बहुत शौक था मुझको भी,
दुनिया को खुश रख पाऊँ,
होश हुआ जब वक्त जरूरत,
स्वयं अकेला ही रह जाऊँ।
पानी भरपूर बदन में होता,
पर चोट लगे तो रक्त बहे,
हृदय रुधिर मय होता है,
पर चोट लगे तो आँसू बहे।
हृदय को दर्द मिलने पर जहाँ
ज़िन्दगी का एहसास होता है,
कठिनाइयों से और मजबूत
हो जाने का आभाष होता है।
ईश्वर का ध्यान करने पर योग
प्राणायाम का संयोग बनता है,
ऐसे अद्भुत संयोग में ही आत्मा,
परमात्मा मिलन योग बनता है।
इड़ा, पिंगला पर पा नियंत्रण,
सुषुम्ना नाड़ी को सक्रिय करे,
योग, प्राणायाम की साधना,
कुंडलिनी सहस्त्रार जागृत करे।
सिद्ध योगी के लिए योगाभ्यास,
स्थितप्रज्ञ होने का साधन बने,
प्रज्ञा प्रतिष्ठित जगत कल्याण,
में अति सूक्ष्म सरल माध्यम बने।
जीवन तो एक अथाह सागर है,
गोता लगाकर खोजना पड़ता है,
गहराई में पैठकर जिन खोजियाँ,
अनमोल से मोती तिन पाइयाँ।
मत्स्य मकर झस जीव जल के,
यद्यपि खोजें नही तो भी मिलें।
जो डर गये, समझो वह मर गये,
निडर होकर डट गये वह पा गये।
जो सद्ज्ञान गुरुवर से पाया,
वह अति अद्भुत अनमोल है,
माता, पिता, आर्य, अग्रज
सब, गुरू स्वरूप श्रद्धेय हैं।
गुरु ही ब्रह्मा, गुरू ही विष्णु,
गुरू ही देवों के देव महेश हैं,
‘आदित्य’ गुरू ज्ञान बिन,
मम मूरख हृदय न चेत है।
- डॉ. कर्नल आदिशंकर मिश्र ‘आदित्य’