लखनऊ (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने उम्मीदवारों को लेकर बड़ा बदलाव कर सकती है। लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की चुनौती के बीच पार्टी गुजरात मॉडल के सहारे चुनावी रणनीति को धार देने की तैयारी में जुटी बताई जा रही है। चर्चा है कि विधायकों के कामकाज, जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और दोबारा चुनाव जीतने की क्षमता के आधार पर टिकट का फैसला किया जा सकता है। यदि आंतरिक आकलन में कमजोर पाए गए विधायकों को लेकर सख्त रुख अपनाया गया, तो कई पुराने और अनुभवी नेताओं की चुनावी राह मुश्किल हो सकती है।
124 विधायकों की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, भाजपा के आंतरिक सर्वे में 124 विधायकों का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं पाया गया है। इनमें बड़ी संख्या उन नेताओं की बताई जा रही है, जो दो या उससे अधिक बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। हालांकि, इन आंकड़ों और टिकट काटने की संभावनाओं की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है। पार्टी के लिए चुनौती यह होगी कि पुराने चेहरों के अनुभव और मौजूदा जनसमर्थन के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए।
गुजरात मॉडल से यूपी में भी बदल सकते हैं समीकरण
भाजपा गुजरात में उम्मीदवारों के चयन के दौरान कई मौजूदा विधायकों की जगह नए चेहरों को मौका देने की रणनीति अपना चुकी है। वर्ष 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कई विधायकों के टिकट बदले और 182 में से 156 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन ने नए उम्मीदवारों को मौका देने की रणनीति को चर्चा में ला दिया। अब उत्तर प्रदेश में भी पार्टी इसी तरह का प्रयोग करती है या नहीं, इस पर राजनीतिक हलकों की नजर रहेगी।
लोकसभा चुनाव के नतीजों से भाजपा ने लिया सबक?
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ा झटका लगा था। प्रदेश की 80 सीटों में पार्टी को 33 सीटों पर जीत मिली, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें हासिल कीं। इन नतीजों ने भाजपा के सामने जनसमर्थन मजबूत करने और चुनावी रणनीति की समीक्षा करने की चुनौती खड़ी की। ऐसे में विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों का चयन पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल रह सकता है।
पुराने विधायकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती
विधायकों का टिकट केवल उनके राजनीतिक अनुभव या पार्टी में पुराने होने के आधार पर तय हो, यह जरूरी नहीं है। क्षेत्र में विकास कार्य, जनता से संपर्क, स्थानीय नाराजगी, संगठन के साथ तालमेल और चुनावी समीकरण जैसे पहलू भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। जिन नेताओं के खिलाफ क्षेत्र में असंतोष अधिक होगा, उनके टिकट पर दोबारा विचार किया जा सकता है। वहीं, मजबूत जनाधार और बेहतर प्रदर्शन वाले विधायकों को फिर मौका मिलने की संभावना रहेगी।
2027 में भाजपा के सामने सत्ता बचाने की चुनौती
उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए अगला विधानसभा चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। पार्टी के सामने न केवल सत्ता में वापसी की चुनौती होगी, बल्कि अपने मौजूदा जनाधार को बनाए रखने की भी परीक्षा होगी। ऐसे में टिकट वितरण के दौरान कुछ विधायकों को दोबारा मौका मिल सकता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में नए चेहरों पर दांव लगाया जा सकता है। फिलहाल टिकट काटने की कोई अंतिम सूची सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए 124 विधायकों की रिपोर्ट को लेकर सामने आ रही चर्चाओं को संभावित चुनावी संकेत के रूप में ही देखा जाना चाहिए। अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा।

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