महिला आरक्षण की आड़ में लोकतंत्र पर वार?

लेखक: राजेन्द्र शर्मा

लेखक: राजेन्द्र शर्मा

महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने के नाम पर बुलाई गई संसद की तीन दिन की विशेष बैठक में जब सरकार की ओर से संविधान संशोधन समेत तीन विधेयकों पर चर्चा शुरू हो रही थी, तभी एक अहम अधिसूचना जारी की गई। इसमें बताया गया कि सितंबर 2023 में पारित 106वें संविधान संशोधन के जरिए महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का कानून 16 अप्रैल 2026 से लागू हो गया है।
यह घोषणा आम पाठकों के लिए उलझन भरी थी, क्योंकि जिस आरक्षण को लागू करने के लिए फिर से संशोधन लाया जा रहा था, उसी के लागू होने का दावा भी किया जा रहा था। दरअसल, यह एक तकनीकी प्रक्रिया थी—सरकार को कानून में संशोधन करने से पहले उसे अधिसूचित करना आवश्यक था।
लेकिन इस तकनीकी पहलू ने एक बड़े राजनीतिक सवाल को जन्म दिया। 2023 में लगभग सर्वसम्मति से पारित इस कानून को तीन साल तक ठंडे बस्ते में क्यों रखा गया? और अब अचानक इसे लागू करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई?
असल में, 2023 के कानून में ही यह सुनिश्चित कर दिया गया था कि महिला आरक्षण तुरंत लागू नहीं होगा। इसे जनगणना और परिसीमन (डिलिमिटेशन) से जोड़ दिया गया था, जिससे इसका क्रियान्वयन वर्षों तक टल सकता था। विपक्ष ने उस समय सुझाव दिया था कि इन शर्तों को हटाकर मौजूदा सीटों में ही एक-तिहाई आरक्षण लागू किया जाए, जिससे अगले चुनाव से ही महिलाएं इसका लाभ उठा सकें।

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लेकिन सरकार ने इस सुझाव को खारिज कर दिया। कारण स्पष्ट था—पुरुष सांसदों की संख्या घटाए बिना, कुल सीटों की संख्या बढ़ाकर ही महिलाओं को आरक्षण देना सत्ता पक्ष को अधिक अनुकूल लग रहा था।
अब जब सरकार संशोधन की बात कर रही है, तब भी वह मूल समस्या को दूर करने के बजाय परिसीमन का रास्ता खोलने पर ज्यादा केंद्रित दिखती है। यही इस पूरे विवाद का केंद्र है।
परिसीमन पर पिछले दो दशकों से रोक इसलिए लगी थी ताकि राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे। उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जनसंख्या और विकास के अंतर को देखते हुए यह संतुलन बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है।
लेकिन नई संसद के निर्माण के साथ ही लोकसभा सीटों को 770 से बढ़ाकर 850 तक करने की योजना ने संकेत दे दिया था कि भविष्य में बड़े पैमाने पर बदलाव की तैयारी है। अगर परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का राजनीतिक वजन बढ़ेगा, जिससे संघीय ढांचे का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
सरकार ने आश्वासन दिया कि सभी राज्यों की सीटों में समानुपातिक वृद्धि होगी, लेकिन संबंधित विधेयक में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। यही संदेह को जन्म देता है कि परिसीमन के बाद वास्तविक स्थिति अलग हो सकती है।
इसके अलावा, मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रियाओं को लेकर उठे सवाल भी चिंता बढ़ाते हैं। अगर संस्थाएं निष्पक्षता सुनिश्चित करने में विफल रहती हैं, तो परिसीमन जैसे बड़े फैसले राजनीतिक पक्षपात से प्रभावित हो सकते हैं।
इस पूरे परिदृश्य में महिला आरक्षण एक सकारात्मक पहल होने के बावजूद, उसके जरिए बड़े राजनीतिक बदलावों का रास्ता खोलने की आशंका भी नजर आती है। यही कारण है कि विपक्ष ने इसे सिर्फ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन से जुड़ा प्रश्न बताया है।
अंततः सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण वास्तव में महिलाओं को सशक्त बनाने का माध्यम बनेगा, या फिर यह व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना का औजार साबित होगा?

Editor CP pandey

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