क्या यह विश्व इतिहास का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार हो सकता है?

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर मध्य-पूर्व का इतिहास केवल युद्धों,तेल,परमाणु कार्यक्रमों और कूटनीतिक संघर्षों से नहीं लिखा गया है, बल्कि ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों से भी लिखा गया है जिन्होंने आने वाली पीढ़ियों की राजनीति और जनमानस को प्रभावित किया।28 फरवरी 2026 कों ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार ऐसा ही एक आयोजन बनता दिखाई दे रहा है। फरवरी में हुए अमेरिकी-इजरायली हमले में उनकी मृत्यु के बाद सुरक्षा कारणों से अंतिम संस्कार तत्काल नहीं किया जा सका और उसे कई महीनों के लिए स्थगित करना पड़ा। अब जुलाई में शुरू हुई बहु-दिवसीय अंतिम यात्रा को ईरानी नेतृत्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता, शहादत, प्रतिरोध और राजनीतिक संदेश के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। अनेक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के अनुसार अंतिम यात्रा तेहरान से शुरू होकर विभिन्न धार्मिक स्थलों से गुजरते हुए 9 जुलाई को मशहद में दफ़न के साथ पूरी होगी।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र इलेक्ट्रॉनिक सोशल मीडिया में लगातार देख रहा हूं कि ईरानी सरकारी मीडिया और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में इसे फनरल ऑफ़ द सेंचुरी यानें शताब्दी का अंतिम संस्कार कहा जा रहा है। आयोजकों का दावा है कि पूरे कार्यक्रम में करोड़ों लोग शामिल हो सकते हैं, जबकि स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ अभी केवल लाखों से करोड़ों तक की संभावित भीड़ का उल्लेख कर रही हैं और अंतिम संख्या की पुष्टि बाद में होने की बात कह रही हैं। कुछ रिपोर्टों में 1.5 से 2 करोड़ तथा कुछ में इससे भी अधिक उपस्थिति का अनुमान लगाया गया है, किंतु इन आँकड़ों की सटीकता से स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है। हालांकि यह पूरी जानकारी मीडिया से उठाई गई है।
साथियों बात अगर हम चार महीने तक सुरक्षित रखा गया पार्थिव शरीर,शिया परंपरा और अभूतपूर्व राष्ट्रीय तैयारी को समझने की करें तो,इस पूरे आयोजन का सबसे असाधारण पक्ष यह है कि अयातुल्ला खामेनेई और उनके परिवार के 4 अन्य दिवंगत सदस्यों के पार्थिव शरीरों को लगभग चार महीने तक संरक्षित रखा गया। सामान्य इस्लामी परंपरा में मृत्यु के बाद शीघ्र दफ़न को सर्वोत्तम माना जाता है, लेकिन युद्ध, बड़े सुरक्षा संकट या अन्य असाधारण परिस्थितियों में विलंब की अनुमति दी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अवधि में शवों को रासायनिक संरक्षण (एम्बामिंग) के बजाय नियंत्रित तापमान वाले रेफ्रिजरेटेड कोल्ड स्टोरेज में रखा गया होगा, ताकि धार्मिक मान्यताओं का सम्मान बना रहे।युद्धकालीन परिस्थितियों के कारण अंतिम संस्कार टालना केवल धार्मिक निर्णय नहीं था,बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति भी थी। ईरान को आशंका थी कि यदि युद्ध के दौरान इतने बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए गए तो दुश्मन देश या आतंकी संगठन भीड़ या शीर्ष नेतृत्व को निशाना बना सकते हैं। इसी कारण अंतिम संस्कार तब तक स्थगित रखा गया जब तक व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं हो गई।
साथियों बात अगर हम तेहरान में शुरू हुए इस शोक समारोह के लिए राजधानी को अभूतपूर्व सुरक्षा घेरे में बदल दिया गया है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार सेना, पुलिस, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स,स्वयंसेवी संगठन और प्रशासनिक तंत्र को संयुक्त रूप से तैनात किया गया है। संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है और कुछ अवधियों के लिए हवाई क्षेत्र पर भी विशेष नियंत्रण रखा गया है। सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में पाँच करोड़ रोटियाँ, हजारों जल-छिड़काव केंद्र, सैकड़ों पार्किंग स्थल और करोड़ों श्रद्धालुओं जैसी तैयारियों के दावे सामने आए हैं। हालांकि इन सभी विशिष्ट आँकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें ईरानी या अन्य मीडिया के दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि स्थापित तथ्य के रूप में। दूसरी ओर, यह स्पष्ट है कि आयोजन के पैमाने को देखते हुए भोजन,पेयजल, चिकित्सा सहायता,भीड़ नियंत्रण और परिवहन की सटीकता से व्यापक व्यवस्थाएँ की गई है।
साथियों, इस अंतिम यात्रा को केवल एक राज्य समारोह नहीं बल्कि शिया धार्मिक संस्कृति की निरंतरता के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। शिया परंपरा में शहादत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और करबला की ऐतिहासिक स्मृति आज भी धार्मिक और राजनीतिक चेतना का आधार मानी जाती है। इसी कारण ईरानी नेतृत्व खामेनेई की मृत्यु को राष्ट्रीय प्रतिरोध और धार्मिक धैर्य के प्रतीक के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि ईरान के भीतर सभी नागरिक इस आयोजन को एक समान दृष्टि से नहीं देखते। निर्वासित विपक्षी समूह और कुछ आलोचक इसे राज्य- प्रायोजित राजनीतिक प्रदर्शन बताते हैं, जबकि समर्थकों के लिए यह राष्ट्रीय सम्मान और श्रद्धांजलि का अवसर है। इसलिए यह अंतिम संस्कार केवल शोक का नहीं, बल्कि ईरान के भीतर मौजूद राजनीतिक मतभेदों का भी दर्पण बन गया है।
साथियों बात अगर हम मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया: एकजुटता और व्यावहारिक राजनीति का मिश्रण को समझने की करें तो रिपोर्टों के अनुसार लगभग 30 देशों के प्रतिनिधिमंडलों के शामिल होने की संभावना जताई गई है। रूस, पाकिस्तान तथा क्षेत्र के कई देशों के प्रतिनिधियों के आने की खबरें हैं, जबकि अधिकांश पश्चिमी देशों की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि कईमुस्लिम और क्षेत्रीय देश ईरान के साथ संवाद बनाए रखना चाहते हैं, भले ही उनकी अपनी विदेश नीतियाँ अलग-अलग हों।क्या यह सचमुच विश्व इतिहास का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार हो सकता है?इतिहास में अनेक विशाल अंतिम संस्कार हुए हैं, जिनमें 1989 में अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी का अंतिम संस्कार भी शामिल है, जिसमें लगभग एक करोड़ लोगों की उपस्थिति का व्यापक उल्लेख मिलता है। वर्तमान आयोजन के बारे में कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इसकी भीड़ उस रिकॉर्ड को भी पार कर सकती है। हालांकि अंतिम और स्वतंत्र रूप से सत्यापित आँकड़े उपलब्ध होने के बाद ही यह निश्चित रूप से कहा जा सकेगा कि यह वास्तव में विश्व का सबसे बड़ा अंतिम संस्कार था या नहीं।यह अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि मध्य-पूर्व की बदलती शक्ति-संरचना का भी प्रतीक माना जा रहा है। ईरान अपने समर्थक समूहों और सहयोगी देशों को यह संदेश देना चाहता है कि नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद उसकी राजनीतिक और सैन्य संरचना कायम है। दूसरी ओर अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगी इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी निगरानी रखे हुए हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह आयोजन भविष्य की वार्ताओं, क्षेत्रीय गठबंधनों और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
साथियों, इस समारोह में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के आने की भी खबरें हैं। चीन ने वरिष्ठ प्रतिनिधि भेजने की घोषणा की है, जबकि क्षेत्रीय सहयोगी देशों और कई धार्मिक प्रतिनिधि मंडलों की भागीदारी की भी सूचना है। भारत से भी कुछ सार्वजनिक हस्तियों के शामिल होने की मीडिया रिपोर्टें सामने आई हैं, हालांकि आधिकारिक भारतीय सरकारी प्रतिनिधित्व की प्रकृति अलग-अलग रिपोर्टों में भिन्न बताई गई है। इस प्रकार यह आयोजन केवल एक अंतिम संस्कार नहीं रह गया है; यह ईरान की आंतरिक राजनीति, शिया धार्मिक पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा, जन-समर्थन और वैश्विक कूटनीति का संगम बन गया है। आने वाले वर्षों में इतिहासकार संभवतः इसे केवल एक धार्मिक घटना नहीं बल्कि 21वीं सदी के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक -प्रतीकात्मक आयोजनों में से एक के रूप में भी सटीकता से देखेंगे।
साथियों बात कर हम अमेरिका पर प्रभाव: कूटनीतिक दबाव और नई रणनीतिक चुनौती को समझने की करें तो यदि अंतिम संस्कार में विशाल जनसमूह और अनेक देशों के प्रतिनिधि मंडल शामिल होते हैं,तो यह अमेरिका के लिए केवल एक शोक समारोह नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी होगा।ईरान इस आयोजन को राष्ट्रीय एकता,प्रतिरोध और अपनी राज्य व्यवस्था की निरंतरता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि तेहरान इस अवसर का उपयोग अमेरिका और उसके सहयोगियों पर मनोवैज्ञानिक तथा कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए भी कर सकता है।
साथियों बात अगर हम भारत की भूमिका: संतुलित कूटनीति की परीक्षा को समझने की करें तो भारत के लिए ईरान एक महत्वपूर्ण ऊर्जा, संपर्क और क्षेत्रीय साझेदार है, वहीं अमेरिका भी उसका प्रमुख रणनीतिक सहयोगी है। इसलिए भारत की नीति परंपरागत रूप से संतुलन की रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भारत से प्रतिनिधिमंडल और कुछ सार्वजनिक हस्तियों ने श्रद्धांजलि कार्यक्रमों में भाग लिया है, जबकि भारत आधिकारिक स्तर पर क्षेत्रीय शांति, संवाद और स्थिरता का समर्थन करता रहा है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के यदि इस अंतिम संस्कार में वास्तव में अभूतपूर्व जनसमूह और व्यापक अंतरराष्ट्रीय भागीदारी दर्ज होती है, तो यह केवल एक नेता की विदाई नहीं बल्कि ईरान की राजनीतिक पहचान,शिया धार्मिक परंपरा और क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी माना जाएगा।साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भीड़ के आकार,भाग लेने वाले देशों की संख्या और आयोजन से जुड़े कई दावे अभी भी विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और आधिकारिक बयानों पर आधारित हैं;इनके सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि समय के साथ अधिक स्पष्ट होगी
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
