व्यंग्य: स्मार्टफोन में पति आकर्षण, वीडियो कॉल पर दर्शन

करवा चौथ का डिजिटल चाँद: नेटवर्क में अटका पति का दीदार!
लेखक: संजय एम. तराणेकर
एक समय था, जब करवा चौथ पर पत्नियाँ सुबह से ही पति की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती थीं। दिनभर भूखी-प्यासी रहकर शाम को चाँद का इंतजार करती थीं। अब जमाना डिजिटल हो गया है। चाँद निकले या न निकले, मोबाइल की स्क्रीन चमकनी चाहिए। आखिर आधुनिक प्रेम की असली रोशनी अब चाँद में नहीं, स्मार्टफोन में बसती है!
पहले पत्नियाँ छलनी से चाँद देखकर पति का चेहरा निहारती थीं। अब पति दूसरे शहर में हों, विदेश में हों या ऑफिस में बैठकर बॉस की डाँट खा रहे हों, वीडियो कॉल पर दर्शन देना उनका परम कर्तव्य है। पत्नी ने छलनी उठाई, मोबाइल का कैमरा खोला और पतिदेव स्क्रीन पर प्रकट! व्रत भी पूरा, तकनीक का सदुपयोग भी पूरा।
मगर इस डिजिटल प्रेम में भी कुछ खतरे हैं। नेटवर्क चला जाए तो पति की लंबी उम्र का मामला बफरिंग में अटक सकता है। वीडियो कॉल के बीच आवाज गायब हो जाए तो पत्नी को पति का मौन प्रेम नहीं, कोई नई साजिश नजर आने लगती है। और यदि पतिदेव ने कैमरा बंद कर दिया, तो सवाल उठता है—चाँद छिपा है या पतिदेव कोई राज छिपा रहे हैं?
पहले पति बाजार से साड़ी, मिठाई और गहने लाकर पत्नी को खुश करते थे। अब ऑनलाइन ऑर्डर देकर स्क्रीनशॉट भेज देते हैं—‘प्रिय, तुम्हारा उपहार रास्ते में है।’ पत्नी भी मुस्कराकर कह देती है—‘ठीक है, लेकिन डिलीवरी का इंतजार तुम्हारी लंबी उम्र से भी लंबा नहीं होना चाहिए!’
सोशल मीडिया ने तो करवा चौथ को प्रेम से अधिक प्रदर्शन का त्योहार बना दिया है। किसकी साड़ी महँगी, किसकी मेहँदी गहरी और किसका पति अधिक रोमांटिक—इसकी प्रतियोगिता देर रात तक चलती है।
सच तो यह है कि तकनीक दूरियाँ मिटा सकती है, रिश्तों की गर्माहट नहीं खरीद सकती। करवा चौथ का असली चाँद मोबाइल में नहीं, पति-पत्नी के विश्वास में चमकता है। वरना स्क्रीन पर चेहरा हजार बार दिख जाएगा, मगर दिल में जगह बनाने के लिए नेटवर्क नहीं, सच्चा प्रेम चाहिए!
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
31, संजय नगर, इन्दौर–452011 (मध्य प्रदेश)
