Categories: Uncategorized

यादों के झरोखे: पल दो पल का नहीं, सदियों के शायर हैं साहिर लुधियानवी

साहिर लुधियानवी कोई साधारण फिल्मी शायर नहीं बल्कि प्रगतिशीलता और समाजवादी विचारधारा के अलम्बरदार किरदार हैं। 59 साल की कम उम्र में अपनी मृत्यु के समय वे कैरियर के ऊंचे पायदान पर थे। उनका नेहरूवियन और समाजवादी होना जग जाहिर हो चुका था। उनके गीत इंक़लाब और बदलाव के गीत बन चुके थे। जिन्हें आज भी यदा-कदा इंक़लाबी जलसों में सुना जा सकता है।
साहिर 1950 में मुंबई आ गए। 1950 में फिल्म ‘आजादी की राह पर ‘ में अपना पहला गीत ‘बदल रही है जिन्दगी ‘ लिखा। वर्ष 1951 में एसडी बर्मन की धुन पर फिल्म नौजवान में लिखे अपने गीत ‘ठंडी हवाएं लहरा के आए ‘ सुपरहिट रहा।इसके बाद साहिर ने कभी मुडकर नही देखा। साहिर ने खय्याम के संगीत निर्देशन में 1958 में फिल्म ‘ फिर सुबह होगी ‘का गीत ‘ वो सुबह कभी तो आयेगी ‘ ने काफी नाम कमाया।
गुरुदत्त की फिल्म प्यासा, साहिर के सिने कैरियर की अहम फिल्म साबित हुई। मुंबई के मिनर्वा टाकीज में जब यह फिल्म दिखाई जा रही थी तब जैसे ही साहिर का लिखा क्रान्तिकारी गीत “जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं” बजा तब दर्शक अपनी सीट से उठ खडे हुए और गाने की समाप्ति तक तालियां बजाते रहे। बाद में दर्शकों की मांग पर इसे तीन बार बजाया गया।फिल्म इण्डस्ट्री के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ.
तीन दशक से ज्यादा वर्षों तक हिन्दी सिनेमा को अपने इंक़लाबी गीतों से आंदोलित करने वाले साहिर 59 साल की उम्र में 25 अक्टूबर 1980 में इस दुनिया को अलविदा कह गए।
साहिर के कुछ महत्वपूर्ण गीत दर्शनीय है- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूँ…, मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला…, न मुँह छुपा के जिओ…, उड़े जब जब जुल्फें तेरी…, मेरे दिल में आज क्या है…, तोरा मन दर्पण कहलाये…, मैं पल दो पल का शायर हूँ…, जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं…. आदि हैं।
साहिर लुधियानवी और इन पंक्तियों के लेखक के वालिद अच्छे दोस्तों में थे। इसलिए उनसे मिलने का गाहे ब गाहे मौका मिलता रहता था। लोग उनसे शाम में मिलने आते पर हमारे लिए हुक्म होता कि दोपहर शुरू होने के पहले ही आना यानि लगभग 11बजे दिन के आसपास। वजह होती शाम का उनका अपनी महफ़िल में बिजी होना और दोपहर का हमें खाना खिलाना। मेरे वालिद शायद ऐसे शख्स थे जो इन जैसी तमाम नामचीन हस्तियों को एक साथ बैठ सकते थे।
मुझे1973 की एक घटना याद है। मेरे बड़े भाई की शादी का वलीमा (रिसेप्शन)था और साहिर लुधियानवी मेरे गरीबखाने पर तशरीफ़ फरमा रहे थे। उस वक़्त फोटोग्राफी का रिवाज गांव में न के बराबर था। साहिर साहब बार-बार कहते सिनेमा में रहने की वजह से बिना फोटोशूट के कोई जश्न समझ में ही नही आता। बम्बई पहुंचते ही उन्होंने एक कोडक कैमरा भेजा जो काफी दिनों तक हमारा कीमती सरमाया बना रहा। गांव में उनकी बेतरतीब जीवनशैली (बम्बइया) से मेरी अम्मा को अपने घरेलू रूटीन में बदलाव लाना पड़ता था। जो उन्हें नागवार गुजरता था। लेकिन मेहमान नवाजी में कोई कमी नहीं करती थी। अम्मा कहती कि ई मट्टीमिला तो मज़रुह से ठीक है। ऊ तो दिन रात सुबह कुछ नही देखते और शुरू हो जाते हैं पर ई तो आसपास वालों का भी लिहाज रखते है। कहने की जरूरत नहीं कि मेरी अम्मा बात बात में मट्टी मिला लफ्ज़ का इस्तेमाल भी करती थीं।
अनेक बार मैं उनसे बम्बई में मिला। वे दुबारा 1979 में मेरे गाँव आये। सम्भवतः जनतापार्टी की सरकार थी। वालिद गाँधीयन के साथ-साथ नेहरूवियन भी थे। नेहरू साहिर की भी पसन्द थे तब तक मैं गांधी-नेहरू को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहता था। शेरो-शायरी के साथ-साथ सियासत की बातें होती। उसी वक़्त मैंने पहली बार साहिर की लिखी हुई नेहरू पर नज़्म सुनीं। दिन में दर्जनों बार साहिर लुधियानवी इसे पढ़ते और मेरे वालिद ग़मज़दा होकर इसे सुनते.हम लोग इसे उस वक़्त पागलपन करार देते। आज समझ मे आया कि उस पीढ़ी को नेहरू क्यों इतने महबूब थे।
ये वही नज़्म है जिसे नेहरू की मौत पर साहिर ने लिखा था,
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है*
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते
धड़कनें रुकने से अरमान नहीं मर जाते
साँस थम जाने से एलान नहीं मर जाते
होंट जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है
वो जो हर दीन से मुंकिर था हर इक धर्म से दूर
फिर भी हर दीन हर इक धर्म का ग़म-ख़्वार रहा
सारी क़ौमों के गुनाहों का कड़ा बोझ लिए
उम्र-भर सूरत-ए-ईसा जो सर-ए-दार रहा
जिसने इंसानों की तक़्सीम के सदमे झेले
फिर भी इंसाँ की उख़ुव्वत का परस्तार रहा
जिस की नज़रों में था इक आलमी तहज़ीब का ख़्वाब
जिस का हर साँस नए अहद का मेमार रहा
मौत और ज़ीस्त के संगम पे परेशाँ क्यूँ हो
उस का बख़्शा हुआ सह-रंग-ए-अलम ले के चलो
जो तुम्हें जादा-ए-मंज़िल का पता देता है
अपनी पेशानी पर वो नक़्श-ए-क़दम ले के चलो
वो जो हमराज़ रहा हाज़िर-ओ-मुस्तक़बिल का
उस के ख़्वाबों की ख़ुशी रूह का ग़म ले के चलो
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है….
उनसे मिलने पर आत्मीयता का एहसास होता। हम लोग उन्हें अंकल कहते। जब भी मिलते गांव का हाल पूछते और सबसे मजेदार बात अम्मा की बकरी का भी हाल चाल लेते। बकरी को ऐसे तमाम नामचीन लोगों के दामन कुतरने का मेडल हासिल था। पर क्या मजाल कोई बकरी पर रोब ग़ालिब कर सके। अम्मा की नाराजगी का डर बहुत महंगा पड़ सकता था।
25 अक्टूबर 1980 को वो इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कर गए पर जाते-जाते मेरे पोस्ट ग्रेजुएशन करने की खुशी में एक कोट तोहफे में सिला गए।

rkpnews@somnath

Recent Posts

पुलिस लाइन में भव्य दीक्षांत परेड

493 महिला प्रशिक्षुओं ने ली शपथ कानून-व्यवस्था को मिलेगी नई मजबूती गोरखपुर(राष्ट्र की परम्परा)l पुलिस…

12 hours ago

कलयुगी दामाद ने ससुराल में तिहरा हमला, पत्नी व सास की मौत, ससुर गंभीर

इलाके के बछईपुर गांव के छोटका पूरा में शनिवार की देर रात एक सनसनीखेज वारदात…

12 hours ago

रविप्रताप सिंह ने मोहन सेतु के निर्माण में देरी पर उठाए सवाल, आंदोलन की चेतावनी

बरहज/देवरिया (राष्ट्र की परम्परा)। कांग्रेस प्रवक्ता रविप्रताप सिंह ने कार्यकर्ताओं के साथ अर्धनिर्मित मोहन सेतु…

12 hours ago

हिंदी विभाग को मिला नया नेतृत्व: प्रो. विमलेश मिश्र ने संभाली विभागाध्यक्ष की जिम्मेदारी

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा तथा…

1 day ago

कुर्थीजाफरपुर : चेयरमैन के रिश्तेदारों को हुआ आवासीय पट्टा 39 साल बाद रद्द

जिलाधिकारी ने दिया कब्जा हटाने का आदेश मऊ (राष्ट्र की परम्परा) जनपद के कुर्थीजाफरपुर नगर…

1 day ago

होमगार्ड्स एनरोलमेंट–2025 परीक्षा का निरीक्षण, डीएम-एसपी ने परखी व्यवस्थाएं

महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। जिलाधिकारी संतोष कुमार शर्मा एवं पुलिस अधीक्षक शक्ति मोहन अवस्थी द्वारा…

1 day ago