Friday, June 26, 2026
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बांग्लादेश में राजनीतिक उबाल: हादी की मौत के बाद सड़कों पर आग

बांग्लादेश में हिंसा का नया दौर: उस्मान हादी की मौत के बाद हालात बेकाबू, मॉब लिंचिंग में हिंदू युवक की हत्या

ढाका (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)बांग्लादेश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक और सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में है। जुलाई विद्रोह के प्रमुख नेता और इंकलाब मंच के संस्थापक शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद देशभर में अशांति फैल गई है। हादी की हत्या ने न केवल राजनीतिक उथल-पुथल को तेज किया है, बल्कि अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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इसी उग्र माहौल के बीच मैमनसिंह जिले के भालुका उपजिला में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। बीबीसी बांग्ला की रिपोर्ट के अनुसार, दीपु चंद्र दास नामक एक हिंदू युवक की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। वह एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करता था और किराए के मकान में रह रहा था। आरोप है कि उस पर पैगंबर मोहम्मद (PBUH) के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करने का संदेह जताया गया, जिसके बाद गुरुवार रात करीब 9 बजे भीड़ ने उस पर हमला कर दिया।

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पुलिस के अनुसार, हमलावरों ने दीपु को बेरहमी से पीटा, फिर उसके शव को पेड़ से बांधकर आग के हवाले कर दिया। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और हालात पर काबू पाया। शव को पोस्टमॉर्टम के लिए मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजा गया है। फिलहाल औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं हुई है और पुलिस पीड़ित के परिजनों की तलाश कर रही है।

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उधर, उस्मान हादी की मौत के बाद ढाका, चटगांव समेत कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए। अखबारों के दफ्तरों, अवामी लीग नेताओं के घरों और शेख मुजीबुर रहमान के ऐतिहासिक निवास 32 धानमंडी में तोड़फोड़ की गई। चटगांव में भारतीय सहायक उच्चायुक्त के आवास पर भी पथराव हुआ।

देश को संबोधित करते हुए मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने उस्मान हादी की हत्या के दोषियों को जल्द न्याय के कटघरे में लाने का आश्वासन दिया और उनके परिवार की जिम्मेदारी सरकार द्वारा उठाने की घोषणा की।

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बांग्लादेश में हिंसा का उबाल, कश्मीर में भारत की सैन्य तैयारी से पाकिस्तान में खलबली

सिंगापुर (राष्ट्र की परम्परा) एक अस्पताल में इलाज के दौरान युवा नेता उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में व्यापक हिंसा भड़क उठी है। देश के कई बड़े शहरों में आक्रोशित भीड़ सड़कों पर उतर आई। हालात इतने बिगड़ गए कि सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को निशाना बनाया गया, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं।

राजशाही शहर में प्रदर्शनकारियों ने अवामी लीग के एक स्थानीय कार्यालय को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया। वहीं, देश के दो प्रमुख समाचार पत्रों—द डेली स्टार और प्रोथोम आलो—की इमारतों में आग लगा दी गई। ढाका स्थित द डेली स्टार कार्यालय में हालात उस समय और गंभीर हो गए जब भीड़ के घुसने के चार घंटे से अधिक समय बाद जाकर 25 पत्रकारों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका।

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हिंसा यहीं नहीं रुकी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चटोग्राम में भारतीय सहायक उच्चायोग के बाहर भी प्रदर्शन किया गया, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर तनाव और बढ़ गया है। बांग्लादेश सरकार के सामने कानून-व्यवस्था बहाल करना एक बड़ी चुनौती बन गया है।

इधर, जब बांग्लादेश में हालात बिगड़े हुए हैं, उसी समय भारत ने कश्मीर में एक अहम सैन्य वैलिडेशन एक्सरसाइज को अंजाम देकर पाकिस्तान की चिंता बढ़ा दी है। इतिहास में पहली बार भारतीय सेना की एक विशेष सैन्य ट्रेन, जिसमें टैंक, भारी आर्टिलरी गन और अत्याधुनिक हथियार लदे थे, कश्मीर पहुंची है।

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यह ट्रेन उधमपुर–श्रीनगर–बारामुला रेल लिंक के जरिए जम्मू से अनंतनाग तक पहुंचाई गई। 772 किलोमीटर लंबा यह रेल ट्रैक कुछ महीने पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया था। इस अभ्यास का उद्देश्य यह परखना था कि भारी सैन्य साजो-सामान और सैनिकों को कितनी तेजी से कश्मीर पहुंचाया जा सकता है।

जानकारी के अनुसार, सितंबर से अब तक इसी रेल मार्ग से सेना का 753 टन शीतकालीन सामान कश्मीर पहुंचाया जा चुका है। इससे पहले भारत रेल आधारित मोबाइल लॉन्चर से अग्नि प्राइम मिसाइल का सफल परीक्षण भी कर चुका है, जिसकी मारक क्षमता करीब 2000 किलोमीटर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर में इस तरह की सैन्य तैयारी रणनीतिक संदेश है, जिसने पाकिस्तान में हलचल मचा दी है और दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

शीतलहर का कहर: बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्कूल बंद करने की उठी मांग

भीषण शीतलहर के चलते पूर्वी चंपारण में स्कूल बंद करने की मांग, जिलाधिकारी को सौंपा गया ज्ञापन

मोतिहारी/पूर्वी चंपारण (राष्ट्र की परम्परा)।पूर्वी चंपारण जिले में लगातार जारी कड़ाके की ठंड और घने कोहरे ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर दिया है। शीतलहर की गंभीरता को देखते हुए परिवर्तनकारी शिक्षक महासंघ, बिहार ने जिला प्रशासन से जिले के सभी सरकारी एवं निजी विद्यालयों में पठन-पाठन कार्य अस्थायी रूप से स्थगित करने की मांग की है। इस संबंध में महासंघ की ओर से जिलाधिकारी को एक लिखित अनुरोध पत्र सौंपा गया है।

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महासंघ के प्रदेश मीडिया प्रभारी मृत्युंजय ठाकुर ने बताया कि वर्तमान मौसम परिस्थितियां खासकर छोटे बच्चों के लिए अत्यंत जोखिमपूर्ण हो गई हैं। अत्यधिक ठंड, तेज ठंडी हवाएं और सुबह के समय घना कोहरा बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। मौसम विभाग द्वारा भी शीतलहर को लेकर अलर्ट जारी किया गया है और लोगों को अनावश्यक बाहर न निकलने की सलाह दी जा रही है।

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उन्होंने कहा कि प्रातःकाल स्कूल जाने के दौरान बच्चों को सर्द हवाओं और कम दृश्यता की समस्या से जूझना पड़ता है, जिससे सर्दी, खांसी, बुखार, निमोनिया और अन्य मौसमी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में विद्यालयों का संचालन बच्चों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से उचित नहीं है।

परिवर्तनकारी शिक्षक महासंघ ने जिला प्रशासन से अपील की है कि बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए शीतलहर की अवधि तक सभी सरकारी एवं निजी विद्यालयों में शिक्षण कार्य पर अस्थायी रोक लगाने का आदेश जारी किया जाए। महासंघ का मानना है कि समय रहते लिया गया निर्णय न केवल बच्चों को संभावित बीमारियों से बचाएगा, बल्कि अभिभावकों की चिंता भी कम करेगा।

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अब जिले की निगाहें प्रशासन के फैसले पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि शीतलहर के इस दौर में विद्यार्थियों की सुरक्षा को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं।

ग्रामीण भारत में रोजगार अधिकार बनाम सरकारी कृपा

महात्मा गांधी — जै राम जी

संजय पराते

संघी गिरोह को महात्मा गांधी के काम से ही नहीं, उनके नाम से भी कितनी नफरत है, यह मनरेगा को खत्म करने और उसकी जगह वीबी-जी राम जी विधेयक लाने के मोदी सरकार के कदम से पता चलता है। विधेयक के नाम से ही यह भी साफ हो जाता है कि उसकी पूरी राजनीति राम के नाम पर ही टिकी है।

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इस योजना का नाम कुटिलतापूर्वक मनरेगा से बदलकर जी राम जी किया जाना भी, भाजपा- आरएसएस के विचारधारात्मक आग्रह को दिखाता है। संघी गिरोह ने राज करने के लिए राम को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रतीक बना लिया है। तीन दिन पहले मंत्रिमंडल ने महात्मा गांधी की जगह पूज्य बापू नाम रखने का फैसला किया था, लेकिन इसे बदल दिया गया, तो शायद इसलिए कि यह नाम उनकी ध्रुवीकरण की राजनीति के मकसद को पूरा नहीं कर रहा था।

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श्रम कानूनों को खत्म करके और चार श्रम संहिताओं को थोपने के जरिए शहरी मजदूरों के अधिकारों पर हमले के बाद देर-सबेर ग्रामीण मजदूरों के अधिकारों पर भी हमला होना ही था। लेकिन यह हमला इतनी जल्दी होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। मोदी सरकार जिन ‘श्रम सुधारों’ की बात करती है, उसका चरित्र ही मजदूर विरोधी और कॉरपोरेटपरस्त हैं। यह पूंजीवाद के हित में होता है कि समाज में बेरोजगार मजदूरों की एक बड़ी सेना का अस्तित्व बना रहे, ताकि लागत में मजदूरी के हिस्से को न्यूनतम रखकर अधिकतम मुनाफा कमाया जा सके। इसलिए वह सार्वभौमिक रोजगार, जो कि मनरेगा की अवधारणा है, जैसी किसी भी योजना के खिलाफ होता है।

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महात्मा गांधी नेशनल रूरल एंप्लायमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) की जगह विकसित भारत — गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 (वीबी-जी राम जी विधेयक) लाने का मोदी सरकार का फैसला इन्हीं मजदूर विरोधी श्रम सुधारों को लागू करने की दिशा में एक बढ़ा हुआ कदम है। मोदी सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि यह विधेयक, मनरेगा के बुनियादी चरित्र को ही पूरी तरह से नकारता है और रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी की जगह काम की केवल एक सीमित गारंटी देता है। यह विधेयक केंद्र सरकार को राज्यों की मांग के अनुसार फंड आबंटित करने की अपनी जिम्मेदारी से भी कानूनी तौर पर बरी कर देता है।

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रोजगार की सार्वभौमिक गारंटी और राज्यों की मांग के अनुसार फंड का 100 प्रतिशत आबंटन — ये दोनों प्रावधान मनरेगा की जान हैं। नया विधेयक इन दोनों प्रावधानों के विपरीत है और इसलिए ये ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का सृजन नहीं, रोजगार का विनाश ही करेंगे। (इस विधेयक का छुपा हुआ उद्देश्य यही है।) इस प्रकार, दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार प्रदाय योजना, जिसने कोरोना के संकट काल में भी अपना औचित्य साबित किया था और कृषि विकास दर में वृद्धि सुनिश्चित की थी, को असल में भाड़ में झोंक दिया गया। इस विधेयक को अपने संसदीय बहुमत के बल पर सरकार ने पारित करा लिया है और हड़बड़ी इतनी थी कि इसके प्रावधानों को संसद की स्थायी समिति में भेजकर विचार-विमर्श करने की विपक्ष की सलाह को भी मानने से इंकार कर दिया।

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मनरेगा में बिना किसी भेदभाव के हर ग्रामीण परिवार के लिए 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई है। नए विधेयक में इसे 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान को सामने रखकर संसद में मोदी सरकार ने इसे “पुराने मनरेगा कानून का आधुनिक विकल्प” बताया है और इसे “विकसित भारत – 2047 के लक्ष्य के अनुरूप ग्रामीण विकास के लिए संरचनात्मक सुधार” करार दिया है। लेकिन यह दावा महज एक दिखावा है। सचाई यह है कि यह विधेयक, जॉब कार्डों को युक्तियुक्त बनाने के नाम पर, ग्रामीण परिवारों के बहुत बड़े हिस्सों को रोजगार मांगने के अधिकार से ही बाहर करने के दरवाजे खोलता है। हमारा अनुभव यह बताता है कि मनरेगा के सार्वभौमिक रोजगार के प्रावधान को कमजोर करने की पिछले 11 सालों में हर संभव कोशिश हुई है, जिसके तहत पर्याप्त बजट आबंटन न करना, इस कारण मजदूरों का समय पर मजदूरी का भुगतान न होना और महीनों इसका लंबित रहना, इस भुगतान को भी अनिवार्य रूप से आधार और बैंक खातों से जोड़ना, मजदूरों की उपस्थिति को डिजिटली दर्ज करने का निर्देश देना आदि शामिल हैं। इसी साल अक्टूबर-नवम्बर के बीच के एक माह में 27 लाख मजदूरों के नाम निष्क्रियता के आधार पर पंजीयन सूची से हटा दिए गया है। इसलिए इस नए विधेयक में 100 की जगह 125 दिनों का रोजगार देने का प्रावधान आश्वस्तिदायक नहीं है। पिछले 11 सालों का मोदी सरकार का रिकॉर्ड बताता है कि मनरेगा के 100 दिनों के रोजगार की गारंटी के बावजूद उसने औसतन हर साल 40-45 दिनों का ही रोजगार दिया है, जो यूपीए राज के औसत से कम है। नए विधेयक में तो इस गारंटी को भी कमजोर कर दिया गया है।

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मनरेगा मांग-आधारित योजना है, लेकिन नए विधेयक में इससे राम-राम कर लिया गया है। 125 दिनों के रोजगार की उपलब्धता उन क्षेत्रों के लिए होगी, जिसका चयन केंद्र सरकार करेगी। इस चयन के मापदंड का उल्लेख विधेयक में नहीं मिलता और हम आसानी से अनुमान लगा सकते है कि यह चयन भाजपा की राजनैतिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बनेगा। इसके साथ ही, ग्रामीण विकास योजनाओं को तैयार करने में ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता भी खत्म हो जाएगी और उन्हें केंद्र की बनी-बनाई लीक पर काम करना होगा। इस प्रकार, राज्यों और केंद्र के बीच संविधान में उल्लेखित सहकारी संघवाद की अवधारणा को भी दफनाया जाएगा।

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नए विधेयक में सरकार को यह अधिकार दिया जा रहा है कि कृषि के मौसम में, जब खेतों में सबसे ज्यादा काम होता है, इस रोजगार योजना को निलंबित किया जा सकता है। यह प्रावधान ग्रामीण परिवारों को उसकी सबसे ज्यादा जरूरत के समय काम से वंचित करके, उन्हें भूस्वामियों के रहमो-करम पर निर्भर बना देगा। विधेयक में ‘कृषि-सघन मौसम’ को परिभाषित नहीं किया गया है। हमारे देश में, जलवायु की विविधता है और इसके कारण विविध फसलों का उत्पादन होता है।

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रबी और खरीफ के मौसम के अलावा, ऐसे भी क्षेत्र हैं, जहां तीन फसलें होती हैं और इस कारण कृषि संबंधी गतिविधियां साल भर चलती रहती हैं। नए विधेयक के इस प्रावधान के तहत काम देने से इंकार करने के लिए इसे साल के ज़्यादातर हिस्से तक बढ़ाया जा सकता है। इससे रोजगार गारंटी का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। कार्य स्थल पर डिजिटल हाजिरी की अनिवार्यता का प्रावधान भी मजदूरों के लिए भारी कठिनाईयां पैदा करेगा और उन्हें रोजगार की हानि के साथ ही उनके अधिकारों से वंचित करने का माध्यम बनेगा।

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नव उदारवादी नीतियों के तहत जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर कॉरपोरेट कब्जे को आसान बनाने के कारण छोटे किसानों के हाथों से बड़े पैमाने पर कृषि भूमि निकल गई है और किसानों से वे खेत मजदूरों की कतार में आकर खड़े हो गए हैं। इसके साथ ही कृषि क्षेत्र में पूंजीवादी विकास के कारण मशीनीकरण बढ़ा है। इसके कारण खेती के मौसम में भी खेत मजदूरों को खेती में मिलने वाले रोजगार के दिनों में भयंकर गिरावट आई है। ग्रामीण क्षेत्र की यह जानी-पहचानी हकीकत है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद आज भी खेती के कामों में महिलाओं को पुरुषों के बराबर मजदूरी नहीं दी जाती और उनके लिए यह मजदूरी 40 प्रतिशत तक कम है। मनरेगा ने ठीक ऐसे ही खेत मजदूरों को सहारा दिया था और कृषि-सघन मौसम में भी यदि उनके लिए उचित मजदूरी पर खेतों में काम उपलब्ध नहीं है, तो वैकल्पिक रोजगार का प्रबंध किया था। यह नया विधेयक सबसे ज्यादा ग्रामीण गरीबों से जिंदा रहने का यह वैकल्पिक सहारा भी छीन रहा है। बढ़ते मशीनीकरण और रोजगार के औसत दिनों में गिरावट के साथ मनरेगा की अनुपस्थिति उनकी मजदूरी में भी और विशेषकर, महिलाओं की मजदूरी में भयंकर गिरावट लाएगी और भूस्वामियों के शोषण को तेज करेगी।

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मनरेगा पर हुए कई अध्ययन यह बताते हैं कि इससे ग्रामीण गरीबों की आय में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इस योजना के कारण गरीब ग्रामीणों में स्वाभिमान की भावना बढ़ी है, क्योंकि इसने उनकी सामूहिक सौदेबाजी की ताकत को बढ़ाया है। इसके कारण, चाहे मनरेगा में उसे रोजगार मिले या न मिले, मनरेगा से कम मजदूरी दरों पर अन्यत्र काम करने से उसने इंकार किया है। मनरेगा के कारण कृषि कार्यों के लिए मजदूर न मिलने का दुष्प्रचार इसी कारण से है कि अब गरीब ग्रामीण कम मजदूरी पर काम करने के लिए तैयार नहीं है। प्रभुत्वशाली सामंती वर्ग इसे अपने लिए गरीब ग्रामीणों की सीधी चुनौती मानता है। मोदी सरकार का जी राम जी विधेयक मनरेगा के कारण बनी ग्रामीण गरीबों की इसी ताकत को तोड़ने का काम करेगा।
ग्रामीण रोजगार के लिए फंडिंग के पैटर्न में प्रस्तावित बदलाव भी मजदूरों को रोजगार से वंचित करेगा। यह विधेयक, मजदूरी भुगतान के लिए केंद्र की जवाबदेही वर्तमान 100 फीसद से घटाकर, राज्यों के साथ 60:40 के आधार पर साझेदारी का प्रावधान करता है। यह बेरोजगारी भत्ता तथा मुआवजे के खर्च की जिम्मेदारी भी राज्यों पर डालता है। इसके साथ ही, ‘‘नार्मेटिव आबंटन’’ का प्रावधान किया जा रहा है, जिसका अर्थ है कि केंद्र द्वारा रोजगार कार्यों पर खर्च की राज्यवार अधिकतम सीमाएं तय की जाएंगी और इससे ज्यादा खर्च करने पर लागत का भार राज्यों को उठाना होगा।

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अभी तक केंद्र सरकार इस योजना के लिए 60-70 हजार करोड़ रुपयों का ही बजट आबंटन करती आई है। इस योजना के विशेषज्ञों के अनुसार मनरेगा के लिए यह बजट आबंटन बहुत ही कम है और इस योजना से जुड़ी बहुत-सी परेशानियां और खामियां इसी कारण से है। अब कथित रूप से बढ़े हुए रोजगार दिवसों के साथ, यदि योजना के स्तर को बनाए रखना है, तो कम से कम 1 लाख करोड़ रुपयों का बजट आबंटन करना होगा और विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, इसका 40 प्रतिशत याने लगभग 40000 करोड़ रुपयों का बोझ राज्य सरकारों को उठाना होगा। इससे पहले से ही आर्थिक रूप से संकटग्रस्त राज्य सरकारों पर अवहनीय वित्तीय बोझ पड़ेगा, जबकि राज्यों के वित्तीय संसाधनों के पूरे स्रोत पहले ही केंद्र सरकार ने हड़प लिए हैं। इससे ग्रामीण रोजगार कार्यों के सृजन से ही राज्य बचने की कोशिश करेंगे। यदि मोदी सरकार केंद्र के वर्तमान आबंटन को ही राज्यों के साथ साझा करेगी, तो योजना की वर्तमान गुणवत्ता को भी बनाए रखना मुश्किल होगा, क्योंकि सरकार का यह रुख इस कार्यक्रम के दायरे को और सीमित कर देगा और केंद्र की जवाबदेही को कम करेगा।
हमारे देश का किसान आंदोलन इस योजना में 250 दिनों का रोजगार देने और मजदूरी दर 750 रुपए करने की मांग को लेकर निरंतर आंदोलन कर रहा है। संसद की स्थायी समिति ने भी न्यूनतम मनरेगा मजदूरी 400 रुपए प्रतिदिन करने की सिफारिश की है। इसको नजरअंदाज करते हुए मोदी सरकार ने अपने ही अंदाज में इस योजना में न्यूनतम मजदूरी 240 रुपए प्रतिदिन का प्रावधान कर दिया है, जबकि भाजपा शासित राज्यों सहित कई राज्यों में मजदूरी की दर इससे बहुत ऊंची है। इसलिए यह न्यूनतम मजदूरी कई राज्यों को इस रोजगार योजना के लिए मजदूरी कम करने या फिर लंबे समय तक उन राज्यों में चल रही मजदूरी दरों पर ही स्थिर रहने को प्रेरित करेगा।

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वास्तविकता तो यह है कि मनरेगा के लिए दी जा रही मजदूरी शहरों में असंगठित क्षेत्र के अकुशल मजदूरों के लिए घोषित न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। इसके बावजूद भाजपा सरकार ग्रामीण गरीबों की आजीविका की कीमत पर कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा दे रही है। इसलिए इस विधेयक का नाम रोजगार और आजीविका मिशन (राम) से जोड़ना ही हास्यास्पद है, लेकिन आम जनता को भ्रमित करने और समाज के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के लिए यह नाम रखा जा रहा है। नामों को बदलना और काम की गुणवत्ता को गिराना — इस सरकार की निशानी ही बन गया है।

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मोदी सरकार ने इस विधेयक को संसद में रखते हुए मनरेगा के जिस आधुनिकीकरण की बात की है, उसके लिए मनरेगा को खत्म करने की जरूरत ही नहीं थी। राजनीतिक पार्टियों, ट्रेड यूनियनों तथा ग्रामीण गरीबों के संगठनों के साथ परामर्श करके और मनरेगा के नियमों में व्यापक सहमति के साथ बदलाव करके वह इसे आसानी से कर सकती थी। इससे मनरेगा और मजबूत होता और एक सार्वभौम तथा मांग-आधारित रोजगार गारंटी के रूप में इसका प्रभावी परिपालन सुनिश्चित किया जा सकता है। लेकिन सरकार का वास्तविक मकसद तो मनरेगा के इसी चरित्र को खत्म करना है। इसलिए समग्रता में यह नया विधेयक संविधान के अनुच्छेद 21 और 23 को भी निष्प्रभावी करता है, जो अपने नागरिकों को सम्मानपूर्वक आजीविका कमाने का अधिकार देता है।

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महात्मा गांधी ने समाज के सबसे अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछने की बात की थी। तत्कालीन संप्रग सरकार पर वामपंथी पार्टियों के दबाव के बाद बना मनरेगा इसी का एक प्रयास था। इसने आदिवासियों, दलितों और आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को आजीविका का सहारा दिया है। लेकिन कॉरपोरेटों का हित साधने के लिए मोदी सरकार ने महात्मा गांधी के इसी लक्ष्य को “जै राम जी” कह दिया है।

बिचौलियों से बचें किसान, सरकारी क्रय केंद्रों पर बेचें धान : जिलाधिकारी

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)जनपद में धान की सरकारी खरीद पूर्व से ही संचालित है। शासन की मंशा के अनुरूप धान खरीद को और अधिक सक्रिय एवं प्रभावी बनाए जाने के उद्देश्य से जनपद के सभी नामित धान क्रय केंद्रों को पूर्ण रूप से संचालित कर दिया गया है। किसानों की सुविधा एवं हितों को ध्यान में रखते हुए सभी क्रय केंद्रों पर निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान की खरीद सुनिश्चित की जा रही है। जिला प्रशासन द्वारा किसानों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ की गई हैं।जिलाधिकारी दिव्या मित्तल ने जनपद के सभी किसान भाइयों से अपील करते हुए कहा कि वे अपना धान किसी भी परिस्थिति में बिचौलियों अथवा बाजार में कम दामों पर न बेचें। सभी किसान अपना संपूर्ण धान सीधे सरकारी धान क्रय केंद्रों पर लेकर आएँ, जहाँ पारदर्शी एवं सुव्यवस्थित ढंग से धान की खरीद की जा रही है।उन्होंने बताया कि धान बिक्री के दौरान अंश निर्धारण एवं खतौनी से संबंधित समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए प्रत्येक तहसील पर हेल्प डेस्क की स्थापना की गई है। यदि किसी किसान की खतौनी के अंश में कोई त्रुटि है, तो वह संबंधित तहसील की हेल्प डेस्क पर संपर्क कर उसका निराकरण करा सकता है, जिससे धान खरीद प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो।जिलाधिकारी ने विशेष रूप से छोटे एवं सीमांत किसानों से धैर्य बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि जिला प्रशासन द्वारा सभी पात्र किसानों का धान खरीदने की समुचित व्यवस्था की गई है। धान खरीद से संबंधित समस्याओं का निस्तारण प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा।उन्होंने कहा कि शासन एवं जिला प्रशासन किसानों के हितों के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है तथा यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि धान खरीद प्रक्रिया पारदर्शी, सुव्यवस्थित एवं किसान हितैषी बनी रहे।

मड़ई में लगी भीषण आग, दो बछिया की जलकर मौत, एक गाय झुलसी

तिलौली गांव में गुरुवार रात दर्दनाक हादसा, ग्रामीणों की मदद से पाया गया आग पर काबू

बलिया(राष्ट्र की परम्परा)

जनपद के तिलौली गांव में गुरुवार की रात अचानक लगी आग से पशुपालक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। गांव निवासी धुरेन्द्र राजभर की मड़ई में आग लगने से दो बछिया की जलकर मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक गाय गंभीर रूप से झुलस गई। घटना से पूरे गांव में अफरा-तफरी मच गई और पीड़ित परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, गुरुवार की रात लगभग 9:30 बजे धुरेन्द्र राजभर रोज की भांति अपने पशुओं को मड़ई में बांधकर पास स्थित अपने रिहायसी मकान में सोने चले गए थे। इसी दौरान अचानक मड़ई से धुआं निकलता दिखाई दिया। जब तक परिवार के लोग और आसपास के ग्रामीण कुछ समझ पाते, तब तक आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। देखते ही देखते मड़ई में बंधे पशु आग की चपेट में आ गए और दो बछिया जलकर राख हो गईं, जबकि एक गाय बुरी तरह झुलस गई।
आग लगने की सूचना मिलते ही ग्रामीण मौके पर पहुंचे और अपने स्तर से आग बुझाने का प्रयास शुरू किया। रास्ता संकरा और दुर्गम होने के कारण फायर ब्रिगेड को सूचना नहीं दी जा सकी। इसी बीच सूचना पर चौकी प्रभारी मालदा नीरज कुमार यादव अपने सहयोगियों के साथ मौके पर पहुंचे और ग्रामीणों के सहयोग से कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया गया। घटना की जानकारी शुक्रवार सुबह राजस्व विभाग को दी गई, जिसके बाद हल्का लेखपाल मौके पर पहुंचे और नुकसान का आकलन किया। साथ ही पशु चिकित्सालय की टीम भी घटनास्थल पर पहुंची, जहां मृत बछियों का पोस्टमार्टम कराया गया। झुलसी गाय का उपचार पशु चिकित्सकों द्वारा किया गया।
ग्रामीणों के अनुसार, आग लगने का स्पष्ट कारण अभी पता नहीं चल सका है, हालांकि शॉर्ट सर्किट या जलते उपले से आग फैलने की आशंका जताई जा रही है। पीड़ित परिवार ने प्रशासन से आर्थिक सहायता की मांग की है। घटना के बाद गांव में शोक और चिंता का माहौल बना हुआ है।

कथावाचक को गार्ड ऑफ ऑनर पर सियासी घमासान

बहराइच (राष्ट्र की परम्परा)। वृंदावन के कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी को गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने के बाद बहराइच में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इस पूरे मामले को लेकर योगी सरकार और उत्तर प्रदेश पुलिस पर कड़े सवाल उठाए हैं।

अखिलेश यादव ने कहा कि जब पूरा पुलिस महकमा सलामी देने में व्यस्त रहेगा, तब प्रदेश का अपराधी बेखौफ रहेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस अपने मूल दायित्वों के निर्वहन में नाकाम साबित हो रही है और अपनी सीमित क्षमताओं को गैर-जरूरी गतिविधियों में खर्च कर रही है। अखिलेश ने कहा कि भाजपा शासन में बेतहाशा बढ़ते अपराध और माफिया राज पर अंकुश लगाने के बजाय सलाम-सलाम का खेल खेला जा रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए पूछा कि इस घटना का संज्ञान लेने वाला कोई है या सब परेड में शामिल हैं।

वहीं सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कथावाचक को सलामी दिए जाने को संविधान पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि आस्था को संविधान से ऊपर रखा जाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया मंच X पर कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी का वीडियो साझा करते हुए लिखा कि भारत कोई मठ नहीं, बल्कि एक संवैधानिक गणराज्य है और राज्य किसी धर्म-विशेष की जागीर नहीं हो सकता।

घटना के अनुसार, कथावाचक पुंडरीक गोस्वामी 17 नवंबर को बहराइच पहुंचे थे। पुलिस लाइन में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने पुलिसकर्मियों को प्रेरित किया। यह कार्यक्रम पूरी तरह पुलिस विभाग का बताया जा रहा है। इसी दौरान कथावाचक के स्वागत में रेड कारपेट बिछाई गई और एसपी आर सिंह द्वारा उन्हें सैल्यूट कर गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया। इसी सम्मान को लेकर अब सियासी विवाद खड़ा हो गया है और प्रशासनिक भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान से आमजन में बढ़ा सुरक्षा का भरोसा

देवरिया(राष्ट्र की परम्परा)पुलिस अधीक्षक देवरिया संजीव सुमन के निर्देशन में जनपद में शांति, सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाए रखने के उद्देश्य से शुक्रवार को “मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान” चलाया गया। यह अभियान प्रातः 5 बजे से 8 बजे तक जिले के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित किया गया।अभियान के दौरान सभी थाना प्रभारी एवं थानाध्यक्षों ने मार्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से सीधा संवाद स्थापित किया और उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाया। इस दौरान मित्र पुलिसिंग की भावना को प्रोत्साहित करते हुए छोटे-मोटे विवादों का मौके पर समाधान भी किया गया।पुलिस द्वारा संदिग्ध व्यक्तियों एवं वाहनों की सघन चेकिंग की गई। चेकिंग के दौरान चोरी की वाहनों की तलाश, तीन सवारी के विरुद्ध कार्रवाई, मॉडिफाइड साइलेंसर वाले दोपहिया वाहनों के चालान, नाबालिगों द्वारा वाहन चलाने तथा यातायात नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई की गई। साथ ही अवैध असलहा एवं मादक पदार्थों पर भी विशेष निगरानी रखी गई।पुलिस अधिकारियों ने आमजन को मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान के उद्देश्यों से अवगत कराया। नागरिकों ने पुलिस की इस पहल की सराहना करते हुए सुरक्षा व्यवस्था को लेकर संतोष व्यक्त किया।अभियान के दौरान जनपद के कुल 14 स्थानों पर चेकिंग करते हुए 189 व्यक्तियों एवं 108 वाहनों की जांच की गई।जनपदीय पुलिस द्वारा ऐसे अभियानों को निरंतर जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई गई है, ताकि आमजन की सुरक्षा, शांति एवं विश्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा सके।

बांग्लादेश में बदलती राजनीतिक परिदृश्य: भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती

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संपादकीय

हाल ही में विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि बांग्लादेश में बदलती राजनीतिक स्थिति भारत के लिए 1971 के युद्ध के बाद सबसे गंभीर रणनीतिक चुनौती बन गई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली इस समिति की रिपोर्ट ने न केवल पड़ोसी देश में अस्थिरता को उजागर किया है, बल्कि चीन-पाकिस्तान की बढ़ती प्रभावशाली गतिविधियों की ओर भी गंभीर इशारा किया है।
समिति की रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश में राजनीतिक अस्थिरता और इस्लामी ताकतों की वापसी ने वहां के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को जटिल बना दिया है। अतिवादी छात्र संगठन लगातार भारत विरोधी बयानबाजी कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि हालांकि मौजूदा स्थिति वर्ष 1971 की तुलना में अलग है, लेकिन बाहरी शक्तियों की सक्रियता और आंतरिक अस्थिरता मिलकर दीर्घकालिक चुनौतियाँ पैदा कर सकती हैं।
विशेष रूप से चीन की गतिविधियाँ चिंता का विषय हैं। समिति ने मोंगला बंदरगाह के विस्तार का उदाहरण देते हुए बताया कि चीन ने इस परियोजना में लगभग 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश किया है। चीन न केवल आर्थिक स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है, बल्कि बांग्लादेश में एयरबेस और पनडुब्बी बेस बनाने जैसी रणनीतिक योजनाओं के माध्यम से सैन्य प्रभाव भी बढ़ा रहा है। साथ ही, जमात-ए-इस्लामी जैसे समूहों को प्रोत्साहित करने की कोशिशें क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती हैं।
इस रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह पूरी तरह सरकारी अधिकारियों और गैर-सरकारी विशेषज्ञों के इनपुट पर आधारित है। इस तथ्य से इसकी विश्वसनीयता और गंभीरता और बढ़ जाती है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत को पड़ोसी देश की राजनीति पर करीबी नजर रखनी होगी और अपनी शांत कूटनीति के माध्यम से किसी भी अप्रत्याशित चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद चीन की सक्रियता बांग्लादेश में तेज़ हुई है। यह संकेत है कि क्षेत्रीय समीकरण अब अधिक जटिल और संवेदनशील हो गए हैं। भारत के लिए यह चुनौती केवल राजनीतिक या सैन्य नहीं है, बल्कि आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर भी निर्णायक भूमिका निभाने वाली है।
भारत की ‘शांत कूटनीति’ और सतर्क रणनीतिक दृष्टिकोण की सराहना करते हुए, यह जरूरी है कि पड़ोसी देश में किसी भी प्रकार के असंतुलन या बाहरी हस्तक्षेप की निगरानी लगातार की जाए। बांग्लादेश में स्थिरता न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र के लिए शांति और समृद्धि का आधार है।
बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक और रणनीतिक तस्वीर भारत के लिए केवल चुनौती ही नहीं, बल्कि चेतावनी भी है। अब वक्त आ गया है कि भारत अपनी नीतियों में और अधिक सक्रियता, सतर्कता और दूरदर्शिता लाए, ताकि किसी भी अप्रत्याशित संकट से निपटने की क्षमता मजबूत रहे।

संस्कार और शिक्षा का संतुलन: सशक्त समाज निर्माण की अनिवार्य शर्त

डॉ.सतीश पाण्डेय

महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। किसी भी समाज की प्रगति केवल ऊंची इमारतों, अत्याधुनिक तकनीक या डिग्रियों की संख्या से नहीं आंकी जा सकती। समाज की वास्तविक शक्ति उन संस्कारों में निहित होती है, जो व्यक्ति के चरित्र, सोच और व्यवहार को गढ़ते हैं। आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में जब शिक्षा का उद्देश्य नौकरी, पद और भौतिक सफलता तक सिमटता जा रहा है, तब यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि क्या हम एक सशक्त, संवेदनशील और नैतिक समाज की ओर अग्रसर हैं।
संस्कार जीवन की वह पहली पाठशाला है, जहां व्यक्ति सत्य, ईमानदारी, करुणा, अनुशासन, सहिष्णुता और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे मूल्यों से परिचित होता है। परिवार से शुरू होकर समाज और विद्यालय तक पहुंचने वाली यह सीख जब औपचारिक शिक्षा से जुड़ती है, तभी एक संतुलित और जिम्मेदार नागरिक का निर्माण संभव होता है। किंतु वर्तमान समय की विडंबना यह है कि शिक्षा और संस्कार के बीच की यह आवश्यक कड़ी धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है।डिग्रियों और अंकों की होड़ में नैतिकता,संवेदनशीलता और सामाजिक सरोकार पीछे छूटते जा रहे हैं। परिणामस्वरूप समाज में शिक्षित लोगों की संख्या तो बढ़ रही है, लेकिन मानवीय मूल्यों से युक्त नागरिकों का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, असहिष्णुता, पारिवारिक विघटन और सामाजिक तनाव इस गिरते नैतिक स्तर के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यह स्थिति इस ओर संकेत करती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में संस्कारों का समावेश अब केवल एक विचार नहीं, बल्कि समय की अनिवार्य आवश्यकता बन चुका है। शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा करने और परीक्षा परिणाम देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों को विद्यार्थियों में जीवन मूल्यों, सामाजिक चेतना और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करनी होगी। नैतिक शिक्षा, योग, खेल, सामाजिक सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियों को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए, ताकि विद्यार्थी सर्वांगीण विकास की ओर बढ़ सकें। इसके साथ ही परिवार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चों के पहले गुरु माता-पिता ही होते हैं, जिनके आचरण और व्यवहार से संस्कारों की नींव पड़ती है। यदि घर का वातावरण अनुशासन, प्रेम और नैतिकता से परिपूर्ण होगा, तो वही मूल्य बच्चों के व्यक्तित्व में भी परिलक्षित होंगे। जब परिवार, विद्यालय और समाज—तीनों मिलकर एक ही दिशा में प्रयास करते हैं, तभी एक सशक्त, समरस और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव होता है।
संस्कार से शिक्षा तक की यह यात्रा ही समाज को वास्तविक मजबूती प्रदान करती है। यही वह असली पाठशाला है, जहां केवल उज्ज्वल भविष्य ही नहीं, बल्कि सभ्यता और संस्कृति का भी निर्माण होता है।

सत्ता का बढ़ता वर्चस्व और कमजोर होता विपक्ष: भारतीय लोकतंत्र के संतुलन पर गहराता संकट

कैलाश सिंह
महाराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। भारतीय राजनीति वर्तमान समय में एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां सत्ता का लगातार बढ़ता वर्चस्व लोकतांत्रिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। एक ओर सत्ताधारी दल का राजनीतिक, संगठनात्मक और वैचारिक प्रभुत्व मजबूत होता दिख रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष संख्या, नेतृत्व और वैचारिक स्पष्टता—तीनों ही स्तरों पर सिमटता नजर आ रहा है। यह स्थिति किसी एक दल तक सीमित न होकर संपूर्ण लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन चुकी है।

लोकतंत्र की मूल आत्मा संतुलन, जवाबदेही और पारदर्शिता में निहित होती है। एक मजबूत सरकार तभी प्रभावी मानी जाती है, जब उसके समानांतर एक सशक्त विपक्ष भी मौजूद हो, जो नीतियों की समीक्षा करे, जनहित के प्रश्न उठाए और सत्ता को निरंकुश होने से रोके। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में सत्ता का प्रभाव केवल चुनावी जीत तक सीमित नहीं रह गया है। इसका असर प्रशासनिक निर्णयों, संस्थागत प्रक्रियाओं, सार्वजनिक विमर्श और मीडिया के एजेंडे तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।

दूसरी ओर विपक्ष अपनी भूमिका निभाने में बार-बार असफल होता प्रतीत हो रहा है। आपसी मतभेद, नेतृत्व का अभाव, साझा वैचारिक दिशा की कमी और जमीनी मुद्दों से दूरी ने विपक्ष को कमजोर किया है। संसद से लेकर सड़क तक विपक्ष की आवाज़ उतनी प्रभावी नहीं रह गई, जितनी एक स्वस्थ लोकतंत्र में अपेक्षित होती है। इसके परिणामस्वरूप सत्ता के फैसलों पर प्रभावी निगरानी कमजोर पड़ती जा रही है, जो लोकतांत्रिक ढांचे के लिए शुभ संकेत नहीं है।

विपक्ष का सिमटना केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरे वैचारिक संकट का भी संकेत देता है। जब महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की समस्याएं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र से बाहर हो जाते हैं, तब लोकतंत्र का उद्देश्य भी कमजोर पड़ने लगता है। ऐसी परिस्थितियों में सत्ता के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए आवश्यक नैतिक और वैचारिक शक्ति भी क्षीण हो जाती है।

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वर्चस्व की राजनीति का एक बड़ा खतरा यह है कि असहमति को अवांछित या राष्ट्रविरोधी दृष्टि से देखा जाने लगता है। आलोचना को विकास में बाधा और सवालों को नकारात्मकता के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगता है। यह प्रवृत्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थागत संतुलन और स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण संवाद की गुंजाइश को सीमित करता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है।

लोकतंत्र में संवाद, सहमति और असहमति—तीनों का समान महत्व होता है। जब संवाद की जगह आदेश और सहमति की जगह वर्चस्व ले लेता है, तब लोकतांत्रिक ढांचा धीरे-धीरे खोखला होने लगता है। इतिहास साक्षी है कि सत्ता का अति-केंद्रीकरण अंततः जनहित और संस्थागत स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाता है।

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आज आवश्यकता है कि विपक्ष आत्ममंथन करे, आंतरिक मतभेदों को दूर कर संगठित प्रयास करे और जनता के वास्तविक मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में लाए। केवल सत्ता-विरोध नहीं, बल्कि सकारात्मक विकल्प और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ना समय की मांग है। वहीं सत्ताधारी पक्ष को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरंतर संवाद, पारदर्शिता और जवाबदेही की जीवंत प्रणाली है।

यदि विपक्ष इसी तरह कमजोर होता रहा और सत्ता का वर्चस्व निरंतर बढ़ता गया, तो इसका दुष्परिणाम लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने के रूप में सामने आ सकता है। ऐसी स्थिति में सबसे अधिक नुकसान आम जनता को उठाना पड़ेगा। इसलिए यह समय आत्मचिंतन का है, ताकि लोकतंत्र का संतुलन बना रहे और उसकी आत्मा सुरक्षित रह सके।

वायरल वीडियो पर त्वरित पुलिस कार्रवाई, नाबालिग से मारपीट का आरोपी गिरफ्तार

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हजारीबाग/रांची (राष्ट्र की परम्परा)। जिले के बरही थाना क्षेत्र में एक नाबालिग बच्चे के साथ मारपीट का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। जांच में यह घटना बरही थाना क्षेत्र के हरिनगर मोहल्ला की पाई गई।

मामले में नाबालिग की मां के बयान के आधार पर 17 दिसंबर 2025 को बरही थाना में कांड संख्या 468/25 दर्ज किया गया। आरोप है कि क्रिकेट खेलने के दौरान 11 वर्षीय बच्चे के साथ आरोपी आलोक गुप्ता (उम्र लगभग 30 वर्ष) ने मारपीट की। बच्चे की आवाज सुनकर उसकी मां मौके पर पहुंची और बीच-बचाव कर बच्चे को सुरक्षित किया।

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पुलिस के अनुसार, प्राथमिकी दर्ज होने के बाद आरोपी और उसके परिजनों को नोटिस भेजा गया, लेकिन उन्होंने नोटिस लेने से इंकार कर दिया। इसके बाद 18 दिसंबर 2025 को एक विशेष टीम का गठन किया गया। पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी आलोक गुप्ता को हजारीबाग रोड, एनएच-33 स्थित युवराज होटल के पास से गिरफ्तार कर लिया।

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पुलिस अधिकारियों ने बताया कि मामले में संबंधित धाराओं के तहत विधिसम्मत कार्रवाई की जा रही है और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

शिक्षामित्र पर मनमानी का आरोप, प्रधानाध्यापक ने खंड शिक्षा अधिकारी से की शिकायत

बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। नगरपालिका क्षेत्र अंतर्गत स्थित एक प्राथमिक विद्यालय में तैनात शिक्षामित्र पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विद्यालय के प्रधानाध्यापक ने शिक्षामित्र की मनमानी और लापरवाही को लेकर खंड शिक्षा अधिकारी को लिखित रूप से अवगत कराया है। आरोप है कि शिक्षामित्र बच्चों के पठन-पाठन में किसी प्रकार का सहयोग नहीं करतीं और टोकने पर विवाद व झगड़े पर उतारू हो जाती हैं, जिससे विद्यालय का शैक्षणिक माहौल प्रभावित हो रहा है।

मामला नगरपालिका क्षेत्र के जयनगर प्राथमिक विद्यालय नंबर दो से जुड़ा है, जहां तैनात महिला शिक्षामित्र पर यह आरोप है कि वह नियमित रूप से बच्चों को पढ़ाने का कार्य नहीं करतीं। प्रधानाध्यापक का कहना है कि इस संबंध में वे पहले भी खंड शिक्षा अधिकारी को जानकारी दे चुके हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

प्रधानाध्यापक ने बताया कि गुरुवार को कक्षा चार में छात्रों की उपस्थिति कम होने पर जब उन्होंने कारण पूछा तो शिक्षामित्र बहस करने लगीं। उस समय प्रधानाध्यापक बीएलओ ड्यूटी में तैनात थे। स्थिति बिगड़ने पर उपजिलाधिकारी विपिन कुमार द्विवेदी को सूचना दी गई, जिनके हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ।

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आरोप है कि शिक्षामित्र विद्यालय समय में अक्सर मोबाइल फोन पर व्यस्त रहती हैं या बातचीत करती रहती हैं। इस संबंध में अभिभावकों द्वारा भी शिकायत की गई थी, जो जांच में सही पाई गई। प्रधानाध्यापक का यह भी कहना है कि कई बार शिक्षामित्र उनके साथ गाली-गलौज और झगड़ा करने लगती हैं, लेकिन महिला होने के कारण वे विवश हो जाते हैं।

प्रधानाध्यापक का आरोप है कि पूरे प्रकरण की जानकारी उच्च अधिकारियों को होने के बावजूद कार्रवाई के बजाय उन्हें ही नसीहत देकर मामला टाल दिया जाता है, जिससे विद्यालय का वातावरण प्रभावित हो रहा है।

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इस संबंध में पूछे जाने पर खंड शिक्षा अधिकारी देव मुनि वर्मा ने बताया कि मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।

उपायुक्त की अध्यक्षता में आपूर्ति विभाग की समीक्षा बैठक, राशन वितरण व धान अधिप्राप्ति पर सख्त निर्देश

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हजारीबाग/रांची (राष्ट्र की परम्परा)। उपायुक्त शशि प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में समाहरणालय सभागार में आपूर्ति विभाग की समीक्षात्मक बैठक आयोजित की गई। बैठक में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) एवं राज्य खाद्य सुरक्षा योजनाओं की प्रगति की विस्तार से समीक्षा की गई। इस दौरान ई-केवाईसी, पीडीएस व्यवस्था, राशन कार्ड विलोपन, आरसीएमएस तथा पीजीएमएस से संबंधित मामलों पर भी चर्चा हुई।

उपायुक्त ने स्पष्ट निर्देश दिए कि मृत एवं अयोग्य लाभुकों के राशन कार्ड तत्काल हटाए जाएं तथा पात्र लाभुकों को प्राथमिकता के आधार पर जोड़ा जाए। उन्होंने लंबित आवेदनों का शीघ्र निष्पादन सुनिश्चित करने और कम वितरण वाले क्षेत्रों में सुधार के लिए ठोस कार्रवाई के निर्देश दिए।

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बैठक में पीडीएस डीलरों की नियमित जांच, “वन नेशन वन राशन कार्ड” योजना के तहत लाभुकों का सत्यापन तथा धान अधिप्राप्ति प्रक्रिया में बिचौलियों पर सख्त रोक लगाने के निर्देश भी दिए गए। उपायुक्त ने सभी आवश्यक वस्तुओं का शत-प्रतिशत वितरण सुनिश्चित करने पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

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अल्पसंख्यक दिवस पर 75% अनुदान की मांग, हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट ने सरकार से उठाया मुद्दा

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रांची (राष्ट्र की परम्परा)। अल्पसंख्यक दिवस के अवसर पर हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट ने अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित विद्यालयों और महाविद्यालयों को मिलने वाला सरकारी अनुदान बढ़ाकर 75 प्रतिशत करने की मांग उठाई है। ट्रस्ट का कहना है कि वर्तमान में मिलने वाला अनुदान अपर्याप्त है, जिससे शैक्षणिक संस्थानों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

ट्रस्ट के अनुसार, कम अनुदान के कारण शिक्षकों के मानदेय, शिक्षा की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाएं प्रभावित हो रही हैं। इससे न केवल शिक्षकों का मनोबल गिर रहा है, बल्कि छात्रों की पढ़ाई पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

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अल्पसंख्यक मंत्री से हुई मुलाकात

हेल्पिंग इंडिया ट्रस्ट के सचिव शाहिद रज़ा ने इस मुद्दे को लेकर अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हाफ़िज़ुल हसन से मुलाकात की और संस्थानों की समस्याओं से अवगत कराया। ट्रस्ट ने सरकार से मांग की कि शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यक संस्थानों को मजबूत करने के लिए अनुदान में बढ़ोतरी आवश्यक है।

मुलाकात के दौरान मंत्री हाफ़िज़ुल हसन ने ट्रस्ट की मांगों पर गंभीरता से विचार करने और सकारात्मक कदम उठाने का आश्वासन दिया। ट्रस्ट ने उम्मीद जताई है कि सरकार जल्द ही इस दिशा में ठोस निर्णय लेगी, जिससे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को राहत मिलेगी।

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