सागर की धरती रो पड़ी, आँखों में है नमी,
किसने घोला ज़हर, बाँटी हैं मौत की ग़मी?
जाम समझ बढ़े, “ज़िंदगी” हाथ से छूट गई,
घर की चौखट सूनी, लाखों उम्मीदें टूट गईं।
वो किसके लाल ग्यारह, बहुतों के थे सहारे,
हर माँ की आँखें पूछ रहीं, कहाँ मेरे दुलारे?
शराब नहीं, ये ज़हर था, घर-घर शोक दिया,
लालच की आँधी ने घर-संसार झोंक दिया।
सात दुकानों पे ताले, सवाल अभी बाकी है,
कानून की चौखट पे जवाबदेही की बारी है।
कितना बिकता रहेगा ज़हर, यूँ घर उजड़ेंगे?
चंद सिक्कों की ख़ातिर इंसानियत से लड़ेंगे?
ऐसा समाज बनाएँगे, जीवन सबसे प्यारा हो,
यूँ नशे के अँधियारे में मानवता उजियारा हो।
ग्यारह दीप बुझ गए, सिर्फ़ ये संदेश छोड़ गए,
ज़िंदगी अनमोल है, इसे जाम में ना खोने दो।
संदर्भ: जहरीली शराब ने ली 11 जानें।
रचनाकार
संजय एम. तराणेकर
कवि, लेखक एवं समीक्षक
इंदौर-452011, मध्य प्रदेश

Editor CP pandey

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