जब हनुमान ने स्वयं को पहचाना: लंका-गमन से पूर्व आत्मबोध की दिव्य लीला
रामकथा का प्रत्येक प्रसंग केवल इतिहास नहीं, बल्कि आत्मबोध, भक्ति और कर्तव्य का जीवंत दर्शन है। एपिसोड–11 में हम उस क्षण पर पहुँचते हैं जहाँ महावीर हनुमान पहली बार अपनी असीम शक्तियों को पहचानते हैं—और यही पहचान उन्हें लंका-गमन के लिए अग्रसर करती है। यह प्रसंग केवल समुद्र लांघने की कथा नहीं, बल्कि “स्व-परिचय” का शास्त्रोक्त उपदेश है—कि जब सेवा का संकल्प जागृत होता है, तब सामर्थ्य स्वयं प्रकट हो जाता है।
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शास्त्रोक्त पृष्ठभूमि: शक्ति विस्मृति और उसका कारण
वाल्मीकि रामायण के सुंदरकाण्ड में वर्णित है कि बाल्यकाल में हनुमान की उग्र लीला से देवताओं को भय हुआ। इन्द्र के वज्राघात के उपरांत ब्रह्मा सहित देवों ने वरदान दिए—पर साथ ही ऋषियों के शाप से यह भी हुआ कि हनुमान अपनी शक्तियाँ तभी स्मरण करेंगे जब कोई उन्हें स्मरण कराएगा। यह कोई दंड नहीं, बल्कि लीलात्मक विधान था—ताकि शक्ति अहंकार नहीं, सेवा में प्रकट हो।
जाम्बवान्त का वाक्य: आत्मबोध का दीप
सीता-हरण के पश्चात जब वानर-सेना समुद्र तट पर असमंजस में खड़ी थी, तब जाम्बवान्त ने हनुमान से कहा—
“हे महावीर! तुम्हारे समान कोई नहीं जो समुद्र लांघ सके। तुम्हारी गति वायु समान है, बल पर्वत समान।”
यहीं से आत्मबोध का क्षण आता है। हनुमान के भीतर सोई शक्ति जागती है। वे समझते हैं—“मैं प्रभु श्रीराम का दास हूँ; उनकी सेवा हेतु असंभव भी संभव है।”
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आत्मपहचान का क्षण: भीतर से उठता ‘राम’
जैसे ही यह स्मरण हुआ, हनुमान के रोम-रोम में राम-नाम का नाद गूँज उठा। आँखों में तेज, वक्ष में विश्वास और मन में केवल एक संकल्प—सीता-शोध। यह आत्मपहचान किसी दंभ का उद्घोष नहीं, बल्कि भक्ति से उत्पन्न निःस्वार्थ साहस है।
विशाल रूप धारण: सेवा के अनुरूप सामर्थ्य
हनुमान ने विशाल रूप धारण किया—पर यह विस्तार अहंकार का नहीं, उत्तरदायित्व का था। पर्वत-सा कंधा, वज्र-सा वक्ष और दृष्टि में करुणा—यह रूप बताता है कि सच्ची शक्ति वही है जो विनय से जुड़ी हो।
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समुद्र लंघन: आस्था की परीक्षा और सिद्धि
जब हनुमान ने उड़ान भरी, तो मार्ग में मैनाक पर्वत ने विश्राम का आग्रह किया—हनुमान ने विनम्रता से स्वीकार किया, पर ठहरे नहीं। सुरसा ने परीक्षा ली—हनुमान ने बुद्धि से समाधान किया। सिंहिका ने छाया पकड़ने का प्रयास किया—हनुमान ने संयम से उसे परास्त किया।
संदेश: मार्ग में आने वाली बाधाएँ, यदि भक्ति-बुद्धि के साथ सुलझें, तो वे सिद्धि का द्वार बनती हैं।
लंका का प्रथम दर्शन: संयमित साहस
लंका पहुँचकर हनुमान ने लघु रूप धारण किया। यह दर्शाता है कि विवेक के बिना शक्ति विनाशक हो सकती है। वे राक्षस-नगरी में भी शास्त्रीय मर्यादा का पालन करते हैं—किसी निर्दोष को कष्ट नहीं देते, केवल लक्ष्य पर केंद्रित रहते हैं।
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अशोक वाटिका और सीता-संदेश
अशोक वाटिका में माता सीता को देखकर हनुमान की आँखों से करुणा बह निकली—पर उन्होंने स्वयं को संभाला। राम-नाम की अंगूठी सौंपकर विश्वास दिलाया—
“माता! प्रभु श्रीराम शीघ्र आएँगे।”
यह क्षण बताता है कि दूत का धर्म भावुकता में नहीं, धैर्य और प्रमाण में होता है।
शास्त्रोक्त महिमा: हनुमान क्यों अद्वितीय हैं?
दास्य-भाव: वे स्वयं को कभी कर्ता नहीं, सेवक मानते हैं।
बुद्धि और बल का संतुलन: जहाँ बल चाहिए, वहाँ बल; जहाँ बुद्धि चाहिए, वहाँ विवेक।
विनय: अपार शक्ति के बावजूद अहंकार शून्य।
निष्ठा: लक्ष्य से विचलन नहीं—सीता-शोध ही प्रधान।
समानता (Relevance): आज के युग में हनुमान
आत्मविश्वास: हमारी शक्तियाँ भी अक्सर सुप्त रहती हैं; सही प्रेरणा उन्हें जगा देती है।
सेवा-भाव: स्वार्थ त्यागकर लक्ष्य साधें—सफलता सुनिश्चित।
धैर्य: बाधाएँ मार्ग का सत्यापन हैं, रोक नहीं।
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भावनात्मक संदेश: पाठक के नाम
जब जीवन का समुद्र विशाल लगे, और तट दूर—तो जाम्बवान्त का वाक्य याद करें। कोई न कोई आपको आपकी शक्ति याद दिलाएगा। और यदि नहीं—तो राम-नाम स्वयं वह स्मरण बन जाएगा। उठिए, उड़िए, और अपने लंका-गमन के लिए तैयार हो जाइए।
निष्कर्ष
एपिसोड–11 हमें सिखाता है कि स्वयं को पहचानना ही सबसे बड़ी सिद्धि है। हनुमान का लंका-गमन केवल एक यात्रा नहीं—यह आत्मबोध से उपजी भक्ति की उड़ान है। जहाँ सेवा लक्ष्य हो, वहाँ शक्ति स्वतः प्रकट होती है।
