विकास की दौड़ में बुजुर्ग पीछे क्यों छूट रहे हैं?

माता-पिता वृद्धाश्रम में, बच्चे विदेश में—क्या यही है आधुनिक सफलता की कीमत?
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से मांगी वृद्धाश्रम, पेंशन और चिकित्सा सुविधाओं की रिपोर्ट; बुजुर्गों की वास्तविक स्थिति पर अब होगी जवाबदेही

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किसी सभ्य समाज की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, चमकती सड़कों और आर्थिक विकास के आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों, कमजोरों और निर्भर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। आज जब संयुक्त परिवार तेजी से एकल परिवारों में बदल रहे हैं और शिक्षा व रोजगार के लिए युवा महानगरों तथा विदेशों में बस रहे हैं, तब बुजुर्ग माता-पिता का अकेलापन हमारे सामाजिक विकास पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
सबसे पीड़ादायक स्थिति तब होती है, जब जिन माता-पिता ने अपनी संतान के भविष्य के लिए जीवन भर संघर्ष किया, वही संतान उनके जीवन के अंतिम पड़ाव पर उनसे भावनात्मक दूरी बना लेती है। सवाल यह नहीं है कि बच्चे विदेश क्यों गए? सवाल यह है कि क्या विदेश जाने के साथ माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी भी पीछे छूट गई?
इसी व्यापक चिंता के बीच 7 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में बुजुर्गों के अधिकारों से संबंधित वर्ष 2016 से लंबित जनहित याचिका की सुनवाई महत्वपूर्ण बन गई। अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से वृद्धाश्रमों तथा वरिष्ठ नागरिकों को उपलब्ध सुविधाओं की ताजा स्थिति रिपोर्ट मांगी है। राज्यों को संबंधित पत्र प्राप्त होने के बाद लगभग चार सप्ताह में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट की दस्तक—क्या देश अपने बुजुर्गों के लिए तैयार है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने लंबे समय से लंबित मामले को गंभीरता से लिया। वर्ष 2016 में दायर इस जनहित याचिका का मुद्दा केवल वृद्धाश्रमों की संख्या तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा, आश्रय, पेंशन, स्वास्थ्य सुविधा और गरिमापूर्ण जीवन उपलब्ध कराने का संवैधानिक प्रश्न है।
अदालत ने अटॉर्नी जनरल को राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एडवोकेट जनरल तथा स्टैंडिंग काउंसिल से संपर्क कर वृद्धाश्रमों की स्थापना और उनमें उपलब्ध सुविधाओं की अद्यतन जानकारी जुटाने का निर्देश दिया है।
यह केवल सरकारी आंकड़े जुटाने की कवायद नहीं है। असली सवाल है—कागजों पर बुजुर्गों के लिए कितनी योजनाएं हैं और जमीन पर उनका लाभ वास्तव में कितने बुजुर्गों तक पहुंच रहा है?
अनुच्छेद 21: सिर्फ जीवन नहीं, गरिमा का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है। बुजुर्गों के संदर्भ में इसका अर्थ केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं माना जा सकता। सम्मान, सुरक्षा, स्वास्थ्य, आश्रय और गरिमा के साथ जीवन जीना भी इस विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 में वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण की व्यवस्था की गई है। कानून की धारा 19 में राज्यों द्वारा चरणबद्ध रूप से प्रत्येक जिले में कम-से-कम एक वृद्धाश्रम स्थापित करने का प्रावधान है।
लेकिन सवाल है—क्या वृद्धाश्रम केवल भवन का नाम है?
क्या वहां पर्याप्त भोजन मिलता है? क्या स्वच्छता की व्यवस्था है? क्या नियमित चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध है? क्या दवाइयां मिलती हैं? क्या सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है? क्या बुजुर्गों की मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को समझा जाता है?
यही वे प्रश्न हैं जिनका वास्तविक उत्तर अब राज्यों की रिपोर्ट से सामने आना चाहिए।
वृद्धाश्रम समाधान हैं या परिवार के विघटन का आईना?
वृद्धाश्रम अपने आप में बुराई नहीं हैं। संतानविहीन, अकेले, आर्थिक रूप से कमजोर या असुरक्षित वरिष्ठ नागरिकों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक संस्थागत देखभाल बेहद आवश्यक हो सकती है।
समस्या तब पैदा होती है जब वृद्धाश्रम जरूरतमंद बुजुर्गों के सहारे के बजाय सक्षम संतानों की जिम्मेदारी से बचने का माध्यम बनने लगें।
जिस मां ने बच्चे की बीमारी में रातें जागकर गुजारीं, जिस पिता ने अपनी जरूरतें रोककर बच्चे की फीस भरी, जिन माता-पिता ने अपनी इच्छाओं का त्याग कर संतान को बेहतर भविष्य दिया—यदि वही माता-पिता बुढ़ापे में अपने ही बच्चों के लिए बोझ बन जाएं तो यह केवल पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता के क्षरण का संकेत है।
विदेश जाना गलत नहीं है। बेहतर अवसरों की तलाश भी स्वाभाविक है। लेकिन भौगोलिक दूरी को भावनात्मक दूरी में बदल देना चिंता का विषय है। तकनीक के इस दौर में हजारों किलोमीटर दूर रहकर भी माता-पिता से संवाद, आर्थिक सहयोग, स्वास्थ्य की निगरानी और भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखा जा सकता है।
कितने वृद्धाश्रम, कितनी पेंशन और कैसी चिकित्सा?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान तीन प्रमुख मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट करने की आवश्यकता सामने आई—देश में कितने वृद्धाश्रम हैं, बुजुर्गों को कितनी पेंशन मिल रही है और उनकी चिकित्सा सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है।
केंद्र की ओर से अगस्त 2023 में दाखिल हलफनामे में 15 राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों की जानकारी दी गई थी, लेकिन अद्यतन और पूर्ण राष्ट्रीय तस्वीर सामने नहीं आई थी। अदालत ने इस मामले के लंबे समय तक सूचीबद्ध न होने पर भी सवाल उठाया।
अब राज्यों से मांगी गई रिपोर्ट यह स्पष्ट करने का अवसर देती है कि सरकारी योजनाएं वास्तविक धरातल पर कितनी प्रभावी हैं।
देशव्यापी नीति या हाईकोर्टों के जरिए निगरानी?
सुनवाई में मामले को संबंधित हाईकोर्टों को भेजने का सुझाव भी सामने आया। हालांकि याचिकाकर्ता की ओर से इसका विरोध किया गया और यह तर्क रखा गया कि बुजुर्गों के अधिकार पूरे देश से जुड़े समान संवैधानिक प्रश्न हैं।
यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण है। बुजुर्गों की गरिमा किसी राज्य की सीमा से निर्धारित नहीं हो सकती। चाहे महाराष्ट्र हो, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, दिल्ली या कोई अन्य राज्य—वरिष्ठ नागरिकों को सम्मान और सुरक्षा का अधिकार समान होना चाहिए।
देशभर के लिए व्यापक सिद्धांत तय करने और स्थानीय स्तर पर उनके क्रियान्वयन की निगरानी की व्यवस्था अधिक प्रभावी मॉडल बन सकती है।
सरकार से पहले परिवार को देनी होगी जवाबदेही
सरकार वृद्धाश्रम बना सकती है, पेंशन दे सकती है, अस्पतालों में जेरियाट्रिक सेवाएं विकसित कर सकती है और कानून बना सकती है। लेकिन कोई कानून परिवार के भीतर प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता पैदा नहीं कर सकता।
इसलिए समस्या के दो आयाम हैं—सरकारी जिम्मेदारी और पारिवारिक संवेदनशीलता।
सरकार को पर्याप्त वृद्धाश्रम, सम्मानजनक पेंशन, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, कानूनी संरक्षण और प्रभावी शिकायत तंत्र सुनिश्चित करना होगा।
वहीं परिवारों को समझना होगा कि बुजुर्गों को केवल पैसा नहीं चाहिए। उन्हें समय, संवाद, अपनापन और यह भरोसा चाहिए कि वे अपने ही घर में अनावश्यक नहीं हैं।
बुजुर्ग बोझ नहीं, हमारी जीवित स्मृति हैं
आज जिस पीढ़ी को हम बुजुर्ग कहते हैं, उसी ने सीमित संसाधनों में परिवार खड़े किए, बच्चों को शिक्षित किया, कठिन परिस्थितियों में घर चलाया और अगली पीढ़ी के सपनों को अपने सपनों से ऊपर रखा।
इसलिए बुजुर्गों की देखभाल दया नहीं, बल्कि सामाजिक कृतज्ञता और नैतिक जिम्मेदारी है।
हमारी कोशिश ऐसी व्यवस्था बनाने की होनी चाहिए जिसमें वृद्धाश्रम किसी बुजुर्ग की मजबूरी न हों, बल्कि जरूरतमंदों के लिए सम्मानजनक विकल्प हों। पेंशन इतनी प्रभावी हो कि बुजुर्ग अपनी मूल जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भर न रहें। अस्पतालों में उम्र के अनुरूप चिकित्सा उपलब्ध हो और उत्पीड़न की स्थिति में तत्काल कानूनी संरक्षण मिले।
अंतिम सवाल—हम अपने भविष्य के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं?
सुप्रीम कोर्ट की 7 सितंबर 2026 की सुनवाई ने बुजुर्गों के अधिकारों की बहस को फिर राष्ट्रीय केंद्र में ला दिया है। अब राज्यों को अपनी व्यवस्थाओं की वास्तविक तस्वीर अदालत के सामने रखनी होगी।
लेकिन सबसे बड़ी रिपोर्ट सरकारों को नहीं, हम सभी को स्वयं से मांगनी चाहिए।
हमने अपने माता-पिता के लिए कितना समय निकाला?
हमने उनकी बीमारी में कितनी बार उनका हाथ थामा?
हमने उनकी इच्छाओं को कितनी बार समझा?
और क्या हमने उन्हें यह महसूस कराया कि वे हमारे जीवन में आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं?
आज जिस मां-बाप को हम अकेला छोड़ रहे हैं, कल हम स्वयं उसी उम्र की ओर बढ़ेंगे।
समाज की वास्तविक प्रगति तब होगी, जब वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ने को उपलब्धि नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने को उपलब्धि माना जाएगा जिसमें कोई बुजुर्ग केवल इसलिए वृद्धाश्रम जाने को मजबूर न हो क्योंकि उसके अपने बच्चों ने उसे भुला दिया।
सुप्रीम कोर्ट सरकारों से रिपोर्ट मांग रहा है। अब समय है कि समाज भी स्वयं से एक रिपोर्ट मांगे—हमने अपने बुजुर्गों के लिए क्या किया?
शायद इसी आत्ममंथन का उत्तर तय करेगा कि हम वास्तव में आधुनिक हुए हैं या केवल आधुनिक दिखाई देने लगे हैं।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
विशेषज्ञ स्तंभकार | साहित्यकार | अंतरराष्ट्रीय लेखक | चिंतक | कवि | संगीत माध्यमा | सीए (एटीसी) | एडवोकेट
गोंदिया, महाराष्ट्र

Editor CP pandey

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