डॉ. सतीश पाण्डेय
महराजगंज (राष्ट्र की परम्परा)। देश की रीढ़ कही जाने वाली सरकारी शिक्षा व्यवस्था आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। कागजों में करोड़ों के बजट, योजनाओं की लंबी फेहरिस्त और सरकारी मंचों से किए जा रहे दावे अपनी जगह हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन सबके उलटा तस्वीर पेश करती है। सवाल यह नहीं है कि योजनाएं क्यों बनीं, बल्कि यह है कि उनका असर आखिर कहां और किस पर दिखाई दे रहा है?
ग्रामीण अंचलों से लेकर कस्बों तक ऐसे सरकारी विद्यालयों की संख्या कम नहीं, जहां शिक्षक कम और ताले ज्यादा नजर आते हैं। कहीं भवन है पर शिक्षक नहीं, कहीं शिक्षक हैं तो बच्चे नहीं, और जहां बच्चे हैं वहां पढ़ाने का जुनून गायब है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और टैबलेट जैसे शब्द सरकारी फाइलों में जरूर चमकते हैं, लेकिन कक्षाओं में आज भी टूटी कुर्सियां, जर्जर छतें और खामोश ब्लैकबोर्ड सच्चाई बयान करते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि शिक्षा को सेवा नहीं, योजना बना दिया गया है। मध्यान्ह भोजन, यूनिफॉर्म और छात्रवृत्ति जैसी सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन गुणवत्ता का सवाल लगातार हाशिए पर जा रहा है। हालात इतने खराब हैं कि कई स्थानों पर पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा की किताब भी सहजता से नहीं पढ़ पाता। यह स्थिति केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि देश के भविष्य के साथ किया जा रहा खतरनाक प्रयोग है।
शिक्षकों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और स्थानांतरण की प्रक्रिया में राजनीति और भ्रष्टाचार ने शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर दिया है। निरीक्षण व्यवस्था औपचारिक बन चुकी है और जवाबदेही लगभग समाप्त हो गई है। जब जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तो सुधार के सभी दावे केवल कागजी साबित होंगे।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को फिर से राष्ट्र निर्माण का आधार माना जाए। इसके लिए स्कूलों की नियमित निगरानी, योग्य और प्रतिबद्ध शिक्षकों की पारदर्शी नियुक्ति, स्थानीय समाज की भागीदारी और कठोर जवाबदेही व्यवस्था लागू करना अनिवार्य है। बिना इन कदमों के शिक्षा सुधार की बात केवल भाषणों तक ही सीमित रहेगी।
यदि अब भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को नहीं संभाला गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी। शिक्षा सिर्फ किताबों का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य की बुनियाद है। सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों को मिलकर अब निर्णायक कदम उठाने होंगे, वरना “सब पढ़े, सब बढ़े” महज एक नारा बनकर रह जाएगा।
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