाद आए नए प्रयोगवादी युग के सशक्त कवि थे। उनकी कविता में गांव, खेत, मजदूर, किसान और आम जीवन की वास्तविक छवि दिखाई देती है।

त्रिलोचन जी की विशेषता थी – सीधी, सरल और जनमानस से जुड़ी भाषा। उन्होंने दिखावटी साहित्य नहीं, बल्कि जमीन से जुड़ा साहित्य लिखा। उनकी रचनाएँ सामाजिक विषमता, श्रम और मानवीय संघर्ष की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।

9 दिसंबर 2007 को उनका निधन हुआ। उनका साहित्य आने वाली पीढ़ियों को सिखाता है कि कविता केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि समाज को जगाने का माध्यम है।

  1. सचिन्द्र लाल सिंह (निधन – 2000)
    बिहार राज्य के मूल निवासी सचिन्द्र लाल सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभावशाली राजनीतिज्ञ रहे। वे स्वतंत्रता के बाद के भारत के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले नेताओं में से एक थे। जनसेवा, संगठन निर्माण और सामाजिक न्याय उनके राजनीतिक जीवन के मुख्य उद्देश्य रहे।

उन्होंने संसद में रहते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर लगातार आवाज उठाई। जनता से उनका गहरा लगाव और सादगी भरा जीवन उन्हें एक जनप्रिय नेता बनाता था।

9 दिसंबर 2000 को उनके निधन से राजनीतिक जगत ने एक ईमानदार और कर्मयोगी नेता को खो दिया। आज भी उनके योगदान को सम्मान के साथ याद किया जाता है।

  1. शाह नवाज़ ख़ान (निधन – 1983)
    उत्तर प्रदेश में जन्मे शाह नवाज़ खाँ आज़ाद हिन्द फ़ौज के वीर अधिकारी थे। वे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अत्यंत विश्वस्त सहयोगियों में से एक रहे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन में भाग लेकर भारत की आज़ादी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

स्वतंत्रता के बाद उन्होंने राजनीति और समाज सेवा के क्षेत्र में भी कार्य किया। वे सैनिक अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और साहस के प्रतीक थे।

9 दिसंबर 1983 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका नाम भारतीय इतिहास में वीरता और बलिदान का अमिट चिन्ह बनकर दर्ज है।

  1. महेन्द्रनाथ मुल्ला (निधन – 1971)
    उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार में जन्मे महेन्द्रनाथ मुल्ला भारतीय नौसेना के अत्यंत जांबाज अधिकारी थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उनका अद्वितीय साहस देखने को मिला। वे आईएनएस खुकरी (INS Khukri) युद्धपोत के कमांडिंग अधिकारी थे, जो युद्ध के दौरान दुश्मन के हमले में डूब गया।

अंतिम क्षण तक वे अपने सैनिकों के साथ डटे रहे और अपने कर्तव्य का पालन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 9 दिसंबर 1971 को उनका शहीद होना भारतीय नौसेना के इतिहास का सबसे भावुक और गौरवपूर्ण बलिदान माना जाता है।

उनका जीवन युवाओं को देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा देता है।

  1. डॉ. द्वारकानाथ कोटणीस (निधन – 1942)
    महाराष्ट्र के सोलापुर जनपद में जन्मे डॉ. द्वारकानाथ कोटणीस एक ऐसे भारतीय चिकित्सक थे जिन्होंने अपनी जान तक मानवता की सेवा में अर्पण कर दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वे चीन गए और वहाँ घायल सैनिकों और आम नागरिकों का इलाज किया।
    वे एक मिशनरी डॉक्टर की तरह हर दिन युद्ध के मैदान में जाकर लोगों की जान बचाते रहे। अत्यधिक बीमारी और कठिन परिस्थितियों के कारण 9 दिसंबर 1942 को उनका निधन हो गया।

आज चीन और भारत दोनों देशों में उन्हें आदर के साथ याद किया जाता है। वे निस्वार्थ सेवा, मानवता और अंतरराष्ट्रीय भाईचारे के प्रतीक बने।

  1. गोविन्द सिंह राठौड़ (निधन – 1924)
    राजस्थान के वीर भूमि में जन्मे गोविन्द सिंह राठौड़ ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध लड़ने वाले जाबांज सैनिकों में से एक थे। उनका जीवन साहस, त्याग और मातृभूमि-प्रेम का प्रतीक रहा।

उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों का विरोध करते हुए कई आंदोलनों में भाग लिया। उनकी पहचान एक निर्भीक योद्धा की थी, जिसने अंत तक अन्याय के आगे घुटने नहीं टेके।

9 दिसंबर 1924 को उनका निधन हुआ। लेकिन उनकी वीरता राजस्थानी लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में आज भी जीवित है।

9 दिसंबर केवल मौतों की सूची नहीं है, बल्कि यह उन अमर आत्माओं की स्मृति है जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्र, समाज और मानवता के नाम कर दिया। इन सभी महान व्यक्तित्वों का योगदान समय की सीमाओं से परे है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची अमरता कर्मों से प्राप्त होती है, तन के जाने से नहीं।

“9 दिसंबर: राजनीति, साहित्य और संस्कृति के सितारे

9 दिसंबर केवल एक तारीख नहीं, बल्कि इतिहास के उन महान व्यक्तियों की जन्म-तिथि है जिनकी छाप आज भी समाज, राजनीति, साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रीय चेतना के हर पन्ने पर दिखाई देती है। इस दिन जन्मे ये व्यक्तित्व केवल अपने समय के ही नायक नहीं रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए। आइए जानें इनके जीवन, जन्म-स्थान, जनपद, प्रदेश और उनके ऐतिहासिक योगदान को विस्तार से –

  1. आदित्य चौधरी (जन्म: 9 दिसंबर 1961)

जन्म स्थान: मथुरा जिले का ब्रज क्षेत्र, उत्तर प्रदेश
क्षेत्र: साहित्य, डिजिटल ज्ञान और संस्कृति संरक्षण
योगदान:
आदित्य चौधरी आधुनिक युग में भारतीय संस्कृति के संवाहक के रूप में पहचाने जाते हैं। उन्होंने ‘भारतकोश’ और ‘ब्रजडिस्कवरी’ जैसे प्रतिष्ठित वेबसाइटों की स्थापना कर भारत के इतिहास, देवी-देवताओं, धार्मिक स्थलों, साहित्य, परंपराओं और ब्रज संस्कृति को डिजिटल माध्यम से दुनिया के सामने रखा। उनका मुख्य उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुँचाना रहा है।

ब्रजभूमि (मथुरा-वृंदावन-कान्हा की नगरी) के गौरव को वैश्विक पहचान दिलाने में आदित्य चौधरी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंदी भाषा को इंटरनेट पर एक मजबूत पहचान दिलाई। आज देश-विदेश के विद्यार्थी और शोधकर्ता उनके कार्यों का लाभ उठा रहे हैं। उनका जीवन यह दर्शाता है कि आधुनिक तकनीक के माध्यम से भी अपनी संस्कृति और पहचान को जीवंत रखा जा सकता है।

  1. सोनिया गाँधी (जन्म: 9 दिसंबर 1946)
    जन्म स्थान: लुसियाना, इटली
    क्षेत्र: राजनीति, समाजसेवा
    भारत में कार्यक्षेत्र: रायबरेली, उत्तर प्रदेश / नई दिल्ली
    योगदान:सोनिया गांधी भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में से एक हैं। उनका जीवन एक सामान्य विदेशी नागरिक से भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस की अध्यक्ष बनने तक का प्रेरणादायक सफर है। उन्होंने अपने पति, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद राजनीति में प्रवेश किया और कांग्रेस पार्टी को कई वर्षों तक नेतृत्व प्रदान किया।

सोनिया गांधी का योगदान केवल राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाओं को आगे बढ़ाया। उनका व्यक्तित्व त्याग, संयम और राष्ट्र के प्रति समर्पण का उदाहरण है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद का प्रस्ताव ठुकराकर यह साबित कर दिया कि सत्ता से बड़ा देशहित होता है।

  1. शत्रुघ्न सिन्हा (जन्म: 9 दिसंबर 1945)
    जन्म स्थान: पटना, बिहार
    क्षेत्र: सिनेमा, राजनीति
    योगदान:शत्रुघ्न सिन्हा भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग के सुपरस्टार रहे हैं। ‘खामोशी’ जैसे उनके संवाद ने उन्हें एक अलग ही पहचान दिलाई। उन्होंने लगभग 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया और अपनी दमदार आवाज़ और अभिनय शैली से दर्शकों के दिलों पर राज किया।

बाद में वे राजनीति में भी सक्रिय हुए और कई बार लोकसभा के सदस्य चुने गए। बिहार के जननायक के रूप में उनकी गिनती की जाती है। उनका जीवन यह दर्शाता है कि प्रतिभा और मेहनत किसी भी क्षेत्र में ऊँचाइयों तक पहुंचा सकती है।

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  1. रघुवीर सहाय (जन्म: 9 दिसंबर 1929)
    जन्म स्थान: लखनऊ, उत्तर प्रदेश
    क्षेत्र: साहित्य, पत्रकारिता
    योगदान:रघुवीर सहाय हिंदी साहित्य के आधुनिक स्तंभ माने जाते हैं। वे एक क्रांतिकारी कवि और बेबाक पत्रकार थे। उनकी कविताएँ आम आदमी के दर्द, संघर्ष और राजनीतिक विडंबनाओं को उजागर करती थीं। ‘दिनमान’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने पत्रकारिता में नई चेतना का संचार किया।

उनका लेखन आज भी सामाजिक यथार्थ का आईना माना जाता है। उन्होंने साहित्य को केवल कलात्मकता तक सीमित न रखकर उसे समाज परिवर्तन का माध्यम बना दिया।

  1. ई. के. नायनार (जन्म: 9 दिसंबर 1919)
    जन्म स्थान: कन्नूर, केरल
    क्षेत्र: राजनीति (कम्युनिस्ट आंदोलन)
    योगदान:ई. के. नायनार केरल के तीन बार मुख्यमंत्री रहे और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक थे। उन्होंने मजदूर, किसान और गरीब वर्ग के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया। उनका जीवन सादगी, ईमानदारी और जनसेवा का प्रतीक था।

उन्होंने केरल को शिक्षा और सामाजिक बराबरी की दिशा में आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

  1. होमाई व्यारावाला (जन्म: 9 दिसंबर 1913)
    जन्म स्थान: गुजरात
    क्षेत्र: पत्रकारिता, फोटोग्राफी
    योगदान:होमाई व्यारावाला भारत की पहली महिला फोटो-पत्रकार थीं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम, महात्मा गांधी सहित कई ऐतिहासिक क्षणों को कैमरे में कैद किया। वे उस दौर में फोटो पत्रकार बनीं जब यह क्षेत्र पुरुषों तक सीमित माना जाता था।

उनका जीवन साहस, आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया।

  1. संत सूरदास (जन्म: 1484)
    जन्म स्थान: ब्रज क्षेत्र (मथुरा-वृंदावन), उत्तर प्रदेश क्षेत्र: भक्ति आंदोलन, साहित्य
    योगदान: संत सूरदास भक्ति आंदोलन के महान कवि थे। उनकी रचनाओं में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, प्रेम और भक्ति का अत्यंत कोमल वर्णन मिलता है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘सूरसागर’ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

भले ही वे जन्म से दृष्टिहीन थे, लेकिन उनकी अंतर दृष्टि ने उन्हें अमर बना दिया। उनका भक्ति साहित्य आज भी जनमानस को आध्यात्मिक ऊर्जा देता है।

ठंड से बचाव के उपाय: बच्चों व बुजुर्गों को सर्दी में सुरक्षित रखने के लिए डा. गिरजेश मिश्र की विशेष सलाह

जैसे-जैसे तापमान गिरता है, सर्दी का असर सबसे अधिक बच्चों और बुजुर्गों पर देखने को मिलता है। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता और बदलते मौसम के कारण सर्दी, खांसी, बुखार, अस्थमा और सांस से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाती हैं। ऐसे में “ठंड से बचाव के उपाय” को अपनाना बेहद जरूरी हो जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ डा. गिरजेश मिश्र का कहना है कि अगर समय पर सतर्कता बरती जाए तो ठंड से होने वाले अधिकांश रोगों से बचा जा सकता है।

कई परतों में कपड़े पहनना है जरूरी

ठंड से बचाव का सबसे पहला और प्रभावी तरीका है गर्म और कई परतों वाले कपड़े पहनना। बेस लेयर के रूप में सूती या थर्मल कपड़े पहनें, मिड लेयर में ऊनी या फ्लीस और बाहर वाटरप्रूफ जैकेट का प्रयोग करें। सिर के लिए टोपी, पैरों में मोजे और हाथों में दस्ताने जरूर पहनें, क्योंकि शरीर की अधिक गर्मी इन्हीं स्थानों से निकलती है। बच्चों और बुजुर्गों के कपड़े गीले न होने दें और अगर कपड़े गीले हो जाएं तो तुरंत बदलें।

खान-पान से बढ़ाएं इम्यूनिटी

ठंड से बचाव के उपाय में सही और पौष्टिक भोजन की अहम भूमिका है। डा. गिरजेश मिश्र के अनुसार सर्दियों में गर्म सूप, खिचड़ी, दलिया, हरी सब्जियां, मेवे, गुड़, अदरक और हल्दी वाला दूध फायदेमंद होता है। विटामिन C से भरपूर फल जैसे संतरा, नींबू और आंवला शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। ठंडी चीजें, आइसक्रीम, और ज्यादा तला-भुना भोजन खाने से बचें।

त्वचा और शरीर की नमी बनाए रखें

सर्दियों में त्वचा रूखी और बेजान होने लगती है। इसलिए नहाने के बाद और सोने से पहले शरीर पर अच्छा मॉइस्चराइजर या नारियल तेल लगाना चाहिए। हालांकि ठंड में प्यास कम लगती है, लेकिन शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दिनभर गर्म पानी पीते रहना जरूरी है। यह शरीर के तापमान को संतुलित रखता है और स्किन को भी हेल्दी बनाए रखता है।

बच्चों और बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त सावधानियां

बच्चों और बुजुर्गों को ठंड और प्रदूषण दोनों से बचाना जरूरी है। अगर बाहर धुंध या स्मॉग ज्यादा है तो उन्हें घर के अंदर ही रखें। बहुत जरूरी हो तो बाहर जाते समय मास्क (N95) का प्रयोग कराएं। सुबह के समय हल्की धूप लेना विटामिन D के लिए फायदेमंद है, लेकिन बहुत देर तक तेज हवा में रहना नुकसानदायक हो सकता है।

बुजुर्गों के लिए फिसलन वाली जगहों से बचाव जरूरी है। जमीन पर पानी या बर्फ जमा हो तो वहां रबर सोल वाले जूतों का प्रयोग करें और रेलिंग का सहारा लें। उन्हें समय पर दवाइयां देना और नियमित ब्लड प्रेशर व शुगर की जांच कराना बेहद जरूरी है।

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स्वच्छता और नींद का रखें विशेष ध्यान

ठंड से बचाव के उपाय में स्वच्छता भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। हाथों को बार-बार साबुन से धोएं और छींकते या खांसते समय मुंह ढकें। साफ-सफाई से वायरल इंफेक्शन से काफी हद तक बचा जा सकता है। साथ ही दिन में कम से कम 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेना भी इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है।

डा. गिरजेश मिश्र की सलाह

डा.गिरजेश मिश्र का कहना है कि ठंड के मौसम में लापरवाही भारी पड़ सकती है। इसलिए सावधानी, संतुलित आहार और सही दिनचर्या अपनाकर हम खुद को और अपने परिवार को स्वस्थ रख सकते हैं। अगर सर्दी, खांसी, सांस लेने में परेशानी या अत्यधिक कमजोरी महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

नोट: यह जानकारी सुझाव के रूप में मुहैया कराई जा रही है, कृपया किसी भी घरेलू या औषधीय उपाय को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।