Monday, February 16, 2026
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मेकअप नहीं, मानवता ही असली आभूषण

अंधेरी खदान से प्रशासनिक शिखर तक

♥️ कहानी – एपिसोड 1 ♥️

जीवन का असली रंग: वह कलेक्टर जो मेकअप नहीं करती


✦ हम जीवन को बाहर से सुंदर बनाने के लिए कितने ही रंग चुनते हैं—कपड़े, गहने, मेकअप। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि जीवन का असली रंग कौन-सा है? वह रंग जो लग जाए तो न धुले, न फीका पड़े, न समय मिटा पाए। यह कहानी उसी रंग की है—मानवता, संघर्ष और दिव्य प्रेम की।
“कलेक्टर मेकअप क्यों नहीं करती?”
कॉलेज के सभागार में छात्रों की हलचल थी। मंच पर बैठी थीं जिले की कलेक्टर—सुश्री आर्या (पात्र नाम बदला गया)। सादे परिधान, कलाई में घड़ी—बस। न आभूषण, न मेकअप।
छात्रों को सबसे ज़्यादा यही बात खटक रही थी।
कलेक्टर ने दो मिनट में जीवन, अनुशासन और जिम्मेदारी पर बात रखी। शब्द कम थे, असर गहरा। फिर प्रश्नों का दौर शुरू हुआ।
“मैडम, आपका नाम?”
“आर्या।”
एक क्षण का मौन। फिर भीड़ में से एक दुबली-सी छात्रा खड़ी हुई।
“मैडम, आप मेकअप क्यों नहीं करतीं?”
हॉल सन्न रह गया।
आर्या का चेहरा क्षण भर को उतर गया। माथे पर पसीना चमका। उन्होंने पानी पिया, छात्रा को बैठने का संकेत दिया और शांत स्वर में बोलीं—
“यह सवाल एक शब्द में नहीं सिमटता। अगर आप दस मिनट दे सकें, तो मैं अपनी कहानी सुनाना चाहती हूँ।”
सभागार से एक साथ आवाज़ आई—“हाँ!”
अंधेरे में जन्मी रौशनी
“मेरा जन्म एक आदिवासी इलाके में हुआ,” आर्या ने कहना शुरू किया।
“अभ्रक की खदानों से घिरे गाँव में। माता-पिता खनिक थे। झोपड़ी ऐसी कि बारिश में बह जाए। रोज़ी—खदान। भोजन—कभी पानी, कभी एक-दो रोटियाँ।”
चार साल की उम्र में बीमारी घर कर गई। खदानों की ज़हरीली धूल ने सबको जकड़ लिया। पाँच साल की होते-होते दो भाइयों की मौत हो गई—भूख और बीमारी से।
गाँव में न स्कूल था, न अस्पताल, न शौचालय, न बिजली।
“क्या आप ऐसे गाँव की कल्पना कर सकते हैं?”—आर्या ने पूछा।
कोई उत्तर नहीं आया।
पाँच साल की मज़दूर
“एक दिन भूख से बेहाल थी,” आर्या बोलीं,
“पिता मेरा हाथ पकड़कर खदान ले गए। लोहे की चादरों से ढकी, गहराई में उतरती अंधेरी सुरंगें। मेरा काम—रेंगते हुए अभ्रक बटोरना। यह काम सिर्फ़ छोटे बच्चों के बस का था।”
पहली बार पेट भर रोटी मिली—पर शरीर ने साथ नहीं दिया। उल्टी हुई।
“पाँच साल की उम्र में,” उन्होंने कहा,
“मैं अंधेरे में ज़हरीली धूल साँस में ले रही थी।”
दिन में आठ घंटे काम—तब जाकर एक रोटी।
कभी भूस्खलन, कभी बीमारी—मौत आम बात थी।
एक साल बाद छोटी बहन भी खदान में उतरने लगी। चारों मिलकर काम करने लगे। भूख कुछ कम हुई—पर भाग्य को कुछ और मंज़ूर था।
एक बारिश… और सब कुछ खत्म
“एक दिन तेज़ बुखार के कारण मैं काम पर नहीं जा सकी,” आर्या का स्वर कांपा।
“अचानक बारिश हुई। खदान ढह गई। सैकड़ों लोग दब गए।”
उनमें—मेरे पिता, मेरी माँ, मेरी बहन—सब।
सभागार में सिसकियाँ फैल गईं।
आर्या की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं तब छह साल की थी। बाद में एक सरकारी आश्रय पहुँची। वहीं पढ़ाई शुरू हुई। अपने गाँव की पहली बच्ची बनी जिसने वर्णमाला सीखी।”
सवाल का असली जवाब
आर्या ने गहरी साँस ली और कहा—
“अब आप समझ रहे होंगे कि मेकअप का सवाल क्यों भारी है।
खदानों में जो अभ्रक हम बटोरते थे, वही आज चमकदार मेकअप का हिस्सा है।”
उन्होंने सीधे छात्रों की ओर देखा—
“दुनिया भर के रंगीन कॉस्मेटिक में वही अभ्रक है, जिसे निकालने में आज भी हज़ारों बच्चों की ज़िंदगी दांव पर लगी है।
उनके टूटे सपने, कुचला हुआ बचपन—हमारे गालों पर चमक बनकर चढ़ जाता है।”
एक पल का सन्नाटा।
“अब आप ही बताइए,” आर्या बोलीं,
“मैं मेकअप कैसे करूँ?
भूख से मरे भाइयों की याद में पेट भर कैसे खाऊँ?
फटे कपड़ों में जीने वाली माँ की याद में रेशम कैसे पहनूँ?”
खामोश सम्मान
पूरा सभागार खड़ा हो गया।
आर्या बाहर निकलीं—बिना शब्दों के।
सिर ऊँचा, आँखों में आँसू, चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान।
इस कहानी का संदेश
बाहरी रंग कब तक साथ देते हैं—किसे पता?
पर भीतर का रंग—मानवता, करुणा और दिव्य प्रेम—जीवन भर चमकता है।
अपने भीतर का रंग चुनिए। वही असली सुंदरता है।
“मानवता की नियति का निर्माण स्वयं से शुरू होता है। पहले चेतना का विकास, फिर उसका विस्तार।”

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