✍️ वशिष्ठ सिंह (पूर्व प्रचार्य)
उत्तर प्रदेश में जल संकट लगातार गहराता जा रहा है। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, तालाब सूख रहे हैं और सदियों पुराने कुएँ उपेक्षा के कारण जमींदोज़ हो रहे हैं। दूसरी ओर, पड़ोसी राज्य बिहार ने जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधन, विशेषकर कुओं के संरक्षण और सफाई, को लेकर एक सराहनीय पहल की है। यह समय है जब उत्तर प्रदेश सरकार को भी जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए।
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📌 जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों की वर्तमान स्थिति
कभी गांवों और कस्बों की जीवनरेखा रहे कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब और पोखरे आज बदहाली के शिकार हैं। शहरीकरण, अतिक्रमण और सरकारी उपेक्षा के चलते जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधन धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई कुएँ कचरे से पटे हैं, कहीं उनमें गंदा पानी भरा है, तो कहीं वे पूरी तरह बंद हो चुके हैं। यह स्थिति न केवल जल संकट को बढ़ा रही है, बल्कि पर्यावरण संतुलन को भी नुकसान पहुँचा रही है।
🌊 बिहार का मॉडल: एक सकारात्मक उदाहरण
बिहार सरकार ने हाल के वर्षों में जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों को पुनर्जीवित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। राज्य में—
पुराने कुओं की पहचान कर उनकी सफाई कराई गई
कुओं की मरम्मत और चारदीवारी बनाई गई
ग्रामीण समुदाय को जल संरक्षण से जोड़ा गया
मनरेगा और स्थानीय निकायों के माध्यम से कार्य कराया गया
इस प्रयास का परिणाम यह हुआ कि कई इलाकों में भूजल स्तर सुधरा और ग्रामीणों को पेयजल की स्थायी सुविधा मिली।
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🚰 उत्तर प्रदेश में उपेक्षा क्यों?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधन आज भी नीति-निर्माताओं की प्राथमिकता सूची में पीछे हैं। योजनाएँ कागजों तक सीमित रह जाती हैं, जबकि ज़मीनी स्तर पर—
कुएँ पाट दिए जाते हैं
तालाबों पर कब्ज़ा हो जाता है
स्थानीय प्रशासन उदासीन रहता है
यदि समय रहते ठोस नीति नहीं बनी, तो आने वाले वर्षों में प्रदेश गंभीर जल आपातकाल की ओर बढ़ सकता है।
🌱 पारंपरिक संसाधनों का वैज्ञानिक महत्व
कुएँ और तालाब केवल जल स्रोत नहीं हैं, बल्कि ये प्राकृतिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी हैं। वर्षा जल को जमीन में समाहित कर ये भूजल स्तर बनाए रखते हैं। जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधन आधुनिक तकनीकों से कहीं अधिक टिकाऊ और किफायती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन संसाधनों को पुनर्जीवित किया जाए तो—ट्यूबवेल पर निर्भरता कम होगी
बिजली की बचत होगी
सूखे की समस्या घटेगी
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🏛️ सरकार और समाज की संयुक्त जिम्मेदारी
जल संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। उत्तर प्रदेश में यदि जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों को बचाना है, तो—
ग्राम पंचायतों को अधिकार और बजट दिया जाए
स्कूलों और कॉलेजों में जल जागरूकता अभियान चलें
स्थानीय नागरिक निगरानी में भाग लें
बिहार की तर्ज पर जनभागीदारी से ही यह अभियान सफल हो सकता है।
🔍 समाधान और आगे की राह
उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि—
राज्य-स्तरीय जल संरक्षण नीति बनाए
सभी जिलों में पारंपरिक जल स्रोतों का सर्वे कराए
कुओं और तालाबों को अतिक्रमण-मुक्त करे
बजट और समयबद्ध कार्ययोजना लागू करे
यदि ये कदम उठाए जाते हैं, तो प्रदेश में जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधन फिर से जीवनदायी बन सकते हैं।
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🧭 निष्कर्ष
आज जब जल संकट वैश्विक चुनौती बन चुका है, तब उत्तर प्रदेश को अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। बिहार ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति और सही नीति से जल संरक्षण के पारंपरिक संसाधनों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। अब आवश्यकता है कि उत्तर प्रदेश भी इस दिशा में ठोस कदम उठाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को जल के लिए संघर्ष न करना पड़े।
