बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। बरहज विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक राम प्रसाद जायसवाल की 9वीं पुण्यतिथि गुरुवार को उनके बरहज स्थित निजी आवास परिसर में श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर विधानसभा क्षेत्र एवं नगरपालिका के नागरिकों ने उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।
कार्यक्रम में भक्ति रस से ओत-प्रोत संगीत संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें कलाकारों की प्रस्तुतियों ने उपस्थित लोगों को भाव-विभोर कर दिया।
नगरपालिका अध्यक्ष श्वेता जायसवाल ने पूर्व विधायक द्वारा क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा। श्यामसुंदर जायसवाल ने कहा कि अपने पिता के सपनों को साकार करना ही उनका प्रथम कर्तव्य है।
कार्यक्रम का संचालन मनोज गुप्ता ने किया। इस अवसर पर आश्रम के पीठाधीश्वर आँजनेय दास महाराज, भाजपा जिलाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह, अनिरुद्ध मिश्रा, केशव सिंह पहलवान, भाजपा मंडल अध्यक्ष विवेक गुप्त, रामेश्वर यादव, रमेश तिवारी अंज्जान, संगीता देवी, नीलू यादव, शंभू नाथ तिवारी, अशोक शुक्ला, डॉ. सूरज गुप्ता, बादशाह प्रेमी सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)l जनपद में आयोजित देवरिया रोजगार मेला 2026 में कुल 402 अभ्यर्थियों ने भाग लिया, जिनमें से 259 युवाओं का विभिन्न कंपनियों द्वारा प्रारंभिक चयन किया गया। रोजगार मेले में 9 कंपनियों ने तकनीकी, सेल्स, मार्केटिंग, सुपरवाइजर, मशीन ऑपरेटर, कस्टमर सर्विस और प्रशासनिक पदों के लिए साक्षात्कार किए।रोजगार मेला राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम लिमिटेड और जिला सेवायोजन कार्यालय, देवरिया के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम परिसर में आयोजित किया गया। चयन प्रक्रिया के दौरान अभ्यर्थियों के बायोडाटा की जांच, लिखित व मौखिक साक्षात्कार और आवश्यकतानुसार कौशल परीक्षण किया गया।चयनित युवाओं को संबंधित कंपनियों द्वारा आगे की औपचारिकताओं, दस्तावेज सत्यापन और प्रशिक्षण संबंधी जानकारी दी गई। आयोजन में सुबह से ही युवाओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं, जिनमें ग्रामीण क्षेत्रों से आए अभ्यर्थी भी शामिल रहे।प्रभारी सेवायोजन अधिकारी रोहन अपूर्व सिन्हा ने चयनित अभ्यर्थियों को बधाई देते हुए निरंतर कौशल विकास और निष्ठा से कार्य करने की सलाह दी। साथ ही जिन युवाओं का चयन नहीं हो सका, उन्हें निराश न होकर प्रयास जारी रखने का संदेश दिया।विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे रोजगार मेले स्थानीय स्तर पर बेरोजगारी कम करने और युवाओं को महानगरों की ओर पलायन से रोकने में सहायक साबित होते हैं। नियमित अंतराल पर इस प्रकार के आयोजन से जनपद में कौशल आधारित रोजगार के अवसरों में वृद्धि की संभावना है।
एआई के भविष्य पर भारत-फ्रांस की साझेदारी, जिम्मेदार टेक्नोलॉजी पर जोर
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने गुरुवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में हिस्सा लिया। इस वैश्विक मंच पर कई देशों के शीर्ष नेता, टेक कंपनियों के सीईओ और नीति-निर्माता मौजूद रहे। अपने मुख्य संबोधन में मैक्रॉन ने संकेत दिया कि भारत 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध पर विचार कर सकता है। उन्होंने कहा कि फ्रांस में ऐसे नियम लागू हैं और भारत भी बच्चों एवं किशोरों की डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता दे सकता है। उन्होंने कहा, “बच्चों की सुरक्षा नियमन नहीं, बल्कि सभ्यता का प्रश्न है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस दिशा में सोच रहे हैं।” बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध पर बड़ा संकेत इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में मैक्रॉन का यह बयान खासा चर्चित रहा। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए नाबालिगों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम जरूरी हैं। फ्रांस में 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े नियम लागू हैं। इसी तर्ज पर भारत में भी नीति-निर्माण की संभावना जताई गई। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत इस दिशा में कदम उठाता है, तो यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में से एक में बड़ा बदलाव होगा। इंडिया स्टैक और डिजिटल पहचान की वैश्विक सराहना इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में मैक्रॉन ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की खुलकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारत ने 1.4 अरब लोगों के लिए डिजिटल पहचान तैयार कर एक मिसाल कायम की है। उन्होंने कहा, “दुनिया ने एक दशक पहले कहा था कि इतने बड़े देश को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ना असंभव है। भारत ने इसे संभव कर दिखाया।” भारत की डिजिटल भुगतान प्रणाली आज हर महीने लगभग 20 अरब लेनदेन संसाधित कर रही है। साथ ही, 50 करोड़ से अधिक डिजिटल स्वास्थ्य आईडी जारी की जा चुकी हैं। मैक्रॉन ने इस मॉडल को “इंडिया स्टैक ओपन इंटरऑपरेबल सॉवरेन सिस्टम” बताया, जो डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अनूठा उदाहरण है।
एआई का भविष्य: नवाचार और जिम्मेदारी का संतुलन इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का मुख्य फोकस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के जिम्मेदार उपयोग पर रहा। मैक्रॉन ने कहा कि एआई केवल बड़े देशों का खेल नहीं है। उन्होंने कहा, “भारत, फ्रांस और यूरोप मिलकर एक ऐसा रास्ता अपना सकते हैं जिसमें नवाचार और जिम्मेदारी, प्रौद्योगिकी और मानवता का संतुलन हो।” उनके अनुसार, एआई का भविष्य वही देश तय करेंगे जो तकनीकी प्रगति के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व को भी महत्व देंगे। भारत-फ्रांस साझेदारी को नई दिशा इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक सहयोग को नई ऊर्जा दी है। दोनों देशों ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई रिसर्च और साइबर सुरक्षा में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। भारत की डिजिटल क्रांति—चाहे वह डिजिटल पहचान हो, भुगतान प्रणाली हो या स्वास्थ्य अवसंरचना—अब वैश्विक मॉडल के रूप में देखी जा रही है। विश्लेषकों का मानना है कि इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 आने वाले वर्षों में एआई नीति निर्माण का आधार बनेगा। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि डिजिटल भविष्य की दिशा तय करने वाला मंच बनकर उभरा है। इमैनुएल मैक्रॉन के बयान ने जहां बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध पर नई बहस छेड़ी है, वहीं भारत के डिजिटल मॉडल को वैश्विक स्वीकृति भी दिलाई है। भारत और फ्रांस की साझेदारी एआई के क्षेत्र में एक जिम्मेदार और समावेशी भविष्य की ओर बढ़ने का संकेत दे रही है।
कराची (राष्ट्र की परम्परा)। पाकिस्तान के कराची शहर में बड़ा हादसा हुआ है। गैस सिलेंडर लीक से हुए धमाके के बाद एक रिहायशी इमारत ढह गई, जिसमें दबकर 16 लोगों की मौत हो गई और 14 अन्य घायल हो गए। हादसा सुबह करीब 4:15 बजे सहरी के समय सोल्जर बाजार स्थित गुल राणा कॉलोनी में हुआ।
पुलिस के अनुसार धमाका इमारत के पहले फ्लोर पर हुआ, जिसके बाद पूरी संरचना भरभराकर गिर गई। राहत एवं बचाव दल ने मलबे से कई लोगों को बाहर निकाला और घायलों को अस्पताल पहुंचाया।
महिलाओं और बच्चों समेत 16 की मौत
स्थानीय अधिकारियों ने पुष्टि की है कि मृतकों में छह महिलाएं और चार बच्चे शामिल हैं।
सिविल हॉस्पिटल कराची के ट्रॉमा सेंटर के निदेशक डॉ. मोहम्मद साबिर मेमन के मुताबिक 13 शव अस्पताल लाए गए थे, जबकि अन्य मृतकों की पहचान प्रक्रिया जारी है। घायलों का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में चल रहा है।
अधिकारियों का कहना है कि यह इमारत वैध रूप से स्वीकृत नहीं थी। अलग-अलग कमरों को जोड़कर बहुमंजिला ढांचा खड़ा किया गया था। भीड़भाड़ वाले इलाके और संकरी जगह के कारण राहत कार्य में दिक्कतें आईं। आसपास के घरों को भी नुकसान पहुंचा है। पुलिस ने इलाके को घेरकर सुरक्षा कड़ी कर दी है।
पाकिस्तान-ईरान सीमा पर गैस प्लांट में धमाका
एक अन्य घटना में बलूचिस्तान के ताफ्तान क्षेत्र में, जो पाकिस्तान-ईरान सीमा के पास है, एक गैस प्लांट में जोरदार विस्फोट हुआ। धमाके की आवाज करीब 10 किलोमीटर दूर तक सुनी गई।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्लांट के अंदर 100 से अधिक लोगों के फंसे होने की आशंका है। इससे पहले खैबर पख्तूनख्वा के बाजौर जिले में सुरक्षा बलों पर हमले में एक बच्चे समेत 11 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी।
नाइजीरिया के उत्तर-मध्य क्षेत्र में स्थित एक खदान में जहरीली गैस के रिसाव से कम से कम 37 लोगों की मौत हो गई, जबकि 26 अन्य को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है। घटना के बाद प्रशासन ने खनन स्थल को बंद कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के अनुसार यह हादसा मंगलवार तड़के पठार राज्य के वासे क्षेत्र स्थित कम्पानी जुराक समुदाय में हुआ। पुलिस प्रवक्ता अल्फ्रेड अलाबो ने बताया कि प्रारंभिक जांच में खनिकों पर सीसा ऑक्साइड, सल्फर और कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों के अचानक रिसाव का असर पाया गया। ये गैसें बंद या कम हवादार वातावरण में अत्यंत घातक होती हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, खदान के अंदर काम कर रहे मजदूर अचानक बेहोश होने लगे। राहत और बचाव दल ने कई लोगों को बाहर निकाला, लेकिन तब तक 37 लोगों की मौत हो चुकी थी। मृतकों के शव उनके परिवारों को धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिए गए हैं।
सरकार ने खदान बंद कराई
नाइजीरिया के ठोस खनिज विकास मंत्री डेले अलाके ने कहा कि खनिक गैस के उत्सर्जन की जहरीली प्रकृति से अनजान थे और काम जारी रखे हुए थे। घटना के बाद सरकार ने खदान को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है और विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं।
यह स्पष्ट नहीं है कि खदान कानूनी रूप से संचालित हो रही थी या नहीं। नाइजीरिया में अवैध खनन लंबे समय से चिंता का विषय रहा है, जिसके चलते बीते वर्षों में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है।
योगी आदित्यनाथ–मोहन भागवत मुलाकात: 2027 विधानसभा चुनाव और UGC विनियम 2026 पर मंथन से तेज हुई सियासी हलचल
लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत की लखनऊ में हुई मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत दो दिवसीय दौरे पर राजधानी में थे। निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में हुई यह बैठक करीब 40 मिनट चली। आधिकारिक तौर पर एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव, UGC विनियम 2026, और संगठनात्मक समन्वय जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहे। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह मुलाकात सिर्फ औपचारिक शिष्टाचार नहीं थी, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव की रणनीतिक तैयारियों का संकेत देती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में अपेक्षित प्रदर्शन न मिलने के बाद भाजपा के लिए राज्य की राजनीतिक जमीन और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
UGC विनियम 2026 और सुप्रीम कोर्ट की रोक हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा लाए गए UGC विनियम 2026 पर अंतरिम रोक लगाई थी। इन नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और पारदर्शिता बढ़ाना बताया गया था, लेकिन देशभर में इन पर विवाद खड़ा हो गया। सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मोहन भागवत के साथ बातचीत में UGC विनियम 2026 के राजनीतिक प्रभाव और 2027 विधानसभा चुनाव पर संभावित असर को लेकर चिंता साझा की। यह मुद्दा छात्रों, शिक्षकों और विपक्षी दलों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यदि इस विवाद का समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो यह चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा बन सकता है। समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला चर्चा में बैठक में समाजवादी पार्टी के पीडीए (PDA) फॉर्मूले पर भी मंथन हुआ। समाजवादी पार्टी द्वारा पेश किए गए इस सामाजिक समीकरण को भाजपा गंभीरता से देख रही है। हाल के महीनों में योगी आदित्यनाथ ने अपने भाषणों में PDA अभियान का उल्लेख कर विपक्ष पर सीधा हमला बोला है। मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में हिंदू एकता, धर्मांतरण और जनसंख्या असंतुलन जैसे मुद्दों पर जोर दिया। इसे भाजपा की वैचारिक दिशा और चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। RSS शताब्दी वर्ष और उत्तर प्रदेश का महत्व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस वर्ष अपना शताब्दी समारोह मना रहा है। मोहन भागवत इससे पहले मथुरा और गोरखपुर का दौरा कर चुके हैं। संघ इसे जनसंपर्क अभियान का हिस्सा बता रहा है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है। उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए निर्णायक राज्य है। संगठन की मजबूती, बूथ स्तर तक समन्वय और सरकार-संगठन के बीच तालमेल को बेहतर बनाने पर भी बैठक में चर्चा होने की संभावना जताई जा रही है। 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, योगी आदित्यनाथ–मोहन भागवत मुलाकात में 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति, सामाजिक समीकरण और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर विस्तार से विचार हुआ। भाजपा आगामी चुनाव को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच लगातार संवाद इसी दिशा में संकेत देता है। योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत की यह मुलाकात उत्तर प्रदेश की सियासत में दूरगामी असर डाल सकती है। UGC विनियम 2026, 2027 विधानसभा चुनाव, और समाजवादी पार्टी का PDA फॉर्मूला आने वाले समय में राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। संघ के शताब्दी वर्ष के बीच हुई यह बैठक भाजपा की चुनावी रणनीति का अहम अध्याय मानी जा रही है।
बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस: युवक फंदे से लटका मिला, बक्से में थर्ड जेंडर का शव; हत्या के बाद आत्महत्या की आशंका
बलिया (राष्ट्र की परम्परा )डबल मर्डर सुसाइड केस ने गुरुवार सुबह पूरे जनपद में सनसनी फैला दी। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के बैरिया थाना क्षेत्र के रानीगंज कस्बे में एक युवक का शव कमरे में फंदे से लटका मिला, जबकि उसी मकान की छत पर रखे बक्से से एक थर्ड जेंडर का शव बरामद हुआ। पुलिस इसे प्रथम दृष्टया हत्या के बाद आत्महत्या का मामला मानकर जांच कर रही है। क्या है पूरा मामला? गुरुवार सुबह करीब नौ बजे रानीगंज बाजार स्थित एक मकान में 32 वर्षीय युवक का शव फंदे से लटका मिला। मृतक की पहचान रवि गुप्ता (32) पुत्र विजय कुमार गुप्ता निवासी रानीगंज बाजार के रूप में हुई। जब परिजनों और स्थानीय लोगों ने पुलिस को सूचना दी तो बैरिया पुलिस और क्षेत्राधिकारी मौके पर पहुंचे। जांच के दौरान मकान की छत पर रखे एक बड़े बक्से से 62 वर्षीय थर्ड जेंडर रेखा उर्फ जहांगीर बादशाह का शव बरामद हुआ। इस खुलासे के बाद बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस ने गंभीर रूप ले लिया और इलाके में दहशत फैल गई।
पैसों के लेनदेन से जुड़ा विवाद? प्राथमिक जांच में सामने आया है कि युवक और थर्ड जेंडर के बीच पैसों के लेनदेन को लेकर विवाद चल रहा था। पुलिस सूत्रों के अनुसार आशंका है कि विवाद बढ़ने पर युवक ने पहले रेखा की हत्या की। इसके बाद शव को ठिकाने लगाने के लिए उसे बक्से में बंद कर छत पर रख दिया गया। लेकिन शव को कहीं और ले जाने में असफल रहने पर युवक ने अपने कमरे में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच के बाद ही बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस की सच्चाई सामने आएगी। थर्ड जेंडर समुदाय में शोक रेखा उर्फ जहांगीर बादशाह पिछले करीब 50 वर्षों से रानीगंज कस्बे में रह रहे थे। वे थर्ड जेंडर समुदाय के प्रमुख माने जाते थे और विभिन्न आयोजनों में समुदाय की बुकिंग व व्यवस्थाएं संभालते थे। उनकी अचानक हुई मौत से समुदाय में शोक की लहर है। स्थानीय लोगों के अनुसार वे लंबे समय से कस्बे में रहकर सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय थे। पुलिस की कार्रवाई और जांच घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची। दोनों शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। पुलिस निम्न बिंदुओं पर जांच कर रही है: मोबाइल कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR),घटनास्थल से जुटाए गए फॉरेंसिक साक्ष्य,आसपास के लोगों से पूछताछ,पैसों के लेनदेन का रिकॉर्ड,अधिकारियों का कहना है कि बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस में हर पहलू की बारीकी से जांच की जा रही है और जल्द ही पूरे मामले का खुलासा किया जाएगा। इलाके में दहशत, लोग स्तब्ध रानीगंज कस्बे में इस दोहरे मौत के मामले के बाद दहशत का माहौल है। स्थानीय लोग इस घटना से स्तब्ध हैं। दिनभर क्षेत्र में लोगों की भीड़ जुटी रही।पुलिस ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और जांच में सहयोग करने की अपील की है। कानूनी और सामाजिक पहलू बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस न केवल एक आपराधिक घटना है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक तनाव की भी ओर इशारा करता है। पैसों के विवाद, मानसिक दबाव और आपसी तनाव कई बार गंभीर अपराध का रूप ले लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में:वित्तीय पारदर्शिता,विवादों का कानूनी समाधान,मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान,बेहद जरूरी है। फिलहाल बलिया डबल मर्डर सुसाइड केस की जांच जारी है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक विश्लेषण के बाद ही स्पष्ट होगा कि यह मामला पूरी तरह हत्या के बाद आत्महत्या का है या इसमें कोई अन्य साजिश भी शामिल है। पुलिस का कहना है कि साक्ष्यों के आधार पर जल्द ही सच सामने लाया जाएगा।
पटना हाईकोर्ट का नोटिस: विधानसभा अध्यक्ष समेत 42 विधायकों से चुबिहार में राजनीतिक भूचाल: विधानसभा अध्यक्ष समेत कई दिग्गजों से जवाब तलब
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क) हाईकोर्ट का नोटिस बिहार की सियासत में बड़ा मुद्दा बन गया है। पटना हाईकोर्ट का नोटिस एक साथ 42 विधायकों को जारी किया गया है, जिनमें बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार, मंत्री विजेंद्र यादव, विधायक चेतन आनंद और अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं। इस कार्रवाई ने सत्ता और विपक्ष दोनों खेमों में हलचल मचा दी है। क्या है पूरा मामला? मामला विधानसभा चुनाव के बाद दायर चुनाव याचिकाओं से जुड़ा है। हारने वाले उम्मीदवारों ने आरोप लगाया कि विजयी प्रत्याशियों ने अपने चुनावी हलफनामा (Election Affidavit) में संपत्ति, आपराधिक मामलों और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को या तो छुपाया या गलत तरीके से प्रस्तुत किया। प्रारंभिक सुनवाई के बाद पटना उच्च न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए सभी 42 विधायकों से जवाब मांगा है। अदालत का मानना है कि चुनावी हलफनामा लोकतांत्रिक पारदर्शिता का आधार है और इसमें गलत जानकारी देना गंभीर उल्लंघन हो सकता है। किन-किन नेताओं को मिला नोटिस? सूची में कई बड़े नाम शामिल हैं—विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार,मंत्री विजेंद्र यादव,विधायक चेतन आनंद,पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा राजद विधायक अमरेंद्र प्रसाद,सत्ता और विपक्ष दोनों के विधायकों को नोटिस मिलना इस मामले को और व्यापक बनाता है। नेताओं की प्रतिक्रिया राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने कहा कि चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है। उनका कहना है कि अब मामला न्यायालय के विचाराधीन है और अंतिम फैसला अदालत ही करेगी। जीवेश मिश्रा ने स्पष्ट किया कि न्यायालय के सवालों का जवाब अदालत में ही दिया जाएगा। कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने भी कहा कि यदि किसी को चुनाव प्रक्रिया पर आपत्ति है, तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाना उसका अधिकार है।
क्यों अहम है पटना हाईकोर्ट का नोटिस? पटना हाईकोर्ट का नोटिस सिर्फ एक कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता पर बड़ा संदेश है। अदालत ने साफ कहा कि मतदाताओं को उम्मीदवार की सही जानकारी मिलना उनका अधिकार है। यदि यह साबित होता है कि चुनावी हलफनामा में जानबूझकर गलत जानकारी दी गई, तो संबंधित विधायकों की सदस्यता तक पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि पटना हाईकोर्ट का नोटिस राजनीतिक हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। आगे क्या? अब सबकी निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत यह तय करेगी कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या कानूनी कार्रवाई बनती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में बिहार की राजनीति की दिशा तय कर सकता है। यदि अदालत सख्त रुख अपनाती है, तो भविष्य में उम्मीदवारों को चुनावी हलफनामा भरते समय अधिक सावधानी बरतनी होगी। लोकतंत्र के लिए क्या मायने?चुनावी पारदर्शिता मजबूत होगी,उम्मीदवारों की जवाबदेही बढ़ेगी,मतदाताओं को सही जानकारी मिलने का अधिकार सुरक्षित होगा,पटना हाईकोर्ट का नोटिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका को भी दर्शाता है।
एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम ठप: 40 मिनट की सॉफ्टवेयर खराबी से दिल्ली-मुंबई सहित कई एयरपोर्ट प्रभावित
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। गुरुवार सुबह देश के कई बड़े एयरपोर्ट पर अचानक एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम में आई तकनीकी खराबी से यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। जानकारी के मुताबिक यह सॉफ्टवेयर खराबी करीब 40 मिनट से अधिक समय तक जारी रही, जिसके कारण एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम अस्थायी रूप से ठप हो गया। पीटीआई सूत्रों के अनुसार सुबह लगभग 6:45 बजे से 7:28 बजे तक एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम काम नहीं कर सका। इस दौरान दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों के एयरपोर्ट पर यात्रियों की लंबी कतारें देखी गईं। हालांकि बाद में तकनीकी टीम ने सॉफ्टवेयर खराबी को दूर कर सिस्टम को सामान्य कर दिया।
किन एयरलाइंस पर पड़ा असर इस तकनीकी समस्या का असर देश की प्रमुख एयरलाइंस पर पड़ा। इनमें IndiGo,Air India Express,SpiceJet,Akasa Air की चेक-इन सेवाएं प्रभावित रहीं। एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम बंद रहने के कारण यात्रियों को बोर्डिंग पास लेने और बैगेज ड्रॉप में देरी हुई। दिल्ली एयरपोर्ट पर ज्यादा असर राजधानी के Indira Gandhi International Airport पर सुबह के व्यस्त समय में यह समस्या सामने आई, जिससे यात्रियों में कुछ समय के लिए अफरातफरी की स्थिति बन गई। कई यात्रियों ने सोशल मीडिया पर एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम में आई सॉफ्टवेयर खराबी की जानकारी साझा की। मुंबई और अन्य महानगरों के एयरपोर्ट पर भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। हालांकि एयरलाइंस और एयरपोर्ट प्रबंधन की त्वरित कार्रवाई से हालात जल्द काबू में आ गए। उड़ानों पर कितना पड़ा असर? सूत्रों के मुताबिक, एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम की इस तकनीकी गड़बड़ी के बावजूद उड़ानों के संचालन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। कुछ फ्लाइट्स में हल्की देरी जरूर हुई, लेकिन बड़े स्तर पर रद्दीकरण की सूचना नहीं है। तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि सॉफ्टवेयर खराबी संभवतः सर्वर सिंक्रोनाइजेशन या नेटवर्क अपडेट से जुड़ी हो सकती है। हालांकि इस संबंध में एयरलाइंस की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। यात्रियों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी स्थिति में यात्रियों को— फ्लाइट से कम से कम 2-3 घंटे पहले एयरपोर्ट पहुंचना चाहिए। ऑनलाइन चेक-इन की सुविधा का उपयोग करना चाहिए। एयरलाइन की आधिकारिक वेबसाइट या ऐप पर फ्लाइट स्टेटस चेक करते रहना चाहिए। भविष्य में एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम की मजबूती और बैकअप व्यवस्था पर और ध्यान दिए जाने की जरूरत है, ताकि सॉफ्टवेयर खराबी जैसी घटनाओं से यात्रियों को कम से कम परेशानी हो। तकनीकी व्यवस्था पर उठे सवाल भारत के बड़े एयरपोर्ट्स पर प्रतिदिन लाखों यात्री सफर करते हैं। ऐसे में एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम का कुछ मिनटों के लिए भी ठप होना बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। इस घटना ने एयरलाइंस और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि राहत की बात यह रही कि सॉफ्टवेयर खराबी जल्द दूर कर ली गई और एयरपोर्ट चेक-इन सिस्टम दोबारा सामान्य रूप से काम करने लगा।
भागलपुर/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भागलपुर ब्लॉक स्थित गोल्डन लाइफ चिल्ड्रन एकेडमी में आयोजित खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान के तहत 5 से 10 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों को एमआर टीका लगाया गया। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने विद्यालय परिसर में पहुंचकर बच्चों का टीकाकरण किया और अभिभावकों को खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान का उद्देश्य बच्चों को खसरा और रूबेला जैसी संक्रामक बीमारियों से सुरक्षित रखना है। अभियान के दौरान आशा कार्यकर्ता पूनम देवी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ती माधुरी चौरसिया तथा एएनएम मंजू प्रजापति की विशेष भूमिका रही। स्वास्थ्यकर्मियों ने बच्चों को सुरक्षित वातावरण में एमआर टीका लगाया और आवश्यक स्वास्थ्य सलाह भी दी।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, खसरा एक अत्यंत संक्रामक और गंभीर बीमारी है, जो बच्चों में निमोनिया, दस्त, कुपोषण और यहां तक कि मृत्यु का कारण भी बन सकती है। वहीं, गर्भावस्था के दौरान यदि महिला को रूबेला संक्रमण हो जाए, तो शिशु में जन्मजात विकार—जैसे अंधापन, बहरापन, मानसिक विकास में कमी और जन्मजात हृदय रोग—हो सकते हैं। ऐसे में खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान बच्चों और समाज दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यालय परिसर में आयोजित इस एमआर टीका कार्यक्रम के दौरान “खसरा–रूबेला को हराएंगे, एमआर का टीका जरूर लगवाएंगे” का संदेश दिया गया। अभिभावकों से अपील की गई कि वे अपने बच्चों का नियमित टीकाकरण अवश्य कराएं और किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें। विद्यालय प्रबंधन ने भी इस खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान को सफल बनाने में सक्रिय सहयोग दिया। इस दौरान संतोष सैनी, कालिंदी सैनी, अध्यापक प्रहलाद प्रसाद, राम प्रेम यादव, अमर साहनी, प्रदीप कुमार मौर्य, प्रिंस कुमार, सौरभ शर्मा, प्रतिज्ञा, नाजिया तथा कमलेश ने आयोजन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य विभाग और विद्यालय प्रशासन के संयुक्त प्रयास से यह खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह के स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रमों से न केवल बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है, बल्कि समाज में टीकाकरण के प्रति सकारात्मक सोच भी विकसित होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि एमआर टीका बच्चों को जीवनभर के लिए गंभीर बीमारियों से बचाव प्रदान करता है। नियमित टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करना प्रत्येक अभिभावक की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य विभाग ने स्पष्ट किया कि आने वाले दिनों में भी विभिन्न विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों पर खसरा–रूबेला टीकाकरण अभियान चलाया जाएगा, ताकि शत-प्रतिशत बच्चों को एमआर टीका से आच्छादित किया जा सके। इस अभियान की सफलता से यह संदेश गया है कि यदि समाज, विद्यालय और स्वास्थ्य विभाग मिलकर प्रयास करें तो किसी भी जनहितकारी कार्यक्रम को सफल बनाया जा सकता है।
अब जबकि पूंजीवाद का सर्वोच्च दूत, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष तक भारत के जीडीपी के अनुमानों की विश्वसनीयता पर संदेह जता चुका है, ठीक-ठीक बजट के आंकड़ों का, जो जीडीपी के एक खास स्तर तथा रुपयों में जीडीपी में एक खास वृद्धि दर को मानकर चलने पर आधारित होते हैं, कोई खास अर्थ ही नहीं रह जाता है।
वास्तव में वर्तमान बजट में, करारोपण संबंधी अनेक कदमों की घोषणा करते हुए, इसके अनुमान तक देने की ज़हमत नहीं उठायी गयी है कि इन कदमों से राजस्व में कितनी कमी या बढ़ोतरी होने जा रही है। फिर भी बजट के आंकड़ों से हम इस बजट की रणनीतिक दिशा का अंदाजा लगा सकते हैं और हैरानी की बात नहीं है कि यह रणनीतिक दिशा, भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में, एक पूरी तरह से विकृत रणनीति है।
इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी समस्याएं इस प्रकार हैं : आर्थिक असमानता में बेतहाशा बढ़ोतरी, जिसका परिमाण पिछले सौ वर्ष के दौरान, किसी भी समय में इतना ज्यादा नहीं था ; शुद्ध गरीबी में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है, जिसे शुुरुआत में योजना आयोग द्वारा दैनिक कैलोरी आहार के मानक के आधार पर परिभाषित किया गया था ; और बेरोजगारी में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसकी मार में अब देश के शिक्षित युवाओं का विशाल हिस्सा भी आ चुका है। इन समस्याओं का एक साझा समाधान यह है कि आम लोगों के हाथों में बड़े पैमाने पर क्रय शक्ति पहुंचायी जाए। लेकिन, अगर जीडीपी के अनुपात के रूप में राजकोषीय घाटे को नहीं बढ़ाना हो तो, इसे अमीरों की कीमत पर कर एकत्र करने के खासे बड़े प्रयास के जरिए ही हासिल किया जा सकता है। इससे, उपभोग की मांग में बढ़ोतरी के रास्ते, अर्थव्यवस्था में सकल मांग का स्तर बढ़ेगा और यह उत्पाद तथा रोजगार में बढ़ोतरी की ओर और गरीबी में कमी की ओर भी ले जाएगा। इससे आय की असमानता भी घटेगी क्योंकि अमीरों की करोपरांत आय का स्तर, अन्यथा जो होता, उससे घटकर होगा।
लेकिन, बजट रणनीति की विकृति, इसमें निहित है कि उसमें जो दिशा ली जानी चाहिए थी, उससे ठीक उल्टी दिशा ली गयी है। जीडीपी के हिस्से के तौर पर कुल कर राजस्व में कोई बढ़ोतरी होने के बजाए, मामूली गिरावट ही हुई है और यह 2023-24 तथा 2024-25 के 11.5 फीसद तथा 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 11.4 फीसद से कुछ घटकर, 2026-27 में 11.2 फीसद रह गया है। और बताया गया है कि इसके साथ ही राजकोषीय घाटा 2024-25 के 4.8 फीसद और 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 4.4 फीसद से घटकर, 4.3 फीसद हो जाना है। इस तरह के कुल सरकारी खर्च के दायरे में, जिसकी सीमाएं सरकार के एक ओर अमीरों पर कर बढ़ाने और दूसरी ओर राजकोषीय घाटा बढऩे देने, दोनों से ही इंकार ने तय कर दी हैं, पूंजी व्यय में बढ़ोतरी की गयी है और इसका हिस्सा 2024-25 के जीडीपी के 4.0 फीसद तथा 2025-26 (संशोधित अनुमान) के 3.9 फीसद से बढ़कर, 2026-27 में 4.4 फीसद हो गया है।
बहरहाल, पूंजी व्यय में यह बढ़ोतरी भी भ्रामक ही है। केंद्र सरकार का अपना पूंजी व्यय तो, जो 2023-24 में तथा 2024-25 में जीडीपी के 3.2 फीसद के बराबर था और 2025-26 (संशोधित अनुमान) में कुछ गिरकर 3.1 फीसद रह गया था, 2026-27 में 3.1 फीसद ही बना रहने जा रहा है। बढ़ोतरी होनी है, पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए ग्रांट इन एड में, जो 2024-25 के 0.8 फीसद तथा 2025-26 के संशोधित अनुमान के 0.9 फीसद से बढक़र, 2026-27 में 1.3 फीसद हो जानी है। लेकिन, इस आखिरी आइटम में मगरेगा का आवंटन भी शामिल है, जिसकी फंडिंग अब केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच, 60:40 के आधार पर साझा की जा रही होगी, जबकि पहले यह साझेदारी 90:10 के आधार पर ही हो रही थी।
इसका अर्थ यह हुआ कि अगर राज्य सरकारें, जो पहले ही फंड की कमी से जूझ रही हैं, अपना आनुपातिक हिस्सा नहीं जुटा पाती हैं, जो जुटाना उनके लिए मुश्किल होगा, उस सूरत में केंद्र को भी मूल रूप में उसके द्वारा आवंटित हिस्सा खर्च नहीं करना पड़ेगा। उस सूरत में केंद्र सरकार को बजट में दर्शाया गया खर्चा करना ही नहीं पड़ेगा और इसके ऊपर से वह इस कार्यक्रम की विफलता का दोष आसानी से राज्य सरकारों के सिर पर डालने में कामयाब हो जाएगी, जबकि इस योजना के व्यय के 60:40 के अनुपात में बंटवारे के फैसले में, राज्य सरकारें तो कहीं से शामिल ही नहीं थीं। यह फैसला तो इकतरफा तरीके से और पूरी तरह से मनमाने ढंग से केंद्र सरकार ने लिया था और उसे राज्यों पर तो थोप भर दिया गया था।
कथित ‘‘सहकारी संघवाद’’ की दिखावटी संज्ञा की यही हकीकत है। इसके नाम पर हो यह रहा है कि केंद्र सरकार मनमाने तरीके से राज्य सरकारों के संसाधनों तथा उनकी जिम्मेदारियों को तय कर रही है और इस तथ्य का इस्तेमाल अपने चहेते राज्यों को बढ़ावा देने के लिए कर रही है, जो इसके पक्षपाती होने के चलते जाहिर है कि भाजपा-शासित राज्यों के साथ पक्षपात के रूप में सामने आता है, जबकि गैर-भाजपा सरकारों के हाथ बांधे जाते हैं और फिर इन विपक्षी सरकारों पर कथित ‘खराब प्रदर्शन’ का दोष डाला जाता है।
वाइवी रेड्डी की अध्यक्षता में, 14वें वित्त आयोग ने इसकी सिफारिश की थी कि करों के विभाज्य पूल में राज्यों का हिस्सा, 2020 तक पहले के 32 फीसद से बढ़ाकर 42 फीसद कर दिया जाए। लेकिन, केंद्र सरकार ने बाकायदा कर लगाने के बजाए, जिनकी प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा करना होता है, सैस तथा सरचार्ज लगाने का ही सहारा लिया, जिनकी प्राप्तियों को राज्यों के साथ साझा नहीं करना होता है और इस तरह उसने यह सुनिश्चित किया कि सैस तथा सरचार्ज समेत कुल कर राजस्व में राज्यों का हिस्सा, 34 फीसद से ज्यादा ही ही नहीं पाए। यह व्यावहारिक रूप से केंद्र के हाथों में संसाधनों के केंद्रीयकरण की ही एक अवैध तिकड़म है।
पूंजी व्यय में बढ़ोतरी भ्रामक
इस कपट लीला के बावजूद, केंद्र सरकार का व्यय जहां का तहां ही रहने जा रहा है (अगर जैसी कि हमने पीछे चर्चा की, पूंजी परिसंपत्तियों के निर्माण के लिए सहायता बजटीय प्रावधान से घटकर रहती है) या फिर जीडीपी के हिस्से के तौर पर उसमें मामूली सी बढ़ोतरी ही होने जा रही है। लेकिन, इससे भारतीय अर्थव्यवस्था के उन तीन फौरी संकटों पर काबू पाना संभव ही नहीं है, जिनकी हम शुरू में ही चर्चा कर आए हैं। वास्तव में समग्रता में केंद्र द्वारा पूंजी व्यय, जनता के हाथों में हस्तांतरणों के मुकाबले कम रोजगार पैदा करने वाला होता है। इसकी वजह यह है कि ढांचागत खर्च का मजदूरी का घटक, जोकि पूंजी व्यय के केंद्र में होता है, कुल पूंजी व्यय का एक अंश भर होता है। इसके विपरीत, जनता के लिए हस्तांतरित समूची राशि ही, व्यावहारिक मानों में एक प्रकार से मजदूरी के भुगतान का काम करती है। और जाहिर है कि अगर ढांचागत निवेश के लिए रखे गए संसाधनों को स्कूलों, कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षकों को लगाने आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इन संस्थाओं में स्टाफ की भारी कमी है, या फिर इन संसाधनों का उपयोग सरकारी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में कर्मचारियों को बढ़ाने के लिए किया जाता है, उस सूरत में इस निवेश का रोजगार पर प्रत्यक्ष असर और इन नये रोजगार पाने वाले लोगों द्वारा पैदा की जा रही मांग के चलते द्वितीयक बहुगुणनकारी प्रभाव, कहीं ज्यादा उल्लेखनीय होगा।
इसलिए, न सिर्फ यह कि यह बजट बेरोजगारी तथा गरीबी में बढ़ोतरी के रुझान को पलटने के लिए कुछ भी नहीं करता है, वास्तव में वह इससे उल्टा काम ही करता है। यह किया जाता है एक ओर तो निजी क्षेत्र को (और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए बहुराष्ट्रीय निगमों को भी) कर रियायतें देने के जरिए और दूसरी ओर प्रत्यक्ष रोजगार पैदा करने करने वाले खर्चों तथा जनता के पक्ष में हस्तांतरणों की कीमत पर, ढांचागत व्यय का अनुपात बढ़ाने के जरिए।
ऐसा लगता है कि सरकार को इस सचाई का पता ही नहीं है कि निजी निवेश, बढ़ती मांग के प्रत्युत्तर में ही आता है। चाहे कितनी ही कर रियायतें क्यों न दी जाएं, पूंजीपतियों को निवेश बढ़ाने के लिए तब तक प्रेरित नहीं किया जा सकता है, जब तक पहले ही स्थापित उत्पादन क्षमता ठाली पड़ी रहती है। प्रसंगत: बता दें कि यही वजह है कि इससे पहले दी गयी तमाम कर रियायतों के बावजूद, जिनमें 2019 में कारपोरेट करों में कटौती करने जैसी भारी रियायतें भी शामिल थीं, निजी निवेश सुस्त ही बना रहा है। इसी तरह, एक ऐसे दौर में जब आम तौर पर विश्व अर्थव्यवस्था में तथा इसलिए निवेश में भी सुस्ती बनी हुई है, यह उम्मीद करना कि बहुराष्ट्रीय निगमों के करों के घटाए जाने भर से भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के प्रवाह चले आएंगे, बेतुकी बात है। और इसकी उम्मीद तब करना जब ट्रंप अमेरिका से निवेशों को बाहर जाने से रोकने के लिए टैरिफ बढ़ाने के हथियार का इस्तेमाल कर रहा है, और भी बेतुका है।
हालात बदतर होंगे
दो और कारणों से हालात और भी बदतर होने जा रहे हैं। पहला तो यह 2027 में प्रतिव्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न वितरण की योजना खत्म होने वाली है। यह ग्रामीण भारत के लिए जीवन रेखा बनी रही है और इसका अंत होने से लोगों की बदहाली बहुत बढ़ जाएगी। दूसरा कारण है, व्यापार समझौते जिन पर दस्तखत किए जा रहे हैं और इनमें अब अमेरिका के साथ हुआ व्यापार समझौता भी शामिल है। अगर खबरों का सच माना जाए तो यह बाद वाला समझौता अमेरिका को तो भारतीय मालों पर 18 फीसद टैरिफ लगाने की इजाजत देता है, जबकि भारत को अमेरिकी मालों के शुल्क मुक्त आयात के लिए बाध्य करता है। इस तरह की ‘नाबराबरी की संधि’ भारतीय कृषि और खासतौर पर डेयरी क्षेत्र में भारी तकलीफें पैदा करने जा रही है। लेकिन, फासीवादी सरकार की तो जनता के प्रति दायलुता की अपनी छवि बनाने में ही ज्यादा दिलचस्पी है, न कि वास्तव में जनता की जीवन-दशाओं को बेहतर बनाने में।
1930 के दशक के फासीवाद और वर्तमान फासीवादी सरकारों के बीच के अंतर को, यह बजट रेखांकित करता है। 1930 के दशक में फासीवादी देशों में सैन्य खर्चों को बढ़ाने के लिए, राजकोषीय घाटे में भारी बढ़ोतरियां की गयी थीं। इससे सकल मांग का स्तर पर बहुत बढ़ा था और ये देश महामंदी से उबरने में कामयाब हो गए थे। इसके अलावा सरकारी खर्चों में यह बढ़ोतरी, ऑटोबानों के निर्माण तथा सैन्य साज-सामान की खरीद जैसे ढांचागत निवेश तक ही सीमित नहीं थे बल्कि इनमें सैन्य बलों के आकार में बढ़ोतरी भी शामिल थी, जिससे प्रत्यक्ष तरीके से रोजगार बढ़ा था। लेकिन, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार जैसी आज की फासीवादी सरकारें, न तो सकल मांग को बढ़ाने के लिए राजकोषीय घाटा बढ़ा सकती हैं और न उसमें इसका बूता है कि (सिर्फ ढांचागत क्षेत्र पर खर्च बढ़ाने से भिन्न) जनता के लिए प्रत्यक्ष रूप से रोजगार बढ़ा सकें या उसके पक्ष में हस्तांतरण कर सकें। जहां तक रोजगार बढ़ाने का सवाल है, वे दोनों ही पहलुओं से नाकाम हैं। इसलिए, आने वाले महीनों में उनका ‘‘नफरत फैलाने’’ का सहारा लेना और भी बढ़ जाने वाला है।
नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)होली फ्लाइट टिकट महंगा होना इस बार परदेसियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। होली पर घर वापसी की तैयारी कर रहे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लाखों लोग हवाई किराए की मार झेल रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों से पटना और लखनऊ की उड़ानों का किराया अंतरराष्ट्रीय रूट से भी ज्यादा पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय से महंगा घरेलू सफर मौजूदा बुकिंग ट्रेंड के अनुसार दिल्ली से सिंगापुर जाने वाली उड़ान का किराया लगभग 15,500 रुपये के आसपास दिख रहा है, जबकि मुंबई से पटना की सीधी फ्लाइट 17,000 रुपये के पार पहुंच गई है। सामान्य दिनों में 7-8 हजार रुपये में मिलने वाला टिकट अब दोगुने से भी ज्यादा कीमत पर बिक रहा है। यही हाल दिल्ली से पटना रूट का है। आम तौर पर 4-5 हजार रुपये में उपलब्ध टिकट अब 12,000 से 13,000 रुपये तक पहुंच गया है। बेंगलुरु और चेन्नई से पटना या लखनऊ आने वाले यात्रियों को 15,000 रुपये से अधिक खर्च करना पड़ रहा है। होली फ्लाइट टिकट महंगा होने से सबसे ज्यादा परेशानी उन परिवारों को है जिन्हें ट्रेन में कंफर्म टिकट नहीं मिल पाया।
1-2 मार्च की सीटों पर सबसे ज्यादा दबाव यात्रा पोर्टल्स के अनुसार 1 और 2 मार्च की तारीखों पर सीटों की मांग चरम पर है। अधिकतर लोग होली से ठीक पहले घर पहुंचना चाहते हैं, जिससे इन तारीखों पर किराया सबसे ज्यादा है। रेलवे की प्रमुख ट्रेनों में लंबी वेटिंग लिस्ट के कारण यात्रियों का रुख हवाई सफर की ओर हुआ है। हालांकि रेलवे ने होली स्पेशल ट्रेनें चलाई हैं, लेकिन मांग के मुकाबले सीटें कम पड़ रही हैं। प्रमुख रूट पर अनुमानित हवाई किराया (होली सीजन) मुंबई से पटना: 16,000 – 18,000 रुपये दिल्ली से पटना: 12,000 – 13,500 रुपये बेंगलुरु से पटना: 15,000 – 18,000 रुपये चेन्नई से पटना: 14,000 – 17,000 रुपये दिल्ली से लखनऊ: 8,000 – 10,000 रुपये मुंबई से लखनऊ: 12,000 – 15,000 रुपये (किराया बुकिंग समय और सीट उपलब्धता के अनुसार बदल सकता है।)
ट्रेन और बस विकल्प दिल्ली और मुंबई से पटना-लखनऊ जाने वाली ट्रेनों में वेटिंग 200 के पार पहुंच चुकी है। सरकार करीब 200 होली स्पेशल बसें चलाने की तैयारी में है ताकि आम यात्रियों को राहत मिल सके। बस का किराया 1,500 से 3,500 रुपये के बीच रहने की संभावना है, जो फ्लाइट के मुकाबले काफी सस्ता है, लेकिन समय अधिक लगेगा। क्यों बढ़ता है किराया? एयरलाइंस कंपनियां मांग और आपूर्ति के आधार पर डायनेमिक प्राइसिंग लागू करती हैं। त्योहारों के दौरान अचानक बढ़ी मांग से किराया स्वतः बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते अतिरिक्त उड़ानें बढ़ाई जाएं तो होली फ्लाइट टिकट महंगा होने की समस्या कुछ हद तक कम हो सकती है।
यात्रियों की नाराजगी सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि घरेलू उड़ानों का किराया अंतरराष्ट्रीय ट्रिप से ज्यादा कैसे हो सकता है। कई यात्रियों ने नियामक हस्तक्षेप की मांग भी की है। आईटी सेक्टर में काम करने वाले पेशेवरों और निजी कंपनियों के कर्मचारियों के लिए अचानक इतना महंगा टिकट लेना आसान नहीं है। क्या करें यात्री? पहले से टिकट बुक करें,वैकल्पिक शहर से उड़ान देखें,ट्रेन स्पेशल और बस विकल्प जांचें,किराया तुलना वेबसाइट का उपयोग करें,त्योहार पर घर पहुंचने की चाहत हर किसी की होती है, लेकिन इस बार होली फ्लाइट टिकट महंगा होने से जेब पर भारी असर पड़ रहा है।
इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) पटना में 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल दिसंबर 2026 तक होगा शुरू
पटना (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देने जा रहा इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) पटना में निर्माणाधीन 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल अब अंतिम चरण में है। संस्थान के निदेशक प्रो. डॉ. बिंदे कुमार के अनुसार, सात मंजिला इस अत्याधुनिक भवन का लगभग 60 प्रतिशत निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और लक्ष्य है कि दिसंबर 2026 तक इसे मरीजों के लिए खोल दिया जाए। यह 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल न केवल बेड क्षमता बढ़ाएगा, बल्कि बिहार में सुपर स्पेशियलिटी इलाज की उपलब्धता को कई गुना मजबूत करेगा। इससे राज्य के मरीजों को दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की ओर रुख करने की जरूरत कम पड़ेगी।
164 बेड की अत्याधुनिक इमरजेंसी यूनिट बनेगी सबसे बड़ी ताकत नए भवन के ग्राउंड फ्लोर पर 164 बेड की आधुनिक इमरजेंसी यूनिट स्थापित की जा रही है। यहां छह अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर और सेंट्रल स्टरलाइजेशन सर्विस डिपार्टमेंट (CSSD) भी बनाया जाएगा। इस सुविधा के शुरू होने से ट्रॉमा, एक्सीडेंट और गंभीर मामलों का इलाज एक ही परिसर में तुरंत संभव होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह यूनिट बिहार में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की तस्वीर बदल सकती है। मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर और 92 बेड का ICU इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) पटना के नए अस्पताल में मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर की संख्या 12 से बढ़ाकर 14 कर दी गई है। इसके साथ ही 92 बेड का अत्याधुनिक ICU तैयार किया जा रहा है। इससे जटिल सर्जरी, क्रिटिकल केयर और गंभीर मरीजों के इलाज में बड़ी सहूलियत मिलेगी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल शुरू होने के बाद राज्य में हाई-एंड सर्जरी की क्षमता दोगुनी हो सकती है।
रोबोटिक सर्जरी की तैयारी अंतिम चरण में संस्थान में इस वर्ष रोबोटिक सर्जरी शुरू करने की भी तैयारी चल रही है। मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रो. डॉ. मनीष मंडल के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम दिल्ली में विशेष प्रशिक्षण ले रही है। एआई लैस रोबोटिक सिमुलेटर के माध्यम से गायनी, प्रोस्टेट, पित्ताशय और अन्य जटिल सर्जरी का अभ्यास कराया जा रहा है। प्रशिक्षण पूरा होने के दो माह के भीतर रोबोटिक सर्जरी सेवा शुरू करने की योजना है। रोबोटिक सर्जरी के शुरू होने से सटीकता बढ़ेगी, रक्तस्राव कम होगा और मरीजों की रिकवरी तेजी से होगी। बिहार में यह तकनीक स्वास्थ्य क्षेत्र में बड़ा बदलाव साबित हो सकती है। हर मंजिल पर अलग सुपर स्पेशियलिटी सुविधा 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल इस तरह डिजाइन किया गया है कि हर मंजिल पर अलग-अलग चिकित्सा विभाग संचालित होंगे। इनमें प्रमुख रूप से:गैस्ट्रोएंटरोलॉजी,स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग,शिशु रोग विभाग,मानसिक स्वास्थ्य,जनरल मेडिसिन ,न्यूरोलॉजी,नेफ्रोलॉजी,यूरोलॉजी,स्पाइन एवं ऑर्थोपेडिक,इन सभी विभागों के लिए अलग वार्ड और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इससे मरीजों को एक ही परिसर में व्यापक और विशेषज्ञ इलाज मिल सकेगा।
बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को मिलेगा बड़ा संबल इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) पटना में बन रहा यह 1200 बेड का मल्टी सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल बिहार के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसके शुरू होने से:राज्य में रेफरल केस कम होंगे,गंभीर मरीजों को त्वरित इलाज मिलेगा,सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं सुलभ होंगी,मेडिकल शिक्षा और रिसर्च को भी बढ़ावा मिलेगा,दिसंबर 2026 तक इसके पूर्ण रूप से चालू होने की उम्मीद है। स्वास्थ्य सेवाओं में यह विस्तार बिहार को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिला सकता है।
देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान के तहत 19 फरवरी 2026 की सुबह 5 बजे से 8 बजे तक जनपद में विशेष सघन सुरक्षा अभियान चलाया गया। देवरिया में चलाए गए इस अभियान का उद्देश्य कानून-व्यवस्था को मजबूत करना, असामाजिक तत्वों पर निगरानी रखना और आमजन में सुरक्षा का विश्वास बढ़ाना रहा। अभियान पुलिस अधीक्षक संजीव सुमन के निर्देशन में संचालित किया गया। सुबह के समय पार्कों, प्रमुख चौराहों, बाजार क्षेत्रों और संवेदनशील स्थानों पर पुलिस की सक्रिय मौजूदगी देखने को मिली। मॉर्निंग वॉक पर निकले नागरिकों से अधिकारियों ने संवाद स्थापित कर उनकी समस्याएं सुनीं और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
18 स्थानों पर कार्रवाई, 314 व्यक्ति और 180 वाहन जांचे देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान के दौरान पूरे जनपद में 18 प्रमुख स्थानों पर सघन चेकिंग की गई। इस दौरान: 314 व्यक्तियों की जांच 180 वाहनों की चेकिंग संदिग्ध व्यक्तियों से पूछताछ वाहनों के दस्तावेजों का सत्यापन पुलिस टीमों ने विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जहां सुबह के समय भीड़ रहती है या पहले आपराधिक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। अधिकारियों के अनुसार, नियमित निवारक कार्रवाई से अपराध की संभावनाओं पर अंकुश लगाया जा सकता है।
यातायात नियमों के उल्लंघन पर सख्ती देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान के दौरान यातायात नियमों के उल्लंघन पर भी सख्त कार्रवाई की गई। पुलिस ने विशेष रूप से निम्न बिंदुओं पर ध्यान दिया: दोपहिया वाहनों पर तीन सवारी नाबालिगों द्वारा वाहन संचालन मॉडिफाइड साइलेंसर लगे वाहन बिना वैध दस्तावेज के वाहन नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ चालान की कार्रवाई की गई। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भविष्य में भी देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान जैसे औचक निरीक्षण जारी रहेंगे। अवैध गतिविधियों पर विशेष निगरानी अभियान के दौरान पुलिस ने अवैध असलहा, मादक पदार्थों और चोरी के वाहनों की तलाश में संदिग्ध वाहनों की गहन तलाशी ली। हालांकि किसी बड़ी आपराधिक घटना की पुष्टि नहीं हुई, लेकिन पुलिस प्रशासन का मानना है कि इस प्रकार की निवारक कार्रवाई अपराध नियंत्रण में प्रभावी साबित होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह के समय पुलिस की सक्रियता से चोरी, लूट, स्नैचिंग और अन्य घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान को दीर्घकालिक अपराध नियंत्रण रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
सामुदायिक पुलिसिंग को मिला बढ़ावा देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान का एक अहम पहलू पुलिस-जन संवाद रहा। अधिकारियों ने नागरिकों को हेल्पलाइन नंबर और आपातकालीन संपर्क साधनों की जानकारी दी। लोगों ने पुलिस की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि सुबह के समय बढ़ी सुरक्षा व्यवस्था से भरोसा मजबूत होता है। “मित्र पुलिसिंग” की अवधारणा को मजबूती देते हुए पुलिस ने यह संदेश दिया कि वह केवल कानून लागू करने वाली संस्था नहीं, बल्कि समाज की संरक्षक भी है। कानून-व्यवस्था सुदृढ़ करने की निरंतर पहल देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान यह दर्शाता है कि जनपदीय पुलिस शांति और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। नियमित चेकिंग से ,अपराधियों में भय बना रहता है संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान आसान होती है स्थानीय सूचना तंत्र मजबूत होता है सामुदायिक सहभागिता बढ़ती है पुलिस अधीक्षक के निर्देशन में चलाया गया यह अभियान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जनसुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रमाण माना जा रहा है। देवरिया मार्निंग वॉकर चेकिंग अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनपद में कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। 18 स्थानों पर सघन जांच, सैकड़ों व्यक्तियों और वाहनों की चेकिंग तथा आमजन से सीधा संवाद इस अभियान की सफलता को दर्शाता है। भविष्य में भी ऐसे अभियानों की निरंतरता से देवरिया में सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित होगा और नागरिकों का भरोसा और मजबूत होगा।
प्रेम का रंग चढ़ता चला गया, यूँ लगा कि दुनिया हमारी है, त्याग का यत्न जब सीखा तो ऐसा लगा कि जन्नत हमारी है। जीवन का साथ निभाता चला गया, समस्याएँ भी सुलझाता चला गया, दहशतगर्दी का शोक मनाया नहीं, बर्बादियों का दर्द भुलाता चला गया। जो कुछ मयस्सर हुआ उसको अपनी तक़दीर समझ लिया, जो मिला नहीं कभी भी उसको मैं अनदेखा करता चला गया। दुख और सुख में फ़र्क़ कोई न कभी हमने महसूस किया, दिल के हर ज़ख़्म को जीवन भर मैं तो सहलाता चला गया। जैसे स्नान से तन, दान से धन, सहिष्णुता से मन निर्मल होते हैं, वैसे ही ईमानदारी से यह जीवन आदित्य सफल हो जाया करते हैं। — विद्यावाचस्पति डॉ० कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’
📌 कविता का सार यह प्रेम का रंग केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि त्याग और ईमानदारी का प्रतीक है। कविता जीवन की सफलता का संदेश देती है कि प्रेम, सहिष्णुता और सत्यनिष्ठा से ही जीवन सार्थक बनता है। इस प्रेरणादायक कविता में लेखक ने संघर्षों के बीच धैर्य, विश्वास और सकारात्मक सोच को जीवन की असली शक्ति बताया है।