सागर की धरती रो पड़ी, आँखों में है नमी,किसने घोला ज़हर, बाँटी हैं मौत की ग़मी?जाम समझ बढ़े, “ज़िंदगी” हाथ…
नदियाँ अपना रौद्र रूप धरती हैं, तो सिर्फ़ घर नहीं बहते- बह जाते हैं सपने भी, किसी माँ की उम्मीद,…