नया साल आया है, तो फिर वही बातें शुरू हो गई हैं। संकल्प, वादे और बड़े-बड़े दावे। लेकिन गाँव, कस्बे और शहर की गली में खड़ा आदमी आज भी एक ही सवाल पूछ रहा है। काम मिलेगा या नहीं, पढ़ाई सुधरेगी या नहीं, और इलाज सस्ता होगा या नहीं। 2026 काग़ज़ पर नया है, मगर ज़िंदगी वहीं अटकी हुई है।
सबसे पहले बात जवाबदेही की। योजना बनती है, फोटो खिंचती है, फिर फाइल बंद हो जाती है। 2026 का संकल्प यह होना चाहिए कि नाम नहीं, काम दिखे।
दूसरी बात आपस की है। पहले लोग दुख-सुख में साथ खड़े होते थे, अब जाति, धर्म और पार्टी देखकर बात होती है। सच्चाई यह है कि लड़ाने से किसी का चूल्हा नहीं जलता। 2026 में अगर समझदारी नहीं आई, तो नुकसान सबका होगा।
तीसरी और सबसे बड़ी बात नौजवानों की है। पढ़-लिख कर भी हाथ खाली हैं। डिग्री है, पर नौकरी नहीं। कहा जाता है कि खुद का काम करो, स्टार्टअप बनाओ। सवाल ये है कि पैसा कहाँ से आए, रास्ता कौन दिखाए? 2026 में अगर ईमानदार भर्ती और पक्की नौकरी नहीं बनी, तो नाराज़गी बढ़ेगी।
चौथी बात पढ़ाई की। बच्चों के हाथ में मोबाइल है, पर सही पढ़ाने वाला नहीं। ऑनलाइन के भरोसे पढ़ाई नहीं चलती। बिना गुरु, बिना बराबरी के साधन, शिक्षा कैसे मजबूत होगी? 2026 में पढ़ाई को मज़ाक नहीं, ज़िम्मेदारी समझना होगा।
पाँचवीं बात पानी, खेत और हवा की। नल सूख रहे हैं, खेत दम तोड़ रहे हैं और हवा भारी होती जा रही है। अगर विकास ऐसा हो कि जीने लायक कुछ बचे ही नहीं, तो तरक़्क़ी किस काम की?
आख़िर में बात साफ़ है, 2026 का संकल्प भाषण का नहीं, ज़मीन का होना चाहिए। नेता सच बोलें, अफसर ईमानदारी से काम करें और जनता सवाल पूछे। जब तक आम आदमी बोलेगा नहीं, तब तक हर साल नया आएगा, हालात पुराने ही रहेंगे।
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