✍️ सोनम सोनी
आज मन का सागर शांत
हो गया — क्यों ।
वो उथल-पुथल, हलचल हलचल,
उलझन सब शांत हो गया … क्यों
मन की लहरें जो बार-बार इच्छा के
बड़े पत्थरों से टकरा रही थी ।
वो लहरें अब टकराती नहीं, वापस चली गई हैं
दूर फलक तक … क्यों ।
सवाल किसी से पूछा नहीं
चाहती मैं — क्यों ।
जवाब चाहे भी नहीं दे पाती । इन
दोनों के बीच कैसा सामंजस्य बैठ गया है
जो मुझे अच्छा नहीं लग रहा …
क्यों ।
पर मैं ऐसी तो न थी …। सब मुझसे
बात क्यों करना चाहते हैं । सब मुझ मुझे
क्यों सुन रहे हैं । आज मैं तो शांत
हूँ …. वो शिकायतें, दर्द, दुख सब
सहन कर लिया मैंने — क्यों ।
वो लोग अपने झूठ और
कुछ भर के आंसुओं से मेरी
स्थिरता को भिगो रहे हैं … क्यों
मन के सागर में मेरे जो
शांति है, उसे मिटाना चाहते
हैं अपने शब्दों के शोर
से ….. क्यों !
छोड़ दे मुझे आज, मेरा साथ
उनके लिए क्या मैं अभी भी हूं
….. क्यों
पर मैं तो जा चुकी सबको
आज़ाद कर दिया अपने से ….
दुख, दर्द, पीड़ा, साथ, साया
जो मेरा था मेरे लिए …
इनके लिए नहीं
तो फिर भी आज भी मुझे
छोड़ेंगे नहीं । क्या आज भी
कुछ गलत किया है मैंने ।
अगर नहीं तो रोका है मुझे … क्यों
मैं बस जाना चाहती हूं उस छोर तक…
जो परे है उन सबसे….
पर ये गलियां, ये घर, ये परिवार,
ये लोग मुझे जाने नहीं देते… क्यों
आखिर में सबके आंखों को वो सरोवर
सूख गया। उनका मन मेरे
जाने से भर गया। और छोड़
दिया मुझे कुछ दिनों का मेहमान बना के,
मुझे भुला दिया गया… क्यों
शायद अब मैं उनको याद नहीं
आना चाहती थी।
बहुत दूर आ चुकी थी
मैं। पर फिर भी मैं तोड़ न पाई बंधन,
वो अहसास, अपनों से वो
मेल… क्यों।
और विदा हो गई मैं इसतरह
मुझे जल की धारा में बह दिया गया
… और मैं दूर हो गई
मैं उनके पास दोबारा नहीं आना चाहती
न जाने… क्यों…
-Sonam Soni , B.Sc (Hons.) Semester (7th) Student at Maharishi University Lucknow
