गाँव की गलियाँ चुप हैं क्यों, ये सवाल मन में आया,
देखा है वर्षों से मैंने, फिर कुछ बात समझ में आया।
मुखिया के घर की ईंटें बढ़ीं, पर गलियाँ जस की तस,
गाँव के लोगों की हालत में न कोई खास सुधार।
पहला कारण जो समझा, वो सबसे भारी बोझ,
धन की कमी में डूबे लोग, दुख के भारी बोझ।
मूल-भूत जो समस्या है, उससे निकल न पाए,
गाँव के हित की बातें फिर, मन में कहाँ समाए?
दूसरा कारण जो देखा, शिक्षा की कमी,
पढ़े-लिखे जब होते नहीं, तो कौन दिखाए गली।
किस अधिकारी के द्वार पर, अपनी गुहार पहुँचाएँ,
मुखिया से रिश्ते जोड़ के, प्रश्न कभी न उठाएँ।
तीसरा डर है मन में जो, पढ़े-लिखों को सताए,
शारीरिक, मानसिक भय, हिम्मत को हर जाए।
सोचते हैं, पर चुप रहते, आवाज न उठा पाते,
गाँव के विकास की राह में, कदम नहीं ये बढ़ाते।
समाधान सीधा एक ही, शिक्षा का दीप जलाएँ,
अधिकारों की जोत जले, और प्रश्न हो भरपूर।
सुरक्षा देगा कानून, ये विश्वास हर मन में दिलाएँ,
गाँव तभी तो बढ़ेगा आगे, जब भय हटेगा दूर।
प्रतीक झा
शोध छात्र
इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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