एआई के बढ़ते प्रभाव के बीच शिक्षक की भूमिका को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है: प्रो. पूनम टंडन

तकनीक के तेजी से विकास के बीच भी मानवीय चेतना, अनुभव और संवेदनाएँ अद्वितीय हैं, जिन्हें कोई भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस प्रतिस्थापित नहीं कर सकता: प्रो. अराधना शुक्ला

उच्च शिक्षा में एआई के उपयोग पर सात दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न

गोरखपुर (राष्ट्र की परम्परा)। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मदन मोहन मालवीय टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर एवं मनोविज्ञान विभाग द्वारा आयोजित सात दिवसीय ऑनलाइन शॉर्ट टर्म प्रशिक्षण कार्यक्रम “उच्च शिक्षा में एआई का उपयोग: मुद्दे, चुनौतियाँ और संभावनाएँ” का समापन 24 नवम्बर 2025 को गरिमामय वातावरण में हुआ। 18 से 24 नवम्बर तक चले इस शैक्षणिक कार्यक्रम में विशेषज्ञ व्याख्यानों, चर्चाओं और संवादों के माध्यम से प्रतिभागियों को समृद्ध स्तर का अकादमिक अनुभव प्राप्त हुआ।
समापन सत्र की शुरुआत विभागाध्यक्ष प्रो. धनंजय कुमार के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने एआई के बढ़ते दायरे और उच्च शिक्षा में इसकी संतुलित भूमिका पर विचार रखते हुए कहा कि आज शिक्षण क्षेत्र तकनीकी परिवर्तन के महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है।
मुख्य वैलेडिक्ट्री व्याख्यान कुमाऊँ विश्वविद्यालय, एसएसजे कैंपस (अल्मोड़ा) की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अराधना शुक्ला द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि शोध एवं उच्च अध्ययन में एआई अब अनिवार्य उपकरण बन चुका है, लेकिन इसके असीमित उपयोग से शिक्षण प्रक्रिया के मानवीय मूल्यों को चुनौती मिल सकती है।
उन्होंने चेताया कि अत्यधिक तकनीकी निर्भरता से शिक्षण अनुभव कभी-कभी संवेदनहीन (dehumanized) रूप ले लेता है, जिससे शिक्षक–छात्र के बीच भावनात्मक संवाद प्रभावित हो सकता है।
डेटा सुरक्षा, नैतिक दिशानिर्देश और AI-driven ट्यूटरिंग के दुरुपयोग की संभावना पर भी उन्होंने गंभीर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार “तकनीक कितनी भी उन्नत क्यों न हो जाए, मानवीय चेतना और अनुभव का कोई विकल्प नहीं है।”
सप्ताहभर चली गतिविधियों का विस्तृत प्रतिवेदन कार्यक्रम संयोजक एवं डीन, स्टूडेंट्स वेलफेयर, प्रो. अनुभूति दुबे ने प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि देश के 10 से अधिक राज्यों तेलंगाना, दिल्ली, चेन्नई, उत्तर प्रदेश, असम, उत्तराखंड, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, बिहार तथा तमिलनाडु से कुल 120 प्रतिभागियों ने कार्यक्रम में सक्रिय भूमिका निभाई।
सात दिनों में 18 प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों द्वारा कुल 22 व्याख्यान प्रस्तुत किए गए।
एम.एम.एम.टी.टी.सी. के निदेशक प्रो. चन्द्रशेखर ने एआई को शिक्षण-अधिगम को समर्थ बनाने वाला प्रभावी उपकरण बताया और कार्यक्रम के सफल आयोजन पर प्रसन्नता व्यक्त की।
समापन सत्र के मुख्य वक्ता कुलपति प्रो. पूनम टंडन रहीं। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति के इस दौर में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि “क्या मशीन शिक्षक का स्थान ले सकती है?” उन्होंने कहा कि छात्रों को एआई के उपयोग से रोकना संभव नहीं, लेकिन नैतिक मूल्यों, भावनाओं और मानवीय संवेदनाओं का शिक्षण केवल शिक्षक ही कर सकते हैं।
उन्होंने चेताया कि तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता स्वतंत्र चिंतन और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
प्रो. टंडन ने कहा कि “हमें किसी भी तकनीक के दास नहीं बनना चाहिए; एआई का उपयोग आवश्यक है, लेकिन उसका विवेकपूर्ण नियंत्रण और मानवीय दृष्टि अधिक आवश्यक है।”
कार्यक्रम के अंत में डॉ. नीतू अग्रवाल एवं डॉ. मनोज कुमार द्विवेदी ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया। देशभर से जुड़े शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सहभागिता ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को अत्यंत प्रभावी और सफल बनाया। संचालन शोधार्थी सुश्री गरिमा यादव ने किया।
कार्यक्रम की को-कोऑर्डिनेटर डॉ. गरिमा सिंह ने कुलपति प्रो. पूनम टंडन, निदेशक एमएमटीटीसी प्रो. चन्द्रशेखर, विभागाध्यक्ष प्रो. धनञ्जय कुमार, संयोजक प्रो. अनुभूति दुबे, सभी प्रतिभागियों, सहयोगी स्टाफ तथा शोध छात्राओं गरिमा यादव, गरिमा सिंह, स्तुति अग्रवाल एवं शाम्भवी त्रिपाठी का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया।

rkpNavneet Mishra

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