बेपरवाही का मंत्र: चाह गई तो चिंता मिटी, मानसिक शांति पाने का सरल उपाय
🧠 भूमिका
“चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।”
यह दोहा आज के तनावग्रस्त जीवन में मानसिक शांति का सबसे सटीक सूत्र है।
मनुष्य आजीवन कामनाओं का दास बनकर लोभ, मोह, माया, क्रोध और काम के चक्र में फँसा रहता है। छोटी-छोटी बातों से उपजा तनाव उसे भीतर से खोखला करता चला जाता है। ऐसे में बेपरवाही का मंत्र ही वह अस्त्र है, जो मन को पुनः केंद्रित कर मानसिक शांति प्रदान करता है।
📌 बड़े बुजुर्गों की सीख और आधुनिक जीवन
वर्ष 1972 की फिल्म अपना प्रेम का गीत —
“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना”
आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
हम जीवन की परेशानियों का दोष कभी समाज, कभी पड़ोस और कभी ईश्वर पर डाल देते हैं, जबकि वास्तविक समस्या हमारी अतिचिंता और अति-परवाह होती है।
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बुजुर्गों की कहावतें —
“दूर के ढोल सुहावने लगते हैं”
“एक उंगली उठाओ तो तीन अपनी ओर होती हैं”
आज भी जीवन का आईना हैं।
🔑 बेपरवाही का अर्थ क्या है?
बेपरवाही का अर्थ लापरवाही नहीं, बल्कि अनावश्यक चिंता से मुक्ति है।
लगातार चिंता और संदेह मानसिक तनाव बढ़ाते हैं, जिससे न तो हम सही निर्णय ले पाते हैं और न ही जीवन का आनंद।
✔️ भावनात्मक संतुलन
✔️ मानसिक मजबूती
✔️ आत्मविश्वास
✔️ बाहरी आलोचना से अप्रभावित रहना
यही बेपरवाही का मंत्र है।
🧍♂️ शारीरिक भाषा और मानसिक बेपरवाही
केवल शब्दों से नहीं, हाव-भाव से भी शांति झलकनी चाहिए।
यदि हम ऊपर से शांत और भीतर से उथल-पुथल में हैं, तो शरीर सच्चाई उजागर कर देता है —
बंधी मुट्ठियाँ, तनी मांसपेशियाँ, तेज आवाज़।
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➡️ समाधान:
अपने शरीर को ऊपर से नीचे तक शिथिल करें।
जैसे-जैसे शरीर शांत होगा, मन भी बेपरवाह होता जाएगा।
📖 रहीम का दोहा और उसका जीवन-संदेश
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछू न चाहिए, वे साहन के साह।।
🔹 अर्थ:
कामनाएँ ही चिंता का मूल हैं।
जिस दिन चाह समाप्त होती है, उसी दिन मन मुक्त हो जाता है।
जो कुछ नहीं चाहता, वही वास्तव में सबसे समृद्ध होता है।
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😊 स्वयं को गंभीरता से न लें
जीवन तब सरल हो जाता है जब हम यह समझ लेते हैं कि
👉 हर बात जीवन-मरण का प्रश्न नहीं होती।
हर परिस्थिति में हास्य खोजिए,
हर समस्या में सीख तलाशिए।
बेपरवाह व्यक्ति भावनाहीन नहीं होता,
वह केवल अति-प्रतिक्रिया से मुक्त होता है।
⚠️ बेपरवाही में संतुलन ज़रूरी
अत्यधिक बेपरवाही से रिश्तों को ठेस पहुँच सकती है।
इसलिए—
✔️ दूसरों की भावनाओं के प्रति संवेदनशील रहें
✔️ शांति रखें, पर संवेदना न खोएँ
✔️ आत्मबल बनाएं, अहंकार नहीं
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🧾 निष्कर्ष
यदि हम पूरे विश्लेषण पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि
साधारण बातों से उपजे तनाव को दूर करने का सबसे सरल उपाय — बेपरवाही का मंत्र है।
थोड़ा-सा मानसिक पुनर्केंद्रीकरण
और जीवन बन सकता है शांत, संतुलित और सुखी।
✍️ लेखक परिचय
संकलनकर्ता एवं लेखक:- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
(कर विशेषज्ञ स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा | सीए(एटीसी))📍 गोंदिया, महाराष्ट्र
