Tuesday, January 13, 2026
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परमानंद की प्राप्ति का मार्ग: ‘अहम्’ का विसर्जन और आत्मविचार, रमण महर्षि का आध्यात्मिक संदेश

आधुनिक युग के महान ऋषि और संत रमण महर्षि का सम्पूर्ण आध्यात्मिक चिंतन एक अत्यंत सूक्ष्म किंतु क्रांतिकारी सत्य पर केंद्रित है। ‘अहम्’ का लय और आत्मविचार द्वारा आत्मसाक्षात्कार। उन्होंने न तो किसी नये मत की स्थापना की, न किसी कर्मकांड का आग्रह किया, बल्कि मनुष्य को सीधे उसके मूल प्रश्न से रूबरू कराया “मैं कौन हूँ?” यही प्रश्न उनके दर्शन की धुरी है और परमानंद की प्राप्ति का प्रवेश द्वार भी।
रमण महर्षि का जीवन स्वयं एक मौन उपदेश था। सोलह वर्ष की अल्पायु में मृत्यु-बोध के माध्यम से उन्हें जो आत्मानुभूति हुई, वही आगे चलकर उनके उपदेशों का आधार बनी। उन्होंने जाना कि देह नश्वर है, मन परिवर्तनशील है, किंतु जो साक्षी भाव से इन सबको देख रहा है। वही सत्य आत्मा है। यही आत्मा परमानंद का स्रोत है। मनुष्य जब तक स्वयं को शरीर और अहंकार से जोड़कर देखता है, तब तक वह सुख-दुःख के द्वंद्व में उलझा रहता है। रमण महर्षि के अनुसार, इस द्वंद्व से मुक्ति का एकमात्र उपाय है। अहम्‌-भाव का क्षय।
‘अहम्’ केवल आत्मगौरव या दंभ नहीं, बल्कि वह मूल भ्रांति है जो व्यक्ति को ‘मैं’ और ‘मेरा’ के सीमित घेरे में बांध देती है। रमण महर्षि कहते हैं कि यह ‘अहम्’ ही समस्त बंधनों की जड़ है। जब साधक आत्मविचार करता है और यह खोजता है कि यह ‘मैं’ वास्तव में कौन है, तब यह अहंकार टिक नहीं पाता। खोज के प्रकाश में वह स्वयं विलीन हो जाता है। यही लय अवस्था है, जहां साधक और साध्य का भेद समाप्त हो जाता है।
आत्मविचार की प्रक्रिया न तो जटिल है और न ही बाह्य साधनों पर निर्भर। रमण महर्षि ने स्पष्ट कहा कि सत्य बाहर नहीं, भीतर है। ध्यान, जप या योग तभी सार्थक हैं जब वे मन को उसकी मूल सत्ता की ओर मोड़ें। आत्मविचार कोई बौद्धिक अभ्यास नहीं, बल्कि चेतना की एकाग्रता है। उस स्रोत पर, जहां से ‘मैं’ का विचार उठता है। जैसे ही मन उस मूल में स्थिर होता है, परमानंद स्वतः प्रकट होने लगता है।
रमण महर्षि का दर्शन आज के अशांत, भोगप्रधान और प्रतिस्पर्धात्मक समाज के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। बाहरी उपलब्धियों के बावजूद मनुष्य भीतर से रिक्त और असंतुष्ट है। रमण महर्षि इस रिक्तता का कारण स्पष्ट करते हैं, आत्मविस्मृति। वे हमें याद दिलाते हैं कि स्थायी सुख किसी वस्तु, पद या संबंध से नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की पहचान से आता है। जब ‘अहम्’ मिटता है, तभी शुद्ध चेतना का अनुभव होता है और वही परमानंद है।
उनका संदेश सरल है, पर प्रभाव गहन। मौन, सरलता और करुणा के माध्यम से उन्होंने सिद्ध किया कि आत्मज्ञान किसी विशेष वर्ग या वेश की बपौती नहीं। यह हर उस व्यक्ति के लिए संभव है जो भीतर झांकने का साहस करता है। रमण महर्षि का जीवन और दर्शन हमें यह सिखाता है कि सच्ची साधना बाहर की यात्रा नहीं, बल्कि भीतर की वापसी है।
रमण महर्षि का आध्यात्मिक दर्शन यह उद्घोष करता है कि परमानंद कोई प्राप्त की जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि हमारा स्वभाव है। आवश्यकता केवल इतनी है कि ‘अहम्’ की परत हटे और आत्मविचार की ज्योति जले। यही उनकी मौलिक देन है और यही मानवता के लिए उनका अमर संदेश।

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