महिला आरक्षण कानून: सशक्तिकरण या पर्दे के पीछे की राजनीति?

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023: क्या बढ़ेगा वास्तविक नेतृत्व या सिर्फ़ संख्या? प्रॉक्सी राजनीति पर सख़्त कानून की ज़रूरत

गोंदिया। भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सशक्त बनाने के उद्देश्य से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (106वां संविधान संशोधन) को लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देकर नीति-निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करता है। हालांकि, इस ऐतिहासिक पहल के साथ कई गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं—क्या यह कानून वास्तविक महिला नेतृत्व को बढ़ावा देगा या फिर केवल प्रॉक्सी नेतृत्व और वंशवाद को मजबूत करेगा?
आलोचकों का मानना है कि इस कानून के लागू होने के बाद कई स्थानों पर महिलाएं केवल औपचारिक प्रतिनिधि बनकर रह जाएंगी, जबकि वास्तविक निर्णय उनके पति, पिता या अन्य पुरुष रिश्तेदार लेंगे। यह प्रवृत्ति पहले से ही स्थानीय निकायों में “सरपंच पति” संस्कृति के रूप में देखी जा चुकी है, जहां चुनी हुई महिला प्रतिनिधि के स्थान पर उनके परिजन प्रशासनिक निर्णय लेते हैं।


लेखक एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी का मानना है कि यदि इस अधिनियम में प्रॉक्सी नेतृत्व को रोकने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान नहीं जोड़े गए, तो यह कानून अपने मूल उद्देश्य से भटक सकता है। उनका कहना है कि पंचायत स्तर पर जिस तरह सरकार ने “प्रॉक्सी सरपंच” के खिलाफ अभियान चलाया है, उसी प्रकार संसद और विधानसभाओं में भी सख़्त नियम लागू करने की आवश्यकता है।
इस संदर्भ में पांच महत्वपूर्ण सुधार रणनीतियां सामने आती हैं। पहली, प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व को स्पष्ट रूप से परिभाषित कर इसे दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। यदि यह साबित होता है कि महिला प्रतिनिधि के अधिकारों का उपयोग कोई अन्य व्यक्ति कर रहा है, तो संबंधित व्यक्ति और प्रतिनिधि दोनों के खिलाफ अयोग्यता, जुर्माना और कारावास जैसी सख़्त कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए।
दूसरी रणनीति क्षमता निर्माण की है। केवल आरक्षण देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि महिला प्रतिनिधियों को प्रशासनिक, विधायी और वित्तीय प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण देना अनिवार्य होना चाहिए, ताकि वे आत्मविश्वास के साथ निर्णय ले सकें।
तीसरी रणनीति डिजिटल पारदर्शिता और निगरानी तंत्र को मजबूत करना है। सभी बैठकों और निर्णयों को ऑनलाइन रिकॉर्ड किया जाए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वास्तविक निर्णय लेने वाला कौन है।
चौथी रणनीति राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करना है। उम्मीदवार चयन में पारिवारिक संबंधों के बजाय योग्यता और सामाजिक योगदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि वंशवाद को रोका जा सके।
पांचवीं और सबसे महत्वपूर्ण रणनीति सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन की है। जब तक समाज महिलाओं को स्वतंत्र और सक्षम नेता के रूप में स्वीकार नहीं करेगा, तब तक किसी भी कानून का प्रभाव सीमित रहेगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह आरक्षण तत्काल लागू नहीं होगा। इसके लिए पहले जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होनी आवश्यक है, जो संभवतः 2029 के आम चुनावों तक पूरी होगी। तब जाकर यह अधिनियम पूरी तरह प्रभावी हो पाएगा।
आगामी संसद के विशेष सत्र (16 से 18 अप्रैल 2026) इस दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। यह केवल आरक्षण लागू करने का अवसर नहीं, बल्कि इसे प्रभावी और सार्थक बनाने का भी ऐतिहासिक मौका है। यदि इस अधिनियम में आवश्यक सुधार नहीं किए गए, तो यह केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित रह सकता है।
अंततः यह प्रश्न देश के सामने खड़ा है—क्या हम केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाना चाहते हैं या उन्हें वास्तविक सत्ता और नेतृत्व भी देना चाहते हैं? यही इस अधिनियम की असली परीक्षा है।


—संकलनकर्ता: एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी, गोंदिया, महाराष्ट्र

Editor CP pandey

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