✍️ डॉ. कर्नल आदि शंकर मिश्र ‘आदित्य’
हे गौरी शंकर अर्धांगिनी,
यथा त्वं शंकर प्रिया,
तथा माम कुरु कल्याणी,
कांत कांतम सुदुर्लभम ॥
शिव के प्रति पार्वती का प्रेम,
भूल नहीं, भक्ति की ज्योति है।
शिव प्रेमी को पागल कहना,
श्रद्धा पर आघात जैसी होती है।
शिव स्वयं शिवा के अद्भुत प्रेमी,
अर्धनारीश्वर रूप में एकाकार हुए।
शिवा शिव के बिना अधूरे,
दोनों एक-दूसरे में संपूर्ण हुए।
पार्वती के मन में बस शिव ही,
अन्य कोई विचार नहीं ठहरता।
शिवा का हठ, शिव का समर्पण,
दोनों का प्रेम अमर रहता।
दसानन की शिवभक्ति याद करो,
सिर काट कर भी अर्पण किया।
भक्ति थी, हठ भी था शायद,
पर उद्देश्य था शिव का सान्निध्य लिया।
शिव की महिमा शिव ही जाने,
कोई अन्य नहीं पहचान सके।
देवों के देव, अनंत, अनादि,
जिन्हें केवल हृदय से मान सके।
आदित्य अर्चना करे सब शिव से,
हर मन को पार्वती सी अर्धांगिनी मिले।
हर नारी को शिव समान वर मिले,
शिव-शिवा सा दिव्य प्रेम जग में खिले।
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