“ईश्वर जब रूप नहीं, विवेक बनकर उतरते हैं”
भूमिका : मौन से आगे, चेतना का अवतरण
हमने देखा कि जब मनुष्य मौन में सही के साथ खड़ा होता है, तब वही मौन शंखनाद बन जाता है।
उससे एक कदम आगे जाता है।यह कथा केवल भगवान विष्णु के अवतारों की नहीं, बल्कि उस क्षण की है जब ईश्वर स्वयं मनुष्य के भीतर धर्म, विवेक और करुणा बनकर प्रकट होते हैं।
शास्त्र कहते हैं —
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
परंतु प्रश्न यह है—
जब अधर्म इतना सूक्ष्म हो कि वह सत्ता, सुविधा और चुप्पी के आवरण में छिप जाए, तब विष्णु कैसे अवतरित होते हैं?
उत्तर यही है—
तब विष्णु किसी एक शरीर में नहीं, अनेक सजग हृदयों में उतरते हैं।
शास्त्रोक्त आधार : विष्णु का तत्त्व, न कि केवल रूप
विष्णु पुराण के अनुसार—
“विष्णु: सर्वगत: प्रोक्तः”
अर्थात विष्णु सर्वत्र व्याप्त हैं।
विष्णु केवल शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाला देवता नहीं हैं।
वे पालन, संतुलन और धर्म की सतत चेतना हैं।
जब-जब सृष्टि संतुलन खोती है—
कभी अत्याचार से
कभी अन्यायपूर्ण मौन से
कभी सत्य के सुविधाजनक त्याग से
तब विष्णु अवतार लेते हैं।
लेकिन हर बार देह में नहीं,
कभी-कभी दृष्टि में,
कभी विवेक में,
और कभी एक साधारण मनुष्य के साहस में।
कथा : धर्मग्राम और मौन का अधर्म
शास्त्रोक्त परंपरा में एक अल्पज्ञात कथा आती है।
धर्मग्राम की कथा, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के उत्तर खंड में सांकेतिक रूप से मिलता है।
धर्मग्राम एक ऐसा राज्य था जहाँ
कोई युद्ध नहीं था
कोई अकाल नहीं था
मंदिरों में दीप जलते थे
शास्त्रों का पाठ होता था
परंतु एक दोष था—
अन्याय के सामने मौन।
राजा स्वयं अत्याचारी नहीं था,
पर वह अन्याय करने वालों को रोकता भी नहीं था।
प्रजा दुखी थी, पर डर से चुप थी।
धर्म बाहरी रूप में जीवित था,
पर अंतरात्मा में मृतप्राय।
प्रजा की पुकार और विष्णु का उत्तर
प्रजा ने यज्ञ किया, स्तुति की—
“हे नारायण! अवतार लो।”
पर कोई सिंह नहीं आया,
कोई बाण नहीं चला,
कोई चक्र नहीं घूमा।
बल्कि एक रात,
राजा को स्वप्न आया।
स्वप्न में विष्णु बोले—
“मैं आ चुका हूँ।”
राजा चौंका—
“पर प्रभु, मुझे तो कोई अवतार दिखाई नहीं दिया।”
विष्णु ने कहा—
“जिस दिन तुम्हारे राज्य में कोई निर्बल के पक्ष में खड़ा होगा,
बिना लाभ की इच्छा के,
बिना भय के—
वही मेरा अवतार होगा।”
शास्त्रोक्त संदेश : अवतार की नई परिभाषा
भगवद्गीता (4.7) कहती है—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…”
धर्म की ग्लानि केवल तब नहीं होती जब रावण या कंस पैदा होते हैं,
धर्म की ग्लानि तब भी होती है जब सही जानते हुए भी लोग चुप रहते हैं।
केंद्रीय भाव यही है—
“ईश्वर हर बार युद्ध नहीं करते,
कभी वे हमें ही युद्धभूमि बना देते हैं—
जहाँ निर्णय लेना ही धर्म होता है।”
विष्णु की महिमा : पालन का सबसे कठिन मार्ग
ब्रह्मा सृजन करते हैं—
यह उत्सव है।
शिव संहार करते हैं—
यह परिवर्तन है।
पर विष्णु पालन करते हैं—
और पालन सबसे कठिन है।
पालन का अर्थ है—
अन्याय को सहन न करना
पर हिंसा से नहीं, विवेक से
शक्ति से नहीं, स्थिरता से
आज का युग विष्णु युग है—
जहाँ सबसे बड़ा धर्म है संतुलन बनाए रखना।
आधुनिक संदर्भ : आज का अवतार कौन?
जब कोई पत्रकार सच लिखता है,
जब कोई शिक्षक डर के बिना सही सिखाता है,
जब कोई अधिकारी नियम से समझौता नहीं करता,
जब कोई आम नागरिक अन्याय देखकर खड़ा होता है—
वहीं विष्णु की लीला चल रही होती है।
शास्त्र स्पष्ट कहते हैं—
“नारायणो नरसहितः”
नारायण मनुष्य के साथ चलते हैं।
निष्कर्ष : जब ईश्वर हमें योग्य समझते हैं
हमें यह नहीं सिखाता कि ईश्वर आएँगे और सब ठीक करेंगे।
यह हमें बताता है—
“जब हम धर्म के योग्य बनते हैं,
तब ईश्वर हमें ही अपना माध्यम बना लेते हैं।”
और यही विष्णु की सबसे गहन,
सबसे मौन,
सबसे शक्तिशाली लीला है।
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