भारत की संस्कृति का दुनिया में बज रहा डंका! पीएम मोदी ने बताया कैसे संगीत, सिनेमा और खानपान जोड़ रहे विश्व को भारत से

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नई दिल्ली (राष्ट्र की परम्परा डेस्क)। भारत की सांस्कृतिक विरासत अब केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि संगीत, नृत्य, सिनेमा, साहित्य और खानपान के माध्यम से दुनिया के अलग-अलग देशों को भारत से जोड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय संस्कृति की इसी वैश्विक ताकत को रेखांकित करते हुए कहा है कि भारत की सभ्यतागत विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नई पहचान मिल रही है। उन्होंने प्राचीन स्मारकों, ऐतिहासिक स्थलों और दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। प्रधानमंत्री का यह संदेश 14 से 16 अक्टूबर तक नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित ‘बृहत्तर भारत : विश्वभर में भारत के सांस्कृतिक संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन’ के उद्घाटन सत्र में पढ़कर सुनाया गया। केंद्रीय संस्कृति सचिव विवेक अग्रवाल ने उनका लिखित संदेश प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, राजनयिक, विद्वान और भिक्षु शामिल हुए। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की सभ्यतागत यात्रा सदियों से सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है। प्राचीन काल में नालंदा जैसे शिक्षा केंद्रों ने भारत और एशिया के दूसरे क्षेत्रों के बीच ज्ञान के प्रसार को मजबूत किया। भिक्षुओं, विद्वानों, व्यापारियों और यात्रियों ने समुद्री तथा जमीनी मार्गों से भारतीय विचारों, दर्शन और परंपराओं को दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाया। उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित अंकोरवाट जैसे ऐतिहासिक स्थलों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भारत और अन्य सभ्यताओं के बीच हुए सांस्कृतिक संवाद के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं। भारतीय परंपराओं का स्थानीय संस्कृतियों के साथ मेल हुआ और इससे अनेक विशिष्ट सांस्कृतिक स्वरूप विकसित हुए। आज भी यह संवाद संगीत, नृत्य, साहित्य, सिनेमा, दर्शन और खानपान के जरिए लगातार आगे बढ़ रहा है। मोदी ने स्पष्ट किया कि सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति एक महत्वपूर्ण दायित्व भी है। उन्होंने कहा कि भारत की समृद्ध पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि इतिहास, ज्ञान और परंपराओं की यह विरासत भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंच सके। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भारत के अनेक सांस्कृतिक स्थलों का शामिल होना इस विरासत के वैश्विक महत्व की पहचान है। प्रधानमंत्री ने स्मारकों के संरक्षण के साथ-साथ पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने के लिए चलाए जा रहे प्रयासों का भी उल्लेख किया। ‘ज्ञान भारतम’ पहल के माध्यम से देश की प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान, संरक्षण और उनके महत्व को सामने लाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य भारत के पारंपरिक ज्ञान और ऐतिहासिक दस्तावेजों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखना है। यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बृहत्तर भारत परिषद, जिसे ‘ग्रेटर इंडिया सोसाइटी’ के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित किया जा रहा है। इस संस्था की स्थापना 14 अक्टूबर 1926 को तत्कालीन कलकत्ता में भारतीय विद्वानों के एक समूह ने की थी। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर इसके आध्यात्मिक मार्गदर्शक थे। सम्मेलन में भारत के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों के साथ-साथ वर्तमान समय में विभिन्न देशों के साथ सहयोग की संभावनाओं पर भी चर्चा की जा रही है। संस्कृति मंत्रालय की ‘वैश्विक सहभागिता योजना’ के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) द्वारा संचालित ‘बृहत्तर भारत योजना’ 2026-2031 इस आयोजन का आधार है। इसके अंतर्गत साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत से जुड़े शोध, दस्तावेजीकरण, प्रकाशन, प्रदर्शनियों, अभिलेखीय परियोजनाओं, डिजिटलीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक साझेदारियों को बढ़ावा देने की योजना है। इसका लक्ष्य भारतीय संस्कृति के उन प्रभावों और परंपराओं को व्यवस्थित रूप से दर्ज करना है, जो समय के साथ विभिन्न देशों और क्षेत्रों में विकसित हुए। केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी भारतीय विरासत को दुनिया के साथ भारत के ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों का मजबूत सेतु बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और वैश्विक स्तर पर प्रसार के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। सम्मेलन के पूर्ण सत्र में भारत में फिजी के उच्चायुक्त जगन्नाथ सामी, लिथुआनिया की राजदूत डायना मिकेविसिएने और कई अन्य देशों के राजनयिकों, विद्वानों तथा भिक्षुओं ने हिस्सा लिया। इस दौरान फिजी के उच्चायुक्त ने भारत सरकार से गिरमिटिया श्रमिकों की ऐतिहासिक समुद्री यात्राओं से जुड़े कोलकाता, विशाखापत्तनम और मद्रास (वर्तमान चेन्नई) के बंदरगाहों को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने की संभावनाओं पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने भारत और फिजी के सांस्कृतिक संस्थानों से साझा विरासत के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए मिलकर काम करने की अपील भी की। यह मुद्दा उन ऐतिहासिक यात्राओं और प्रवासन की स्मृतियों को संरक्षित करने के महत्व को सामने लाता है, जिनसे भारत और दुनिया के कई देशों के सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध बने। भारत की सांस्कृतिक पहचान की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता, प्राचीन ज्ञान परंपरा और दूसरी संस्कृतियों के साथ संवाद करने की क्षमता रही है। ऐसे में ‘बृहत्तर भारत’ सम्मेलन का महत्व केवल अतीत को याद करने तक सीमित नहीं है। यह दुनिया के साथ भारत के सांस्कृतिक रिश्तों को समझने, साझा विरासत को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास को सहेजने का अवसर भी है।